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Saturday, April 13, 2013

2014 में होने वाले में आम चुनाव में लोकसभा की लगभग 160 सीटों पर ट्विटर-फेसबुक का असर

चुनाव के नतीजों पर ट्विटर-फेसबुक का असर?

फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया के मंच का इस्तेमाल करने वाले लोग नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं?

एक नए अध्ययन में इसी सवाल का जवाब खोजा गया है.

आयरिश नॉलेज फाउंडेशन एंड इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने इस पर एक शोध किया है और कहा है कि 2014 में होने वाले में आम चुनाव में लोकसभा की लगभग 160 सीटों पर इसका असर दिखाई दे सकता है.

सर्वाधिक प्रभाव वाली सीटें

अध्ययन में सबसे सर्वाधिक प्रभाव वाली सीटों की पहचान की गई है.सबसे अधिक प्रभाव वाली सीटों का तात्पर्य उन सीटों से है, जहां पिछले लोकसभा चुनाव में विजयी उम्मीदवार के जीत का अंतर फेसबुक का प्रयोग करने वालों से कम है अथवा जिन सीटों पर फेसबुक का प्रयोग करने वालों की संख्या कुल मतदाताओं की संख्या का 10 प्रतिशत है.

अध्ययन में 67 सीटों की 'अत्यधिक प्रभाव वाली', जबकि शेष सीटों की 'कम प्रभाव वाली' सीटों के रूप में पहचान की गई है.

लोकसभा की कुल 543 में से 160 सीटों पर सोशल मीडिया का खासा असर देखने को मिल सकता है. महाराष्ट्र में इसका सबसे ज्यादा असर पडऩे की संभावना है. यहां की 21 सीटों पर सोशल मीडिया का असर पड़ सकता है."

महाराष्ट्र और गुजरात आगे

जबकि गुजरात में 17 सीटें सोशल मीडिया से प्रभावित हो सकती हैं. इसी तरह उत्तर प्रदेश में 14, कर्नाटक की 12, तमिलनाडु की 12, आंध्र प्रदेश की 11, केरल की 10 और मध्य प्रदेश की 9 सीटों पर इसका असर देखने को मिल सकता है.

ये वो लोकसभा सीटें हैं जहां लोग सोशल नेटवर्किंग साइट का इस्तेमाल सबसे ज्यादा करते हैं. इन निर्वाचन क्षेत्रों में कुल मतदाताओं के दस फीसदी से ज्यादा लोग फेसबुक से जुड़े हुए हैं.

सर्वेक्षण के मुताबिक फेसबुक से जुड़े लोग चुनाव से पहले अपने आसपास के वोटरों को प्रभावित कर सकते हैं.

अध्ययन का ये भी कहना हैं कि चुनाव से 48 घंटे पहले उम्मीदवारों के चुनाव प्रचार पर रोक लगने के बाद फेसबुक, ट्विटर जैसी सोशल मीडिया चुनाव प्रचार की कमान संभाल लेंगे.

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Wednesday, January 9, 2013

ऐसी धमकी तो कभी लादेन ने भी नहीं दी

 - सुन, शैतान की औलाद!

 

ऐसी धमकी तो कभी लादेन ने भी नहीं दी
अकबरुद्दीन ओवैसी के बयान पर इन पालतू राष्ट्रवादी मुसलमानों तक की बकार भी नहीं फूटी। किसी अन्य शीर्ष नेता ने भी आज दिन तक ओवैसी पर कड़ी कार्रवाई की मांग नहीं की है। किसी बुद्धिजीवी, पत्रकार और सेकुलर नेता ने यह जानने की जहमत भी नहीं उठाई है कि ओवैसी के पास आखिर कौन सा ऐसा हथियार है जिससे वह १०० करोड़ हिंदुओं के खात्मे की वल्गना कर रहा है? कहीं ओवैसी को पाकिस्तानी इस्लामी परमाणु बम हाथ तो नहीं लग गया? ओवैसी जितनी बड़ी धमकी दे रहा है उतनी बड़ी धमकी तो कभी ओसामा बिन लादेन ने भी नहीं दी। जुल्फिकार अली भुट्टो दशकों तक हिंदुस्तान से लड़ने का दंभ भरा करते थे तो उनकी बेटी बेनजीर भुट्टो सदियों तक हिंदुस्तान से लड़ने का पाकिस्तानी हौसला बयान किया करती थी, पर उन दोनों ने भी कभी १०० करोड़ हिंदुओं के खात्मे का बड़बोलापन नहीं किया। फिर ओवैसी के इतने जबर्दस्त विध्वंसक बयान पर भी सेकुलरवाद के रखवाले गूंगे-बहरे क्यों बने रहे? ‘सहमत’ और शबाना आजमी का एक बयान जरूर आया पर उसमें भी औपचारिक विरोध के अलावा कुछ नजर नहीं आता।

 

ओवैसी को हल्के में लिया तो पछताओगे
आंध्रप्रदेश की पुलिस ने तो ओवैसी के इस बयान पर एक साधारण एफआईआर दर्ज करना भी जरूरी नहीं माना और उनकी कलम तब उठी जब अदालत ने निर्देश दिया। गुजरात दंगों में मुस्लिमों की मौत के लिए दुनिया की कोई भी अदालत न्याय के मान्य मापदंड पर नरेंद्र मोदी को दोषी नहीं ठहरा सकती, फिर भी सिर्फ यूरोप-अरब-अमेरिका प्रायोजित एनजीओ बिरादरी के बखेड़े पर मोदी को यूरोप और अमेरिका मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर विराजमान होने के बावजूद वीसा देने से इंकार करते हैं। ओवैसी को इतने घातक बयान के बाद भी ब्रिटेन का वीसा मिलने और लंदन यात्रा करने में कोई दिक्कत नहीं आती। इस राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय ढोंग का क्या औचित्य? क्या ओवैसी के बयान को हलके में लिया जा सकता है? ओवैसी जिस आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन का विधायक है उसकी पृष्ठभूमि जानने वाला कोई भी जानकार उसके बयान को हलके में लेने की सलाह नहीं देगा। मुस्लिम अलगाववाद का सऊदी अरेबिया और पाकिस्तान प्रायोजित जो ब्लू प्रिंट है उसका अंतिम चरण दक्षिणी हिंदुस्थान का इस्लामी अलगाववाद है। इस्लामी अलगाववाद का पहला चरण कश्मीर, दूसरा चरण असम समेत पूर्वोत्तर, तीसरा चरण हिंदुस्थान के प्रमुख शहरों को निशाना बनाना तथा अंतिम चरण हैदराबाद को केंद्र में रख दक्षिणी हिंदुस्थान में अलगाववादी ताकतों को बढ़ावा देना है।

 

हैदराबाद हो पाकिस्तान का हिस्सा...
इस्लामी आतंकवाद का कश्मीर को हिंदुस्थान से अलग करने का प्रयास १९४७ से जारी है। १९६० के दशक से लगातार पूर्वोत्तर हिंदुस्थान में मुस्लिम आबादी बढ़ाकर असम को लीलने का प्रयास चल रहा है। १९८० के बाद से दर्जनों बार असम में स्थानाrय असमी आबादी और बांग्लादेशी मुसलमानों के बीच टकराव हो चुका है। बीते वर्ष जब बोडो जनजाति और बांग्लादेशी मुसलमानों के बीच संघर्ष व्यापक हुआ था तब मुंबई, बैंगलोर समेत तमाम शहरों में मुसलमानों ने किस तरह पूर्वोत्तर वासियों को धमकाया यह पूरा देश हताश होकर देख रहा था। १९९० के दशक से ऑपरेशन के-२ के माध्यम से इस्लामी अलगाववादी देश के तमाम शहरों में निर्दोष हिंदुओं का खून बहाते रहे हैं। हुजी, लश्कर-ए-तोयबा, इंडियन मुजाहिदीन, हरकत-उल-अंसार जैसी दर्जनों तंजीमे हिंदुस्थान में ग्रीन कॉरिडोर (हरा गलियारा) बनाने में जुटी रही हैंै। शायद ही कोई प्रमुख शहर बचा हो जहां इस्लामी आतंकवाद का पंजा नजर न आया हो। अब मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एमआईएम) के विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी का बयान संकेत दे रहा है कि मुस्लिम अलगाववाद अपने चौथे यानी अंतिम चरण में पहुंचने को है। १९४७ के पहले जिन इलाकों से पाकिस्तान समर्थक बांग लगी थी उसमें हैदराबाद प्रमुख था। हैदराबाद को पाकिस्तान का हिस्सा बनाने की मांग के लिए ही एमआईएम गठित हुई थी। ज्ञात इतिहास के अनुसार १९२७ में निजाम का समर्थन करने के लिए नवाब मीर उस्मान अली खान की सलाह पर महमूद नवाज खान किलेदार गोलकुंडा ने एमआईएम का गठन किया था। इसकी पहली बैठक नवाब महमूद नवाज खान के घर ‘तौहीद मंजिल’ में हुई थी जिसमें पहला ही प्रस्ताव यही था कि एमआईएम को किसी भी सूरत में हैदराबाद को हिंदुस्थान का हिस्सा बनने से रोकना है।

 

...तब कासिम राजवी दुम दबाकर भागा
पाकिस्तान की मांग १९३० के दशक में हुई, एमआईएम उसके पहले से अलगाववाद की पैरोकार रही है। १९३८ में बहादुर यार जंग एमआईएम का सदर बना तो उसने मुस्लिम लीग के साथ सियासी समीकरण बैठा लिया। २६ दिसंबर १९४३ को लाहौर के मुस्लिम लीग सम्मेलन में इसी नवाब बहादुर यार जंग ने पाकिस्तान के समर्थन में सबसे आक्रामक भाषण दिया था। एमआईएम ने आजादी के पहले हैदराबाद से हिंदुओं के सफाए के लिए डेढ़ लाख रजाकारों की फौज तैयार की थी। हैदराबाद स्टेट में तब महाराष्ट्र का वर्तमान मराठवाड़ा भी हिस्सा था। हैदराबाद स्टेट के तत्कालीन प्रधानमंत्री मीर लाइक अली की सलाह पर तब कासिम राजवी नामक वकील को रजाकारों की सेना का मुखिया बनाया गया था। जब १९४८ में रजाकारों ने हिंदुओं का कत्लेआम शुरू किया तब भी पं. जवाहर लाल नेहरू मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति के चलते हिंदुओं का खूनखराबा रजाकारों के हाथ चुपचाप देखते रहे। उन दिनों सरदार वल्लभभाई पटेल देश के गृहमंत्री थे, उन्होंने नेहरू को फटकारा और सेना और पुलिस के संयुक्त अभियान के तहत ‘ऑपरेशन पोलो’ का आदेश दिया। हिंदू जनता पहले से ही रजाकारों की बर्बरता से लड़ने को तैयार थी। जब रजाकार चुन-चुन कर काटे जाने लगे तब मुस्लिम अलगाववादियों का दिमाग ठिकाने पर आया और निजाम भी आत्मसमर्पण को मजबूर हुआ। रजाकारों के मुखिया कासिम राजवी को जेल में ठूंस दिया गया। जब उसने अपने गुनाहों से तौबा कर लिया तब उसे १९५७ में पाकिस्तान जाने की शर्त पर जेल से रिहा किया गया। राजवी के दुम दबाकर भागने के बाद एमआईएम ठंडी पड़ गई। उसका नियंत्रण अब्दुल वाहिद ओवैसी के हाथ आ गया।

 

ये है ओवैसी का अतीत...
अब्दुल वाहिद ओवैसी स्वयंभू सालार-ए-मिल्लत (कौम का कमांडर) कहलाता था। १९६० में उसने हैदराबाद महापालिका का चुनाव जीता। १९६२ में अब्दुल वाहिद ओवैसी का बेटा सुलतान सलाहुद्दीन ओवैसी पथरघट्टी विधानसभा सीट जीतकर आंध्र प्रदेश विधानसभा पहुंचा। १९६७ में वह चारमीनार से और १९७२ में यकूतपुरा से विधानसभा पहुंचा। १९७४-७५ में सुलतान सलाहुद्दीन ओवैसी एमआईएम का सर्वेसर्वा बन गया। १९८४ में सुल्तान सलाहुद्दीन ओवैसी पहली बार हैदराबाद से लोकसभा चुनाव जीतने में कामयाब हुआ तब से २००४ तक वह लगातार सांसद रहा। २००४ में उसने अपनी जगह अपने बेटे असदुद्दीन ओवैसी को हैदराबाद से लोकसभा प्रत्याशी बनाया। २९ सितंबर २००८ को सुलतान सलाहुद्दीन के इंतकाल के बाद उसका बड़ा बेटा असदुद्दीन एमआईएम का प्रमुख बन गया। १९९० के दशक में एमआईएम में फूट पड़ी थी। ओवैसी परिवार के खिलाफ एमआईएम के चंद्रगुट्टा के विधायक अमानुल्ला खान ने बगावत कर दी तो १९९९ में अकबरुद्दीन ओवैसी को उसके खिलाफ उतार कर ओवैसी परिवार ने उसे परास्त किया था। हैदराबाद की महापालिका पर भी एमआईएम का कब्जा है और हैदराबाद का महापौर एमआईएम का मोहम्मद माजिद हुसैन है। एमआईएम की दहशत के चलते बीते कई वर्षों से हैदराबाद में रामनवमी के जुलूस को राज्य सरकार अनुमति नहीं दे रही। चारमीनार के निकट भाग्यलक्ष्मी मंदिर जो कि ३०० साल पुराना ऐतिहासिक मंदिर है और जिसके नाम पर हैदराबाद पहले भाग्यनगर के रूप में जाना जाता था, के गुबंद का निर्माण रोका गया।

 

औवेसी के सामने कांग्रेस भीगी बिल्ली!
आंध्रप्रदेश विधानसभा में एमआईएम के केवल ७ विधायक हैं पर उनकी दबंगई से कांग्रेस की सरकार कांपती है। अकबरुद्दीन ओवैसी माफिया गतिविधियों और हिंदूद्रोही वक्तव्यों के लिए कुख्यात है। २००७ में इसी अकबरुद्दीन ने ऐलान किया था कि यदि सलमान रश्दी या तस्लीमा नसरीन कभी हैदराबाद आए तो वह उनके सिर कलम कर लेगा। तस्लीमा नसरीन पर एमआईएम के कार्यकर्ताओं ने हमले की योजना भी बनाई थी, पर आज दिन तक आंध्र की कांग्रेस सरकार ने अकबरुद्दीन के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। २०११ में कुरनूल में एमआईएम की एक रैली में इसी अकबरुद्दीन ने आंध्र के विधायकों को काफिर तथा आंध्र की विधानसभा को कुप्रâस्तान कह कर अपमानित किया था, पर किसी आंध्र के विधायक ने अकबरुद्दीन पर विशेषाधिकार हनन का मामला चलाने की भी हिम्मत नहीं जुटाई। इसी रैली में उसने पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंहराव को कातिल, दरिंदा, बेईमान, धोखेबाज और चोर जैसी गालियां देकर कहा था -‘अगर राव मरा नहीं होता तो मैं उसे अपने हाथों से मार डालता।’ अप्रैल २०१२ में अकबरुद्दीन ने हरामीपने की हद पार करते हुए हिंदुओं के प्रभु राम और उनकी मां कौशल्या के लिए ऐसे अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया जिसे सुनकर उस सूअर के पिल्ले की खाल खींच लेना ही एकमेव दंड बचता है।

 

अगस्त २०१२ में इसी अकबरुद्दीन ओवैसी ने आंध्र पुलिस को ‘हिजड़ों की फौज’ करार दिया था, तब भी इस ‘लंडूरे’ के खिलाफ आंध्र पुलिस का आत्म सम्मान नहीं जागृत हुआ। उस समय भी ओवैसी ने चुनौती दी थी कि पुलिस और हिंदुओं में मुसलमानों से लड़ने की ताकत नहीं। बीते माह ८ दिसंबर २०१२ को इसी हरामपिल्ले ने फिर जहर उगला- ‘यह भाग्यलक्ष्मी कौन है और वहां बैठ कर क्या कर रही है? यह हिंदुओं का नया देवता कौन है, मैंने तो इसका नाम पहले कभी नहीं सुना। इतनी जोर से नारा लगाओ कि उनका भाग्य कांप जाए और लक्ष्मी गिर पड़े।’ अकबरुद्दीन ने जब यह हरामपंथी वाला बयान दिया तब मुस्लिमों की उन्मादी भीड़ ने ‘अल्लाह ओ अकबर’ का गगनभेदी नारा लगाया। उसके बाद उसने २४ दिसंबर को आदिलाबाद में हजारों मुसलमानों की मौजूदगी में १०० करोड़ हिंदुओं के १५ मिनट में खात्मे की कूवत का ऐलान किया। नरेंद्र मोदी को फांसी पर लटकाने की मांग की। सरकार मुस्लिम वोट बैंक के लिए चुप्पी साधे पड़ी है। सरकार हिंदुओं के सहनशीलता का इम्तहान ले रही है। यदि अकबरुद्दीन पर कार्रवाई नहीं हुई और हिंदुओं का माथा भड़का तो उसकी ऐसी दुर्दशा होगी कि उसके पूर्वज भी कब्र से निकल कर अपने गुनाहों के लिए तौबा करेंगे।

Thursday, December 20, 2012

केजरीवाल के प्रत्यक्ष लोकतंत्र के खतरे

केजरीवाल के प्रत्यक्ष लोकतंत्र के खतरे

 

केजरीवाल के प्रत्यक्ष लोकतंत्र के खतरे - India Real Time Hindi - WSJ

स्विटज़रलैंड अंतर्राष्ट्रीय रेड क्रॉस और घोर मानवाधिकार हनन के खिलाफ जिनेवा सम्मेलन का जन्मस्थान है। इस देश को धार्मिक सहिष्णुता का गढ़ माना जाता है। इसके बावजूद 2009 में, स्विटज़रलैंड ने नागरिकों के जनमत के आधार पर मस्जिदों की मीनारों पर राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध लगाया। क्योंकि स्विटज़रलैंड एक ऐसा देश है, जिसने प्रत्यक्ष लोकतंत्र को अपनाया है, लिहाज़ा जनमत का फैसला वहां का कानून बन गया।

इस कानून को धार्मिक स्वतंत्रता पर कुठाराघात कहकर व्यापक तौर पर निंदा की गई। यूरोप और मध्य एशिया में एमनेस्टी इंटरनेशनल के उप-कार्यक्रम निदेशक डेविड डियाज़-जॉगिक्स ने टिप्पणी की: “स्विटज़रलैंड एक ऐसा देश है, जहां धार्मिक सहिष्णुता की लंबी परंपरा रही है और जहां सताए हुए लोगों को शरण देने का प्रावधान है, ऐसा देश इस विकृत विभेदकारी प्रस्ताव का अनुमोदन करे, ये चौंकानेवाले है।”

फ्रेंच दैनिक ‘लिबरेशन’ के एक रिपोर्टर जीन क्वाट्रेमेर ने उपयुक्त ढंग से मीनारों पर प्रतिबंध और प्रत्यक्ष लोकतंत्र के खतरे के बीच संबंधों का खाका ये कहते हुए खींचा: “एक बार फिर, प्रत्यक्ष लोकतंत्र ने साबित किया है कि इसकी प्रकृति काफी खतरनाक है। लोगों को दूसरों से खतरों को ज़ाहिर करने की दी गई स्वीकृति, तर्कों को तिलांजलि देना और अल्पावधि-हितों पर फोकस करना, निश्चित तौर पर जनमत संग्रह सभी तरह के जनोत्तेजकों के हाथों में एक खतरनाक यंत्र है। ये समझना आसान है कि क्यों कई लोकंतात्रिक देशों ने इसे सीधे तौर पर गैरकानूनी बनाया है।”

भारत उन कई देशों में है, जिन्होंने प्रत्यक्ष लोकतंत्र को नहीं अपनाया। हम प्रतिनिधित्व पर आधारित एक लोकतंत्र हैं, जहां लोग अपने लिए कानून और नीतियां बनाने हेतु प्रतिनिधियों को चुनते हैं। हालांकि, पिछले दो-एक सालों से, अरविंद केजरीवाल और उनके समर्थक स्विस-सरीखे प्रत्यक्ष लोकतंत्र की ज़ोर-शोर से वकालत कर रहे हैं। श्री केजरीवाल दावा करते हैं कि प्रत्यक्ष कानून निर्माण विशेष हितों की हिफाज़त करने वाले कृतज्ञ भ्रष्ट राजनेताओं को दरकिनार करने की स्वीकृति प्रदान कर नागरिकों की सुरक्षा करते हैं।

श्री केजरीवाल ने जनमत संग्रहों और पहलकदमी को प्रस्तुत करने की मांग की है। जनमत संग्रह एक पद्धति है, जहां लोग, प्रत्यक्ष मतों से, नए कानून, नीति अथवा संसद द्वारा पारित मौजूदा कानून को नकारने का फैसला कर सकते हैं। दूसरी तरफ, एक पहलकदमी में नागरिकों का समूह राष्ट्रव्यापी प्रत्यक्ष मत हेतु नया मसौदा प्रस्तुत कर नए कानून अथवा संविधान संशोधन के लिए पहल करता है। हाल ही में, जिस तरीके से बहु-ब्रांड खुदरा में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को मंजूरी देने के लिए संसद में वोटिंग हुई, उसने गुस्से को भड़काया, श्री केजरीवाल ने एक बार फिर इस मुद्दे पर फैसले के लिए संसद में वोटिंग की बजाय राष्ट्रव्यापी जनमत संग्रह पर ज़ोर डाला।

मीनारों पर प्रतिबंध लगाने वाले स्विस जनमत संग्रह के भारत सरीखे देशों में प्रत्यक्ष लोकतंत्र की मांग हेतु गहरे निहितार्थ हैं, जहां कई अल्पसंख्यक गुट हैं। ये दलील दी जा सकती है कि व्यापक भागीदारी, अल्पसंख्यक समूहों को संभावित दमनकारी नीतिगत परिणामों को झेलने के लिए छोड़ती है (जैसे स्विस मीनार प्रतिबंध) जिनका समर्थन बहुसंख्यक आबादी के एक हिस्से (जैसे 50 फीसदी जमा एक वोट) ने किया।

वे अमेरिकन स्टेट्स जिन्होंने प्रत्यक्ष लोकतंत्र को अपनाया और चुनावों को लेकर पहलकदमी के दुर्भाग्यशाली उदाहरण बनाए, इस मुद्दे को स्पष्ट करते हैं। इनमें से कुछ पहलों में शामिल है, हिस्पैनिक्स के लिए बहुभाषी कार्यक्रमों को समाप्त करना, कानून में एक प्रावधान जो समलैंगिकों को बगैर भेदभाव के संरक्षण देता है और अवैध प्रवासियों को स्वास्थ्य, शिक्षा और मेडिकल फायदों जैसी आधारभूत सुविधाओं से वंचित रखना।

शायद, इसी वजह से भारतीय संविधान निर्माता चाहते थे कि कानून चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा बनाए जाएं, हालांकि संविधान सभा के अंतरिम अध्यक्ष, सचिदानंद सिन्हा ने मसौदा तैयार करने वालों के संज्ञान के लिए स्विस संविधान की ओर भी ध्यानाकर्षण दिलाया।

संविधान निर्माताओं ने इसकी बजाय यूएस संविधान, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया के राष्ट्रमंडल मॉडलों और ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था पर ज्यादा भरोसा किया। उन्होंने भारत के राष्ट्रपति के चुनाव और संविधान संशोधन के मामले में राष्ट्रव्यापी जनमत संग्रह के विचार को खारिज कर दिया।

संविधान ने जिस सरकार को ढांचागत किया वो सत्ता के प्रसार के ज़रिए प्रजा पीढ़क शासन को रोकने की कोशिश थी। इसलिए उदाहरणस्वरूप, इसकी तीन शाखाओं की प्रबंधकीय, संसदीय और न्यायिक शक्तियां पृथक हैं। संविधान ने संघवाद के ज़रिए शक्ति को छितरा दिया: ऐसा उसने केन्द्र और राज्यों के बीच सत्ता का विभाजन करके किया। ये संतुलन प्रत्यक्ष लोकतंत्र में गायब है। विभाजित-शक्ति व्यवस्था जो विचार-विमर्श और अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व, अल्पसंख्यक अधिकारों को बढ़ावा देती है, प्रतिनिधि की रोकटोक के बगैर जोखिमपूर्ण होती है।

हालांकि, ऐसा नहीं कहा जा सकता, भारत में प्रत्यक्ष लोकतंत्र की संपूर्ण मांगें औचित्यहीन हैं। मशहूर राजनीतिक विज्ञानी येहेज़केल ड्रॉर ने अन्वेषण किया कि प्रत्यक्ष लोकतंत्र छोटे समुदायों में अपेक्षाकृत अच्छा कर सकता है, जहां लोगों के ज्यादातर मुद्दों पर व्यक्तिगत अनुभव होते हैं, ये देखते हुए कि ये एक उपयुक्त विचारक प्रक्रिया और जटिल मुद्दों की पेशेवर व्याख्या के साथ संयोजित किया जाता है। जीन-जैक्स रूसो भी प्रत्यक्ष लोकतंत्र के हिमायती थे, लेकिन एक बार फिर छोटे प्रांतों के लिए।

प्रत्यक्ष लोकतंत्र सरकार का एक शक्तिशाली प्रकार है, जहां प्रत्येक नागरिक नामित छोटे इलाके में वार्तालाप में सहयोग देने की क्षमता (और इच्छाशक्ति) रखता हो। कुछ हद तक, अल्पसंख्यक दमन की चिंताएं प्रत्यक्ष लोकतंत्र में निहित होती हैं, जो प्रमुख तौर पर तब कम होती हैं, जब ये स्थानीय स्तर पर हर किसी मामले में लागू की जाती हैं, जैसे स्वास्थ्य, साफ-सफाई और आधारभूत सेवाओं का प्रावधान। छोटे क्षेत्रों में, पूरा समुदाय एकत्र हो सकता है और सक्रिय तौर पर अपने प्रतिदिन के क्रियाकलाप से जुड़े मुद्दों पर चर्चा कर सकता है।

इसे समझते हुए, संविधान निर्माताओं ने संविधान के अनुच्छेद 40 का मसौदा तैयार किया, जो राज्यों के लिए चुने गए प्रतिनिधियों वाली ग्राम पंचायतों की स्थापना ज़रूरी बनाता है और उन्हें आत्म-शासन की एक इकाई के तौर पर शक्ति भी प्रदान करता है। इससे आगे, संविधान के 73वें और 74वें संशोधनों के अंतर्गत ग्राम सभाओं और पंचायतों का गठन, प्रोफेसर ड्रॉर और रूसो द्वारा प्रतिपादित प्रत्यक्ष लोकतंत्र के सम्मोहक उदाहरण हैं।

2008 का मॉडल नगर राज बिल शहरों में ग्राम सभाओं के अनुरूप इकाईयां बनाने की बात करता है। ये बिल जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण मिशन के तहत जरूरी सुधार है, जिसका अर्थ हुआ, राज्यों को जेएनयूआरएम कार्यक्रम के तहत फंडिग की पात्रता के लिए बिल-आधारित समुदाय-सहभागी कानून बनाना अनिवार्य है।

श्री केजरीवाल और उनकी नई राजनीतिक पार्टी दुर्लभ और शायद विचित्र भी है, जो कई राजनीतिक दलों की विषमता दिखाती है, जिनकी मुख्य समस्या नए विचारों का अभाव, गहरी जातिगत-राजनीति और भ्रष्टाचार है। भारतीय राजनीति में खलबली के वक्त, श्री केजरीवाल खेल से दूर पर महत्वपूर्ण खिलाड़ी हैं। जैसा प्रताप भानु मेहता ने हाल ही में इंगित किया, विकेन्द्रीकरण को लेकर श्री केजरीवाल की तत्परता चाह जगाने वाली है। हालांकि, उन्हें असंवैधानिक राष्ट्रव्यापी जनमत संग्रह के शब्दाडंबरों को छोड़कर संवैधानिक तरीकों पर चलना चाहिए। शुरुआत में, वो सभी राज्यों से मॉडल नगर राज बिल के तुरंत कार्यान्वयन की जरूरत पर ज्यादा बात कर सकते हैं, जो शहरी परिषदों के गठन की बात करता है।

-करण सिंह त्यागी पेरिस की एक कानून फर्म में एक एसोसिएट एटॉर्नी हैं। वे हारवर्ड लॉ स्कूल से एलएलएम कार्यक्रम में स्नातक हैं।

-इंडिया रियल टाइम को ट्वीटर @indiarealtime पर फॉलो कीजिए।

Thursday, December 13, 2012

भारत के लिये क्‍यों महत्‍वपूर्ण है सर क्रीक ?

भारत के लिये क्‍यों महत्‍वपूर्ण है सर क्रीक ?

 

Sir Creek
गुजरात के कच्‍छ की समुद्री सीमा पर स्थित 650 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र सर क्रीक अचानक सुर्खियों में आ गया है। इस मुद्दे को उठाया है गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी ने और दबाने की कोशिश कर रही है केंद्र की सत्‍ताधारी पार्टी कांग्रेस। देश की सुरक्षा से जुड़े इस संवेदनशील मामले की गहराई में जाने से पहले हम आपको सैर कराना चाहेंगे सरक्रीक की।

 

आये दिन अखबारों में आप पाकिस्‍तानी रेंजरों द्वारा भारतीय मछुवारों को पकड़ने की और भारतीय रेंजरों द्वारा पाक मछुवारों के पकड़े जाने की खबरें पढ़ते रहते होंगे। असल में दोनों देशों के गरीब मछुवारे भी आज तक इस समुद्री सीमा को लेकर कंफ्यूज्‍ड हैं। सर क्रीक 650 वर्ग किलोमीटर का भारत का वो समुद्री इलाका है, जिस पर पाकिस्‍तान अपना दावा करता है।

इतिहास के पन्‍ने पलटें तो भारत में ईस्‍ट इंडिया कंपनी के शासन के दौरान चार्ल्‍स नैपियर ने 1842 में सिंध पर जीत हासिल की और उसे बंबई राज्‍य को सौंप दिया। उसके बाद सिंध में शासन कर रही सरकार ने सिंध और बंबई के बीच सीमारेखा खींचने का निर्णय लिया, जो कच्‍छ से गुजरती थी। उस निर्णय के अंतर्गत सरक्रीक खाड़ी को सिंध प्रांत में दर्शाया गया।

जबकि दिल्‍ली में शासन कर रही अंग्रेज सरकार के नक्‍शे में इसे भारत में दर्शाया गया। विवाद हुआ और फाइलों में दब गया। लेकिन स्‍वतंत्रता के बाद जब दोनों देशों के बीच बंटवारा हुआ तो पाकिस्‍तान ने सरक्रीक खाड़ी पर अपना मालिकाना हक जता दिया। इस पर भारत ने एक प्रस्‍ताव तैयार किया जिसमें समुद्र में कच्‍छ के एक सिरे से दूसरे सिरे तक सीधी रेखा खींची और कहा कि इसे ही सीमारेखा मान लेनी चाहिये। यह प्रस्‍ताव पाकिस्‍तान ने ठुकरा दिया, क्‍योंकि इसमें 90 फीसदी हिस्‍सा भारत को मिल रहा था। तब से लेकर आज तक दोनों देशों के बीच इस खाड़ी के मालिकाना हक को लेकर विवाद चल रहा है।

केंद्र में हाल ही में क्‍या हुआ

केंद्र सरकार ने हाल ही में सर क्रीक पर पाकिस्‍तान से समझौता करने पर सहमति बना ली है। ऐसी खबर आयी है कि हाल ही में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस पर डील फाइनल करने की चर्चा की। रक्षामंत्री एके एंटनी और तत्‍कालीन वित्‍त मंत्री प्रणब मुखर्जी भी इस पर राजी हो गये। माना जा रहा है कि यूपीए इस मामले को जल्‍द ही पाकिस्‍तान के सामने रख सकती है।

नरेंद्र मोदी क्‍यों कर रहे हैं विरोध

यूपीए की इस योजना के बारे में पता चलने पर नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा। पत्र में यह मांग की है कि सरक्रीक का 10 फीसदी हिस्‍सा पाकिस्‍तान को दे दिया जाये और बाकी भारत में रहने दिया जाये। यदि इससे कम पर समझौता हुआ तो देश की सुरक्षा में सेंध लग सकती है। उन्‍होंने कहा कि ऐसा होने पर पूरा देश भले ही खुद को सुरक्षित महसूस करे, लेकिन कच्‍छ सुरक्षित कभी नहीं रह पायेगा। मोदी ने कहा कि सरक्रीक में देश की प्राकृतिक संपदा का भंडार है उसे ऐसे पाकिस्‍तान को नहीं दे देनी चाहिये। आर्थिक दृष्टि से देखें तो इस क्षेत्र में भारी मात्रा में कच्‍चा तेल अथवा गैस होने की संभावना है, जो भारतीय अर्थ व्‍यवस्‍था के लिये सकारात्‍मक साबित हो सकता है।

सरक्रीक से जुड़े कुछ अन्‍य तथ्‍य

- सन 2000 में पाकिस्‍तान ने सरक्रीक पर भारी संख्‍या में सैनिकों को तैनात किया था। यानी वहां भी कारगिल जैसे युद्ध की तैयारी थी।
- 1965 के बाद ब्रिटिश पीएम हेरोल्‍ड विल्‍सन के हस्‍तक्षेप के बाद अदालत ने 1968 में फैसला सुनाया था, जिसके अनुसार पाकिस्‍तान को 9000 वर्ग किलोमीटर का मात्र 10 फीसदी हिस्‍सा मिला था।
- पाकिस्‍तान ने सिंध और कच्‍छ के बीच हुए एग्रीमेंट की कुछ तस्‍वीरों के आधार पर क्रीक को सिंध का भाग घोषित कर दिया और एक रेखा खींची जिसे ग्रीन लाइन बाउंड्री कहा।
- भारत ने इसे मानने से इंकार कर दिया। भारत ने कहा कि अंतर्राष्‍ट्रीय कानून के मुताबिक 1924 के आधार पर लगाये गये स्‍तंभों के आधार पर अपना दावा पेश किया। पाकिस्‍तान ने उसे यह कहकर मानने से इंकार कर दिया कि इस सीमा से नाव पार नहीं की जा सकती है, जबकि इस सीमा को आसानी से पार किया जा सकता है।
- 1999 में भारतीय वायुसेना ने सरहद के पार से आये एक पाकिस्‍तानी विमान को ध्‍वस्‍त कर दिया था। बताया जाता है कि यह विमान भारतीय सीमा में सर क्रीक की स्थिति को टोहने के लिये आया था। यह घटना कारगिल युद्ध के कुछ महीनों बाद ही हुई थी।

कुल मिलाकर देखा जाये तो केंद्र को इस मामले में जल्‍दबाजी नहीं करनी चाहिये। यदि नरेंद्र मोदी ने इस पर सवाल उठाये हैं, तो चुनाव के बाद इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए सुलझाने के ऐसे प्रयास करने चाहिये, जो भारत के हक में हों।

गांधी और कैलनबैक के बीच लिखे पत्र

लंदन में नीलम होंगे गांधी और कैलनबैक के बीच लिखे पत्र

 

लंदन में नीलम होंगे गांधी और कैलनबैक के बीच लिखे पत्र
गुरूवार, जून 14, 2012, 13:35 [IST]

mahatma gandhi
लंदन। दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी द्वारा गुजारे गए समय से जुड़े पत्र, तस्वीरें और दस्तावेज लंदन में 10 जुलाई को नीलाम होने जा रहे हैं। आपको बता दें कि इनमें बापू के आर्किटेक्ट हरमन कैलनबैक के विवादित संबंधों से जुड़े दस्तावेज भी शामिल हैं। नीलाम घर सॉथबी को गांधी से जुड़ी इस सामग्री से 5 लाख से 7 लाख पौंड मिलने की उम्मीद है।

पत्रों में से एक में गांधी ने 25 मार्च 1945 को कालबाख के बारे में लिखा है, ऐसे वक्त में जब सभी ने मेरा साथ छोड़ दिया था वह अक्सर मुझसे कहा करते थे कि मैं उन्हें हमेशा अपने साथ चलने वाले दोस्त की तरह पाएंगे, अगर जरूरत हुई तो, सच की तलाश में धरती के अंत तक जाएंगे।

सॉथबी ने कहा है कि इस सामग्री में दो पुरुषों के बीच दोस्ती के बारे में काफी जानकारियां हैं। यह गांधी जी की जीवनी के लिए अहम दस्तावेज हैं। कैलनबैक की दक्षिण अफ्रीका में 1904 में गांधी से मुलाकात हुई थी। इसके बाद वे दोनों हमेशा संपर्क में बने रहे।

ज्ञात हो कि गांधी जी के भारत लौटने के बाद भी उनकी दोस्ती कायम रही। 1910 में कैलनबैक ने जोहेनसबर्ग के पास 1100 एकड़ जमीन खरीदी और गांधी जी को दे दी। इस जमीन पर खेती का कामकाज गांधी जी और कैलनबैक मिलकर देखते थे।

सॉथबी ने इस विषय में जानकारी देते हुए बताया कि नीलामी के लिए रखी जाने वाली सामग्री में न केवल जमीन की खरीद से संबंधित दस्तावेज हैं, बल्कि वह दस्तावेज भी शामिल हैं, जो बताते हैं कि कैसे दोनों लोगों ने जमीन के लिए फलों के पेड़ खरीदे। वहां सिंचाई की व्यवस्था की। जमीन पर खेती को लेकर उनका पड़ोसियों से बहस होने का जिक्र भी इनमें है।

इन दस्तावेजों को ध्यान से देखने से पता चलता है कि इसमें गांधीजी के बड़े बेटे हरिलाल, दूसरे पुत्र मणिलाल और तीसरे पुत्र रामदास के बारे में भी जानकारी है। सॉथबी के मुताबिक गांधीजी के पारिवारिक सदस्यों और उनके करीबी सहयोगियों की ओर से लिखे गए इन पत्रों में गांधी की निजी जिंदगी के बारे में विस्तृत जानकारी है।

Friday, November 30, 2012

1960 के बाद का सबसे बडा दंगा अहमदाबाद

दंगों में मरता कौन है?

1960 के बाद का सबसे बडा दंगा अहमदाबाद में हुआ। राज्य सरकार ने न्यायमूर्ति जगमोहन रेड्डी वाले जाँच आयोग ने अहमदाबाद के दंगों के बारे में जो आंकडे दिये। उनके मुताबिक इस दंगे में 6742 मकान और दुकान जलाई गयीं। इनमें सिर्फ 671 हिन्दुओं की थीं बाकी 6071 मुसलमानों की नष्ट हुई। कुल सम्पत्ति का मूल्य 42324068 रुपये था। जिसमें हिन्दू सम्पत्ति 7585845 रु. की थी और मुस्लिम सम्पत्ति 34738224 रुपये की। 512 मृतकों में 24 हिन्दू थे और 413 मुसलमान । बाकी 75 की शिनाख्त नहीं हो सकी थी।


इसके बाद का सबसे बडा दंगा 1970 में भिवंडी में हुआ। इसमें 78 लोग मारे गये। इनमें 17 हिन्दू थे और 59 मुसलमान। बाकी दो की शिनाख्त नहीं हो सकी। भिवंडी दंगे की जांच के लिए नियुक्त न्यायमूर्ति डी. वी. मेडन जांच आयोग के सामने जो बयान दिये गये। उनसे यह प्रकट हुआ कि इस दंगे में 6 मुसलमान औरतों के साथ बलात्कार हुआ। जबकि एक भी हिन्दू औरत बलात्कार की शिकार नहीं हुई। भिवंडी के दंगों के परिणामस्वरूप हुये जलगांव के दंगे में 43 लोग मारे गये, जिनमें एक हिन्दू और बाकी के 42 मुसलमान। नष्ट हुयी कुल सम्पत्ति में 3390977 रुपये मूल्य की सम्पत्ति मुसलमानों की थी और सिर्फ 83725 रुपये मूल्य की हिन्दुओं की।


1967 में रांची-हटिया और नौशेरा में हुये दंगों में मृतकों की कुल संख्या 184 थी। जिनमें 164 मुसलमान और तो 19 हिन्दू, एक की शिनाख्त नहीं हो सकी। जिन दंगों का ऊपर जिक्र आया है, वे 1960 के बाद के भारत के भयंकरतम दंगों में हैं। इसके अलावा जमशेदपुर, अलीगढ, वाराणसी और बंबई जैसे शहरों में भी दंगे हुयें हैं। इन दंगों में भी कमोबेश उपर वाली स्थिति ही रही। शायद ही कोई ऐसा दंगा हुआ होगा, जिसमें मरने वालों में 70 प्रतिशत से ज्यादा मुसलमान न रहें हों। नष्ट हुई सम्पत्ति में भी लगभग यही अनुपात रहा।


सबसे ज्यादा अजीब बात यह है कि लगभग हर दंगे में पुलिस के हाथों गिरफ्तार होने वालों में भी मुसलमानों की ही संख्या अधिक रहती है. मुसलमानों के ही अधिक घरों की तलाशियां भी होतीं हैं। पुलिस भी बहुसंख्यक समुदाय की तरह यह सोचती है कि दंगों के लिये जिम्मेदार मुसलमान हैं। लिहाजा वह यह मानती प्रतीत होती है कि दंगों पर तभी नियंत्रण पाया जा सकता है जब मुसलमानों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाएगी। लेकिन इसके बावजूद बहुसंख्यक समुदाय की यह धारणा, कि दंगों में मरने वालों में अधिकतर हिन्दू होतें हैं।

यह धारणा इतनी गहरी है कि तमाम सरकारी आंकडों के बावजूद आम हिन्दू इस बात को नहीं मानता कि वास्तव में दंगों में हिन्दू ज्यादा आक्रामक होतें हैं। इसको न मानने की बात को अगर गहराई से देखा जाय तो पता चलेगा कि इसके पीछे बचपन की वो धारणाएं काम करतीं हैं। जो बचपन से हर हिन्दू घर में बच्चे को यह सिखाया जाता है कि मुसलमान क्रूर होतें हैं और वे किसी की भी जान लेने में नहीं हिचकते। इसके विपरीत हिन्दू तो बडे क़ोमल हृदय का होता है और उसके लिये चींटी की भी जान लेना मुश्किल होता है।

अक्सर आम हिन्दू आपको यह कहते हुए मिलेगा कि अरे साहब ! हिन्दू घर में तो आपको सब्जी काटने की छूरी के अलावा कोई हथियार नहीं मिलेगा। आम हिन्दू का मानना है। कि आमतौर पर मुसलमान अपने घरों में हथियारों का जखीरा रखतें हैं। यही वजह है कि आम हिन्दू को दंगों में मरने वालों के सरकारी आंकडे भी अविश्वसनीय लगतें हैं। दूसरी ओर कोई भी सरकार आंकडों को इस ढंग से पेश करना नही चाहेगी। जिससे आम लोगों के बीच मे यह धारणा बने कि देश में अल्पसंख्यक असुरक्षित है।

Thursday, November 8, 2012

पेट्रोल कंपनियो के घाटे का सच .....!! नुकषाण करने वाली कंपनिया --- अपने शेर होल्डर्स को दे रही है डिविडंड !! Φ

पेट्रोल कंपनियो के घाटे का सच .....!! नुकषाण करने वाली कंपनिया --- अपने शेर होल्डर्स को दे रही है डिविडंड !! Φ

घाटा होने पर भी दिया डिविडंड ??? ---!!

जनता को समजाओ - अपनी अकल लगाओ --- दिन मे तारे दिखानेवाली कॉंग्रेस के वादो पे मत जाओ ![जुगल Éगुरु]

Hindustan Petroleum CorporationDividend - Dividend history of the Hindustan Petroleum Corporation

Definition of 'Dividend Policy'

The policy a company uses to decide how much it will pay out to shareholders in dividends. 

You can view Announcement Date, Effective Date, Dividend Type (Interim, Final and Special), and Percentage of Dividend given information for Hindustan Petroleum Corporation Ltd.

Dividends Declared
Announcement DateEffective DateDividend TypeDividend (%)Remarks
29/05/201230/08/2012Final85%Rs.8.50 per share(85%)Dividend
26/05/201108/09/2011Final140% 
26/05/201003/09/2010Final120% 
02/06/200913/08/2009Final52.5% 
29/05/200802/09/2008Final30%AGM
29/05/200717/08/2007Final120% 
12/12/200627/12/2006Interim60% 
25/05/200618/08/2006Final30%AGM
26/05/200502/09/2005Final100%AGM
29/11/200414/12/2004Interim50% 
01/06/200423/08/2004Final160%AGM
11/12/200329/12/2003Interim60% 
27/06/200305/09/2003Final180%AGM
03/01/200303/02/2003Interim20% 
30/05/200202/08/2002Final100%AGM
25/05/2001 Final100%AGM
10/07/2000 Final30% 
04/04/2000 Interim80% 
11/06/1999 Final110% 
23/06/1998 Final0% 
23/06/1997 Final40%

Indian Oil CorporationDividend - Dividend history of the Indian Oil Corporation

You can view Announcement Date, Effective Date, Dividend Type (Interim, Final and Special), and Percentage of Dividend given information for Indian Oil Corporation Ltd.
Dividends Declared
Announcement DateEffective DateDividend TypeDividend (%)Remarks
28/05/201205/09/2012Final50%Rs.5.00 per share(50%)Dividend
30/05/201115/09/2011Final95% 
28/05/201008/09/2010Final130% 
29/05/200902/09/2009Final75% 
28/05/200809/09/2008Final55%AGM
28/05/200710/09/2007Final130% 
07/12/200626/12/2006Interim60% 
26/05/200607/09/2006Final125%AGM
30/05/200508/09/2005Final100%AGM
07/12/200429/12/2004Interim45% 
08/06/200423/08/2004Final160%AGM
11/12/200301/01/2004Interim50% 
23/06/200318/09/2003Final160%AGM
02/01/200303/02/2003Interim50% 
18/06/200212/09/2002Final110%AGM
15/06/2001 Final95%AGM
05/08/2000 FinalN.A.%Nil Final Dividend
15/05/2000 Interim40%2nd Interim Dividend
31/01/2000 Interim35% 
02/06/1999 Final130%AGM & Dividend

Friday, November 2, 2012

नरेंद्रभाई आज जीस स्थान पर खडे हैं उन के पिछे वो पतिपत्नि का त्याग बहुत बडी भुमिका निभा चुका है ।

हम सब का भरोषा और विश्वास सच साबित हुआ - और मेरी बात का समर्थन सबूतो के साथ मीला - ▐ साभार: श्री भरोडिया(नरेंद्र भाई के बचपन के मित्र) !
नरेंद्रभाई आज जीस स्थान पर खडे हैं उन के पिछे वो पतिपत्नि का त्याग बहुत बडी भुमिका निभा चुका है । उन के निजी जीवन में हमारा कोइ अधिकार नही बनता दखल देने का । मिडिया में ये बात को गलत अंदाज में उछाला गया तो ये लिखना पडा ।
! ▐ जानिए मोदी जी की अनदेखि अन सुनी कहानी बचपन से आज तक की !!! - जुगल ईगुरु !

  • मेरा २४ घंटा सिर्फ देश के लिये ही है । ५ मिनिट भी मै किसी सगे को नही दे सकता । - Narendra Modi

  • उन्होंने मुझे देखा है की नही मालुम नही । अपने भाई को भी घुसने नही देते तो मै क्यों जाउ ।?? - Cousin of Narendra Modi
  • अपने घर संसार की बली, भाभी जी के अरमानों की बली, अपने ही संबंधियो से बेरुखी । ये सब नरेंद्र मोदीने किया है । उनका केरेक्टर ढिला है या मजबूत तय जनता करगी, कोंग्रेस या दिग्गी राजा नही ।
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ये बच्चा मुश्किल से १५-१६ सालका रहा होगा तब भारत-पाक की लडाई छीड गई । प्रधानमंत्री लाल बाहादुर शास्त्रीने मोरचा संभाला । देश का हौसला बढाने के लिए नारा दिया  ” जय जवान, जय किसान ” ईस नारे पर देश भर के सेवाभावी लोग, सेवाभावी संस्थाएं, खडे हो गये । आर.एस.एस भी उनमें से एक संस्था थी । लडाई के समय गुजरात के हर रोड पर, हर स्टेशन पर युवा लडके तैनात हो गये थे जरूरी साधन सामग्री ले कर । अगर सैनिकों का जथ्था, उन की गाडियां गुजरती है तो उन्हें जो मदद चाहिए मिल सके ।  ये बच्चा भी उन युवाओं के साथ स्टेशन के प्लेटफोर्म पर भागता फिरता था ।
 वो जमाना आज के मुकाबले अलग था । उस जमाने में माबाप के आगे बच्चों का कुछ नही चलता था । अगर बच्चा विद्रोह भी करता तो माबाप तो बाजुमें रहते सारे गांव के चाचे ताउ कान खिंचने लग जाते । बच्चे सब की ईज्जत करते थे तो मजबूर हो जाते थे, बडों की बात मानने के लिए । इसी आधार पर मा बापने जशोदाभाभी से उनका ब्याह करवा दिया,१९६८ में । लेकिन देश सेवा की ईतनी लगन लगी थी की ईसने जशोदाभाभी का स्विकार (गौना नही करवाया , असली शादी गौना होता था, इससे पहले लडके लडकी एक दुसरे का मुह भी नही देखते ) नही किया, चल पडे घर छोड कर । पिता भारत और मां भारती की सेवा के लिए अपने खूद के माबाप की भावना को ठेस पहुंचाया । ये किशोरावस्था थी, जहां आदमी दोराहे पे खडा होता है । उसने बडी राह, देशसेवा की राह पकडली ।
दौरान पोलिटिकल सायन्स की डिग्री हासिल कर ली । आर.एस.एस के प्रचारक भी बन गया । आज भारत के कितने नेता के पास पोलिटिकल सायन्स की सामान्य डिग्री भी है ?
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जब ईस बच्चे का नरेन्द्रभाई मोदी के नाम से जनता को परिचय हुआ तो एक गुजराती मेगेजीन (१९८४) में जशोदाभाभी का ईन्टर्व्यु छपा था । उसमें तस्विर थी, भाभी अपने पिताजी की किराने की दुकानमें हाथमें तराजु लिए बैठी थी, काफी खूश दिखती थी । बताती थी वो मुझे बुलायेंगे तब जाउंगी तबतक पिता की दुकानमें मदद करुंगी, मेरा भाई अशोक अभी छोटा है । लेकिन अब पता चला है भाभीने टिचरकी नौकरी कर ली थी, अब रिटायर्ड भी हो गई है और १०००० का पेन्शन भी मिलता है । एक सच्ची भारतिय नारी की तरह पति के बुलावे का ईन्तजार करती रही, पति के खिलाफ खभी नही बोली । मोदी के कारण ही उस के आसपास के लोग, अपनी स्कूल, पूरा रसोसणा गांव उस का मान सम्मान करता रहा हैं । लोगोने हर तरह की मदद की है, तकलिफ नही पडने दी है ।
२००७ में नरेन्द्रभाई के साले साबह अशोकभाईने कोशीश की दीदी और जीजा को मिलाने की लेकिन सफलता नही मिली । मोदी का कहना है के मेरा २४ घंटा सिर्फ देश के लिये ही है । ५ मिनिट भी मै किसी सगे को नही दे सकता । बात भी सही है । अपनी मां के अलावा उसे कोइ सगा मिल नही सकता, अपने सगे भाई भी नही । उन के सगे चचेरे भाई को मैंने कहा था तू अब नरेंद्रभाई के पास चला जा कहीं अच्छी जगह सेट कर देंगे मैं ईस मंदी मे कितना पगार दे देता हुं । उसने मुझे बताया छोडो सब । वो चले गए उस के बाद मेरा जनम हुआ है । मैंने भी उन्हें एक ही बार देखा है । उन्होंने मुझे देखा है की नही मालुम नही । अपने भाई को भी घुसने नही देते तो मै क्यों जाउ ।
उस की बात सही थी । मोदी गांव छोडकर गये तो किसी को पता नही था वो कहां है । कहा जाता है वो सिर्फ दो बार गांव आये हैं । एक बार पिता के अवसान के समय और दुसरी बार स्कूल की निव रखने के कार्यक्रम के लिए । उस समय भीड में उनकी छोटी बेहन भी उन्हें देखने आई थी, पास जानेकी हिम्मत नही कर पाई थी । मोदीने देख लिया या किसीने ध्यान दिलाया तो वो खूद उसके पास गये और हालचाल पूछ लिया ।
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जब मोदी पहलीबार मुख्यमंत्री बने तो उनका ही बचपन का दोस्त उन पर उबल पडा था । ” ये घांची अब तक लुक्खे की तरह भटकता था तो घर नही चला सकता था, अब नेता हो गया है, अब क्या कमी है, अब बहु को बुला लेना चाहिए ” । ये एक आम आदमी की आवाज थी । आम आदमी सोचता है की नेता बनते ही पैसे का पेड लग जाता है । बस अब उसे खा-पिकर राज करना है । आम नेता के लिए ये सही बात होगी मोदी के लिए नही ।
उन के तलाक के लिए भी सवाल उठे हैं । तलाक ईस लिए लिया जाता है की आदमी दूसरी शादी कर के जीवन में सेट हो सके । ईन की उमर थी तलाक ले के दूसरी शादी की तब शादी और तलाक का सारा मामला सामाजिक तरिके से होता था । तलाक में कभी कानून का दखल नही होता था । दोनों पक्ष के १०-१२ आदमी मिलकर तलाक दे देते थे । ये जिम्मेदारी माबाप की होती थी, तलाक लेनेवालों की नही । लेकिन समाज वकिल का बाप होता है राह देखता है बच्चों का मन बदलने का । उसे समजाने में टाईम पास कर देता है ।
लेकिन इस दौरान ये पतिपत्नी समाज से आगे बढ गए । भाभीने ठान लिया की मैं तलाक नही लुंगी । मरते दमतक नरेन्द्र ही मेरा पति रहेगा । और नरेन्द्रभाई भी मजबूर है । देश सेवा का ईतना बडा भार उठा लिया है की २४ घंटे में से ५ मिनट भी वो भाभी या अन्य सगे को नही दे सकते । भाभी भी ये समज चुकी है । देश के लिये आदमी मर जाता है तो ये तो सिर्फ पति का वियोग ही है ।
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अपने घर संसार की बली, भाभी जी के अरमानों की बली, अपने ही संबंधियो से बेरुखी । ये सब नरेंद्र मोदीने किया है । उनका केरेक्टर ढिला है या मजबूत तय जनता करगी, कोंग्रेस या दिग्गी राजा नही ।
नरेंद्रभाई आज जीस स्थान पर खडे हैं उन के पिछे वो पतिपत्नि का त्याग बहुत बडी भुमिका निभा चुका है । उन के निजी जीवन में हमारा कोइ अधिकार नही बनता दखल देने का ।  मिडिया में ये बात को गलत अंदाज में उछाला गया तो ये लिखना पडा ।

मेरी पोस्ट ये थी - जिसके जवाब मे मेरी बात और विषवास को समर्थन और ज्यादा सबूत मीले ! मे : श्री भरोडिया(नरेंद्र भाई के बचपन के मित्र) का दिल से धन्यवाद करता हूँ !
▐ क्यू है खामोश मोदी जी - यशोदाबेंन वाले आरोप पर ? ▐ Φ यशोदाबेन ने कहा था,‘मोदी मेरे पति और मैं उनके खिलाफ कुछ नहीं बोलूंगी। मुझे खुशी है हम दोनों समाज सेवा कर रहे हैं।’ [Φ वो नेशनल लीडर हैं, बहुत सुंदर और पढ़-लिखे हैं, मैं तो उनके सामने कुछ भी नहीं।....]
▐ अगर ये बात सच है तो शर्म आनी चाहिए उन गंदे खून वालi - चरित्रहीनता जिनके डीएनए मे है और नहेरु के वंश से है ......! ऐसी देवी जैसी स्त्री का नाम सारे बाजार उछाल के अपने संस्कार और पैदाइश मे पूरे गाँव की सहकारी महनत योजना दर्शाती है ! ▐
मोदी और यशोदाबेन की शादी बचपन में हुई थी, लेकिन उनका ‘गौना’नहीं हुआ। उस जमाने में बाल विवाह की प्रथा थी और मोदी की भी इसी प्रथा के तहत शादी कर दी गई थी। इसके बाद उनका झुकाव संघ की ओर हो गया और उन्होंने अविवाहित रहने का फैसला किया। यशोदाबेन ने भी मोदी के फैसले का सम्मान किया, लेकिल उन्होंने भी शादी नहीं की।
यशोदाबेन स्कूल टीचर थीं और वो भी समाजसेवा में जुटी हैं। हाँ उनका और गाँव का इंटरव्यू मैंने भी देखा है ! यशोदाबेन के करीबी कहते हैं कि वो इस बात से खुश हैं कि मोदी और वो दोनों समाज की सेवा कर रहे हैं। इंटरनेट पर यशोदाबेन और उनके नाते रिश्तेदारों के बयान वाले कुछ वीडियो भी हैं, जिनमें यशोदाबेन के मोदी की पत्नी होने की बात कही गई है।
2009 में एक मैगजीन ने अपनी रिपोर्ट में यशोदाबेन नाम की महिला से बातचीत की थी और ये दावा किया था वो मोदी की पत्नी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक यशोदाबेन गुजरात के राजोसाना गांव में रहती हैं और जिस समय ये रिपोर्ट आई थी तब वो उसी गांव के स्कूल में पढ़ाती थीं। मैगजीन के मुताबिक यशोदाबेन ने कहा, ‘हां मोदी से मेरी शादी हुई थी, लेकिन हम अलग रहते हैं। वो नेशनल लीडर हैं, बहुत सुंदर और पढ़-लिखे हैं, मैं तो उनके सामने कुछ भी नहीं। ’मैगजीन ने यशोदाबेन के हवाले से लिखा था कि मोदी और उनकी शादी वाडनगर गांव में हुई थी। शादी के कुछ दिन बाद वो पढ़ाई पूरी करने के लिए अपने घर वापस लौट आईं और फिर कभी वापस नहीं गईं।
▐ रिपोर्ट में राजोसाना गांव के लोगों के भी बयान दिए गए थे। उस गांव के सभी लोग यशोदाबेन को मोदी की पत्नी के तौर पर ही जानते हैं। वो कहते हैं कि यशोदाबेन अहमदाबाद कभी कभी जाती हैं, लेकिन मोदी ने उन्हें कभी बुलाया नहीं। वो मुस्लिमों के बच्चों को पढ़ाती हैं और उनकी सेवा करती हैं। इस मैगजीन से बातचीत में यशोदाबेन ने कहा था,‘मोदी मेरे पति और मैं उनके खिलाफ कुछ नहीं बोलूंगी। मुझे खुशी है हम दोनों समाज सेवा कर रहे हैं।’
▐ Φ अगर ये बात सच है तो शर्म आनी चाहिए उन गंदे खून वालi - चरित्रहीनता जिनके डीएनए मे है और नहेरु के वंश से है ......! ऐसी देवी जैसी स्त्री का नाम सारे बाजार उछाल के अपने संस्कार और पैदाइश मे पूरे गाँव की सहाकरी योजना दर्शाती है ! एक तरफ तीन तीन बार शादी करनेवाला वो थरूर ..... और अपने 19 साल के बेटे को और 2 -2 पति को गरीब होने पर छोड देनेवाली सुनंदा, [ नयी सूचना और सबूतो के आधार पर उसके दूसरे पति को आत्म हत्या करनी पड़ी थी- क्यूँ की दुबई मे उसके द्वारा खर्च किए गए करोड़ो का बोज उसके दूसरे पति मैनन पर ला दिया था , इस लिए मेनन का कंस्ट्रक्षण बिजनेस बर्बाद हुआ और जैसा की मीने पहले कहा था की आर्थिक बदहाली की वजह से मेनन को दुबई से भारत वापिस आना पड़ा था , लेकिन उसके बाद भी उसने सुनन्दा को बहुत ही रिक्वेस्ट की थी लेकिन थरूर के साथ लगी हुई वो दुबई छोड कर नहीं आई , और उसके दूसरे पति मेनन ने आत्महत्या कर ली जिसको सुनन्दा और उसके फौजी पिता अकस्मात मौत बता रहे थे !]
Φ अपने जिस्म को सीढी बनाकर तीसरी शादी के लिए थरूर तक पहुंची ! और आगे की कोई गेरंटी नहीं है ! भारतीय संस्कृति पर कलंक जैसा ये ये सुनंदा - शशि का युगल और
▐ भारतीयता और हिन्दू संस्कृति को अपनी नस नस मे खून की तरह दौड़ रहा है ऐसा नरेंद्र मोदी और यशोदा बहन का युगल ! ▐ जिनहोने अपनी बचपन की शादी को ना निभाते हुए भी एक भारतीय नारी और एक संसार त्यागी पुरुष बनकर निभा रहे है ! और मोदी जी की देश सेवा के यज्ञ मे अपनी ख्वाहिशों का हवन करने वाली और , दूसरी शादी ना कर के भी पवित्रता से पतिव्रत निभानेवाली उस यशोदा बहन --- यशोदा माँ जैसी है ! उनको मे साष्टांग प्रणाम मोदी जी से भी पहले करूंगा ! ▐
▐ क्यूँ की पुरुष और प्रदेश दोनों के उत्थान और पतन के केंद्र मे नारी होती है ! आज अगर उनको कोई भी शिकायत होती ......... तो मोदी जी की नकली सेक्स सीडी बनाने के लिए साउथ की अभिनेत्री ओ को और तहलका को हाई टेक फर्जी वीडियो बनवाने का कोंटरेक्ट देने वाली ये कॉंग्रेस इस मुद्दे को छोड़ती क्या ? ▐ चलो वो तो छोड भी दे क्यूँ की उनके खुद के ही हर गली हर नुक्कड़ पर नारी शोषण के कांड होते रहते है , ▐ लेकिन मीडिया .... मोदी जी को छिंक भी आए तो देश भर मे सनसनी की तरह पेश करने वाली मीडिया ..... जो कॉंग्रेस के फेंके टुकड़ो पर पलनेवाली,▬ और हर दुखद कांड या घटना मे देश वासियो की लाशों की बोटियों को आपस मे बाँट कर अपनी रोटी का निवाला बनाने वाली,▬ ये मीडिया क्या इस मुद्दे को छोड़ती क्या !
▐ मोदी के नाम के 2 अक्षर जिनकी टीआरपी और अखबार मेगेजीन की बिक्री कई गुना कर देती है तो ये मुद्दा तो उनके लिए बहुत बड़ा चांस था ! और ये बात सच इस लिए मानने योग्य है क्यूँ की यशोदा बहन ने जब खुद ही कहा की वह खुश है और उनको मोदी जी से कोई शिकायत बाजू पर रही ऊपर से गर्व है ....तो जमीन ही ताकनी पड़ी होगी शर्म से उन बेशर्मो को !
▐ तो ऐसी बात हमे क्यूँ बताए ! ? क्यूँ की इसको रहस्य ही रहने दे कर अपने न्यूझ के हेडलाइन के टाइटल बनाने का मौका भी चला जाता जो आज उनको मीला है !
▐ अगर आप ऐसे हालत मे हो तो आप अपने पारिवारिक जीवन के बारे मे क्या सार्वजनिक करेंगे? अगर खुद को शादी शुदा बताए - तो उन्होने एक भी दिन क्या सांसरिक जीवन का बिताया है ? और उन्होने खुद कभी बाल ब्रह्मचारी नहीं कहा और इस बात पे मौन है ....क्यूँ की वे भी मन ही मन यशोदा बहन के निस्वार्थ त्याग के रूण के नीचे है ...... और सिर्फ वे हि क्यूँ पूरा गुजरात उनका ऋणी है , और कल पूरा देश होगा ...जिसने इक योगी पुरुष का रास्ता न भटका कर खुद को भी उनही की तरह अलग राह पर जन सेवा मे समर्पित कर दिया !▐
▬ आप मूजे चाहे चमचा कह लो मोदी जी का , चाहे नाजायज औलाद {जो मूज जैसे अकेले अनाथ के लिए गर्व की बात होती }, पर अंध भक्त बिलकुल नहीं हूँ ! एक वक्त मे खुद कॉंग्रेस के करीब शक्ति सिंह गोहेल वर्ष 1996- 1999 भावनगर रह चुका हूँ - कॉलेज के दिनो मे मेरे बिन नेता पद के भी नेतृत्व को केश करवाते थे ..और रेलियों मे भीड़ जुटाते थे.... क्यूँ की लड़किया सिर्फ मूज पे भरोसा करती थी .....! एक को छोड़ कर सभी को बहन ही बान लिया था ...इस लिए !! . हनुमंत सिंह चूड़ासमा नाम क एक भावनगरी कोंग्रेसी और बदले मे मे सिर्फ विद्यार्थी हीतो के काम और भावनगर शहर की बापूगीरी मे , मेरे बीपीटीआई कॉलेज सर्कल की सहपाठी और लड़कियो को निर्भीकता का वचन ! ▐
▐ मे ही हूँ जो बीजेपी और कॉंग्रेस के निजी युद्ध के कारण अपना करीयर और डिग्री गंवाई - एक शानदार भविष्य गंवाया - जब बीजेपी की सरकार थी - केशु भाई सीएम थे - और भरत बारोट - टेकनिकल शिक्षा मंत्री - जिनकी केबिन के अंदर जा कर मैंने आसमान सर पे उठा लिया था , खुद को निर्दोष साबित करने के लिए ... तब मूजे जवाब मिला था की कभी कभी सूखे घास के साथ हरी घास भी जल जाती है ! और मूज जैसे एक के लिए उनके पास कोई वक्त नहीं है ! तब से ही मे धूर विरोधी था - बीजेपी और केशुभाई का ! और हर राजनीतिज्ञ का ....... लेकिन जीवन मे हादसो की कतार लिए हमेशा जलता ही रहा हूँ बदनसीबी की आग मे - जब मेरा प्रेम और पारिवारिक जीवन भी बर्बाद हो गया - क्यूँ की मूजे चुनना था - केनेडा मे ग्रीन कार्ड और जॉब - या फिर देश मे ही रहकर मेरे जेसो के साथ हुए अन्याय के लिए लड़ना ...... तो मैंने भी .... केनेडा छोड़ दिया था .....! और देश को चुना था !
▐ जब सब कुछ लूट गया तो मरने की धुन सवार हो गई , लेकिन जीवन व्यर्थ गया था इस लिए मौत किसी के काम आ जाये इस लिए --- मरते मरते भी किसी एक की जिंदगी बचाता जाऊन - न्याय दिलाता जाऊन - इस लिए एक एनजीओ मे जूड़ा --- NEST India - Fights Against Crime and Corruption ! और ऐसे ऐसे पंगे लिए फिर भी सिर्फ धमकिया और एक ही बार खूनी हमला ---- उसमे भी मूजसे ज्यादा हमला करने वाला घायल हुआ बेचारे को अस्पताल भी मेरी टिम ले कर गई थी ....! कोई मार डाले इस इंतजार मे बहुत वक्त ना गंवा कर अपने कोम्प्यूटर पे ही ध्यान केन्द्रीत रखकर मुफ्त मे शिक्षा देना शुरू किया जिस कोर्स के 50,000 से 1 लाख तक फीस थे उसको मुफ्त मे करवाया पहले अपने गाँव मे और फिर बरोड़ा , अहमदाबाद और अब भरूच अंकलेश्वर - जहां जॉब मिली वहाँ फूल टाइम जॉब भी की पार्ट टाइम लोगो की मदद - [ जिसमे मेरा खुद का स्वार्थ था क्यूँ की मेरा अहम संतुस्ट होता था, की मे भी काम का हूँ , किसी को तो काम लगा ] करता रहा ! और एक दुर्घटना ने मौजे मेरे ही परीवार और समाज के कुछ लोगो के जूठे आरोपो और उनकी हलकी मानसिकता और नियत को सबूत के साथ पोल-खोल के लिए ही फेसबुक पे आया था !! फिर जिस तरह से फेसबुक मे देश प्रेम जग रहा था उस को देख कर अपना खुद का बदला लेना भूल गया और देश के लिए बदला लेने लगा !↨ क्यूँ की देश के असली इतिहास - किताबी और स्कूली नहीं - जानता था और बरबादी के मूल मे कौन है वो भी ! और बचपन से - आप कहेंगे मूजे किसने शिखाया तो वो है ---- नगेंद्र विजय और हर्षल पुष्कर्णा भारत का सबसे पहला एक मात्र सायन्स मेगेझिन - जो गुजराती और अब अङ्ग्रेज़ी मे प्रकाशित होता है और -सफारी - जिसने मेरे संस्कारो और देश भक्ति का माँ-बाप बनके सींचा है - जिसने मूजे हर विषय मे जानकार बनाया है ! उस ज्ञान के भंडार जैसे ... हर घर मे गीता रामायण के साथ ये मेगेजीन होना जरूरी है ! www.safari-india.com ▐ तो ये राम कहानी से आपका दिमाग खराब करना उद्देश्य नही था ...उद्देश्य वही की जब कोई खुद को और अपनी निजी जीवन को त्याग कर लोगो की और देश की सेवा मे समर्पित किया हो , ऐसे लोगो की भावनाओ का आदर करे ...क्यूँ की मे खुद उस श्रेणी मे आता हूँ ! और मोदी जी के मौन को समज शकता हूँ ! जिनके सीएम पद पर आने के बाद - बस चंद फेक्स - ईमेल और फोन कॉल से मैंने न्याय दिलाया है ---- जिनकी सीएमओ से मूजे पूर्ण सुरक्षा का वादा मीला था और निभाया भी था ..... जिसमे मूजे कहा गया था की अगर आप ने किसी के मांगने पर घूस दी तो आप पर भी कार्यवाही होगी ! और फ़ीर जा के माना मोदित्व मे व जयते !!
और सिस्टम और गवर्नमेंट के नंगेपन को एक के बाद एक कपड़े पहनते हुए देखा है ---! खुद को सर्वोपरि समाजने वाले --- अधिकारियों को पहली बार वे सरकार और जनता के नौकर है इस बात का एहसास होते हुए देखा है और एक एप्लीकेशन पे दौड़ते हुए देखा है ! एक अंकलेश्वर के एएसआई के नाम पर की गई मेरी फरियाद के दिन के तीसरे दिन के बाद ही विधान सभा चुनाव थे .....! मैंने सोचा था 1-2 महीने मे उसकी लग जाएगी ....! लेकिन तीसरे ही दीन उसको सस्पेंड होते हुए देखा है ----! जिस दिन से चुनाव शुरू हो रहे थे ....! उसी दिन आम आदमी की अर्जी का रिसपोन्स ????? आश्चर्य है ना !! आपसे पूछता हु...अपने कभी अपने या अपने आसपास हो रहे अन्याय- भ्राष्टाचार और गुनाह के सामने आवाज उठाई है ? है तो कहाँ तक ? सीएमओ फोन या लेटर से फेक्स से संपर्क किया है .... और अगर आप समजते है की आप को तब भी न्याय नहीं मीला .....तो आपका वो तथा कथित न्याय क्या किसी अन्य के लिए अन्यायपूर्ण था ? अगर आप खुद ही अपने आसपास की गण्डकी साफ नहीं करना चाहते तो उस गंदगी के सड़ने पर बीमार हो कर सरकार पे उंगली उठाने का आपको कोई हक नहीं ...! जय हिन्द - जय गुजरात ! मोदी सिर्फ एक ही बात ! █▌║││█║▌│║█║▌© Official Jugal Eguru™ page ✔ Help us for Grow . Like ✔ Tag ✔ Share ♥

Jantaa ke Chaante !! SUPERHIT !!

Φ सुबह के 4 बजे है फिर भी मेरी आंखो मे हसते हस्ते पानी आ गया है और पेट बल खा रहा है ! इस वेब न्यूझ के कमेन्ट मे जिस तरह मोदी विरोधी या कॉंग्रेस के पेड़ न्यूझ होते है उसकी धड़ा धड़ तीप्पणिया पता नहीं इनकी सोई आत्मा जगाती है की नहीं ! इतने बेशर्म कैसे कोई धंधा कर शकता है !!? और आज की फाइव स्टार कमेन्ट ....!! हँसना आए तो हँसना पर जिस तरह जनता की आवाज को सच दिखाने के लिए भिखारी की तरह प्रदर्शित किया है जरा गौर करना ! सच मे हम सभी इस बिकाऊ मीडिया और पेड़ न्यूझ के कारण इतने ही लाचार है !!

क्या मोदी वाकई अविवाहित हैं: दिग्विजय - Digvijay slams Modi, Questions his marital status - Navbharat Times

kalyan, kalyan का कहना है :
02/11/2012 at 11:52 AM
ओ चैनल वाले भैया… एक दो मासूम सवालों के जवाब दोगे क्या?

1) भाई साहब… भाई साहब!!! कल ही डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी ने "भोंदू" के बारे में खुलासे करते हुए एक प्रेस कांफ़्रेंस की थी, उसे तुमने दस मिनट भी नहीं दिखाया? क्या डॉ स्वामी तुम्हें चाय-नाश्ता नहीं करवाते हैं???

2) नरेन्द्र मोदी की थरूर पर की गई टिप्पणी को लेकर ताबड़तोड़ पैनल डिस्कशन, नारी सम्मान, महिला आयोग वगैरा के ढोल पीट लिए… यहाँ तक कि सुनंदा पुष्कर का इंटरव्यू भी हमारे माथे पर दे मारा… जब अभिषेक मनु सिंघवी ने देश की न्याय-व्यवस्था को ही अपने चेम्बर में सुला लिया था, तब आपके मुँह में दही क्यों जम गया था भैया? बताओ ना प्लीईईईईईईज़!!!

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ए चैनल वाले बाबू…!! ओ भाई…!! अरे अंकल…!! सुनो तो, पतली गली से कहाँ कलटी मार रहे हो…

क्या मोदी वाकई अविवाहित हैं: दिग्विजय - Digvijay slams Modi, Questions his marital status - Navbharat Times

Ashok Gaur, Bansi Paharpur का कहना है :
02/11/2012 at 03:32 PM
दिग्गी टू देश का नेता है/ क्यो किसी के पेर्सनल मामले मे दखल देता है/ सादी नही हुए तो कोई तेरे कन बे के पिच्छे तो नही पड रहा / कई सालो से तेरे कॉमेंट देख रहा हु / सिर्फ पागलो बलि हरकत, जाई चन्द बलि नीति, चमचा गिरि / लगता पिछले जनम मे टू कुत्ता था / बे ही हरकत है / देश के बारे मे सोच / जन लोक पाल ला, भ्रस्तरचार मिटा आसाम मे दंगा क्यो हो रहे है . चीन सीमा पर क्यो घुसा आ रहा है / सोनिया लूट लूट कहा जमा कर रही है मेरा नाम फोर्ब्स मे क्यो नही/ पाकिस्तान को ढंका, अफजल गुरु ओर कसाब के बारे मे बोल जिससे लोग तेरे को कुत्ते से शेर काहे; ताक झहांक् मे कुछ नही रखा क्यो बच्चो की जिन्दि खराब कर रहा है लोग तेरे को प्रधान मंत्री के पड पर देखना चाहते है / इस तरह के बयान देकर भबिस्या खराब कर रहा है / मन मोहन सिंह के बाद दिग विजय सिंह का नंबर है/ क्योकि हो तो दोनो सिंहही / सर्वे से पता चला है सोनिया किपसंद पेहले सिंह दूसरी पसंद ख़ान है /

क्या मोदी वाकई अविवाहित हैं: दिग्विजय - Digvijay slams Modi, Questions his marital status - Navbharat Times

Shankar, Chennai का कहना है :
02/11/2012 at 10:40 AM
मोदी जी की शादी हूवी है या नही इससे जनता को कोई फर्क नही पड़ता नही उन्होने किसी आम जनता का पैसा किसी औरत के पीछे लगाया, लेकिन कोई अगर जनता का 50 करोड़ खर्चा करके अदरक चूसेगा तो जनता का घुस्सा जायज है.
 

 

क्या मोदी वाकई अविवाहित हैं: दिग्विजय - Digvijay slams Modi, Questions his marital status - Navbharat Times

Durga, Vikas Nagar का कहना है :
02/11/2012 at 10:06 AM
दिग्गी राजा बातो के धनी कुटिल राजनेतिक कांग्रेस के बफादार अपनी बे मतलब की बातो से लोगो को गुमराह करना जनता की ताली बटोरना उनकी खूबी है, जनता साबधान् खाली बातो से पेट नही भरता..............
 

 

(1) Sonali Arya

गाँधी के पोरबन्दर से कांग्रेस सांसद विठ्ल भाई भारत के दुसरे ऐसे सांसद है जिनके खिलाफ सबसे ज्यादा क्रिमिनल केस दर्ज है |

पहले नम्बर पर झारखंड मुक्ति मोर्चा के पलामू से सांसद कमलेश्वर बैठा है जिनके खिलाफ 46 क्रिमिनल केस है |

दुसरे नम्बर पर ...

गाँधी के गुजरात और गाँधी के जन्मभूमि पोरबन्दर से कांग्रेस के सांसद विठ्ठल राडडीया है जिनके खिलाफ 41 क्रिमिनल केस दर्ज है | और ६० दुसरे केस दर्ज है |

आज तो गाँधी जी आत्मा ख़ुशी मना रही होगी क्योकि गाँधी के नाम का मार्केटिंग का ठेका लेने वाले नीच कांग्रेस ने सबसे बड़े अपराधी को ही उनके जन्मस्थान से सांसद बनाया |

सुनने में ये भी आ रहा है की गुजरात के लेवुआ पटेल वोटो को अपने तरफ करने के लिए कांग्रेस इस क्रिमिनल सांसद को केन्द्रीय केबिनेट में लेने पर भी विचार कर रही है क्योकि गुजरात कांग्रेस ने इनका नाम केंद्र को मंत्री बनाने के लिए भेजा है |




Serious IPC Sections Number of Times they appear for Radadia :-
*****************************************************
395 2
324 1
304 1
Total 4

Details of Criminal Cases
********************
Cases where accused

Serial No. IPC Sections Applicable Other Details / Other Acts / Sections Applicable
1 322, 323, 501, 506(2) FIR NO: 22/91,Dated: 1-2-91 at the Jamkondarna PS Dist Rajkot, Case is pending in the Dhoraji Magistrate Court (Judicial Magistrate First Class since 26-4-91

2 114 Criminal intimidation,Death threats
3 323, 324 , 504, 506(2) FIR NO 123/91, Dated : 21-9-91 at the Jamkandorna PS District : Rajkot

4 189 Threating public servant on duty,criminal minilation death threats and Astrocities Act A-1(10),case is pending in the Dhoraji Magistrate’s Court First Class Since 1-4-94
5 504, 506(2) FIR NO : 111/92, Dated : 4-11-92 at the Jamkandorna PS District Rajkot, criminal minilation criminal assoult.Case is pending in the Dhoraji Magistrate’s Court,Judicial Magistrate First class since 20-11-92
6 188, FIR NO : 3030/2000 dated : 16-9-2000 at the Jamkandorna PS District : Rajkot, disturbing public servant on duty and Bombay Public Act section 33(1), (2), (33),case pending at Dhoraji Magistrate’s Court Judicial Magistrate First Class since 27-9-2002,
7 189, 504, 506(2) FIR NO : 3058/98, Dated: 15-6-98 at Dhoraji PS District : Rajkot, disturbing public servant injury,criminal minilation death threats case pending at Dhoraji Magistrate’s Court,Judicial Magistrate First class since 3-1-99
8 394, 332, 186, 143, 147, 395, 397, 144, 504, 506(2) FIR NO : 95/2000, Dated : 6-5-2000 at Dhoraji PS District Rajkot,stealing power worth rs 1,81,300 and threating to kill some one,robbery,dacoity,rioting, criminal assault of public servant on duty,death threats Case is pending in the Dhoraji Magistrate’s Court,Judicial Magistrate First class since 3-8-2000
9 394, 332, 186, 143, 147, 395, 397, 144, 504, 506(2) FIR NO : 97/2000,dated: 6-5-2000 at Dhoraji police station district: Rajkot,Looting electric meters worth rs 1,54,000/-, robbery, dacoity, rioting, criminal assult at public servant on duty,death threats,Case is pending in the Dhoraji Magistrate’s Court,Judicial Magistrate First class since 3-8-2000
10 188 FIR NO : 3018/98, Dated: 21-2-1998 under Bombay Police Act 135 , disoveying public servant on duty.Case is pending in the Dhoraji Magistrate’s Court,Judicial Magistrate First class since 23-4-98
11 188 FIR NO : 3019/98, dated : 21-2-1998 under Bombay Police Act 135,Disoveying public servant on duty ,Case is pending in the Dhoraji Magistrate’s Court,Judicial Magistrate First class since 23-4-98
12 332, 143, 149, 504, 341 FIR NO : 57/02,Date: 25-1-02 at Police Station ,Rajkot City,herrest public servant on duty wrongful statement,Case is pending in the Dhoraji Magistrate’s Court,Judicial Magistrate First class Rajkot City since 10-3-2002
13 186, 387, 504, 506(2) FIR NO : 742/02,Dated: 23-11-2000 at Police station,Rajkot City
14 188,114 To damage public property and death threats etc.Case is pending in the Dhoraji Magistrate’s Court,Judicial Magistrate First class Rajkot City since 10-3-2002
15 186, 304, 477, 114 FIR NO : 223/2000 dated : 17-4-2000 at police station Rajkot city , Threats assult of senior government officers destriction of evidence,Case is pending in the Dhoraji Magistrate’s Court,Judicial Magistrate First class Rajkot City since 4-7-2000
16 504, 506(2) FIR NO : 3194//05 dated : 26-05-2005 at Dhoraji Police Station District: Rajkot
17 188, Arms Act 30 Criminal intimidation,death tiea,case pending before Judicial Magistrate’s Court Dhoraji since 22-02-06
18 504, 506(2) FIR NO : 9704/05 Dated: 28-12-2004 at Dhoraji Police Station District Rajkot City
19 135 B.P.A (criminal intimidation,death threats case pending before Judicial Magistrate’s Court Dhoraji since-22-07-05
20 143, 147, 149, 186, 188 FIR NO : 1-555/08 at 04-12-08 at Rajkot City praduman nagar police station,Demage to public property etc,caase is pending before Chief Judicial Magistrate’s Rajkot, Court No 4, since 19-01-2009

वह खून कहो किस मतलब का जिसमें उबाल का नाम नहीं।

  • वह खून कहो किस मतलब का जिसमें उबाल का नाम नहीं।
  • वह खून कहो किस मतलब का आ सके देश के काम नहीं।
  • वह खून कहो किस मतलब का जिसमें जीवन, न रवानी है!
  • जो परवश होकर बहता है,वह खून नहीं, पानी है!
  • उस दिन लोगों ने सही-सही खून की कीमत पहचानी थी।
  • जिस दिन सुभाष ने बर्मा में मॉंगी उनसेकुरबानी थी।
  • बोले,"स्वतंत्रता की खातिर बलिदान तुम्हेंकरना होगा।
  • तुम बहुत जी चुके जग में, लेकिन आगे मरना होगा।
  • आज़ादी के चरणें में जो, जयमाल चढ़ाई जाएगी।
  • वह सुनो, तुम्हारे शीशों के फूलों से गूँथी जाएगी।
  • आजादी का संग्राम कहीं पैसे पर खेला जाता है?
  • यह शीश कटाने का सौदा नंगे सर झेला जाता है"
  • यूँ कहते-कहते वक्ता की आंखों में खून उतर आया!
  • मुख रक्त-वर्ण हो दमक उठा दमकी उनकी रक्तिमकाया!
  • आजानु-बाहु ऊँची करके, वे बोले,"रक्त मुझे देना।
  • इसके बदले भारत की आज़ादी तुम मुझसे लेना।"
  • हो गई सभा में उथल-पुथल, सीने में दिल न समाते थे।
  • स्वर इनकलाब के नारोंके कोसों तक छाए जाते थे।
  • “हम देंगे-देंगे खून”शब्द बस यही सुनाई देते थे।
  • रण में जाने को युवक खड़े तैयार दिखाई देते थे।
  • बोले सुभाष,"इस तरह नहीं, बातों से मतलब सरता है।
  • लो, यह कागज़, है कौन यहॉं आकर हस्ताक्षर करता है?
  • इसको भरनेवाले जन को सर्वस्व-समर्पण काना है।
  • अपना तन-मन-धन-जन-जीवन माता को अर्पण करना है।
  • पर यह साधारण पत्र नहीं, आज़ादी का परवाना है।
  • इस पर तुमको अपने तन का कुछ उज्जवल रक्त गिराना है!
  • वह आगे आए जिसके तन में खून भारतीय बहता हो।
  • वह आगे आए जो अपने को हिंदुस्तानी कहता हो!
  • वह आगे आए, जो इस पर खूनी हस्ताक्षर करता हो!
  • मैं कफ़न बढ़ाता हूँ, आए जो इसको हँसकर लेता हो!
  • "सारी जनता हुंकार उठी- हम आते हैं, हम आते हैं!
  • माता के चरणों में यह लो, हम अपना रक्त चढाते हैं!
  • साहस से बढ़े युबक उस दिन, देखा, बढ़ते ही आते थे!
  • चाकू-छुरी कटारियों से, वे अपना रक्त गिराते थे!
  • फिर उस रक्त की स्याही में, वे अपनी कलम डुबाते थे!
  • आज़ादी के परवाने पर हस्ताक्षर करते जाते थे!
  • उस दिन तारों ने देखा था हिंदुस्तानी विश्वास नया।
  • जब लिक्खा महा रणवीरों ने ख़ूँ से अपना इतिहास नया.........

Tuesday, October 16, 2012

असली मौत के सौदागर कौन है कांग्रेस है या बीजेपी I

 झूठे सेक्युलारिस्म के लिए कई निर्दोशो को बलि का बकरा बना दिया-असली मौत के सौदागर कौन है कांग्रेस है या बीजेपी I

IF MODI SIR IS CULPRIT......WHOLE CONGRESS CULPRIT....!
4000 MURDERS....In 1984......પૂછે ગુજરાત..?? આપો જવાબ અમને અને ગુજરાત ને?
१९८४ के बारे में बात करते है I जहा पर इंदिरा गांधीजी के हत्यारे शीख होने के कारन बेवजह डेल्ही के हजारो शीखो...
को मौत के घाट उतारा I इतना तो सही है लेकिन उसको जनता का रोष जताकर ठन्डे बसते में डालने की बात कांग्रेस कर रही है I और उनके जिम्मेदार नेता आज केंद्र में है I जिनको कोई सजा नहीं होगी I
कांग्रेस ही सही तौर पर भारत में असली कम्युनल पार्टी है जो दंगे फैलाती है I गुजरात में कांग्रेस के शाशन के दौरान कई दंगे हुए है I जिसमे कई हिन्दू मारे गए है और कई घर उजाड़ दिए गए थे I आज पश्चिम अहमदाबाद में बसने वाले किसी भी लोगो से पुचो आपको एक ही जवाब मिलेगा की क्प्नग्रेस के शाशन में कई दंगे हुए है और कई हिन्दू मरे गए है I
Photo: IF MODI SIR IS CULPRIT......WHOLE CONGRESS CULPRIT....! 4000 MURDERS....In 1984......પૂછે ગુજરાત..?? આપો જવાબ અમને અને ગુજરાત ને? अब १९८४ के बारे में बात करते है I जहा पर इंदिरा गांधीजी के हत्यारे शीख होने के कारन बेवजह डेल्ही के हजारो शीखो को मौत के घाट उतारा I इतना तो सही है लेकिन उसको जनता का रोष जताकर ठन्डे बसते में डालने की बात कांग्रेस कर रही है I और उनके जिम्मेदार नेता आज केंद्र में है I जिनको कोई सजा नहीं होगी I       कांग्रेस ही सही तौर पर भारत में असली कम्युनल पार्टी है जो दंगे फैलाती है I गुजरात में कांग्रेस के शाशन के दौरान कई दंगे हुए है I जिसमे कई हिन्दू मारे गए है और कई घर उजाड़ दिए गए थे I आज पश्चिम अहमदाबाद में बसने वाले किसी भी लोगो से पुचो आपको एक ही जवाब मिलेगा की क्प्नग्रेस के शाशन में कई दंगे हुए है और कई हिन्दू मरे गए है I सच में कांग्रेस का दामन कई निर्दोशो के खून से लाल है I चाहे वोह शीख हो या कोई भी अपने झूठे सेक्युलारिस्म के लिए कई निर्दोशो को बलि का बकरा बना दिया और गाँधी की पार्टी और अहिंसा की पुजारी बता कर सत्ता का सुख ले रही है I बोफोर्स, शीख, भोपाल कांड ऐसे और कई खूंखार खुनी कांड है जो यह साफ़ करता है असली मौत के सौदागर कौन है कांग्रेस है या बीजेपी I         कई नेता कौभांड में शामिल है फिर भी आज भी खुर्शी पे चीपके हुए है I आप की अगुईवाली कई राज्य सरकारों के राज्य में किसान आत्महत्या कर रहा है, पीने को पानी नहीं, बीजली नहीं वैसा हल गुजरात में नहीं I यहाँ पानी एवम लाइट २४ घंटे मौजूद है और किसान भी खुशहाल है I आप ही ने अपने विदेश प्रेम के कारन क्वोत्रोची एवम एंडरसन को देश में से बाइज्जत बरी किया और हो भी क्यों न विदेशी ही तो कांग्रेस को चला रही है I इसलिए विदेश प्रेम जायज है I अंत में किसी और को कुछ कहने से पहले अपने दमन में एक बात जाक लेने चाहिए कही वो दागी तो नहीं अगर है तो पहले उसे साफ़ करना चाहिए बाद में किसी और को बताना चाहिए I इसीलिए १९८४ भोपाल कांड, शीख कांड के बावजूद कांग्रेस बीजेपी को मौतकी सौदागर मानती है तो वोह क्या है ?                   गोधरा में हुए २००२ के दंगो के लिए कांग्रेस एवम अन्य राजनीतिक पक्ष बीजेपी को और खास तौर पर नरेन्द्र मोदी को जिम्मेदार मान रही है I इस दंगो की शुरुआत गोधरा से हुई जहा साबरमती ट्रेन से लौट रहे रामसेवको को कुछ लोगो ने डब्बे में बांध करके जलादिया था I जो उस समय के रेलमंत्री लालू यादव ने कहा की आग अंदर से ही लगे गई थी I               मेरा उनसे एक प्रश्न यह है की कोई भी इन्सान इतना पागल तो नहीं होता की अपने आप को जिन्दा जला डाले I और ऐसे लोगो को जो ठीक से बोल भी नहीं पाते I उस समय वह का मंजर ऐसा था की कोई भी पत्थर दिल इन्सान सहम जाता I जो माजर था वो वाकई में इतना घिनोना था की जब भी उसकी याद आती है आज भी दिल काप उठता है I हमारी केंद्र सरकार को दंगो में मरे जाने वाले मुस्लिमो की चिंता है लेकिन ट्रेन में जो ५८ लोगो को जिन्दा जलाया उनका क्या?               झूठे सेकुलरिस्म के लिए वाकई में ऐसा अन्याय होना यह हम सेहन नहीं सर सकते I दोनों तरफ से लोग कसूरवार है अगर हिन्दू कसूरवार है तो मुस्लिम भी है क्यूंकि उन्होंने ही आग लगायी थी ट्रेन में अगर ट्रेन में आग नहीं लगी होती तो ऐसा नहीं होता I उस समय के गुजरात कांग्रेस नेता शंकरसिंह वाघेला की भी जाच होनी चाहिए क्यूंकि उस समय वोह भी खली भीथे थे और उनके पास चुनाव में कोई मुद्दा नहीं था और आग लगनेवाले में कांग्रेस का स्थानीय कोर्पोराते भी शामिल था I इसलिए गोधरा ट्रेन कांड की निष्पक्ष जांच फिर से होनी चाहिए और जो ट्रेन में जलकर मर गए है उनके परिवार को भी न्याय मिलना चाहिए I और दंगो में कांग्रेस की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए I

सच में कांग्रेस का दामन कई निर्दोशो के खून से लाल है I चाहे वोह शीख हो या कोई भी अपने झूठे सेक्युलारिस्म के लिए कई निर्दोशो को बलि का बकरा बना दिया और गाँधी की पार्टी और अहिंसा की पुजारी बता कर सत्ता का सुख ले रही है I बोफोर्स, शीख, भोपाल कांड ऐसे और कई खूंखार खुनी कांड है जो यह साफ़ करता है असली मौत के सौदागर कौन है कांग्रेस है या बीजेपी I
कई नेता कौभांड में शामिल है फिर भी आज भी खुर्शी पे चीपके हुए है I आप की अगुईवाली कई राज्य सरकारों के राज्य में किसान आत्महत्या कर रहा है, पीने को पानी नहीं, बीजली नहीं वैसा हल गुजरात में नहीं I यहाँ पानी एवम लाइट २४ घंटे मौजूद है और किसान भी खुशहाल है I आप ही ने अपने विदेश प्रेम के कारन क्वोत्रोची एवम एंडरसन को देश में से बाइज्जत बरी किया और हो भी क्यों न विदेशी ही तो कांग्रेस को चला रही है I इसलिए विदेश प्रेम जायज है I
अंत में किसी और को कुछ कहने से पहले अपने दमन में एक बात जाक लेने चाहिए कही वो दागी तो नहीं अगर है तो पहले उसे साफ़ करना चाहिए बाद में किसी और को बताना चाहिए I इसीलिए १९८४ भोपाल कांड, शीख कांड के बावजूद कांग्रेस बीजेपी को मौतकी सौदागर मानती है तो वोह क्या है ?
गोधरा में हुए २००२ के दंगो के लिए कांग्रेस एवम अन्य राजनीतिक पक्ष बीजेपी को और खास तौर पर नरेन्द्र मोदी को जिम्मेदार मान रही है I इस दंगो की शुरुआत गोधरा से हुई जहा साबरमती ट्रेन से लौट रहे रामसेवको को कुछ लोगो ने डब्बे में बांध करके जलादिया था I जो उस समय के रेलमंत्री लालू यादव ने कहा की आग अंदर से ही लगे गई थी I
मेरा उनसे एक प्रश्न यह है की कोई भी इन्सान इतना पागल तो नहीं होता की अपने आप को जिन्दा जला डाले I और ऐसे लोगो को जो ठीक से बोल भी नहीं पाते I उस समय वह का मंजर ऐसा था की कोई भी पत्थर दिल इन्सान सहम जाता I जो माजर था वो वाकई में इतना घिनोना था की जब भी उसकी याद आती है आज भी दिल काप उठता है I हमारी केंद्र सरकार को दंगो में मरे जाने वाले मुस्लिमो की चिंता है लेकिन ट्रेन में जो ५८ लोगो को जिन्दा जलाया उनका क्या?
झूठे सेकुलरिस्म के लिए वाकई में ऐसा अन्याय होना यह हम सेहन नहीं सर सकते I दोनों तरफ से लोग कसूरवार है अगर हिन्दू कसूरवार है तो मुस्लिम भी है क्यूंकि उन्होंने ही आग लगायी थी ट्रेन में अगर ट्रेन में आग नहीं लगी होती तो ऐसा नहीं होता I उस समय के गुजरात कांग्रेस नेता शंकरसिंह वाघेला की भी जाच होनी चाहिए क्यूंकि उस समय वोह भी खली भीथे थे और उनके पास चुनाव में कोई मुद्दा नहीं था और आग लगनेवाले में कांग्रेस का स्थानीय कोर्पोराते भी शामिल था I इसलिए गोधरा ट्रेन कांड की निष्पक्ष जांच फिर से होनी चाहिए और जो ट्रेन में जलकर मर गए है उनके परिवार को भी न्याय मिलना चाहिए I और दंगो में कांग्रेस की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए I
आईना सच का ! सोचो या फोड़ो ! सच तो सच रहेगा !

 

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Sunday, October 14, 2012

ब्रिटन के बाद अब अमरीका ने भी माना - मोदितव मेव जयते ! पश्चीम को झुका देनेवाला ये पहला भारतीय शख्स है !

ब्रिटन के बाद अब अमरीका ने भी माना - मोदितव मेव जयते ! पश्चीम को अपनी शर्तो पे झुका देनेवाले मोदी जी !

नरेंद्र मोदी ने तोड़ा पश्चिम का अहंकार | Narendra Modi

नरेंद्र मोदी ने तोड़ा पश्चिम का अहंकारपश्चिम के देशों मसलन अमेरिका, ब्रिटेन आदि को यह समझ में आ गया है कि भारत में पूंजी निवेश गुजरात को दरकिनार कर नहीं किया जा सकता है और गुजरात में अगर निवेश करना है तो नरेंद्र मोदी की जय करनी ही होगी। गुजरात में चुनावी बयार के बीच 10 अक्तूबर 2012 को सात समंदर पार से यह खबर आई कि ब्रिटिश सरकार गुजरात के साथ द्विपक्षीय सम्बंध बढ़ाना चाहती है। भारत मामलों के नए ब्रिटिश मंत्री ह्यूगो स्वायर ने लंदन में जारी एक बयान में कहा कि मैंने नई दिल्ली स्थित ब्रिटिश उच्चायुक्तों से कहा है कि वे गुजरात जाएं और वहां के मुख्यमंत्री व अन्य बड़ी हस्तियों से मिलकर आएं। बयान में आगे कहा गया था कि इससे आपसी सहयोग बढ़ाने के कई मौके मिलेंगे और हम आपसी हितों के कई मसलों पर चर्चा कर सकेंगे। ब्रिटिश सरकार की यह मंशा केवल एक सामान्य मंशा मात्र नहीं है। ब्रिटिश सरकार ने उसी गुजरात के साथ सम्बंध बढ़ाने की पहल की है, जिसके मुखिया नरेन्द्र मोदी हैं और जिन पर गोधरा कांड के बाद गुजरात में भड़के साम्प्रदायिक दंगों में भूमिका का आरोप लगाकर ब्रिटिश सरकार ने गुजरात से सम्बंधों पर 2002 में ही रोक लगा दी थी। अब यदि 10 साल बाद ब्रिटिश सरकार नींद से जागी है तो इसे मोदी की विकासवादी सोच का नतीजा ही कहा जाएगा।
ठीक एक दिन बाद 11 अक्तूबर 2012 को ब्रिटिश फैसले को नरेंद्र मोदी के लिए अंतरराष्ट्रीय रूप से परित्यक्त व्यक्ति के दर्जे का अंत होने की शुरुआत बताते हुए अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट लिखता है कि विश्व में तेजी से विकसित हो रही अर्थव्यवस्था के उद्यम प्रिय सरकारी अधिकारी (नरेंद्र मोदी) बहुत सी राजनैतिक बाधाएं हटा सकते हैं। इसके बाद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम लिए बगैर अमेरिकी विदेश मंत्रालय में लोक कल्याण मामलों के सहायक विदेश मंत्री माइक हैमर ने वाशिंगटन में एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान विदेशी पत्रकारों को बताया कि हम किसी व्यक्ति विशेष के वीजा मामले से जुड़े सवालों में नहीं पड़ते। अमेरिका किसी भी वीजा आवेदन का मूल्यांकन योग्यता और अमेरिकी नियमों के मुताबिक करेगा। दरअसल नरेंद्र मोदी के बारे में हैमर से सवाल नरेंद्र मोदी और गुजरात को लेकर ब्रिटेन के हालिया फैसले के संदर्भ में पूछा गया था।

दरअसल कहानी तो यहीं खत्म हो जाती है कि 11 सालों में देखते ही देखते हार्डकोर हिन्दुत्व का पोस्टर ब्वॉय नरेंद्र मोदी अपनी छवि विकास पुरुष के रूप में साबित कर उन पश्चिमी देशों (अमेरिका और ब्रिटेन) के अहंकार को मिट्टी में मिला दिया जिन्होंने नरेंद्र मोदी को `अछूत` मान लिया था। लेकिन यहां यह जानना जरूरी होगा कि इस वैश्विक पूंजीवादी राजनीति के पीछे की हकीकत क्या है? गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी देश के ऐसे इकलौते राजनेता हैं जो जिंदगी अपनी शर्तों पर जीते हैं और इसी दर्शन के साथ वह दो दशक से अधिक समय से गुजरात में भी अपना शासन चलाते आ रहे हैं। आपको याद होगा जब वर्ष 2002 में गुजरात में गोधरा की आग फैली थी तो पूरी दुनिया में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को अछूत मान लिया गया था। देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी उन्हें `राजधर्म` का पालन करने की नसीहत दे डाली थी। ब्रिटेन ने 2002 में द्विपक्षीय सम्बंधों पर रोक लगा दी थी और मार्च-2005 में अमरीका ने मोदी को वीजा देने से इनकार कर दिया था। तब मोदी ने कसम खाई थी कि वह जीते जी अमेरिका की धरती पर कदम नहीं रखेंगे। और फिर मोदी ने गुजरात के परिदृश्य को ऐसे बदला कि गुजरात बना विकास मॉडल और नरेंद्र मोदी बने विकास पुरूष।

नरेंद्र दामोदर दास मोदी ने जब अक्तूबर 2001 में मुख्यमंत्री के रूप में पहली बार कार्यभार संभाला था तब गुजरात 26 जनवरी, 2001 को आए विनाशकारी भूकंप की विभीषिका तले दबा हुआ था। तब लगता था मानो गुजरात फिर कभी उठ नहीं पाएगा। लेकिन पुनर्वास और पुनर्निमाण के तेज प्रयासों और पुन: उठ खड़े होने के लोगों के अदम्य साहस और जज्बे से गुजरात विकास के मार्ग पर अग्रसर हो गया। उस दौर में गुजरात के पुनर्वास कार्य को रोल मॉडल के तौर पर स्वीकार किया गया। नरेंद्र मोदी की बातों पर यदि भरोसा करें तो वर्ष 2001 में जब वह मुख्यमंत्री बने थे उस दौरान लोग उनसे विनती करते थे कि कम से कम शाम को भोजन के दौरान बिजली का इंतजाम कर दीजिए। इस समस्या के समाधान के लिए मोदी ने `ज्योति ग्राम योजना` बनाई जिसके तहत गुजरात के गांवों में 24 घंटे अबाध बिजली आपूर्ति की जाती है। इसके साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सड़क, पानी, कृषि, उद्योगों के विकास के साथ सरकारी कार्यालयों के कंप्यूटरीकरण की कवायद भी शुरू की।

लंदन स्कूल और इकोनॉमिक्स के एक विशेषज्ञ ने चुनाव पूर्व सर्वेक्षण के दौरान इस बात को स्वीकार किया है कि मेहसाणा जिले के वडनगर में 16 सितंबर 1950 को जन्मे नरेंद्र मोदी के सितारे बुलंद हैं, क्योंकि उन्होंने गुजरात में विकास के काम किए हैं और इस बात को जनता तक सही तरीके से पहुंचाया गया है। अपने दो दशक से अधिक के शासनकाल में मोदी के विकासवादी सोच के कुछ अहम फैसलों ने गुजरात कि किस्मत ही बदल दी। मसलन डेढ़ लाख खेत तालाब, ज्योति ग्राम योजना से 24 घंटे अबाध बिजली, वाईब्रेंट गुजरात ग्लोबल इनवेस्टर्स समिट से 40 लाख करोड़ का पूंजी निवेश, सभी गावों को ब्रॉडबैंड से जोड़ना, 15 मिनट में एंबुलेंस सेवा, महिला सखी मंडलों को 16 हजार करोड़ के काम, कन्या शिक्षा अभियान, कृषि महोत्सव, कार उद्योग की स्थापना और गरीब कल्याण मेला की उपलब्धि ने नरेंद्र मोदी को विकास पुरुष का ताज पहना दिया। कुछ लोग और सियासी पार्टियां यह दलील देते हैं कि गुजरात में ऐसा कुछ खास नहीं हुआ है। वह आठवी पंचवर्षीय योजना (1992-97) के समय से ही तेजी से विकास कर रहा है। हम इसे गलत भी नहीं ठहरा रहे हैं लेकिन अर्थशास्त्र का नियम कहता है कि जैसे-जैसे विकास होता है वैसे–वैसे उच्च विकास दर को बरकरार रखना मुश्किल होता जाता है। विकास का ह्रास होते देर नहीं लगती।

किसी भी देश या राज्य की अर्थव्यवस्था की बात जब हम करते हैं तो निश्चित रूप से उसके सकल घरेलू उत्पाद दर (जीडीपी दर), कृषि विकास दर, औद्योगिक विकास दर और सेवा क्षेत्र में तरक्की की जमीनी हकीकत को आंका जाता है। गुजरात के सकल घरेलू उत्पाद (तरक्की की रफ्तार) की बात करें तो यह हमेशा डबल डिजिट में रही है जबकि भारतीय अर्थव्यवस्था की तरक्की की रफ्तार (जीडीपी दर) की बात करें तो यह डबल डिजिट के नजदीक भी नहीं पहुंच पा रही है। हमारा इरादा गुजरात की अर्थव्यवस्था की तुलना भारतीय अर्थव्यवस्था से करने का नहीं है लेकिन इस बात को मानने से इनकार नहीं किया जा सकता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती में गुजरात का बड़ा योगदान है। वर्ष 2000 के बाद गुजरात में कृषि की विकास दर बहुत अच्छी रही है। गुजरात में कृषि विकास दर हमेशा 10 प्रतिशत से ज्यादा रही है। इसमें पानी, बिजली और सड़कों के अलावा भी कई कारकों की भूमिका रही है। वर्ष 2001 में गुजरात में 2000 मेगावाट बिजली पैदा होती थी जो उसकी अपनी जरूरत से बहुत कम थी, लेकिन 2012 के अंत में गुजरात में अतिरिक्त बिजली पैदा होने लगी। गुजरात ने इस दलील को भी गलत साबित कर दिया कि लोगों को कम दाम में बिजली चाहिए होती है और वह ज्यादा दामों का भुगतान नहीं करना चाहते। गुजरात का अनुभव बताता है कि लोग भुगतान करने को तैयार होते हैं बशर्ते बिजली सप्लाई बेहतर हो। चूंकि बिजली औद्योगिक विकास के लिए संजीवनी होती है इसलिए गुजरात में औद्योगिक विकास की रफ्तार भी तेज है। आप दिल्ली में जिस मेट्रो कोच में सफर करते हैं उसके निर्माण की भारत में इकलौती फैक्ट्री गुजरात में है। बॉम्बार्डियर कनाडा की कंपनी है जिसका संयंत्र गुजरात के सावली जिले में स्थित है। साणंद को इंड्रस्ट्रियल हब के रूप में विकसित किया गया है। औद्योगिक विकास को गति देने के लिए गुजरात सरकार ने बुनियादी सुविधाएं तो मुहैया कराई ही हैं, इसके साथ ही अगर आपको उद्योग लगाना है और उसकी सरकार से मंजूरी चाहिए तो इसके लिए सिंगल विंडो सिस्टम लागू किया गया। अन्य राज्यों में इस मंजूरी के लिए कुल 84 एप्रूवल उद्यमियों को लेने पड़ते है। जाहिर है उद्यमियों की प्राथमिकता में गुजरात पहले नंबर पर होगा। मारुति और टाटा नैनो गुजरात में अपना विस्तार कर रहे हैं।

वर्ष 2002 में समूचे गुजरात के गांवों में शुद्घ पानी पहुंचाने के उद्देश्य से वास्मो का गठन किया गया। जनभागीदारी और असरदार जल व्यवस्थापन की वजह से आज गुजरात में 17,700 से भी ज्यादा पानी समितियां कार्य कर रही हैं। इनमें से ज्यादातर समितियों की कमान महिलाओं के हाथों में है। 19 अप्रैल 2012 के दिन एक ओर जहां वैज्ञानिकों ने अग्नि-5 मिसाइल का सफल प्रक्षेपण कर देश को गौरवान्वित किया, वहीं दूसरी ओर इसी दिन गुजरात ने 600 मेगावाट की सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता राष्ट्र को अर्पित कर एक नए अध्याय की शुरूआत की। 25 वर्ष के समय काल में यह 600 मेगावाट का प्रोजेक्ट 24000 मिलियन यूनिट्स बिजली पैदा करेगा। इससे पहले वर्ष 2009 में गुजरात ने अपनी सौर ऊर्जा नीति की घोषणा की। 500 मेगावाट की स्थापित क्षमता वाली इस सौर ऊर्जा नीति के लिए करीब 85 डेवलपरों के साथ 968.5 मेगावाट की खरीद व्यवस्था पर हस्ताक्षर किए गए। आज देश के कुल सौर ऊर्जा उत्पादन में 66 फीसदी योगदान गुजरात का है।

लोग अक्सर पूछते हैं कि गुजरात मॉडल क्या है। दरअसल इस राज्य में व्यक्तिगत पहल और उद्यमशीलता के लिए पूरी आजादी दी गई है और राज्य ने इसके लिए अनुकूल माहौल भी पैदा किया है। यह नियोजन के सशक्तिकरण और लोगों के सशक्तिकरण का बेजोड़ उदाहरण है। इसमें केंद्र के अनुदान से चलनेवाली योजनाओं के साथ राज्य की विशिष्ठ योजनाओँ को पूरक बनाया गया है। यह विकास का एक मानक सांचा है जिसे कोई भी राज्य अपनाकर तरक्की की राह पकड़ सकता है। वैसे गुजरात मॉडल को सफल तरीके से लागू करने में जिन विभिन्न कारकों का हाथ है उसमें पहला कारक हे विरासत का। 2002 के पहले की सरकारों ने भी अच्छा प्रभाव छोड़ा है। दूसरा गुजरात में निजी उद्यमशीलता और सरकार के प्रति संदेह करने की स्वस्थ परंपरा रही है। तीसरा पानी और बिजली के क्षेत्र में गुजरात को अनुकूल स्थितियों का लाभ मिला। चौथा वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व ने नौकरशाही के सशक्तिकरण, भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम, नियोजन और डिलीवरी के विकेंद्रीकरण और पिछड़े वर्गों व क्षेत्रों के विकास के लिए सुनियोजित दखलंदाजी कर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

बहरहाल, इतना सब कुछ अगर गुजरात में मौजूद है तो फिर पश्चिमी देशों के लिए गुजरात को या नरेंद्र मोदी को दरकिनार करने की कोई वजह नहीं बनती है। आपको यह जानकर शायद आश्चर्य होगा कि जब अमेरिका और ब्रिटेन ने गोधरा कांड की आड़ लेकर मोदी को दरकिनार करने की कोशिश की तो नरेंद्र मोदी ने जापान से दोस्ती गांठी, चीन और इजरायल से दोस्ती गांठी। आज की तारीख में चीन, जापान और इजरायल से नरेंद्र मोदी के रिश्ते बेहद मधुर हैं। जाहिर है पूंजी निवेश में अमेरिका और ब्रिटेन के मुकाबले नरेंद्र मोदी जापान, इजरायल और चीन को ज्यादा तरजीह देंगे। इस बात को अमेरिका और ब्रिटेन भी समझ रहा होगा। गुजरात में दिसंबर में विधानसभा चुनाव होने हैं। इस चुनाव की अहमियत इस मायने में अधिक है कि नरेंद्र मोदी भले ही गुजरात के मुख्यमंत्री हैं, लेकिन उनकी छवि एक राष्ट्रीय नेता के रूप में है। देश की जनता उन्हें आगामी लोकसभा चुनाव-2014 में प्रधानमंत्री के एक सशक्त उम्मीदवार के रूप में देख रही है। देश के कुछ बड़े औद्योगिक घराने रतन टाटा, मुकेश अंबानी आदि ने भी देश के अगले प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी को पहली पसंद बताया है। गुजरात विधानसभा चुनाव में अगर मोदी की बड़ी जीत होती है तो प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी का दावा और मजबूत हो जाएगा। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकारों की इस पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर है और इसी के तहत गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान अमेरिका और ब्रिटेन ने नरेंद्र मोदी के प्रति समर्पण का एक खास भाव पेश किया है।

Saturday, October 13, 2012, 16:25

जब माफी मांगे बिना ही लोग उन्हें अगले प्रधानमंत्री के रूप में देखने को तैयार है तो वे माफी क्यों मांगे?

अगर वे माफी मांगते हैं जो वर्ग अभी तक मोदी को 2002 दंगों का कूसूरवार बताता आ रहा है उनकी बातों को बल मिलेगा कि वे सही थे।

पीएम पद के लिए मोदी को मंजूर नहीं माफीनामा   जब से यूके से संदेश आया है मोदी गदगद हैं। वे खुश हो भी क्यों न आखिर उनकी छवि जो देश से विदेश तक खराब थी उसमें सुधार आ रहा है। इस बात का अंदाजा सभी को है कि अगर मोदी को पीएम पद के रेस में आगे आना है तो उन्हें अपनी छवि में थोड़ा परिवर्तन लाना ही होगा। लेकिन वे अपनी छवि में परिवर्तन लाने के लिए 2002 के लिए लोगों से माफी नहीं मागने वाले। क्योंकि वे भी जानते हैं कि इससे उन्हें फायदा के बजाय नुकसान ही होगा। अभी दो दिन पहले राजदीप सरदेसाई से बात करते हुए उन्होंने 2002 दंगों के मसले पर माफी मांगने के सवाल पर कुछ नहीं बोला। सरदेसाई से दो बार यह सवाल किया कि जो लोग चाहते हैं कि वे प्रधानमंत्री बने, वे चाहते हैं कि मोदी 2002 दंगों के लिए लोगों से माफी मागें। क्या वे ऐसा करेंगे? दोनों ही बार मोदी ने कुछ नहीं कहा। आखिर इसके पीछे क्या वजह क्या हो सकती है?

मोदी अपनी छवि में तो सुधार तो चाहते हैं लेकिन माफी नहीं मांगना चाहते। अपनी इसी छवि को सुधारने के लिए उन्होंने    सद्भावना यात्रा निकाली थी। लेकिन यात्रा के दौरान एक अल्पसंख्यक के हाथों टोपी न पहनने पर उनकी सद्भावना यात्रा पर सवाल भी खड़े हुए थे। उसी समय इस बात संकेत मिल गए थे कि मोदी अपनी छवि में सुधार अपनी ही शर्तो पर चाहते हैं। आज जब लोग या कहे मीडिया मोदी को प्रधानमंत्री पद का सबसे प्रबल दावेदार मानता है तो भी वे माफी मांगने पर राजी नहीं है। माफी मांगने से मोदी को क्या नुकसान हो सकता?

अगर वे माफी मांगते हैं जो वर्ग अभी तक मोदी को 2002 दंगों का कूसूरवार बताता आ रहा है उनकी बातों को बल मिलेगा कि वे सही थे। जबकि मोदी शुरू से ही इस मसले पर अडिग रहे हैं। इस बात अंदाजा उन्हें भी है कि वे माफी मांग भी ले उस वर्ग का विश्वास नहीं जीत सकते। माफी मांगने से दूसरा नुकसान यह हो सकता है कि जिन लोगों ने 2002 दंगों के बाद भी मोदी को सर आंखों पर बैठाया। माफी मांगने के बाद मोदी की छवि उनकी आंखों में कम हो जाएगी। आखिर उनकी आंखों में 2002 के बाद से वे एक हीरो के रूप में सामने आए थे। तभी तो वे लगातार दो बार गुजरात में दो बार अपनी सत्ता जमाने में कामयाब हो सके। मोदी को उन लोगों का या कहे की उस वोट बैंक की भी चिंता है जिसके कारण वे माफी से कतरा रहे हैं।

अगर वे माफी मांग लेते हैं तो कांग्रेस भी उनको नहीं छोड़ेगा। कांग्रेस को बैठे-बिठाय मोदी पर निशाना साधने का मुद्दा मिल जाएगा। इस बार के गुजरात चुनावों में कांग्रेस 2002 की बात नहीं कर रहा क्योंकि उससे कांग्रेस को ही नुकसान होता। जिसका उदाहरण वे पिछले दो चुनावों में देख चुके हैं। जहां सोनिया ने मोदी को मौत का सौदागर तक कह दिया था। लेकिन उससे मोदी को ही फायदा हुआ और चुनाव आसानी से जीत गए। इन परिस्थितियों में अगर मोदी माफी मांगते हैं तो कांग्रेस इस मुद्दे को हाथ से जाने नहीं देगी। वैसे भी कांग्रेस भाजपा को कट्टर दल बताने का कोई मौका अपने हाथ से जाने देना नहीं चाहती। मोदी को शायद इन सभी बातों का इल्म है इसलिए ही वे माफी मांगने को तैयार नहीं है।

मोदी के माफी मांगने का सबसे बड़ा नुकसान उनको आरएसएस के गुस्से के रूप में भी झेलना पड़ सकता है। जब नीतिश कुमार ने कहा था कि अगला प्रधानमंत्री धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए तो मोदी के बचाव में आरएसएस ही सबसे पहले सामने आया था। आज आरएसएस ही मोदी का सबसे बड़ा समर्थक है। अगर उसका साथ ही मोदी के साथ न रहा तो उनके लिए प्रधानमंत्री पद तक पहुंचना आसान नहीं होगा। क्योंकि सभी जानते हैं कि आरएसएस की सहमति के बिना भाजपा में कोई बड़ा फैसला नहीं होता।

मोदी यह जानते हैं कि प्रधानमंत्री पद के लिए उनकी छवि का सुधरना जरूरी हैं। लेकिन अपनी छवि सुधारने के चक्कर में अपना नुकसान नहीं कराना चाहते। उनके माफी न मांगने पर भी कई लोग उन्हें प्रधानमंत्री पद का दावेदार मानते हैं। संडे इंडियन में छपे सर्वे में भी लोग मोदी को बेहतर प्रधानमंत्री मानते हैं। सर्वे में इस बात पर लोगों ने सहमति जताई है कि अगर मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं तो देश से भ्रष्टाचार में काफी हद तक कमी आ जाएगी। यह मोदी के लिए अच्छी बात है। जब माफी मांगे बिना ही लोग उन्हें अगले प्रधानमंत्री के रूप में देखने को तैयार है तो वे माफी क्यों मांगे? 

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