Φ अपना विषय खोजे

Saturday, October 13, 2012

▐ रॉबर्ट राष्ट्रीय दामाद▬ नेहरू खानदान की अनैतिकता, बईमानी और भ्रष्टाचार की कहानी का एक और अध्याय !

▐ रॉबर्ट राष्ट्रीय दामाद▬ नेहरू खानदान की अनैतिकता, बईमानी और भ्रष्टाचार की कहानी का एक और अध्याय !

सत्ताधारी सास का भ्रष्टाचारी दामाद


 
नेहरू खानदान की अनैतिकता, बईमानी और भ्रष्टाचार की कहानी कोई पहली बार उजागर नहीं हुई है। जवाहर लाल नेहरू के शासनकाल में जीप और तोप-राइफल घोटाला हुआ था। इन्दिरा गांधी ने संवैधानिक संस्थाओं का कांग्रेसीकरण, अनैतिककरण किया था। ईमानदारी की देवी कही जानेवाली इन्दिरा गांधी के शासनकाल में ही भ्रष्टचार सर्वव्यापी हुआ था। राजीव गांधी पर बोफोर्स तोप घोटाला में दलाली खाने के कुख्यात आरोप लगे थे। सोनिया गांधी के ऊपर मूर्ति तस्कर और कालेधन पर सुब्रहण्यम स्वामी के आरोप भी न्यायालय में लंबित हैं और चर्चित भी हुए हैं। अब सोनिया गांधी के दामाद, प्रियंका के पति राबर्ट वाड्र पर सास की सत्ता का लाभार्थी होने का आरोप लगा है।
राबर्ट व डीएलएफ के पक्ष में बैंटिंग और राबर्ट वाडा व डीएलएफ को ईमानदारी का सर्टिफिकेट देने वाले कांग्रेसियों, मीडियाकर्मियों और अन्य सभी इनके समर्थकों के पास इन प्रश्नों का उत्तर है क्या? क्या राबर्ट वाड्रा आम आदमी है? अगर राबर्ट वाडा आम आदमी होता तो क्या उसे डीएलएफ में चपरासी की भी नौकरी मिल सकती थी? उसके पास कौन सी विजनेस क्लास की डिग्री है, वह किस क्षेत्र का विशेषज्ञ है जिसके आधार पर डीएलएफ ने उसे अपना डाइरेक्टर बनाया? क्या देश की सत्ता की असली बागडौर हाथ में रखने वाली सोनिया गांधी का राबर्ट वाड्रा दामाद नहीं है? क्या राबर्ट वाड्रा किसी भी कंपनी को अनाप-शनाप और कानूनो को ताक पर रखकर फायदा पहुंचाने की हैसियत नहीं रखता है?
राबर्ट वाडा की कंपनी की संपत्ति रातोरात कुछ लाख से उठकर 400 करोड़ रूपये कैसे हो गयी? आम आदमी को 400 करोड़ की ईमानदारी और कानूनी ढंग से संपत्ति बनाने में वर्षों क्यों लग जाते हैं? क्या डीलएफ किसी एक व्यक्ति की  निजी प्रोपर्टी है? क्या डीएलएफ एक प्राइवेट कंपनी नहीं है? क्या डीएलएफ शेयर मार्केट में सूचीबद्ध नहीं है? अगर डीएलएफ एक प्राइवेट कंपनी है और वह शेयर मार्केट में सूचीबद्ध कंपनी है तब किसी एक व्यक्ति पर करोड़ो-अरबों रूपये लुटाने का उसे कानूनी अधिकार है क्या? राबर्ट वाड्रा को व्याज रहित कर्ज देने और औने-पौने भाव में संपत्ति बेचने से क्या डीएलएफ के शेयरधारकों के हित पर चोट नहीं पहुंची है? क्या डीएलएफ के शेयरधारकों की सहमति राबर्ट वाडा प्रकरण में ली गयी थी? डीएलएफ  क्या दाउद इब्राहिम को अपनी संपत्ति का हिस्सेदार बना सकता है और उसे लगभग मुफ्त में अपनी संपति दे सकता है? इन सभी प्रश्नों का उत्तर कांग्रेसियों, सोनिया गांधी-राबर्ट वाडा के बचाव करने वाले राजनीतिक मैनजरों, पत्रकारों और अन्य समर्थकों के पास हो ही नही सकता है। कुतर्क से सच्चाई नहीं छुपायी जा सकती है और न ही कानूनी अपराध को ढ़का जा सकता है। यह सीधेतौर पर सास की सत्ता का लाभार्थी होने का प्रसंग है? सत्ता और राजनीति के शिखर पर बैठे और नजदीक रहने वाले लोग न केवल जनता की खून-पसीने की कमाई का दोहन करते हैं बल्कि रातोरात  अरबों-अरब के धनस्वामी हो जाते हैं। दुर्भाग्य यह है कि राबर्ट वाडा जैसे लोग सत्ता के गैर कानूनी ही नहीं बल्कि अपराधिक तौर पर दोहन करने के बाद भी  ईमानदारी की बात करते हैं और कानून को खरीदकर बरी भी हो जाते हैं।
अनैतिक है कुर्तक की ढाल
कुर्तक का ढाल कब खड़ा होता है? किन-किन मूल्यो के कब्र पर कूतर्क का ढाल खड़ा होता है? ईमानदारी और नैतिकता के कब्र पर ही कूर्तक का ढाल खड़ा होता है। अनैतिक,पतित और बईमान ही कूतर्क का ढाल खड़ा करते हैं। कुतर्क  पेश करने वाले और चमचागिरी  लगे लोग कौन हैं? कौन सी ईमानदारी और नैतिकता है इनके पास? कूतर्क और चमचागिरी हमारी सत्ता राजनीति का अंग बन गया है। राजनीतिक दोषियों, आथ्रिक अपराधियों को बचाने के लिए कूतर्क पेश करना, चमचागिरी में राजनीतिक दोषियों, आर्थिक अपराधियो के पक्ष में ढाल बनना एक फैशन हो गया है। कानूनी फैसले या फिर कानूनी संहिताओं को तोड़़-मरोड़ कर पेश करना, व्याख्या करने की राजनीतिक और बुद्धिजीवी प्रकिया खतरनाक ढंग से बढ़ी है? खासकर यूपीए वन और यूपीए टू की सरकार में हुए एक पर एक घोटालो को दबाने, उस पर पर्दा डालने के लिए कूतर्क की राजनीतिक प्रक्रिया क्या चली नहीं है? टू जी हो या फिर, राष्टमंडल खेल घोटाला/देवास घोटाला हो या फिर कोयला घोटाला, इन सभी में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, चिदम्बरम, श्रीप्रकाश जायसवाल जैसे दोषियों को बचाने और राहत दिलाने के इच्छा से राजनीतिक कूतर्क पेश नहीं किये गये थे? दिग्विजय सिंह, सलमान खुर्शीद, मनीष तिवारी जैसे कांग्रेस के दिग्गज राष्टमंडल खेल घोटाले के आरोपी सुरेश कलमाडी और टू जी घोटाले के आरोपी ए राजा को ईमानदारी के सर्टिफिकेट  नहीं दिये थे क्या? टू जी के घोटालेबाज बिजनेश घरानों के पक्ष में क्या बैटिंग नहीं हुई थी और इन्हें जेल में रखने के खिलाफ कूतर्क पेश नहीं किये गये थे क्या?सुरेश कलमाडी और ए राजा जैसे घोटालेबाज को  कांग्रेस और मनमोहन सरकार द्वारा ईमानदारी का सर्टिफिकेट देकर संसदीय कमिटी में अभी हाल ही में नियुक्ति दी गयी है। कलमाडी-ए राजा की संसदीय कमिटी में नियुक्ति पर हो-हल्ला मचने पर भी कांग्रेस की ओर कूूतर्क क्या पेश नहीं किया गया? जिस तरह से कलमाडी, ए राजा के पक्ष में दिग्विजय सिंह, सलमान खुर्शीद और मनीष तिवारी जैसे कांग्रेसियों ने कूतर्क पेश किये थे उसी तरह से सोनिया गांधी के दामाद रार्बट वाडा के प़क्ष में भी बेटिंग हो रही है और कुतर्को का ढाल-जाल बुना जा रहा है और वह भी बेशर्मी के साथ। नैतिकता और ईमानदारी की भी कब्र पर राबर्ट वाडा को ईमानदारी की सर्टिफिकेट दिया
जा रहा है।
सिर्फ दामाद मात्र की डिग्री
तल्ख शव्दों में यह तर्क काफी महत्वपूर्ण है और राबर्ट वाडा-डीएलएफ सांठगांठ को देखने-समझने का रास्ता आसान हो सकता है। अब यहां यह सवाल उठता है कि तर्क है क्या? अब आप तर्क देखिये। राबर्ट वाडा जैसे देश में करोड़ो-करोड़ युवा और अधेड़ हैं जो सड़कों पर संघर्ष करते-करते बेहाल रहते हैं पर उन्हें डीएलएफ जैसे तो क्या कोई छोटी-मोटी कंपनी में भी जगह नहीं मिल पाती है? इस सच को स्वीकार करना होगा। अगर राबर्ट वाडा आम आदमी होता तो डीएलएफ में उसे चपरासी की भी नौकरी नहीं मिल सकती थी। जानना यह भी जरूरी है कि रार्बड वाडा डीएलएफ के डायरेक्टर हैं? राबर्ट वाडा रियल स्टेट का कौन सा चैम्पियन है? उसके पास कौन सी बिजनेस क्लास का डिग्री है? वह किस क्षेत्र का विशेषज्ञ है जो डीएलएफ ने रार्बट वाडा को डायरेक्टर के लायक माना और डायरेक्टर बनाया। मेरी समझ से राबर्ट वाडा के पास सिर्फ और सिर्फ सोनिया गांधी के दामाद होने की ही डिग्री है जिसके आधार पर डीएलएफ ने उसे अपनी कंपनी डायरेक्टर के पद के लिए चुना और उसे लगभग मुफ्त अपनी संपत्तियां सौंपी हैं।
पर्दे पर छिपे है अनेक रहस्य
अभी पर्दे के पीछे वाडा और डीएलएफ प्रकरण में कई रहस्य हैं? यह सिर्फ डीएलएफ द्वारा मु्फ्त में राबर्ट वाडा को संपत्ति देने और 400 करोड़ की संपत्ति बनाने में मदद करने का ही प्रसंग नहीं है। इसके बदले में डीएलएफ ने कितनी सरकारी-प्रशासनिक अपनी समस्याएं हल करायी, कितनी कानूनी संहिताओं को रार्बट वाडा की पहुंच के बल पर ठोकर मारी है? क्या राजनीतिक रिश्वत खोरी और कालेधन का रहस्य कहीं न कहीं छुपा है? सच तो यह है कि डीएलएफ ही नहीं बल्कि जितनी भी बड़ी-बड़ी कपिनयां हैं उन सभी कंपनियों में नेताओं और अपराधियों के भ्रष्टाचार, लूट, डकैती से प्राप्त किया गया काला धन जमा है। डीएलएफ कोई सत्य हरिशचन्द्र के सिद्धांत पर खड़ा नहीं है। राबर्ट वाडा का कितना काला धन डीएलएफ में जमा है? इस आधार पर ध्यान देना चाहिए कि नेता या किसी अन्य सवंर्ग के कालेधन के विसात पर ही कपनियां उन्हें लाभार्थी बनाती हैं।
स्वतंत्र जांच से परहेज क्यों?
एक नैतिक और ईमानदार अभिभावक का कर्तव्य क्या होता है। नैतिक और इमानदार अभिभावक का पहला कर्तव्य अपने वारिशों के गुनाह छिपाना नहीं बल्कि कानून की सजा के लिए अपने वारिशों को सुपर्द करना होता है। अगर सोनिया गांधी में ईमानदारी होती और नैतिकता होता तो वह किसी भी परिस्थिति मे अपने दामाद राबर्ड का बचाव नहीं करती। अब किसी को क्यों यह कहना चाहिए कि सोनिया गांधी का परिवार ईमानदार है? राबर्ट वाडा की करतूतों से छवि सिर्फ और सिर्फ सोनिया गांधी के खानदान की खराब हुई है। सोनिया गाधी, प्रियंका गांधी और राहुल गांधी को राबर्ट वाडा की करतूतों का प्रतिफल मालूम होता तो शायद ही कूर्तकों का ढाल खड़ा किया जाता? राबर्ट वाडा को कानूनी तौर स्वयं को ईमानदार साबित करने के लिए छोड़ दिया  जाता? पर सोनिया गांधी ने अपने दामाद के बचाव में कांग्रेसियों की पूरी टीम ही उतार दी है। अगर राबर्ट वाडा ईमानदार है तो फिर उसके खिलाफ पुलिस-न्यायिक जांच की मांग को खारिज करने का आधार क्या है? नैतिकता और ईमानदार वाली सत्ता व्यवस्था पुलिस-न्यायिक जांच से हटती नहीं है। दुर्भाग्य यह है कि न तो हम मनमोहन सरकार से नैतिकता व ईमानदारी की बात सोच सकते हैं और न ही सोनिया गांधी से ईमानदारी और नैतिकता की आश कर सकते हैं। निश्चित तौर पर राबर्ट वाड्रा अपनी सास की सत्ता का लाभार्थी बना है।

No comments:

Post a Comment