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Saturday, April 13, 2013

2014 में होने वाले में आम चुनाव में लोकसभा की लगभग 160 सीटों पर ट्विटर-फेसबुक का असर

चुनाव के नतीजों पर ट्विटर-फेसबुक का असर?

फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया के मंच का इस्तेमाल करने वाले लोग नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं?

एक नए अध्ययन में इसी सवाल का जवाब खोजा गया है.

आयरिश नॉलेज फाउंडेशन एंड इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने इस पर एक शोध किया है और कहा है कि 2014 में होने वाले में आम चुनाव में लोकसभा की लगभग 160 सीटों पर इसका असर दिखाई दे सकता है.

सर्वाधिक प्रभाव वाली सीटें

अध्ययन में सबसे सर्वाधिक प्रभाव वाली सीटों की पहचान की गई है.सबसे अधिक प्रभाव वाली सीटों का तात्पर्य उन सीटों से है, जहां पिछले लोकसभा चुनाव में विजयी उम्मीदवार के जीत का अंतर फेसबुक का प्रयोग करने वालों से कम है अथवा जिन सीटों पर फेसबुक का प्रयोग करने वालों की संख्या कुल मतदाताओं की संख्या का 10 प्रतिशत है.

अध्ययन में 67 सीटों की 'अत्यधिक प्रभाव वाली', जबकि शेष सीटों की 'कम प्रभाव वाली' सीटों के रूप में पहचान की गई है.

लोकसभा की कुल 543 में से 160 सीटों पर सोशल मीडिया का खासा असर देखने को मिल सकता है. महाराष्ट्र में इसका सबसे ज्यादा असर पडऩे की संभावना है. यहां की 21 सीटों पर सोशल मीडिया का असर पड़ सकता है."

महाराष्ट्र और गुजरात आगे

जबकि गुजरात में 17 सीटें सोशल मीडिया से प्रभावित हो सकती हैं. इसी तरह उत्तर प्रदेश में 14, कर्नाटक की 12, तमिलनाडु की 12, आंध्र प्रदेश की 11, केरल की 10 और मध्य प्रदेश की 9 सीटों पर इसका असर देखने को मिल सकता है.

ये वो लोकसभा सीटें हैं जहां लोग सोशल नेटवर्किंग साइट का इस्तेमाल सबसे ज्यादा करते हैं. इन निर्वाचन क्षेत्रों में कुल मतदाताओं के दस फीसदी से ज्यादा लोग फेसबुक से जुड़े हुए हैं.

सर्वेक्षण के मुताबिक फेसबुक से जुड़े लोग चुनाव से पहले अपने आसपास के वोटरों को प्रभावित कर सकते हैं.

अध्ययन का ये भी कहना हैं कि चुनाव से 48 घंटे पहले उम्मीदवारों के चुनाव प्रचार पर रोक लगने के बाद फेसबुक, ट्विटर जैसी सोशल मीडिया चुनाव प्रचार की कमान संभाल लेंगे.

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Friday, April 12, 2013

फेसबुक राजनीति में आहिस्ता आहिस्ता राजनीति में पैंठ बनाने में सक्षम बना रहा है

फेसबुक राजनीति में आहिस्ता आहिस्ता राजनीति में पैंठ बनाने में सक्षम बना रहा है - ताकत तकनीक की ...... या तो तैयार रहो .... या तो मीट जाओ !

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राजनीति में धीरे धीरे पैठ बना रहा है फेसबुक गूगल, फेसबुक और माइक्रोसॉफ्ट सहित अमेरिका की कुछ शीर्ष तकनीकी कंपनियों ने अमेरिकी आव्रजन नीति से जुड़े अहम मुद्दों के लिए आपस में हाथ मिलाया है। फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने इस समूह को एफडब्ल्यूडी का नाम दिया है जो उन्हें आहिस्ता आहिस्ता राजनीति में पैंठ बनाने में सक्षम बना रहा है और अमेरिका में आव्रजन सुधार को आगे बढाने के साथ ही वहां के उन प्रवासियों को मदद पहुंचा रहा है जो अभी तक पंजीकृत नहीं हैं।

वाशिंगटन पोस्ट में कल जुकरबर्ग ने लिखा, ‘‘ हमारी आव्रजन नीति विचित्र है ओैर आज की दुनिया के लिए उपयुक्त नहीं है। ’’ नये समूह का कहना है कि वह आव्रजन सुधार , बेहतर स्कूलों के मुद्दे के साथ साथ वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए और धन जुटाने को लेकर कांग्रेस और व्हाइट हाउस में लॉबिंग करने के साथ ही सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर जनसमर्थन जुटाएगा।

समूह में जुकरबर्ग का साथ नेटफ्लिक्स के सीईओ रीड हेस्टिंग्स , लिंकडिन के संस्थापक रेड हाफमैन ,येल्प के चेयरमैन मैक्स लेव्चिन , याहू के सीईओ मेरिसा मेयर ,ज्येंगा के सीईओ मार्क पिन्कस और गूगल के चेयरमैन एरिक श्मित दे रहे हैं।
जुकरबर्ग ने रेखांकित किया कि अमेरिका की मौजूदा अर्थव्यवस्था प्राकृतिक संसाधनों , औद्योगिक मशीनों और श्रम के बजाए मुख्य तौर पर ज्ञान और विचारों पर आधारित है। उन्होंने कहा कि अमेरिका को सबसे प्रतिभाशाली और मेहनती लोगों को आकषिर्त करने की जरूरत है। और उनमें से कई विदेश में जन्में हैं।

फेसबुक के सीईओ ने कहा, ‘‘ हम ऐसे 40 फीसदी गणित और विज्ञान स्नातकों को शिक्षा देने के बाद देश से बाहर क्यों कर देते हैं जो कि अमेरिका के नागरिक नहीं हैं। ’’ उन्होंने सवालिया लहजे में कहा, ‘‘ हम क्यों नहीं उद्यमियों को यहां आने देते हैं जबकि वे यहां आकर कंपनियां शुरू कर और नौकरियां पैदा कर सकते हैं। ’’ आव्रजन की बहस में शामिल होने वाले हाई प्रोफाइल चेहरों में अब फेसबुक के सह संस्थापक शामिल हो गए हैं। बुधवार को इस मुद्दे पर अमेरिकी राजधानी और देश भर में आयोजित रैली में हजारों लोगों ने हिस्सा लिया। ( https://www.facebook.com/jugal24x7 )

Tuesday, April 9, 2013

जिससे डरता है अमेरिका उत्तर कोरिया का यह शासक अपने पिता की तरह ही रहस्यमयी और खुंखार है। किम जोंग

दुनिया का सबसे खतरनाक इंसान जिससे डरता है अमेरिका


नई दिल्ली:  किम जोंग उन दुनिया के ऐसे खतरनाक शासक हैं जिनके डर से अमेरिका भी कांपता है। उत्तर कोरिया का यह शासक अपने पिता की तरह ही रहस्यमयी और खुंखार है। किम जोंग उन ने हाल ही में अमेरिका को धमकाते हुए दक्षिण कोरिया पर परमाणु हमले तक की धमकी दे दी है। इतना ही नहीं, दोनों देशों की सेना अपने अपने देश की सीमा पर युद्ध के लिए तैयार खड़ी है। हम यहां आपको इस खतरनाक नेता के बारे में कई सारी बातें बता रहे हैं।

दुनिया का सबसे खतरनाक शख्स: किम जोंग उन

किम जोंग उन। जी हां, दुनिया उसे इसी नाम से जानती है। अपने पिता और अपने जमाने में दुनिया के सबसे खतरनाक और रहस्यमय माने जाने वाले किम जोंग इल की तीन संतानों में आखिरी संतान हैं किम जोंग उन। दुनिया में सबसे बड़ी खुफिया एजेंसी होने का दावा करने वाली अमेरिका की सीआईए भी पानी भरता नजर आता है।

उत्तर कोरिया के इस नेता की दुनिया कितनी रहस्मय है इस बात का दावा इस बात से किया जा सकता है कि किम जोंग उन के जन्म के बारे में भी कयास लगते रहते हैं। 30 साल के स्विट्जरलैंड में पढ़ाई करने वाले किम जोंग उन के जन्म तिथि के बारे में कोई 1983 का दावा करता है तो कोई 1984 का। सही-सही किसी को पता नहीं।

किम जोंग उन के पिता किम जोंग इल ने जब सत्ता संभाली थी, तब भी दुनिया हैरान रह गई थी। इसका कारण यह था कि  तब किम पर्दे के पीछे रहने वाले एक शातिर नेता समझे जाते थे। किम जोंग इल को 2008 में पक्षाघात हुआ था। बीमारी की हालत में दो साल पहले किम जोंग इल ने मृत्यु से पहले ही किम जोंग उन को अपनी सत्ता सौंप दी थी। लेकिन किम जोंग उन के सामने अपने पिता के मुकाबले हमेशा ही कुछ अलग तरह की चुनौतियां रही हैं।

कहा जाता है कि जिस तरह से किम जोंग इल के बारे में पहले से कोई जानकारी नहीं थी, उसी तरह उनके बेटे और उत्तर कोरिया के शासक किम जोंग उन के बारे में कोई नहीं जानता। पढ़ाई के लिए जोंग उन विदेश चले गए यानी अपने देश का उन्हें वह अनुभव नहीं, जो उनसे पहले उनके पिता या दादा को था। हालांकि किम जोंग उन अपने दिवंगत पिता के चहेते रहे हैं।

किम ने जब सत्ता संभाली तो सबसे पहले अपने चाचा को ताकतवर सैनिक पद पर बिठाया था और उसके बाद अपनी बहन को भी जनरल बना दिया।

जहां तक 30 साल के किम जोंग उन के राजनीतिक करियर का सवाल है, उन्हें अपने देश का ज्यादा तजुर्बा नहीं है। उनके सत्ता संभालने के साथ ही सवाल उठने लगे थे कि 60 से ज्यादा परमाणु हथियारों से संपन्न उत्तर कोरिया क्या इनको सुरक्षित रख पाएगा और क्या सीमा पर अचानक पैदा हो गए तनाव को झेल पाएगा।

बावजूद किम जोंग उन के हक में जो बात रही वह है उनका अंतरराष्ट्रीय आयाम। विदेशों में पढ़ाई करने और पश्चिमी जगत को समझने वाले माने जाते हैं। किम जोंग उन पर देश में क्रांतिकारी बदलाव लाकर उत्तर कोरिया को 21वीं सदी में प्रवेश कराने को लेकर काफी दवाब रहा।

परमाणु हथियारों और पारिवारिक सत्ता के अलावा गरीबी भी उत्तर कोरिया के लिए बड़ी समस्या माना जाता है। अपने जुड़वां देश दक्षिण कोरिया के मुकाबले उत्तर कोरिया का प्रति व्यक्ति आय 17 गुना कम है और पश्चिमी मीडिया के मुताबिक कई घरों में चूल्हा जलाने तक का संसाधन नहीं है।

किंग जोंग इल: पिता भी खतरनाक

किम जोंग उन के पिता किंग जोंग इल की मौत हो चुकी है। उन्हे ना सिर्फ एक तानाशाह के रूप में देखा जाता था बल्कि उनकी गिनती उन कुछ नेताओं में होती है जो तानाशाह होने के बाद भी जनता के बीच लोकप्रिय रहे। कुछ लोग उन्हें आज भी काला जादू का मालिक मानते हैं तो कुछ उन्हें एक रंगीन-मिजाज तानाशाह। अपनी गद्दी और शासन के लिए किंग जोंग ने कुछ ऐसे काम किए कि लोग उनकी मौत के बाद उन्हें सिर्फ नरक का ही उत्तराधिकारी मानते हैं। देश में गरीबी से मर रहे लोग हों या भुखमरी से मर रहे लोग, उन्हें किसी की कोई परवाह नहीं रही। उन्हें अगर किसी की परवाह की तो बस, अपने सैन्य ताकत की।

उत्तर कोरिया के पूर्व शासक किंग जोंग इल का नाम दुनियाभर में अपने कारनामे के लिए कुख्यात रहा है खासकर, अपने जन्मजात दुश्मन देश दक्षिण कोरिया की महिलाओं को जबरन कैदी बनाने के लिए। माना जाता है कि उन्होंने 2000 महिलाओं की एक ऐसी सेना बनाई थी जिसे वह अपने प्लेजर ग्रुप में रखते थे। इनमें से अधिकतर दक्षिण कोरिया की रहने वाली थी जिन्हें जबरन अपहरण कर भर्ती किया जाता था। इन महिलाओं को खुछ खास कामों के लिए भर्ती किया जाता था। पहला सेक्सुअल सर्विस के लिए, दूसरा मसाज और तीसरा डांसिंग और सिंगिंग के लिए।

उत्तर कोरिया का भूगोल

उत्तर कोरिया, आधिकारिक रूप से कोरिया जनवादी लोकतांत्रिक गणराज्य (हंगुल, हांजा) पूर्वी एशिया में कोरिया प्रायद्वीप के उत्तर में बसा हुआ देश है। दुनियाभर में कुख्यात उत्तर कोरिया को दुनिया का सबसे बड़ा 'उस्तरा' भी कहा जाता है। प्योंगयांग उत्तर कोरिया की राजधानी और सबसे बड़ा शहर भी है।

कोरिया प्रायद्वीप के बीच कोरियाई सैन्यविहीन क्षेत्र उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच विभाजन रेखा कहलाती है। उत्तर कोरिया का करीबी साथी चीन उत्तर कोरिया को पड़ोसी भी है। अमनोक नदी और तुमेन नदी उत्तर कोरिया और चीन के बीच सीमा का निर्धारण करती है, वहीं उत्तर-पूर्वी छोर पर तुमेन नदी की एक शाखा रूस के साथ सीमा बनाती है।

उत्तर कोरिया का इतिहास

1905 में रुसो-जापान युद्ध के बाद जापान द्वारा कब्जा किए जाने के पहले प्रायद्वीप पर कोरियाई साम्राज्य का शासन था। सन 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद यह सोवियत संघ और अमेरिका के कब्जे वाले क्षेत्रों में बांट दिया गया। उत्तर कोरिया ने संयुक्त राष्ट्र संघ की पर्यवेक्षण में सन 1948 में दक्षिण में हुए चुनाव में भाग लेने से इंकार कर दिया, जिसके बाद दो कब्जे वाले क्षेत्रों में अलग कोरियाई सरकारों का गठन किया गया।

लेकिन उत्तर और दक्षिण कोरिया दोनों ने ही पूरे प्रायद्वीप पर अपनी संप्रभुता का दावा किया। इसी दावे का परिणाम सन 1950 में कोरियाई युद्ध के रूप में सामने आया। सन 1953 में हुए युद्धविराम के बाद लड़ाई तो खत्म हो गई, लेकिन दोनों देश अभी भी आधिकारिक रूप से युद्धरत हैं, क्योंकि शांति संधि पर कभी हस्ताक्षर नहीं किए गए। दोनों देशों को सन 1991 में संयुक्त राष्ट्र में स्वीकार कर लिया गया।

Thursday, April 4, 2013

चीन साइबर दुनिया के माध्यम से अपने दुश्मनको निशाना बना शक्ति प्रदर्शन कर रहा है.

♠ Jugal Eguru™ § आईटी जागृति और शिक्षा अभियान : ♠ Éगुरु द्वारा|  

युद्ध का नया सिद्धांत किसी राष्ट्र पर आर्थिक हमला करने, उसे आगामी कई वर्षों के लिए पंगु बना देना है. हो सकता है चीन शुरुआती तौर पर औद्योगिक क्रांति में पिछड़ गया हो लेकिन अतीत से सीखते हुए, आभासीय क्रांति का अगुवा बनने को वह पूर्णतया उद्यत है. सच यह है कि दूसरे देशों के साथ साइबर वार की सघन प्रतिस्पर्धी आभासी दुनिया में वह एक कदम आगे ही है. इस बार भी वह सुस्त पड़ने वाला नहीं!

 

चीन साइबर दुनिया के माध्यम से अपने दुश्मन अमेरिका को निशाना बना शक्ति प्रदर्शन कर रहा है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य और एक परमाणु शक्ति होने के बावजूद, चीन अच्छी तरह से जानता है कि वह अभी भी पश्चिमी आयुध प्रौद्योगिकी की बराबरी नहीं कर सकता. हताशा की इसी खाई को पाटने के लिए ही चीन साइबर वार के औचित्य को मूलाधार बना रहा है. इसके जरिए कई बार विभिन्न सैन्य और खुफिया वेबसाइटों पर हमला किया गया।

 

आखिर जासूसी किसे कहते हैं? आंकड़े, प्रौद्योगिकी, ब्लूप्रिंट, रणनीतियों और भूसामरिक निर्देशांकों तक की पहुंच को ही न! तो इस काम में वह काफी हद तक सफल भी है। इस वक्त चल रहे साइबर वार की जो भारी कीमत अमेरिकी और ब्रिटिश प्रतिष्ठान चुका रहे हैं उसे देखते हुए उनका चिंतित होना वाजिब है. हालांकि, साइबर संघर्ष सिर्फ सैन्य जासूसी तक ही सीमित नहीं है. इसमें खुफियागीरी, आर्थिक और सामाजिक जासूसी भी शामिल है. 2010 में, तकरीबन 103 देशों के राजनयिकों के कंप्यूटर में चीनी साइबर जासूसों ने सेंधमारी की, लाल ड्रेगन की कारगुजारियों पर भारत भी सचेत हुआ है. कारण स्पष्ट है. इस क्षेत्र में- चीन के बाद भारत तेजी से बढ़ता भावी सिलिकॉन हब की एशियाई शक्ति माना जाता है. ऐसा तो है नहीं कि चीन भारत के रक्षा प्रौद्योगिकी और सैन्य तैयारियों से बहुत कुछ सीख सकता है, पर निश्चित ही वह भारत की कुछ जानकारियां चोरी कर सकता है और उन्हीं के अनुरूप विभिन्न स्तरों पर रणनीतियां और प्रतिरणनीतियों बना सकता है.

 

 

निस्संदेह, आधुनिक युद्ध में हताहतों की संख्या या भौतिक संपत्ति का विनाश न्यूनतम होता है. इस साइबर वार में आर्थिक मायाजाल पर हमला किया जाता है और उसे ध्वस्त करने की कोशिश की जाती है. आर्थिक विपन्न देश दीर्घकालिक तौर पर न केवल मानव पूंजी से महरूम बल्कि राजनीतिक अस्थिरता का भी शिकार हो जाता है.

 

वियतनाम तट पर दक्षिण चीनी सागर में, जहां भारत और चीन की  तेल की खोज और नौसैनिक शक्ति से संबंधित मुद्दों पर कुछ समय से राजनीतिक कशमकश चल रही है. इस पर भी नजर डालें: 30 जून, 2010 को, विशाखापत्तन स्थित भारत के पूर्वी नौसेना कमान मुख्यालय के कंप्यूटर प्रणाली को अज्ञात एजेंटों द्वारा हैक कर लिया गया. साइबर फोरेंसिक विशेषज्ञों ने ट्रैक किया तो हैकिंग में बीजिंग की संलिप्तता जाहिर हो गई. अतीत में इसी तरह वित्त मंत्रालय के से ले कर पीएमओ की वेबसाइटों को चीनी हैकरों ने हैक किया. चीन के दुश्मनों की नजर में भविष्य में साइबर हमलों में वृद्धि की पूरी आशंका है, भारत के विरुद्ध भी जो इस साइबरवार में पूर्णत: शिथिल बैठा है.

अजीब बात है कि प्रतिभाशाली कंप्यूटर विशेषज्ञों समूह के बावजूद, भारत इस मोर्चे पर अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराने में लचर साबित हो रहा है. वास्तव में यह रक्षा, रक्षा उत्पादन और रक्षा अनुसंधान एवं विकास जैसे हमारे संस्थानों की बेहतर भर्ती और बौद्धिक पूंजी की राष्ट्र के रहस्यों की रक्षा के संदर्भ में उपयोग में विफलता है. सरकार हैकरों की सेना क्यों नहीं रखती है जो राष्ट्र के रहस्यों की रक्षा कर सकते हों? कम से कम इतना तो ईमानदारी से प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए.

इसके विपरीत, हैकिंग चीन में सरकार प्रायोजित पहल है. चीनी सरकार इसके लिए सालाना 55 मिलियन डॉलर की भारी भरकम राशि खर्च करती है. टोरंटो विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार, चीनी नौसेना की गुप्त शाखा कई तरह की साइबर जासूसी के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार है. यहां तक ​​कि पाकिस्तान में पलने और दूसरी जगहों पर चलने वाले आतंकवादी संगठनों को चीनी हैकर्स (राज्य प्रायोजित या अन्यथा) से निकलने वाली संवेदनशील जानकारी तक पहुंचने में खासी रुचि रहती है. ये जानकारियां भारत में आतंकी हमलों की साजिश में काम आ सकती हैं. भारत के लिए यह वक्त की मांग है कि वह साइबर सुरक्षा मोर्चे पर मजबूत बने.

 

साइबर सुरक्षा के लिए एक विशेष सेल का गठन अत्यंत महत्वपूर्ण है, प्रधानमंत्री और उनकी मंडली को इस स्थिति की गंभीरता का एहसास होना चाहिए. भारत तेजी से कंप्यूटरीकृत और उसकी अधिकतर संचार प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण होता जा रहा है, एक भरपूर साइबरवार के दुष्परिणाम का असर उस पूरी प्रणाली पर पड़ेगा जिससे देश संचालित होता है. यदि स्टक्सनेटॅ जैसे वायरस (जिसने नवंबर 2007 में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को गड़बड़ा दिया था) भारत के शेयर बाजार से लेकर भारतीय सशस्त्र बलों या यूटीलिटी सेंटरों तक के सर्वर पर हमला कर दे तो  देश जहां का तहां ठिठक कर ठहर जाएगा. (बेशक, इसके चलते लोगों के बीच भ्रम, भय, अविश्वास, क्रोध, लाचारी और हताशा अलग से उपजेगी !)

इस सूचना युग में, जब जानकारी की सुरक्षा सीमाओं की रक्षा जितनी ही जरूरी है, भारत क्यों न अपनी आवश्यकतानुसार आभासी और वास्तविक युद्ध को एकीकृत कर एक व्यापक रक्षा नीति का निर्माण करे. एक केंद्रीकृत रक्षा इकाई जो कि एक साथ साइबर और सीमा की रक्षा से निपटने के लिए सक्षम हों, ऐसी डिवीजनों का गठन जरूरी है. वर्तमान में, भारत में वेबसाइटों की हैकिंग कोई कठिन काम नहीं है. एक चीनी से ऐसा करने को कह कर तो देखें, यह वास्तव में यह बहुत आसान है!

Φ याद रखिए - सिक्यूरिटी का एक ही नियम है .... " हम कहीं भी सिक्यूर नहीं ...." फिर भी बचाव करना हमारे हाथ मे है !
आपका / देश का - जुगल ईगुरु ▐
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Tuesday, March 12, 2013

गुजरात के आईएएस अफसर भी मोदी से ज्यादा अमीर!

 

गुजरात के आईएएस अफसर भी मोदी से ज्यादा अमीर!

गुजरात के आईएएस अफसर भी मोदी से ज्यादा अमीर!

अहमदाबाद: गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के अधीन काम करने वाले आईएएस अफसर की चौंकाने वाली बात सामने आई है कि मोदी से ज्यादा अमीर उनके आईएएस अफसर है। सूत्र के अनुसार पता चला है कि मोदी के नौ और अधिकारी ऐसे हैं जिनकी संपत्ति मोदी की संपत्ति से कई गुना ज्यादा है। मोदी की कुल संपत्ति करीब 70 लाख रुपये है जबकि उनके सूबे के शहरी विकास विभाग के प्रधान सचिव आइपी गौतम की संपत्ति मुख्यमंत्री की संपत्ति से पांच गुना अधिक है। इसके साथ ही 1984 बैच के पीके तनेजा एक करोड़ तीस हजार, 1980 बैच के एचके दास एक करोड़ 20 लाख संपत्ति आंकी गई है।


ऐसे कई नेता है जिनकी संपत्ति ज्यादा है। दूसरी तरफ केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने सोमवार को मोदी की उनके भारत पहले संबंधी बयान चुटकी लेते हुए कहा था कि भाजपा नेता को बाकी देश से पहले अपने राज्य में यह प्रदर्शित करना चाहिए कि वह धर्मनिरपेक्ष हैं। मोदी के बयान को लेकर सवाल पूछे जाने पर सिब्बल ने कहा, धर्मनिपेक्षता मानसिकता से जुड़ी है। हम सभी सबसे पहले भारत को रखना चाहते हैं। यह हमारा सपना है। धर्मनिरपेक्षता जीवन जीने का एक तरीका है और इसकी जगह किसी और चीज को रखने की मोदी में क्षमता नहीं है। उन्हें भारत के बारे में बात करने से पहले गुजरात में यह दिखाने दीजिए कि वह धर्मनिरपेक्ष हैं।

Thursday, January 10, 2013

FACEBOOK in DANGER : Indian Govt. Planning To GET RID OVER

♠ FACEBOOK in DANGER : Indian Govt. Planning To GET RID OVER
♠ फेसबुक खतरे मे : भारत सरकार दबाना चाहती है अभिव्यक्ति की आजादी

 

दिल्ली में घटित हुए कांड के विरोध में रायसीना हिल्स पर पहुंचे जनसैलाब ने सरकार और खुफिया तंत्र को हिलाकर रख दिया है। सरकारी मशनीरी हैरत में है कि बिना किसी नेतृत्व के इतनी बड़ी तादाद में जनता सिर्फ सोशल मीडिया के जरिये एकजुट हुए और राष्ट्रपति भवन के पास तक आक्रोश जाहिर करने पहुंच गये। सरकार और खुफिया तंत्र की ओर से सोशल मीडिया को खतरे के तौर पर देखा जा रहा है। इससे निपटने के लिए भी व्यापक विचार विमर्श इंटेलीजेंस और सरकार के बीच शुरू हो चुका है। माना जा रहा है कि देश के राजनीतिक और सांप्रदायिक माहौल को बिगाडऩे के लिए भविष्य में भी सोशल मीडिया अहम् भूमिका निभा सकता है।

सुरक्षा के लिहाज से सोशल साइटें एक नयी चुनौती बनकर सरकार के सामने खड़ी हैं। इस बात की आशंका सोशल मीडिया साइटों पर निगरानी रखने वाली सरकारी एजेंसी ने जाहिर की है। रिपोर्ट में कहा गया है उग्र प्रदर्शन के पीछे इन साइटों का इस्तेमाल किया गया। भावनाओं को छू जाने वाले अनगिनत संदेशों के जरिये दिल्ली के यूथ को टारगेट किया गया। एजेंसी की रिपोर्ट पर कारगर कदम उठाने का निर्णय लिया गया है। सरकार और तमाम खुफिया एजेंसियां उन कारणों पर गहन चिंतन मंथन कर रही है जिससे भविष्य में इस तरह की स्थितियों की पुनरावृत्ति न होने पाए।
   
आज की तारीख में युवा भारत के पास अपने जज्बात और गुस्से का इजहार करने के लिए वो हथियार है, जिसे कोई नहीं रोक सकता। वो हैं सोशल वेबसाइट्स। जो लोग दिल्ली के इंडिया गेट पर अपना आक्रोश दिखाने नहीं पहुंच सके, वो ट्विटर और फेसबुक सरीखी सोशल वेबसाइट्स पर अपने जज्बातों और गुस्से की इबारत लिख रहे हैं। लेकिन आम आदमी की सोशल मीडिया पर सक्रियता सरकार को रास नहीं आ रही है और येन-केन प्रकरेण वो सोशल मीडिया को दायरे में रखने और रखवाली के उपायों को खोज रही है। सोशल बेवसाइटस पर पोस्ट, कमेंटस और लाइक करना अपराध की श्रेणी मे शामिल है और इसकी वजह से कई लोग हवालात की सैर भी कर चुके हैं। गौरतलब है कि शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे की शवयात्रा के दौरान शिवसेना कार्यकर्ताओं द्वारा मुम्बई ठप किये जाने पर शाहीन धाडा नामक युवती ने फेसबुक पर टिप्पणी की थी और उनकी मित्र रेणु श्रीनिवासन ने उसे ‘लाइक’ किया था। इसके बाद दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया था लेकिन बाद में उन्हे रिहा कर दिया गया। कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को कार्टून बनाने पर राजद्रोह के मामले में जेल की हवा खानी पड़ी तो वहीं आम आदमी की आवाज दबाने के लिए सरकार और सरकारी मशीनरी आईटी एक्ट की विभिन्न धाराओं का दुरूपयोग जमकर कर रही है। आईटी एक्ट की धारा 66-ए  में संशोधन की मांग जोर-शोर से उठने लगी है।

असलियत यह है कि वर्तमान यूपीए सरकार लगभग हर मोर्चे पर फेल दिख रही है। सरकार के हठधर्मी, बेश्र्म और नकारा रवैये के कारण जनता में अंदर तक गुस्सा भरा हुआ है और जनता विशेषकर युवा वर्ग अपनी भड़ास को सोशल वेबसाइटस के माघ्यम से देश-दुनिया में सांझा करता है। इससे जनता के बीच सरकार की छवि को गहरा धक्का पहुंच रहा है। लेकिन समस्या यह है कि सरकार कमियों को दूर करने की बजाय जनता की आवाज दबाने में ऊजो खपा रही है। सरकार अपने अपराधों की मुखर आलोचना सुनने की सहनशीलता खो चुकी है और उसी का परिणाम है कि सरकार झुंझलाहट भरे आलोकतांत्रिक व्यवहार पर उतर आई है।

 

सोशल नेटवर्किंग की दुनिया में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर शिकंजा कसने के सरकार के षडयंत्र इसी झुंझलाहट और खीझ की असंतुलित प्रतिक्रिया है जिसे कि वह कई बहानों के चोले से ढंकने का प्रयास कर रही है। योग गुरू रामदेव का आंदोलन रहा हो अथवा अन्ना का अभियान, सरकार व कांग्रेस की तरफ से जिस तरह की प्रतिक्रिया व बयानबाजी की गई वह उसकी हताशा व अवसाद को बखूबी स्पष्ट करती है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की असफलता के साथ साथ राहुल गांधी का औंधे मुंह गिरना और उसके बाद एक और बड़े राज्य आन्ध्र प्रदेश में सूपड़ा साफ होना कांग्रेस और सोनिया गांधी की हताशा के ऊपर और कई मन का बोझ बढ़ा गया। रही सही कसर गुजरात में कांग्रेस की हार ने पूरी कर दी है। निश्चित रूप से इन असफलताओं में कांग्रेस नीत केंद्र सरकार के काले इतिहास का बहुत बड़ा योगदान है।

पिछले दो वर्षों में अन्ना हजारे द्वारा लोकपाल बिल पास करने के लिए चलाया जाने वाला अभियान हो या फिर बाबा रामदेव की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साईट्स की मदद से तेजी से आगे बढ़ी और फ़ैली। अगर ये कहा जाए कि सोशल नेटवर्किंग साइटस ने ही इन आंदोलनों की आग को फैलाया तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। समस्त विश्व में पिछले एक दशक में  इन्टरनेट विरोध या असहमति दर्ज कराने के एक नए प्लेटफॉर्म के रूप में उभरा है। इसे दुर्भाग्य कहा जाए या भ्रष्ट मानसिकता का दुराग्रह कि सत्तासीन अपने इन पापों को स्वीकारने व सुधारने के स्थान पर सतत सीनाजोरी का रास्ता अपनाए हुए हैं! इसी दुराग्रह के चलते सरकार अन्ना के विरुद्ध भद्दी बयानबाजी और रामदेव पर सस्ते आरोप लगाकर अपनी साख बचाने का बचकाना प्रयास करती रही है और अब उसी बचकानी सोच का परिणाम है कि सरकार सोशल नेटवर्किंग साइट्स को नियंत्रित करने का प्रयास कर रही है। गूगल सहित फेसबुक व ट्विटर जैसी वेबसाइट्स से सरकार लंबे समय से आमने-सामने की स्थिति में है।

 

लोकतन्त्र में यदि सरकार सच को स्वीकारने की अपनी अक्षमता के चलते अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के हनन की सीमा तक पहुंच जाए तो यह स्वयंसिद्ध हो जाता है कि सरकार लोकतान्त्रिक व्यवस्था में पूर्णत: असफल हो चुकी है। ऐसी सरकार को लोकतान्त्रिक व्यवस्था में बने रहने का नैतिक अधिकार ही नहीं रह जाता है। 1975 के आपातकाल के बाद आज पुन: एक बार सरकार यदि उस स्थिति में नहीं तो उस मनोदशा में अवश्य पहुंच गई है। फिनलैंड ने विश्व के सभी देशों के समक्ष एक उदहारण पेश करते हुए इन्टरनेट को मूलभूत कानूनी अधिकार में शामिल कर लिया। वहीं विश्व के सबसे बड़े और सफल लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले हमारे राष्ट्र में नकारा और निकम्मी सरकारें अपनी नाकामियां, असफलताओं, लचर कार्यप्रणाली, लालफीताशाही, भ्रष्टाचार और कमियों को ढकने के लिए आम आदमी की आवाज को दबाने का जो कुचक्र रच रही हैं वो किसी भी दृष्टि से स्वस्थ प्रजातंत्र का लक्षण नहीं है वहीं यह संविधानप्रदत्त मौलिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन भी है। अगर सरकार आम आदमी की आवाज दबाने की बजाय उसे सुनने और समझने का प्रयास करे तो देश की दशा और दिशा बदल सकती है। अदम गोंडवी का  शेर इस हालात के माकूल है-

 

ताला लगा के आप हमारी ज़बान को,
कैदी न रख सकेंगे ज़ेहन की उड़ान को।

Wednesday, January 9, 2013

ऐसी धमकी तो कभी लादेन ने भी नहीं दी

 - सुन, शैतान की औलाद!

 

ऐसी धमकी तो कभी लादेन ने भी नहीं दी
अकबरुद्दीन ओवैसी के बयान पर इन पालतू राष्ट्रवादी मुसलमानों तक की बकार भी नहीं फूटी। किसी अन्य शीर्ष नेता ने भी आज दिन तक ओवैसी पर कड़ी कार्रवाई की मांग नहीं की है। किसी बुद्धिजीवी, पत्रकार और सेकुलर नेता ने यह जानने की जहमत भी नहीं उठाई है कि ओवैसी के पास आखिर कौन सा ऐसा हथियार है जिससे वह १०० करोड़ हिंदुओं के खात्मे की वल्गना कर रहा है? कहीं ओवैसी को पाकिस्तानी इस्लामी परमाणु बम हाथ तो नहीं लग गया? ओवैसी जितनी बड़ी धमकी दे रहा है उतनी बड़ी धमकी तो कभी ओसामा बिन लादेन ने भी नहीं दी। जुल्फिकार अली भुट्टो दशकों तक हिंदुस्तान से लड़ने का दंभ भरा करते थे तो उनकी बेटी बेनजीर भुट्टो सदियों तक हिंदुस्तान से लड़ने का पाकिस्तानी हौसला बयान किया करती थी, पर उन दोनों ने भी कभी १०० करोड़ हिंदुओं के खात्मे का बड़बोलापन नहीं किया। फिर ओवैसी के इतने जबर्दस्त विध्वंसक बयान पर भी सेकुलरवाद के रखवाले गूंगे-बहरे क्यों बने रहे? ‘सहमत’ और शबाना आजमी का एक बयान जरूर आया पर उसमें भी औपचारिक विरोध के अलावा कुछ नजर नहीं आता।

 

ओवैसी को हल्के में लिया तो पछताओगे
आंध्रप्रदेश की पुलिस ने तो ओवैसी के इस बयान पर एक साधारण एफआईआर दर्ज करना भी जरूरी नहीं माना और उनकी कलम तब उठी जब अदालत ने निर्देश दिया। गुजरात दंगों में मुस्लिमों की मौत के लिए दुनिया की कोई भी अदालत न्याय के मान्य मापदंड पर नरेंद्र मोदी को दोषी नहीं ठहरा सकती, फिर भी सिर्फ यूरोप-अरब-अमेरिका प्रायोजित एनजीओ बिरादरी के बखेड़े पर मोदी को यूरोप और अमेरिका मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर विराजमान होने के बावजूद वीसा देने से इंकार करते हैं। ओवैसी को इतने घातक बयान के बाद भी ब्रिटेन का वीसा मिलने और लंदन यात्रा करने में कोई दिक्कत नहीं आती। इस राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय ढोंग का क्या औचित्य? क्या ओवैसी के बयान को हलके में लिया जा सकता है? ओवैसी जिस आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन का विधायक है उसकी पृष्ठभूमि जानने वाला कोई भी जानकार उसके बयान को हलके में लेने की सलाह नहीं देगा। मुस्लिम अलगाववाद का सऊदी अरेबिया और पाकिस्तान प्रायोजित जो ब्लू प्रिंट है उसका अंतिम चरण दक्षिणी हिंदुस्थान का इस्लामी अलगाववाद है। इस्लामी अलगाववाद का पहला चरण कश्मीर, दूसरा चरण असम समेत पूर्वोत्तर, तीसरा चरण हिंदुस्थान के प्रमुख शहरों को निशाना बनाना तथा अंतिम चरण हैदराबाद को केंद्र में रख दक्षिणी हिंदुस्थान में अलगाववादी ताकतों को बढ़ावा देना है।

 

हैदराबाद हो पाकिस्तान का हिस्सा...
इस्लामी आतंकवाद का कश्मीर को हिंदुस्थान से अलग करने का प्रयास १९४७ से जारी है। १९६० के दशक से लगातार पूर्वोत्तर हिंदुस्थान में मुस्लिम आबादी बढ़ाकर असम को लीलने का प्रयास चल रहा है। १९८० के बाद से दर्जनों बार असम में स्थानाrय असमी आबादी और बांग्लादेशी मुसलमानों के बीच टकराव हो चुका है। बीते वर्ष जब बोडो जनजाति और बांग्लादेशी मुसलमानों के बीच संघर्ष व्यापक हुआ था तब मुंबई, बैंगलोर समेत तमाम शहरों में मुसलमानों ने किस तरह पूर्वोत्तर वासियों को धमकाया यह पूरा देश हताश होकर देख रहा था। १९९० के दशक से ऑपरेशन के-२ के माध्यम से इस्लामी अलगाववादी देश के तमाम शहरों में निर्दोष हिंदुओं का खून बहाते रहे हैं। हुजी, लश्कर-ए-तोयबा, इंडियन मुजाहिदीन, हरकत-उल-अंसार जैसी दर्जनों तंजीमे हिंदुस्थान में ग्रीन कॉरिडोर (हरा गलियारा) बनाने में जुटी रही हैंै। शायद ही कोई प्रमुख शहर बचा हो जहां इस्लामी आतंकवाद का पंजा नजर न आया हो। अब मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एमआईएम) के विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी का बयान संकेत दे रहा है कि मुस्लिम अलगाववाद अपने चौथे यानी अंतिम चरण में पहुंचने को है। १९४७ के पहले जिन इलाकों से पाकिस्तान समर्थक बांग लगी थी उसमें हैदराबाद प्रमुख था। हैदराबाद को पाकिस्तान का हिस्सा बनाने की मांग के लिए ही एमआईएम गठित हुई थी। ज्ञात इतिहास के अनुसार १९२७ में निजाम का समर्थन करने के लिए नवाब मीर उस्मान अली खान की सलाह पर महमूद नवाज खान किलेदार गोलकुंडा ने एमआईएम का गठन किया था। इसकी पहली बैठक नवाब महमूद नवाज खान के घर ‘तौहीद मंजिल’ में हुई थी जिसमें पहला ही प्रस्ताव यही था कि एमआईएम को किसी भी सूरत में हैदराबाद को हिंदुस्थान का हिस्सा बनने से रोकना है।

 

...तब कासिम राजवी दुम दबाकर भागा
पाकिस्तान की मांग १९३० के दशक में हुई, एमआईएम उसके पहले से अलगाववाद की पैरोकार रही है। १९३८ में बहादुर यार जंग एमआईएम का सदर बना तो उसने मुस्लिम लीग के साथ सियासी समीकरण बैठा लिया। २६ दिसंबर १९४३ को लाहौर के मुस्लिम लीग सम्मेलन में इसी नवाब बहादुर यार जंग ने पाकिस्तान के समर्थन में सबसे आक्रामक भाषण दिया था। एमआईएम ने आजादी के पहले हैदराबाद से हिंदुओं के सफाए के लिए डेढ़ लाख रजाकारों की फौज तैयार की थी। हैदराबाद स्टेट में तब महाराष्ट्र का वर्तमान मराठवाड़ा भी हिस्सा था। हैदराबाद स्टेट के तत्कालीन प्रधानमंत्री मीर लाइक अली की सलाह पर तब कासिम राजवी नामक वकील को रजाकारों की सेना का मुखिया बनाया गया था। जब १९४८ में रजाकारों ने हिंदुओं का कत्लेआम शुरू किया तब भी पं. जवाहर लाल नेहरू मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति के चलते हिंदुओं का खूनखराबा रजाकारों के हाथ चुपचाप देखते रहे। उन दिनों सरदार वल्लभभाई पटेल देश के गृहमंत्री थे, उन्होंने नेहरू को फटकारा और सेना और पुलिस के संयुक्त अभियान के तहत ‘ऑपरेशन पोलो’ का आदेश दिया। हिंदू जनता पहले से ही रजाकारों की बर्बरता से लड़ने को तैयार थी। जब रजाकार चुन-चुन कर काटे जाने लगे तब मुस्लिम अलगाववादियों का दिमाग ठिकाने पर आया और निजाम भी आत्मसमर्पण को मजबूर हुआ। रजाकारों के मुखिया कासिम राजवी को जेल में ठूंस दिया गया। जब उसने अपने गुनाहों से तौबा कर लिया तब उसे १९५७ में पाकिस्तान जाने की शर्त पर जेल से रिहा किया गया। राजवी के दुम दबाकर भागने के बाद एमआईएम ठंडी पड़ गई। उसका नियंत्रण अब्दुल वाहिद ओवैसी के हाथ आ गया।

 

ये है ओवैसी का अतीत...
अब्दुल वाहिद ओवैसी स्वयंभू सालार-ए-मिल्लत (कौम का कमांडर) कहलाता था। १९६० में उसने हैदराबाद महापालिका का चुनाव जीता। १९६२ में अब्दुल वाहिद ओवैसी का बेटा सुलतान सलाहुद्दीन ओवैसी पथरघट्टी विधानसभा सीट जीतकर आंध्र प्रदेश विधानसभा पहुंचा। १९६७ में वह चारमीनार से और १९७२ में यकूतपुरा से विधानसभा पहुंचा। १९७४-७५ में सुलतान सलाहुद्दीन ओवैसी एमआईएम का सर्वेसर्वा बन गया। १९८४ में सुल्तान सलाहुद्दीन ओवैसी पहली बार हैदराबाद से लोकसभा चुनाव जीतने में कामयाब हुआ तब से २००४ तक वह लगातार सांसद रहा। २००४ में उसने अपनी जगह अपने बेटे असदुद्दीन ओवैसी को हैदराबाद से लोकसभा प्रत्याशी बनाया। २९ सितंबर २००८ को सुलतान सलाहुद्दीन के इंतकाल के बाद उसका बड़ा बेटा असदुद्दीन एमआईएम का प्रमुख बन गया। १९९० के दशक में एमआईएम में फूट पड़ी थी। ओवैसी परिवार के खिलाफ एमआईएम के चंद्रगुट्टा के विधायक अमानुल्ला खान ने बगावत कर दी तो १९९९ में अकबरुद्दीन ओवैसी को उसके खिलाफ उतार कर ओवैसी परिवार ने उसे परास्त किया था। हैदराबाद की महापालिका पर भी एमआईएम का कब्जा है और हैदराबाद का महापौर एमआईएम का मोहम्मद माजिद हुसैन है। एमआईएम की दहशत के चलते बीते कई वर्षों से हैदराबाद में रामनवमी के जुलूस को राज्य सरकार अनुमति नहीं दे रही। चारमीनार के निकट भाग्यलक्ष्मी मंदिर जो कि ३०० साल पुराना ऐतिहासिक मंदिर है और जिसके नाम पर हैदराबाद पहले भाग्यनगर के रूप में जाना जाता था, के गुबंद का निर्माण रोका गया।

 

औवेसी के सामने कांग्रेस भीगी बिल्ली!
आंध्रप्रदेश विधानसभा में एमआईएम के केवल ७ विधायक हैं पर उनकी दबंगई से कांग्रेस की सरकार कांपती है। अकबरुद्दीन ओवैसी माफिया गतिविधियों और हिंदूद्रोही वक्तव्यों के लिए कुख्यात है। २००७ में इसी अकबरुद्दीन ने ऐलान किया था कि यदि सलमान रश्दी या तस्लीमा नसरीन कभी हैदराबाद आए तो वह उनके सिर कलम कर लेगा। तस्लीमा नसरीन पर एमआईएम के कार्यकर्ताओं ने हमले की योजना भी बनाई थी, पर आज दिन तक आंध्र की कांग्रेस सरकार ने अकबरुद्दीन के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। २०११ में कुरनूल में एमआईएम की एक रैली में इसी अकबरुद्दीन ने आंध्र के विधायकों को काफिर तथा आंध्र की विधानसभा को कुप्रâस्तान कह कर अपमानित किया था, पर किसी आंध्र के विधायक ने अकबरुद्दीन पर विशेषाधिकार हनन का मामला चलाने की भी हिम्मत नहीं जुटाई। इसी रैली में उसने पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंहराव को कातिल, दरिंदा, बेईमान, धोखेबाज और चोर जैसी गालियां देकर कहा था -‘अगर राव मरा नहीं होता तो मैं उसे अपने हाथों से मार डालता।’ अप्रैल २०१२ में अकबरुद्दीन ने हरामीपने की हद पार करते हुए हिंदुओं के प्रभु राम और उनकी मां कौशल्या के लिए ऐसे अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया जिसे सुनकर उस सूअर के पिल्ले की खाल खींच लेना ही एकमेव दंड बचता है।

 

अगस्त २०१२ में इसी अकबरुद्दीन ओवैसी ने आंध्र पुलिस को ‘हिजड़ों की फौज’ करार दिया था, तब भी इस ‘लंडूरे’ के खिलाफ आंध्र पुलिस का आत्म सम्मान नहीं जागृत हुआ। उस समय भी ओवैसी ने चुनौती दी थी कि पुलिस और हिंदुओं में मुसलमानों से लड़ने की ताकत नहीं। बीते माह ८ दिसंबर २०१२ को इसी हरामपिल्ले ने फिर जहर उगला- ‘यह भाग्यलक्ष्मी कौन है और वहां बैठ कर क्या कर रही है? यह हिंदुओं का नया देवता कौन है, मैंने तो इसका नाम पहले कभी नहीं सुना। इतनी जोर से नारा लगाओ कि उनका भाग्य कांप जाए और लक्ष्मी गिर पड़े।’ अकबरुद्दीन ने जब यह हरामपंथी वाला बयान दिया तब मुस्लिमों की उन्मादी भीड़ ने ‘अल्लाह ओ अकबर’ का गगनभेदी नारा लगाया। उसके बाद उसने २४ दिसंबर को आदिलाबाद में हजारों मुसलमानों की मौजूदगी में १०० करोड़ हिंदुओं के १५ मिनट में खात्मे की कूवत का ऐलान किया। नरेंद्र मोदी को फांसी पर लटकाने की मांग की। सरकार मुस्लिम वोट बैंक के लिए चुप्पी साधे पड़ी है। सरकार हिंदुओं के सहनशीलता का इम्तहान ले रही है। यदि अकबरुद्दीन पर कार्रवाई नहीं हुई और हिंदुओं का माथा भड़का तो उसकी ऐसी दुर्दशा होगी कि उसके पूर्वज भी कब्र से निकल कर अपने गुनाहों के लिए तौबा करेंगे।

हिंदुस्तान की कसाबों की फेकटरी- (एइएमइएम) लगभग 80 वर्ष पुराना संगठन - ओवेशी का इतिहास

▐ हिंदुस्तान की कसाबों की फेकटरी डालनेवला ओवेशी का इतिहास ♠

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एइएमइएम) लगभग 80 वर्ष पुराना संगठन है जिसकी शुरुआत एक धार्मिक और सामाजिक संस्था के रूप में हुई थी लेकिन बाद में वो एक ऐसी राजनैतिक शक्ति बन गई जिस का नाम हैदराबाद के इतिहास का एक अटूट हिस्सा बन गया है.

ƪJugal Eguru

▐ हिंदुस्तान की कसाबों की फेकटरी डालनेवला ओवेशी का इतिहास ♠
भाग-1 ..... © Jugal Eguru™
[सोर्स बीबीसी- विकिपेडिया - डबल्यूएसजे - ब्रिटिश लाइब्रेरी आर्काइव्स]

▐ जिसकी शुरुआत एक धार्मिक और सामाजिक संस्था के रूप में हुई थी वो है ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एइएमइएम) लगभग 80 वर्ष पुराना संगठन है ! लेकिन बाद में वो एक ऐसी पोलिटिकल पावर बन गई जिस नाम का हैदराबाद के इतिहास गवाह है.

▐1928 म...ें नवाब महमूद नवाज़ खान के हाथों स्थापना से लेकर 1948 तक जबकि यह संगठन हैदराबाद को एक अलग मुस्लिम राज्य बनाए रखने की वकालत करता था. सरदार पटेल को सैनी बल इसी लिए इस्तेमाल करना पड़ा था ! और उस निझाम का बेकिंग बनके येही सब खड़े थे ! उस पर 1948 में हैदराबाद राज्य के भारत में विलय के बाद भारत सरकार ने प्रतिबन्ध लगा दिया था.

▐ 1957 में इस पार्टी बनके शुरू हुआ तब नाम में "ऑल इंडिया" जोड़ा और साथ ही अपने संविधान को बदला. कासिम राजवी ने, जो हैदराबाद राज्य के विरुद्ध भारत सरकार की कारवाई के समय मजलिस के अध्यक्ष थे और गिरफ्तार कर लिए गए थे, कासिम राजवी पाकिस्तान चले जाने से पहले इस पार्टी की बागडोर उस समय के एक मशहूर वकील अब्दुल वहाद ओवैसी के हवाले कर गए थे.

▐ 50 सालो मे धीरे धीरे कॉंग्रेस की तरह पारिवारिक परंपरा रूप .... इस संगठन पर ओवेशी परिवार हावी हो गया है !अब्दुल वाहेद के बाद सलाहुद्दीन ओवैसी उसके अध्यक्ष बने और अब उनके पुत्र असदुद्दीन ओवैसी उस के अध्यक्ष और सांसद हैं जब उनके छोटे भाई अकबरुद्दीन ओवैसी विधान सभा में पार्टी के नेता हैं. विधान सभा में उस के सदस्यों की संख्या बढ़ कर 7 हो गई है, विधान परिषद में उस के दो सदस्य हैं. हैदराबाद लोक सभा की सीट पर 1984 से उसी का कब्ज़ा है और इस समय हैदराबाद के मेयर भी इसी पार्टी के है.

▐ एइएमइएम को आम तौर पर मुस्लिम राजनैतिक संगठन या मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधि के रूप में देखा जाता है और हैदराबाद के मुसलमान बड़ी हद तक इसी पार्टी का समर्थन करते रहे हैं हालांकि खुद समुदाय के अन्दर से कई बार उस के विरुद्ध भी हुए है. जहाँ तक ओवैसी परिवार का सवाल है उस के हाथ में पार्टी की बाग़ डोर उस समय आई जब 1957 में इस संगठन पर से प्रतिबंध हटाया गया.

▐ पोलिटिकल पावर के साथ साथ ओवैसी परिवार के साधन और संपत्ति में भी ज़बरदस्त वृद्धि हुई है जिसमें एक मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज, कई दूसरे कालेज और दो अस्पताल भी शामिल हैं ! जो बिना कॉंग्रेस की रहमो नजर और मुस्लिम ब्रदरहुड नामक फंडिंग संस्था पोसिबल ही नहीं था !
▬ जिस तरह पाकिस्तान मे सोशियल मीडिया गरम है ....! इस की गिरफतारी को लेकर की " भाई को पुलिस हाथ तो नहीं लगाएगी ना ? भाई को गिरफ्तार कर के अब ये ******* क्या करेंगे आगे ? " तो इस हिसाब से वहा का पैसा और दाऊद की अमीरीयत के जलवे भी हो शकते है !

▐ पहला चुनाव जीते 1960 में - सलाहुद्दीन ओवैसी हैदराबाद नगर पालिका के लिए चुने गए और फिर दो वर्ष बाद वो विधान सभा के सदस्य बने तब से मजलिस की शक्ति लगातार बढती गई..... और आज यहाँ तक जा पहुंचे है की लगाने को कसाब पे लगाई देशद्रोह की कार्यवाही भी चल शक्ति है पर ....
कानून = कॉंग्रेस ...................

इस परिवार और मजलिस के नेताओं पर यह आरोप लगते रहे हैं की वो अपने भड़काओ भाषणों से हैदराबाद में साम्प्रदायिक तनाव को बढ़ावा देते रहे हैं. लेकिन दूसरी और मजलिस के समर्थक उसे भारतीय जनता पार्टी और दूसरे हिन्दू संगठनों का जवाब देने वाली शक्ति के रूप में देखते हैं.

राजनैतिक शक्ति के साथ साथ ओवैसी परिवार के साधन और संपत्ति में भी ज़बरदस्त वृद्धि हुई है जिसमें एक मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज, कई दूसरे कालेज और दो अस्पताल भी शामिल हैं.

एइएमइएम ने अपनी पहली चुनावी जीत 1960 में दर्ज की जब की सलाहुद्दीन ओवैसी हैदराबाद नगर पालिका के लिए चुने गए और फिर दो वर्ष बाद वो विधान सभा के सदस्य बने तब से मजलिस की शक्ति लगातार बढती गई.

सांप्रदायिकता का आरोप

बढ़ती हुई लोकप्रियता के साथ साथ सलाहुद्दीन ओवैसी "सलार-ए-मिल्लत" (मुसलमानों के नेता) के नाम से मशहूर हुए. वर्ष 1984 में वो पहली बार हैदराबाद से लोक सभा के लिए चुने गए साथ ही विधान सभा में भी उस के सदस्यों की संख्या बढती गई हालाँकि कई बार इस पार्टी पर एक सांप्रदायिक दल होने के आरोप लगे लेकिन आंध्र प्रदेश की बड़ी राजनैतिक पार्टिया कांग्रेस और तेलुगुदेसम दोनों ने अलग अलग समय पर उससे गठबंधन बनाए रखा.

दिलचस्प बात यह है की हैदराबाद नगरपालिका में यह गठबंधन अभी भी जारी है और कांग्रेस के समर्थन से ही मजलिस को मेयर का पद मिला है.

 मजलिस के नेता अकबरुद्दीन ओवैसी की गिरफ़्तारी के विरुद्ध हैदराबाद में बंद का एक दृश्य

मजलिस के नेता अकबरुद्दीन ओवैसी की गिरफ़्तारी के विरुद्ध हैदराबाद में बंद का एक दृश्य

2009 के चुनाव में एइएमइएम ने विधान सभा की सात सीटें जीतीं जो की उसे अपने इतिहास में मिलने वाली सब से ज्यादा सीटें थीं. कांग्रेस के साथ उस की लगभग 12 वर्ष से चली आ रही दोस्ती में दो महीने पहले उस समय अचानक दरार पड़ गई जब चारमीनार के निकट एक मंदिर के निर्माण के विषय ने एक विस्फोटक मोड़ ले लिया.

मजलिस ने कांग्रेस सरकार पर मुस्लिम-विरोधी नीतियां अपनाने का आरोप लगाया और उस से अपना समर्थन वापस ले लिया. अकबरुद्दीन ओवैसी के तथाकथित भाषण को लेकर जो हंगामा खड़ा हुआ है और जिस तरह उन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज गया है उसे कांग्रेस और मजलिस के टकराव के परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है.

अधिकतर हैदराबाद तक सीमित मजलिस अब अपना प्रभाव आंध्र प्रदेश के दूसरे जिलों और पडोसी राज्यों महाराष्ट्र और कर्नाटक तक फैलाने की कोशिश कर रही है.

हाल ही में उस ने महाराष्ट्र के नांदेड़ नगर पालिका में 11 सीटें जीत कर हलचल मचा दी है. आंध्र प्रदेश में कांग्रेस इस संभावना से परेशान है कि 2014 के चुनाव में एइएमइएम जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस के साथ हाथ मिला सकती है. अकबरुद्दीन ओवैसी की गिरफ्तारी के बाद तो मजलिस और कांग्रेस के बीच किसी समझौते की सम्भावना नहीं रह गई.

Thursday, December 20, 2012

केजरीवाल के प्रत्यक्ष लोकतंत्र के खतरे

केजरीवाल के प्रत्यक्ष लोकतंत्र के खतरे

 

केजरीवाल के प्रत्यक्ष लोकतंत्र के खतरे - India Real Time Hindi - WSJ

स्विटज़रलैंड अंतर्राष्ट्रीय रेड क्रॉस और घोर मानवाधिकार हनन के खिलाफ जिनेवा सम्मेलन का जन्मस्थान है। इस देश को धार्मिक सहिष्णुता का गढ़ माना जाता है। इसके बावजूद 2009 में, स्विटज़रलैंड ने नागरिकों के जनमत के आधार पर मस्जिदों की मीनारों पर राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध लगाया। क्योंकि स्विटज़रलैंड एक ऐसा देश है, जिसने प्रत्यक्ष लोकतंत्र को अपनाया है, लिहाज़ा जनमत का फैसला वहां का कानून बन गया।

इस कानून को धार्मिक स्वतंत्रता पर कुठाराघात कहकर व्यापक तौर पर निंदा की गई। यूरोप और मध्य एशिया में एमनेस्टी इंटरनेशनल के उप-कार्यक्रम निदेशक डेविड डियाज़-जॉगिक्स ने टिप्पणी की: “स्विटज़रलैंड एक ऐसा देश है, जहां धार्मिक सहिष्णुता की लंबी परंपरा रही है और जहां सताए हुए लोगों को शरण देने का प्रावधान है, ऐसा देश इस विकृत विभेदकारी प्रस्ताव का अनुमोदन करे, ये चौंकानेवाले है।”

फ्रेंच दैनिक ‘लिबरेशन’ के एक रिपोर्टर जीन क्वाट्रेमेर ने उपयुक्त ढंग से मीनारों पर प्रतिबंध और प्रत्यक्ष लोकतंत्र के खतरे के बीच संबंधों का खाका ये कहते हुए खींचा: “एक बार फिर, प्रत्यक्ष लोकतंत्र ने साबित किया है कि इसकी प्रकृति काफी खतरनाक है। लोगों को दूसरों से खतरों को ज़ाहिर करने की दी गई स्वीकृति, तर्कों को तिलांजलि देना और अल्पावधि-हितों पर फोकस करना, निश्चित तौर पर जनमत संग्रह सभी तरह के जनोत्तेजकों के हाथों में एक खतरनाक यंत्र है। ये समझना आसान है कि क्यों कई लोकंतात्रिक देशों ने इसे सीधे तौर पर गैरकानूनी बनाया है।”

भारत उन कई देशों में है, जिन्होंने प्रत्यक्ष लोकतंत्र को नहीं अपनाया। हम प्रतिनिधित्व पर आधारित एक लोकतंत्र हैं, जहां लोग अपने लिए कानून और नीतियां बनाने हेतु प्रतिनिधियों को चुनते हैं। हालांकि, पिछले दो-एक सालों से, अरविंद केजरीवाल और उनके समर्थक स्विस-सरीखे प्रत्यक्ष लोकतंत्र की ज़ोर-शोर से वकालत कर रहे हैं। श्री केजरीवाल दावा करते हैं कि प्रत्यक्ष कानून निर्माण विशेष हितों की हिफाज़त करने वाले कृतज्ञ भ्रष्ट राजनेताओं को दरकिनार करने की स्वीकृति प्रदान कर नागरिकों की सुरक्षा करते हैं।

श्री केजरीवाल ने जनमत संग्रहों और पहलकदमी को प्रस्तुत करने की मांग की है। जनमत संग्रह एक पद्धति है, जहां लोग, प्रत्यक्ष मतों से, नए कानून, नीति अथवा संसद द्वारा पारित मौजूदा कानून को नकारने का फैसला कर सकते हैं। दूसरी तरफ, एक पहलकदमी में नागरिकों का समूह राष्ट्रव्यापी प्रत्यक्ष मत हेतु नया मसौदा प्रस्तुत कर नए कानून अथवा संविधान संशोधन के लिए पहल करता है। हाल ही में, जिस तरीके से बहु-ब्रांड खुदरा में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को मंजूरी देने के लिए संसद में वोटिंग हुई, उसने गुस्से को भड़काया, श्री केजरीवाल ने एक बार फिर इस मुद्दे पर फैसले के लिए संसद में वोटिंग की बजाय राष्ट्रव्यापी जनमत संग्रह पर ज़ोर डाला।

मीनारों पर प्रतिबंध लगाने वाले स्विस जनमत संग्रह के भारत सरीखे देशों में प्रत्यक्ष लोकतंत्र की मांग हेतु गहरे निहितार्थ हैं, जहां कई अल्पसंख्यक गुट हैं। ये दलील दी जा सकती है कि व्यापक भागीदारी, अल्पसंख्यक समूहों को संभावित दमनकारी नीतिगत परिणामों को झेलने के लिए छोड़ती है (जैसे स्विस मीनार प्रतिबंध) जिनका समर्थन बहुसंख्यक आबादी के एक हिस्से (जैसे 50 फीसदी जमा एक वोट) ने किया।

वे अमेरिकन स्टेट्स जिन्होंने प्रत्यक्ष लोकतंत्र को अपनाया और चुनावों को लेकर पहलकदमी के दुर्भाग्यशाली उदाहरण बनाए, इस मुद्दे को स्पष्ट करते हैं। इनमें से कुछ पहलों में शामिल है, हिस्पैनिक्स के लिए बहुभाषी कार्यक्रमों को समाप्त करना, कानून में एक प्रावधान जो समलैंगिकों को बगैर भेदभाव के संरक्षण देता है और अवैध प्रवासियों को स्वास्थ्य, शिक्षा और मेडिकल फायदों जैसी आधारभूत सुविधाओं से वंचित रखना।

शायद, इसी वजह से भारतीय संविधान निर्माता चाहते थे कि कानून चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा बनाए जाएं, हालांकि संविधान सभा के अंतरिम अध्यक्ष, सचिदानंद सिन्हा ने मसौदा तैयार करने वालों के संज्ञान के लिए स्विस संविधान की ओर भी ध्यानाकर्षण दिलाया।

संविधान निर्माताओं ने इसकी बजाय यूएस संविधान, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया के राष्ट्रमंडल मॉडलों और ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था पर ज्यादा भरोसा किया। उन्होंने भारत के राष्ट्रपति के चुनाव और संविधान संशोधन के मामले में राष्ट्रव्यापी जनमत संग्रह के विचार को खारिज कर दिया।

संविधान ने जिस सरकार को ढांचागत किया वो सत्ता के प्रसार के ज़रिए प्रजा पीढ़क शासन को रोकने की कोशिश थी। इसलिए उदाहरणस्वरूप, इसकी तीन शाखाओं की प्रबंधकीय, संसदीय और न्यायिक शक्तियां पृथक हैं। संविधान ने संघवाद के ज़रिए शक्ति को छितरा दिया: ऐसा उसने केन्द्र और राज्यों के बीच सत्ता का विभाजन करके किया। ये संतुलन प्रत्यक्ष लोकतंत्र में गायब है। विभाजित-शक्ति व्यवस्था जो विचार-विमर्श और अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व, अल्पसंख्यक अधिकारों को बढ़ावा देती है, प्रतिनिधि की रोकटोक के बगैर जोखिमपूर्ण होती है।

हालांकि, ऐसा नहीं कहा जा सकता, भारत में प्रत्यक्ष लोकतंत्र की संपूर्ण मांगें औचित्यहीन हैं। मशहूर राजनीतिक विज्ञानी येहेज़केल ड्रॉर ने अन्वेषण किया कि प्रत्यक्ष लोकतंत्र छोटे समुदायों में अपेक्षाकृत अच्छा कर सकता है, जहां लोगों के ज्यादातर मुद्दों पर व्यक्तिगत अनुभव होते हैं, ये देखते हुए कि ये एक उपयुक्त विचारक प्रक्रिया और जटिल मुद्दों की पेशेवर व्याख्या के साथ संयोजित किया जाता है। जीन-जैक्स रूसो भी प्रत्यक्ष लोकतंत्र के हिमायती थे, लेकिन एक बार फिर छोटे प्रांतों के लिए।

प्रत्यक्ष लोकतंत्र सरकार का एक शक्तिशाली प्रकार है, जहां प्रत्येक नागरिक नामित छोटे इलाके में वार्तालाप में सहयोग देने की क्षमता (और इच्छाशक्ति) रखता हो। कुछ हद तक, अल्पसंख्यक दमन की चिंताएं प्रत्यक्ष लोकतंत्र में निहित होती हैं, जो प्रमुख तौर पर तब कम होती हैं, जब ये स्थानीय स्तर पर हर किसी मामले में लागू की जाती हैं, जैसे स्वास्थ्य, साफ-सफाई और आधारभूत सेवाओं का प्रावधान। छोटे क्षेत्रों में, पूरा समुदाय एकत्र हो सकता है और सक्रिय तौर पर अपने प्रतिदिन के क्रियाकलाप से जुड़े मुद्दों पर चर्चा कर सकता है।

इसे समझते हुए, संविधान निर्माताओं ने संविधान के अनुच्छेद 40 का मसौदा तैयार किया, जो राज्यों के लिए चुने गए प्रतिनिधियों वाली ग्राम पंचायतों की स्थापना ज़रूरी बनाता है और उन्हें आत्म-शासन की एक इकाई के तौर पर शक्ति भी प्रदान करता है। इससे आगे, संविधान के 73वें और 74वें संशोधनों के अंतर्गत ग्राम सभाओं और पंचायतों का गठन, प्रोफेसर ड्रॉर और रूसो द्वारा प्रतिपादित प्रत्यक्ष लोकतंत्र के सम्मोहक उदाहरण हैं।

2008 का मॉडल नगर राज बिल शहरों में ग्राम सभाओं के अनुरूप इकाईयां बनाने की बात करता है। ये बिल जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण मिशन के तहत जरूरी सुधार है, जिसका अर्थ हुआ, राज्यों को जेएनयूआरएम कार्यक्रम के तहत फंडिग की पात्रता के लिए बिल-आधारित समुदाय-सहभागी कानून बनाना अनिवार्य है।

श्री केजरीवाल और उनकी नई राजनीतिक पार्टी दुर्लभ और शायद विचित्र भी है, जो कई राजनीतिक दलों की विषमता दिखाती है, जिनकी मुख्य समस्या नए विचारों का अभाव, गहरी जातिगत-राजनीति और भ्रष्टाचार है। भारतीय राजनीति में खलबली के वक्त, श्री केजरीवाल खेल से दूर पर महत्वपूर्ण खिलाड़ी हैं। जैसा प्रताप भानु मेहता ने हाल ही में इंगित किया, विकेन्द्रीकरण को लेकर श्री केजरीवाल की तत्परता चाह जगाने वाली है। हालांकि, उन्हें असंवैधानिक राष्ट्रव्यापी जनमत संग्रह के शब्दाडंबरों को छोड़कर संवैधानिक तरीकों पर चलना चाहिए। शुरुआत में, वो सभी राज्यों से मॉडल नगर राज बिल के तुरंत कार्यान्वयन की जरूरत पर ज्यादा बात कर सकते हैं, जो शहरी परिषदों के गठन की बात करता है।

-करण सिंह त्यागी पेरिस की एक कानून फर्म में एक एसोसिएट एटॉर्नी हैं। वे हारवर्ड लॉ स्कूल से एलएलएम कार्यक्रम में स्नातक हैं।

-इंडिया रियल टाइम को ट्वीटर @indiarealtime पर फॉलो कीजिए।

Saturday, December 8, 2012

बेकार - बदहाल --- बेअसर भारत की खुफिया एजंसियां

 बेकार - बदहाल --- बेअसर भारत की  खुफिया एजंसियां

कानून-व्यवस्था बनाए रखने और सुचारु शासन व्यवस्था के लिए खुफिया तंत्र का मजबूत होना बहुत जरूरी है। राजतंत्र के दौरान खुफिया ही शासकों के आंख-कान हुआ करते थे। आजादी मिलने के बाद भी खुफिया तंत्र अधिक सक्रिय था। इसके पीछे एक कारण यह भी हो सकता है कि देश के सामने कई चुनौतियां थीं। विभाजन के घाव हरे थे। देश विरोधी शक्तियां कभी भी सिर उठा सकती हैं, इसलिए ज्यादा सतर्कता रखी गई। कालांतर में सतर्कता में कमी आई है। हालांकि सांप्रदायिक दंगों, आतंकवाद और नक्सलवादी गतिविधियां इन दिनों बढ़ी हैं एवं हमारा खुफिया तंत्र ज्यादा सक्रिय व सतर्क होना चाहिए था। इसके विपरीत कुछ वर्षों से खुफिया तंत्र में कमजोरी साफ नजर आ रही है।


इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के साथ हुई घटनाओं के बारे में खुफिया तंत्र अनभिज्ञ रहा। इसके बाद मुंबई दंगे, 26/11 और देश के विभिन्न स्थानों पर हुए विस्फोटों के मामले में हमें पहले से कोई जानकारी नहीं मिल पाई। देश का खुफिया विभाग समय-समय पर सतर्क रहने की सूचना जब भी देता है तब कोई घटना ही नहीं होती। दरअसल खुफिया विभाग की हालत हमारे मौसम विभाग जैसी हो गई है। मौसम विभाग की अधिकतर घोषणाएं सच नहीं होतीं। उसी तरह खुफिया सूचनाएं भी अक्सर गलत निकल जाती हैं। खुफिया एजेंसियों में तालमेल का अभाव, कर्मियों और विशेषज्ञ स्टाफ की कमी और लचर प्रशासनिक व्यवस्था भी एक बड़ा मुद्दा है।

हर कुछ समय बाद बेखौफ आतंकी हमें लहूलुहान कर रहे हैं। कभी मुंबई, वाराणसी, अहमदाबाद तो कभी जयपुर। हम क्यों नहीं रोक पा रहे इन हमलों को? कहां छूट रही है कमी? क्या हैं हमारी कमी और कमजोरी? खुफिया सूचनाओं की कमी। पिछली आतंकी घटनाओं की बेतरतीब जांच। जिम्मेदार अपराधियों के अनछुए सुराग। सुस्त जांच एजेंसियों को प्रति सरकारी उदासीनता। प्रशिक्षण, आधुनिक हथियारों और उपकरणों की कमी। यही चंद वजहें हैं कि देश में हर छह महीने बाद कहीं न कहीं आतंकी अपनी ताकत दिखा रहे हैं। पिछली घटनाओं से हम कोई सबक नहीं ले रहे। असम और म्यांमार में हुई हिंसा के विरोध में मुंबई में रैली के दौरान दंगा फैल सकता है, खुफिया विभाग इस बारे में सूंघ नहीं सका। असम में हुई हिंसा की भी पहले से जानकारी नहीं मिली। उत्तर प्रदेश में पिछले नौ महीने में हुए एक दर्जन सांप्रदायिक दंगों की हवा भी खुफिया तंत्र को नहीं लगी। इसका मतलब कहीं न कहीं सतर्कता में कमी है। बैंगलोर में मुंबई जैसी हिंसा की अफवाह के चलते एक ही रात में 6 हजार लोग पलायन कर गए मगर हमारे सूचना तंत्र को कानोंकान खबर नहीं लगी, जबकि ये अफवाहें फेसबुक और इंटरनेट के जरिए फैलाई जा रही थीं। यात्रियों की भीड़ के कारण रेल विभाग को स्पेशल ट्रेनें चलाना पड़ती हैं तब जाकर सरकार को खबर लगती है। सूचना तंत्र की कमजोरी के चलते जो हालात बैंगलोर या मुंबई में बने थे, ऐसे हालात आगे चलकर भारत के हर बड़े शहर में पैदा हो सकते हैं।

2008 में मुंबई पर हुए हमले के बाद इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस (आईडीएसए) टास्क फोर्स की रिपोर्ट में खुफिया तंत्र में सुधार की बात कही गयी थी। मुंबई पर हुए आतंकी हमले के बाद गहरी नींद में सो रही सरकार ने राष्ट्र विरोधी व आंतकवादी घटनाओं से जुड़े मामलों की जांच पड़ताल करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर नेश्नल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी [एनआईए] का मजबूत किया है और देश के विभिन्न राज्यों में इसकी क्षेत्रीय इकाइया गठित की जा रही है। मुंबई पर हुए बड़े आतंकी हमले के बाद 2002 में गठित गठित गुप्तचर ब्योरों की एजेंसी ‘मेक’ (बहुएजेंसी केंद्र) की पहली बैठक 1 जनवरी 2009 को तत्तकालीन गृहमंत्री पी. चिदबरम की अध्यक्षता में हुई थी, जिसमें गुप्तचर ब्यूरो, केन्द्रीय अर्द्ध सुरक्षाबलों तथा गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे। तब चिदंबरम ने घोषणा की थी कि मेक तथा अन्य सभी सरकारी एजेंसियों के बीच खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान कानूनन करना होगा। पिछले लगभग चार वर्षों में मेक के तत्त्वावधान में खुफिया एजेंसियों की एक हजार से अधिक बैठकें हो चुकी हैं और नतीजा ढाक के तीन पात ही है।
भारतीय खुफिया एजेंसियों के खराब प्रदर्शन का कारण उनकी आपसी खींचतान और रणनीतिक दृष्टि की कमी है। एक एजेंसी दूसरी एजेंसी को अपने अधिकार क्षेत्र में घुसने नहीं देती इसीलिए दोहरी मेहनत होती है। काडर राज्य से दूर रहने के लिए अधिकारी नागरिक खुफिया एजेंसियों में पड़े रहते हैं। वहीं खुफिया पर लगातार ध्यान देने की जरूरत को नकारा नहीं जा सकता है। ऐसा नहीं हो सकता कि जब कोई बड़ी घटना घटे तब इस तरफ ध्यान दिया जाए और फिर अगले ही पल आप इसे भूल जाएं। प्रतिस्पर्धा और नंबर बढ़ाने के खेल से समस्या पैदा होती है। संस्थाओं को समझना होगा कि समय अहम है न कि यह कि जानकारी कौन दे रहा है।

एक सच यह भी है कि सुधार अचानक नहीं हो सकते। इसमें समय लगेगा। विभागीय बंटवारे, द्वेष और दूरदृष्टि की कमी भी अड़चन का काम करेगी. इसीलिए विशेषज्ञों का मानना है कि विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय ही समस्या का हल है। हमारे यहां आईबी गृह मंत्री को रिपोर्ट करती है, रिसर्च एंड अनालिसिस विंग(रॉ) प्रधानमंत्री को, ज्वाइंट इंटेलीजेंस कमेटी (जेआईसी), एविएशन रिसर्च ब्यूरो (एआरसी) और नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (एनटीआरओ) जैसी एजेंसियां भी हैं जो राष्ट्रीय  सुरक्षा परिषद को रिपोर्ट करती हैं। सेना के पास अपनी खुफिया एजेंसियां हैं जो थल सेना, जल सेना और वायु सेना के लिए काम करती हैं, सभी के ऊपर नेशनल इंटेलीजेंस एजेंसी नाम की संस्था है। वित्तीय खुफिया जांच के लिए अन्य एजेंसियां हैं। इनमें आयकर, सीमा शुल्क और उत्पाद शुल्क के निदेशालय शामिल हैं। इसके अलावा राज्य स्तरीय खुफिया एजेंसियां और विशेष प्रकोष्ठ भी हैं जो खुफिया का ही काम करते हैं। पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने 2009 में इंटेलीजेंस ब्यूरो के समारोह में भाषण देते हुए स्वीकार किया था कि महत्वपूर्ण खुफिया जानकारी के सभी डेटाबेस को एक साथ जोडऩे की जरूरत है। नागरिक और सैन्य खुफिया के बीच की दूरी भी बड़ा मसला है। परंपरागत रूप से रॉ का सचिव मौके और वक्त के हिसाब से प्रधानमंत्री को रिपोर्ट देता रहता है और आईबी का निदेशक गृह मंत्री को। इसमें सैन्य खुफिया यानी मिलिट्री इंटेलीजेंस (एमआई) के पास ऐसा कोई फोरम ही नहीं बचता जहां वह अपनी बात कह सके।

हर बड़े हादसे के बाद सूचना तंत्र की कमजोरी सामने आती है और कुछ दिनों हाय-तौबा करने के बाद इस गंभीर सवाल पर मिट्टी डाल दी जाती है। इससे सरकार की नीयत पर भी संदेह उठता है। क्या खुफिया तंत्र ठीक है। वह सही समय पर सूचनाएं सरकार तक पहुंचा रहा है और सरकार कानों में तेल डालकर बैठी है? क्या सरकार महंगाई या अन्य गंभीर मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने के लिए हिंसक घटनाएं होने देना चाहती है। अगर नहीं तो ऐसे कदम उठाए जाना जरूरी हैं, जिनसे खुफिया तंत्र को मजबूत किया जा सके, ताकि सरकार को समय पर सूचनाएं मिलें और देश हिंसा की लपटों में घिरने से बच सके। महाराष्ट्र सरकार 50 हजार लोगों की रैली निकालने को मंजूरी दे देती है और इसमें शामिल लोगों के मंसूबों से कोई सरोकार नहीं रखती, यह बात हैरान करने वाली है।

स्टाफ की कमी बड़ी समस्या है। चिदंबरम ने इसी साल अप्रैल में लोकसभा को बताया कि प्रति 100,000 लोगों पर (पुलिस-जनसंख्या अनुपात) अनुमोदित और वास्तविक पुलिस बल क्रमश: 145.25 और 117.09 है। भारत में प्रति 100,000 लोगों पर 130 पुलिसकर्मी हैं जबकि संयुक्त राष्ट्र के मानकों में यह संख्या न्यूनतम 220 होनी चाहिए. इस मानक को माना जाए तो भारत में 600,000 पुलिसकर्मियों की कमी है यानी अनुमोदित संख्या बल से करीब 25 फीसदी कम। खुफिया एजेंसियों और राज्य स्तर पर खुफिया विभाग में कार्मिकों का बड़ा टोटा है। जिला स्तर पर इंटेलीजेंस ब्यूरो में चार-पांच लोग होते हैं। सिपाही से उम्मीद रखी जाती है कि वह अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और बिना किसी प्रतिक्रिया के जरूरी जानकारी जुटाता रहे। मगर, बंदोबस्त, चुनाव, राजनीतिक रैलियों और वीआईपी ड्यूटी के चक्कर में उसके काम पर बुरा असर पड़ता है। राज्य सरकारों के पास खुफिया जानकारी जुटाने के लिए विशेष शाखाएं हैं मगर क्या किसी ने कभी इस बात की परवाह की है कि वहां किस तरह के लोग रखे जाते हैं?

विशेषज्ञ और विश्लेषक मानते हैं कि अब खुफिया तंत्र में पूरी तरह बदलाव लाने का समय आ गया है और साथ ही इसकी मुनासिब निगरानी भी होनी चाहिए, चाहे विभिन्न संसदीय समितियों की तर्ज पर निगरानी समिति बनाई जाए या फिर रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री, गृह मंत्री और वित्त मंत्री को शामिल करके प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति बनाई जाए। जरूरी है कि विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को शामिल किया जाए। सुरक्षा के लिए खुफिया तंत्र के  आधुनिकीकरण को जरूरी बताते हुए आईडीएसए ने प्रस्ताव रखा है कि भर्ती से लेकर प्रशिक्षण, वेतन और करियर में आगे बढऩे की प्रक्रिया में सुधार होना चाहिए ताकि प्रतिभावान लोग खुफिया तंत्र से जुडऩा पसंद करें।

अफसोस इस बात का है कि सुधारों को तब एजेंडा में रखा जाता है जब नुकसान हो चुका होता है। इसीलिए हम हमेशा पीछे भागते रहते हैं। यही वजह है कि हम आज तक ऐसा सिस्टम नहीं बना सके जो किसी उभरती हुई शक्ति के पास होना चाहिए। सुब्रामण्यम समिति की रिपोर्ट काफी समझ-बूझ के साथ तैयार की गई थी मगर लागू करने के मामले में हम कभी सफल नहीं हो सकते। बड़ी समस्या यह है कि जो एजेंसियां स्थापित हो चुकी हैं वही विरोध करती हैं ताकि उनकी जगह खतरे में न पड़े। ऊपर से हमारे यहां राजनीतिक दृढ़ता भी नहीं है। बदलते वैश्विक परिदृश्य, आंतकवाद की बढ़ती चुनौतियों और दिन ब दिन मजबूत होते नक्सलवाद, ड्रग माफियाओं और तस्करों पर प्रभावी रोक के लिए खुफिया तंत्र के पेंच कसने की जरूरत है। खुफिया तंत्र की नाकामी देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा के लिए विस्फोटक स्थिति ओर हालात पैदा कर सकती है।

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Friday, November 30, 2012

1960 के बाद का सबसे बडा दंगा अहमदाबाद

दंगों में मरता कौन है?

1960 के बाद का सबसे बडा दंगा अहमदाबाद में हुआ। राज्य सरकार ने न्यायमूर्ति जगमोहन रेड्डी वाले जाँच आयोग ने अहमदाबाद के दंगों के बारे में जो आंकडे दिये। उनके मुताबिक इस दंगे में 6742 मकान और दुकान जलाई गयीं। इनमें सिर्फ 671 हिन्दुओं की थीं बाकी 6071 मुसलमानों की नष्ट हुई। कुल सम्पत्ति का मूल्य 42324068 रुपये था। जिसमें हिन्दू सम्पत्ति 7585845 रु. की थी और मुस्लिम सम्पत्ति 34738224 रुपये की। 512 मृतकों में 24 हिन्दू थे और 413 मुसलमान । बाकी 75 की शिनाख्त नहीं हो सकी थी।


इसके बाद का सबसे बडा दंगा 1970 में भिवंडी में हुआ। इसमें 78 लोग मारे गये। इनमें 17 हिन्दू थे और 59 मुसलमान। बाकी दो की शिनाख्त नहीं हो सकी। भिवंडी दंगे की जांच के लिए नियुक्त न्यायमूर्ति डी. वी. मेडन जांच आयोग के सामने जो बयान दिये गये। उनसे यह प्रकट हुआ कि इस दंगे में 6 मुसलमान औरतों के साथ बलात्कार हुआ। जबकि एक भी हिन्दू औरत बलात्कार की शिकार नहीं हुई। भिवंडी के दंगों के परिणामस्वरूप हुये जलगांव के दंगे में 43 लोग मारे गये, जिनमें एक हिन्दू और बाकी के 42 मुसलमान। नष्ट हुयी कुल सम्पत्ति में 3390977 रुपये मूल्य की सम्पत्ति मुसलमानों की थी और सिर्फ 83725 रुपये मूल्य की हिन्दुओं की।


1967 में रांची-हटिया और नौशेरा में हुये दंगों में मृतकों की कुल संख्या 184 थी। जिनमें 164 मुसलमान और तो 19 हिन्दू, एक की शिनाख्त नहीं हो सकी। जिन दंगों का ऊपर जिक्र आया है, वे 1960 के बाद के भारत के भयंकरतम दंगों में हैं। इसके अलावा जमशेदपुर, अलीगढ, वाराणसी और बंबई जैसे शहरों में भी दंगे हुयें हैं। इन दंगों में भी कमोबेश उपर वाली स्थिति ही रही। शायद ही कोई ऐसा दंगा हुआ होगा, जिसमें मरने वालों में 70 प्रतिशत से ज्यादा मुसलमान न रहें हों। नष्ट हुई सम्पत्ति में भी लगभग यही अनुपात रहा।


सबसे ज्यादा अजीब बात यह है कि लगभग हर दंगे में पुलिस के हाथों गिरफ्तार होने वालों में भी मुसलमानों की ही संख्या अधिक रहती है. मुसलमानों के ही अधिक घरों की तलाशियां भी होतीं हैं। पुलिस भी बहुसंख्यक समुदाय की तरह यह सोचती है कि दंगों के लिये जिम्मेदार मुसलमान हैं। लिहाजा वह यह मानती प्रतीत होती है कि दंगों पर तभी नियंत्रण पाया जा सकता है जब मुसलमानों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाएगी। लेकिन इसके बावजूद बहुसंख्यक समुदाय की यह धारणा, कि दंगों में मरने वालों में अधिकतर हिन्दू होतें हैं।

यह धारणा इतनी गहरी है कि तमाम सरकारी आंकडों के बावजूद आम हिन्दू इस बात को नहीं मानता कि वास्तव में दंगों में हिन्दू ज्यादा आक्रामक होतें हैं। इसको न मानने की बात को अगर गहराई से देखा जाय तो पता चलेगा कि इसके पीछे बचपन की वो धारणाएं काम करतीं हैं। जो बचपन से हर हिन्दू घर में बच्चे को यह सिखाया जाता है कि मुसलमान क्रूर होतें हैं और वे किसी की भी जान लेने में नहीं हिचकते। इसके विपरीत हिन्दू तो बडे क़ोमल हृदय का होता है और उसके लिये चींटी की भी जान लेना मुश्किल होता है।

अक्सर आम हिन्दू आपको यह कहते हुए मिलेगा कि अरे साहब ! हिन्दू घर में तो आपको सब्जी काटने की छूरी के अलावा कोई हथियार नहीं मिलेगा। आम हिन्दू का मानना है। कि आमतौर पर मुसलमान अपने घरों में हथियारों का जखीरा रखतें हैं। यही वजह है कि आम हिन्दू को दंगों में मरने वालों के सरकारी आंकडे भी अविश्वसनीय लगतें हैं। दूसरी ओर कोई भी सरकार आंकडों को इस ढंग से पेश करना नही चाहेगी। जिससे आम लोगों के बीच मे यह धारणा बने कि देश में अल्पसंख्यक असुरक्षित है।

Sunday, November 25, 2012

एसएमएस से सऊदी अरब में औरतों की जासूसी

एसएमएस से सऊदी अरब में औरतों की जासूसी

शनिवार, 24 नवंबर, 2012 को 10:44 IST तक के समाचारसऊदी महिलाएं


सऊदी अरब के रुढ़िवादी समाज में महिलाओं पर काफ़ी पाबंदियों हैं.

सऊदी अरब के पुरुषों को उनके परिवार की महिलाओं की गतिविधियों के बारे में मोबाइल फोन पर मेसेज के ज़रिए लगातार जानकारियां हासिल हो रही हैं.

ये एसएमएस आमतौर पर महिलाओं के देश से कहीं बाहर जाने पर मिलते हैं.

इस तरह के मोबाइल संदेशों की सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर काफ़ी आलोचना हो रही है.

ट्विटर पर पोस्ट किए गए एक संदेश में लिखा है , ''हेलो तालिबान आपके लिए सऊदी अरब के ई-गर्वमेंट ने कुछ टिप्स दिए हैं."

जबकि एक दूसरे पोस्ट में लिखा है कि अब हमें अपनी महिलाओं पर नज़र रखने के लिए माईक्रो-चिप्स का इस्तेमाल करना चाहिए.

इस सेवा की तरफ लोगों का ध्यान तब गया जब अपनी पत्नी के साथ विदेश यात्रा पर जा रहे उसके शौहर को रियाद एयरपोर्ट छोड़ने के तुरंत बाद ऐसा ही एक एसएमएस भेजा गया.

'ग़लत औरत से की शादी ..'

सऊदी अरब में महिलाओं को बिना किसी क़रीबी पुरुष रिश्तेदार के सफ़र करने या गाड़ी चलाने की मनाही है.

इससे पहले एसएमएस सेवा की सुविधा सऊदी अरब के उन पुरुष नागरिकों को दी जाती थी जो इसकी मांग करते थे. ऐसे लोगों को उनकी पत्नियों या परिवार की अन्य महिलाओं के देश से बाहर जाने पर 'अलर्ट मेसेज' मिलते थे.

लेकिन फ़िलहाल ये मैसेज वैसे लोगों को भी मिल रहे हैं जिन्होंने इसकी मांग नहीं की है.

"अगर मुझे अपनी पत्नी के देश से बाहर जाने के जानकारी पाने के लिए एसएमएस की ज़रुरत पड़ती है तो या तो मैंने ग़लत औरत से शादी की है या फिर मुझे एक मनोवैज्ञानिक की ज़रुरत है"

ट्विटर पर कमेंट

ट्विटर पर सक्रिय कुछ लोगों ने सरकार के इस कदम की आलोचना करते हुए इसका मज़ाक उड़ाया है. इनमें से कुछ ने तो महिलाओं की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए उनके शरीर पर माइक्रो-चिप्स और पांव में ब्रेस्लेट डालने तक की सलाह दे डाली है.

एक अन्य ट्वीट में कहा गया है, ''अगर मुझे अपनी पत्नी के देश से बाहर जाने के जानकारी पाने के लिए एसएमएस की ज़रुरत पड़ती है तो या तो मैंने ग़लत औरत से शादी की है या फिर मुझे एक मनोवैज्ञानिक की ज़रुरत है.''

सुधार की कोशिश

इस टेक्सट अलर्ट मेसेज की शुरुआत पिछले साल सऊदी हुकूमत के ज़रिए इलेक्ट्रॉनिक पासपोर्ट सेवा लागू करने के बाद शुरू की गई है.

सरकार की दलील है कि ई-पासपोर्ट के ज़रिए नागरिकों को अपनी यात्रा संबंधी ज़रुरतों में मदद मिलती है. जिससे उन्हें पासपोर्ट दफ्तर जाने की ज़रुरत नहीं होती.

सऊदी अरब एक बेहद रुढ़ीवादी देश है. हालांकि वहां के राजा किंग अब्दुल्लाह ने पिछले कुछ समय में वहां काफी सुधार लाने की कोशिश कर रहे हैं.

सितंबर 2011 में उन्होंने सऊदी महिलाओं को मतदान करने और स्थानीय निकाय चुनावों में खड़े होने का अधिकार भी दिया था.

Thursday, November 8, 2012

पेट्रोल कंपनियो के घाटे का सच .....!! नुकषाण करने वाली कंपनिया --- अपने शेर होल्डर्स को दे रही है डिविडंड !! Φ

पेट्रोल कंपनियो के घाटे का सच .....!! नुकषाण करने वाली कंपनिया --- अपने शेर होल्डर्स को दे रही है डिविडंड !! Φ

घाटा होने पर भी दिया डिविडंड ??? ---!!

जनता को समजाओ - अपनी अकल लगाओ --- दिन मे तारे दिखानेवाली कॉंग्रेस के वादो पे मत जाओ ![जुगल Éगुरु]

Hindustan Petroleum CorporationDividend - Dividend history of the Hindustan Petroleum Corporation

Definition of 'Dividend Policy'

The policy a company uses to decide how much it will pay out to shareholders in dividends. 

You can view Announcement Date, Effective Date, Dividend Type (Interim, Final and Special), and Percentage of Dividend given information for Hindustan Petroleum Corporation Ltd.

Dividends Declared
Announcement DateEffective DateDividend TypeDividend (%)Remarks
29/05/201230/08/2012Final85%Rs.8.50 per share(85%)Dividend
26/05/201108/09/2011Final140% 
26/05/201003/09/2010Final120% 
02/06/200913/08/2009Final52.5% 
29/05/200802/09/2008Final30%AGM
29/05/200717/08/2007Final120% 
12/12/200627/12/2006Interim60% 
25/05/200618/08/2006Final30%AGM
26/05/200502/09/2005Final100%AGM
29/11/200414/12/2004Interim50% 
01/06/200423/08/2004Final160%AGM
11/12/200329/12/2003Interim60% 
27/06/200305/09/2003Final180%AGM
03/01/200303/02/2003Interim20% 
30/05/200202/08/2002Final100%AGM
25/05/2001 Final100%AGM
10/07/2000 Final30% 
04/04/2000 Interim80% 
11/06/1999 Final110% 
23/06/1998 Final0% 
23/06/1997 Final40%

Indian Oil CorporationDividend - Dividend history of the Indian Oil Corporation

You can view Announcement Date, Effective Date, Dividend Type (Interim, Final and Special), and Percentage of Dividend given information for Indian Oil Corporation Ltd.
Dividends Declared
Announcement DateEffective DateDividend TypeDividend (%)Remarks
28/05/201205/09/2012Final50%Rs.5.00 per share(50%)Dividend
30/05/201115/09/2011Final95% 
28/05/201008/09/2010Final130% 
29/05/200902/09/2009Final75% 
28/05/200809/09/2008Final55%AGM
28/05/200710/09/2007Final130% 
07/12/200626/12/2006Interim60% 
26/05/200607/09/2006Final125%AGM
30/05/200508/09/2005Final100%AGM
07/12/200429/12/2004Interim45% 
08/06/200423/08/2004Final160%AGM
11/12/200301/01/2004Interim50% 
23/06/200318/09/2003Final160%AGM
02/01/200303/02/2003Interim50% 
18/06/200212/09/2002Final110%AGM
15/06/2001 Final95%AGM
05/08/2000 FinalN.A.%Nil Final Dividend
15/05/2000 Interim40%2nd Interim Dividend
31/01/2000 Interim35% 
02/06/1999 Final130%AGM & Dividend

Friday, November 2, 2012

नरेंद्रभाई आज जीस स्थान पर खडे हैं उन के पिछे वो पतिपत्नि का त्याग बहुत बडी भुमिका निभा चुका है ।

हम सब का भरोषा और विश्वास सच साबित हुआ - और मेरी बात का समर्थन सबूतो के साथ मीला - ▐ साभार: श्री भरोडिया(नरेंद्र भाई के बचपन के मित्र) !
नरेंद्रभाई आज जीस स्थान पर खडे हैं उन के पिछे वो पतिपत्नि का त्याग बहुत बडी भुमिका निभा चुका है । उन के निजी जीवन में हमारा कोइ अधिकार नही बनता दखल देने का । मिडिया में ये बात को गलत अंदाज में उछाला गया तो ये लिखना पडा ।
! ▐ जानिए मोदी जी की अनदेखि अन सुनी कहानी बचपन से आज तक की !!! - जुगल ईगुरु !

  • मेरा २४ घंटा सिर्फ देश के लिये ही है । ५ मिनिट भी मै किसी सगे को नही दे सकता । - Narendra Modi

  • उन्होंने मुझे देखा है की नही मालुम नही । अपने भाई को भी घुसने नही देते तो मै क्यों जाउ ।?? - Cousin of Narendra Modi
  • अपने घर संसार की बली, भाभी जी के अरमानों की बली, अपने ही संबंधियो से बेरुखी । ये सब नरेंद्र मोदीने किया है । उनका केरेक्टर ढिला है या मजबूत तय जनता करगी, कोंग्रेस या दिग्गी राजा नही ।
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ये बच्चा मुश्किल से १५-१६ सालका रहा होगा तब भारत-पाक की लडाई छीड गई । प्रधानमंत्री लाल बाहादुर शास्त्रीने मोरचा संभाला । देश का हौसला बढाने के लिए नारा दिया  ” जय जवान, जय किसान ” ईस नारे पर देश भर के सेवाभावी लोग, सेवाभावी संस्थाएं, खडे हो गये । आर.एस.एस भी उनमें से एक संस्था थी । लडाई के समय गुजरात के हर रोड पर, हर स्टेशन पर युवा लडके तैनात हो गये थे जरूरी साधन सामग्री ले कर । अगर सैनिकों का जथ्था, उन की गाडियां गुजरती है तो उन्हें जो मदद चाहिए मिल सके ।  ये बच्चा भी उन युवाओं के साथ स्टेशन के प्लेटफोर्म पर भागता फिरता था ।
 वो जमाना आज के मुकाबले अलग था । उस जमाने में माबाप के आगे बच्चों का कुछ नही चलता था । अगर बच्चा विद्रोह भी करता तो माबाप तो बाजुमें रहते सारे गांव के चाचे ताउ कान खिंचने लग जाते । बच्चे सब की ईज्जत करते थे तो मजबूर हो जाते थे, बडों की बात मानने के लिए । इसी आधार पर मा बापने जशोदाभाभी से उनका ब्याह करवा दिया,१९६८ में । लेकिन देश सेवा की ईतनी लगन लगी थी की ईसने जशोदाभाभी का स्विकार (गौना नही करवाया , असली शादी गौना होता था, इससे पहले लडके लडकी एक दुसरे का मुह भी नही देखते ) नही किया, चल पडे घर छोड कर । पिता भारत और मां भारती की सेवा के लिए अपने खूद के माबाप की भावना को ठेस पहुंचाया । ये किशोरावस्था थी, जहां आदमी दोराहे पे खडा होता है । उसने बडी राह, देशसेवा की राह पकडली ।
दौरान पोलिटिकल सायन्स की डिग्री हासिल कर ली । आर.एस.एस के प्रचारक भी बन गया । आज भारत के कितने नेता के पास पोलिटिकल सायन्स की सामान्य डिग्री भी है ?
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जब ईस बच्चे का नरेन्द्रभाई मोदी के नाम से जनता को परिचय हुआ तो एक गुजराती मेगेजीन (१९८४) में जशोदाभाभी का ईन्टर्व्यु छपा था । उसमें तस्विर थी, भाभी अपने पिताजी की किराने की दुकानमें हाथमें तराजु लिए बैठी थी, काफी खूश दिखती थी । बताती थी वो मुझे बुलायेंगे तब जाउंगी तबतक पिता की दुकानमें मदद करुंगी, मेरा भाई अशोक अभी छोटा है । लेकिन अब पता चला है भाभीने टिचरकी नौकरी कर ली थी, अब रिटायर्ड भी हो गई है और १०००० का पेन्शन भी मिलता है । एक सच्ची भारतिय नारी की तरह पति के बुलावे का ईन्तजार करती रही, पति के खिलाफ खभी नही बोली । मोदी के कारण ही उस के आसपास के लोग, अपनी स्कूल, पूरा रसोसणा गांव उस का मान सम्मान करता रहा हैं । लोगोने हर तरह की मदद की है, तकलिफ नही पडने दी है ।
२००७ में नरेन्द्रभाई के साले साबह अशोकभाईने कोशीश की दीदी और जीजा को मिलाने की लेकिन सफलता नही मिली । मोदी का कहना है के मेरा २४ घंटा सिर्फ देश के लिये ही है । ५ मिनिट भी मै किसी सगे को नही दे सकता । बात भी सही है । अपनी मां के अलावा उसे कोइ सगा मिल नही सकता, अपने सगे भाई भी नही । उन के सगे चचेरे भाई को मैंने कहा था तू अब नरेंद्रभाई के पास चला जा कहीं अच्छी जगह सेट कर देंगे मैं ईस मंदी मे कितना पगार दे देता हुं । उसने मुझे बताया छोडो सब । वो चले गए उस के बाद मेरा जनम हुआ है । मैंने भी उन्हें एक ही बार देखा है । उन्होंने मुझे देखा है की नही मालुम नही । अपने भाई को भी घुसने नही देते तो मै क्यों जाउ ।
उस की बात सही थी । मोदी गांव छोडकर गये तो किसी को पता नही था वो कहां है । कहा जाता है वो सिर्फ दो बार गांव आये हैं । एक बार पिता के अवसान के समय और दुसरी बार स्कूल की निव रखने के कार्यक्रम के लिए । उस समय भीड में उनकी छोटी बेहन भी उन्हें देखने आई थी, पास जानेकी हिम्मत नही कर पाई थी । मोदीने देख लिया या किसीने ध्यान दिलाया तो वो खूद उसके पास गये और हालचाल पूछ लिया ।
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जब मोदी पहलीबार मुख्यमंत्री बने तो उनका ही बचपन का दोस्त उन पर उबल पडा था । ” ये घांची अब तक लुक्खे की तरह भटकता था तो घर नही चला सकता था, अब नेता हो गया है, अब क्या कमी है, अब बहु को बुला लेना चाहिए ” । ये एक आम आदमी की आवाज थी । आम आदमी सोचता है की नेता बनते ही पैसे का पेड लग जाता है । बस अब उसे खा-पिकर राज करना है । आम नेता के लिए ये सही बात होगी मोदी के लिए नही ।
उन के तलाक के लिए भी सवाल उठे हैं । तलाक ईस लिए लिया जाता है की आदमी दूसरी शादी कर के जीवन में सेट हो सके । ईन की उमर थी तलाक ले के दूसरी शादी की तब शादी और तलाक का सारा मामला सामाजिक तरिके से होता था । तलाक में कभी कानून का दखल नही होता था । दोनों पक्ष के १०-१२ आदमी मिलकर तलाक दे देते थे । ये जिम्मेदारी माबाप की होती थी, तलाक लेनेवालों की नही । लेकिन समाज वकिल का बाप होता है राह देखता है बच्चों का मन बदलने का । उसे समजाने में टाईम पास कर देता है ।
लेकिन इस दौरान ये पतिपत्नी समाज से आगे बढ गए । भाभीने ठान लिया की मैं तलाक नही लुंगी । मरते दमतक नरेन्द्र ही मेरा पति रहेगा । और नरेन्द्रभाई भी मजबूर है । देश सेवा का ईतना बडा भार उठा लिया है की २४ घंटे में से ५ मिनट भी वो भाभी या अन्य सगे को नही दे सकते । भाभी भी ये समज चुकी है । देश के लिये आदमी मर जाता है तो ये तो सिर्फ पति का वियोग ही है ।
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अपने घर संसार की बली, भाभी जी के अरमानों की बली, अपने ही संबंधियो से बेरुखी । ये सब नरेंद्र मोदीने किया है । उनका केरेक्टर ढिला है या मजबूत तय जनता करगी, कोंग्रेस या दिग्गी राजा नही ।
नरेंद्रभाई आज जीस स्थान पर खडे हैं उन के पिछे वो पतिपत्नि का त्याग बहुत बडी भुमिका निभा चुका है । उन के निजी जीवन में हमारा कोइ अधिकार नही बनता दखल देने का ।  मिडिया में ये बात को गलत अंदाज में उछाला गया तो ये लिखना पडा ।

मेरी पोस्ट ये थी - जिसके जवाब मे मेरी बात और विषवास को समर्थन और ज्यादा सबूत मीले ! मे : श्री भरोडिया(नरेंद्र भाई के बचपन के मित्र) का दिल से धन्यवाद करता हूँ !
▐ क्यू है खामोश मोदी जी - यशोदाबेंन वाले आरोप पर ? ▐ Φ यशोदाबेन ने कहा था,‘मोदी मेरे पति और मैं उनके खिलाफ कुछ नहीं बोलूंगी। मुझे खुशी है हम दोनों समाज सेवा कर रहे हैं।’ [Φ वो नेशनल लीडर हैं, बहुत सुंदर और पढ़-लिखे हैं, मैं तो उनके सामने कुछ भी नहीं।....]
▐ अगर ये बात सच है तो शर्म आनी चाहिए उन गंदे खून वालi - चरित्रहीनता जिनके डीएनए मे है और नहेरु के वंश से है ......! ऐसी देवी जैसी स्त्री का नाम सारे बाजार उछाल के अपने संस्कार और पैदाइश मे पूरे गाँव की सहकारी महनत योजना दर्शाती है ! ▐
मोदी और यशोदाबेन की शादी बचपन में हुई थी, लेकिन उनका ‘गौना’नहीं हुआ। उस जमाने में बाल विवाह की प्रथा थी और मोदी की भी इसी प्रथा के तहत शादी कर दी गई थी। इसके बाद उनका झुकाव संघ की ओर हो गया और उन्होंने अविवाहित रहने का फैसला किया। यशोदाबेन ने भी मोदी के फैसले का सम्मान किया, लेकिल उन्होंने भी शादी नहीं की।
यशोदाबेन स्कूल टीचर थीं और वो भी समाजसेवा में जुटी हैं। हाँ उनका और गाँव का इंटरव्यू मैंने भी देखा है ! यशोदाबेन के करीबी कहते हैं कि वो इस बात से खुश हैं कि मोदी और वो दोनों समाज की सेवा कर रहे हैं। इंटरनेट पर यशोदाबेन और उनके नाते रिश्तेदारों के बयान वाले कुछ वीडियो भी हैं, जिनमें यशोदाबेन के मोदी की पत्नी होने की बात कही गई है।
2009 में एक मैगजीन ने अपनी रिपोर्ट में यशोदाबेन नाम की महिला से बातचीत की थी और ये दावा किया था वो मोदी की पत्नी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक यशोदाबेन गुजरात के राजोसाना गांव में रहती हैं और जिस समय ये रिपोर्ट आई थी तब वो उसी गांव के स्कूल में पढ़ाती थीं। मैगजीन के मुताबिक यशोदाबेन ने कहा, ‘हां मोदी से मेरी शादी हुई थी, लेकिन हम अलग रहते हैं। वो नेशनल लीडर हैं, बहुत सुंदर और पढ़-लिखे हैं, मैं तो उनके सामने कुछ भी नहीं। ’मैगजीन ने यशोदाबेन के हवाले से लिखा था कि मोदी और उनकी शादी वाडनगर गांव में हुई थी। शादी के कुछ दिन बाद वो पढ़ाई पूरी करने के लिए अपने घर वापस लौट आईं और फिर कभी वापस नहीं गईं।
▐ रिपोर्ट में राजोसाना गांव के लोगों के भी बयान दिए गए थे। उस गांव के सभी लोग यशोदाबेन को मोदी की पत्नी के तौर पर ही जानते हैं। वो कहते हैं कि यशोदाबेन अहमदाबाद कभी कभी जाती हैं, लेकिन मोदी ने उन्हें कभी बुलाया नहीं। वो मुस्लिमों के बच्चों को पढ़ाती हैं और उनकी सेवा करती हैं। इस मैगजीन से बातचीत में यशोदाबेन ने कहा था,‘मोदी मेरे पति और मैं उनके खिलाफ कुछ नहीं बोलूंगी। मुझे खुशी है हम दोनों समाज सेवा कर रहे हैं।’
▐ Φ अगर ये बात सच है तो शर्म आनी चाहिए उन गंदे खून वालi - चरित्रहीनता जिनके डीएनए मे है और नहेरु के वंश से है ......! ऐसी देवी जैसी स्त्री का नाम सारे बाजार उछाल के अपने संस्कार और पैदाइश मे पूरे गाँव की सहाकरी योजना दर्शाती है ! एक तरफ तीन तीन बार शादी करनेवाला वो थरूर ..... और अपने 19 साल के बेटे को और 2 -2 पति को गरीब होने पर छोड देनेवाली सुनंदा, [ नयी सूचना और सबूतो के आधार पर उसके दूसरे पति को आत्म हत्या करनी पड़ी थी- क्यूँ की दुबई मे उसके द्वारा खर्च किए गए करोड़ो का बोज उसके दूसरे पति मैनन पर ला दिया था , इस लिए मेनन का कंस्ट्रक्षण बिजनेस बर्बाद हुआ और जैसा की मीने पहले कहा था की आर्थिक बदहाली की वजह से मेनन को दुबई से भारत वापिस आना पड़ा था , लेकिन उसके बाद भी उसने सुनन्दा को बहुत ही रिक्वेस्ट की थी लेकिन थरूर के साथ लगी हुई वो दुबई छोड कर नहीं आई , और उसके दूसरे पति मेनन ने आत्महत्या कर ली जिसको सुनन्दा और उसके फौजी पिता अकस्मात मौत बता रहे थे !]
Φ अपने जिस्म को सीढी बनाकर तीसरी शादी के लिए थरूर तक पहुंची ! और आगे की कोई गेरंटी नहीं है ! भारतीय संस्कृति पर कलंक जैसा ये ये सुनंदा - शशि का युगल और
▐ भारतीयता और हिन्दू संस्कृति को अपनी नस नस मे खून की तरह दौड़ रहा है ऐसा नरेंद्र मोदी और यशोदा बहन का युगल ! ▐ जिनहोने अपनी बचपन की शादी को ना निभाते हुए भी एक भारतीय नारी और एक संसार त्यागी पुरुष बनकर निभा रहे है ! और मोदी जी की देश सेवा के यज्ञ मे अपनी ख्वाहिशों का हवन करने वाली और , दूसरी शादी ना कर के भी पवित्रता से पतिव्रत निभानेवाली उस यशोदा बहन --- यशोदा माँ जैसी है ! उनको मे साष्टांग प्रणाम मोदी जी से भी पहले करूंगा ! ▐
▐ क्यूँ की पुरुष और प्रदेश दोनों के उत्थान और पतन के केंद्र मे नारी होती है ! आज अगर उनको कोई भी शिकायत होती ......... तो मोदी जी की नकली सेक्स सीडी बनाने के लिए साउथ की अभिनेत्री ओ को और तहलका को हाई टेक फर्जी वीडियो बनवाने का कोंटरेक्ट देने वाली ये कॉंग्रेस इस मुद्दे को छोड़ती क्या ? ▐ चलो वो तो छोड भी दे क्यूँ की उनके खुद के ही हर गली हर नुक्कड़ पर नारी शोषण के कांड होते रहते है , ▐ लेकिन मीडिया .... मोदी जी को छिंक भी आए तो देश भर मे सनसनी की तरह पेश करने वाली मीडिया ..... जो कॉंग्रेस के फेंके टुकड़ो पर पलनेवाली,▬ और हर दुखद कांड या घटना मे देश वासियो की लाशों की बोटियों को आपस मे बाँट कर अपनी रोटी का निवाला बनाने वाली,▬ ये मीडिया क्या इस मुद्दे को छोड़ती क्या !
▐ मोदी के नाम के 2 अक्षर जिनकी टीआरपी और अखबार मेगेजीन की बिक्री कई गुना कर देती है तो ये मुद्दा तो उनके लिए बहुत बड़ा चांस था ! और ये बात सच इस लिए मानने योग्य है क्यूँ की यशोदा बहन ने जब खुद ही कहा की वह खुश है और उनको मोदी जी से कोई शिकायत बाजू पर रही ऊपर से गर्व है ....तो जमीन ही ताकनी पड़ी होगी शर्म से उन बेशर्मो को !
▐ तो ऐसी बात हमे क्यूँ बताए ! ? क्यूँ की इसको रहस्य ही रहने दे कर अपने न्यूझ के हेडलाइन के टाइटल बनाने का मौका भी चला जाता जो आज उनको मीला है !
▐ अगर आप ऐसे हालत मे हो तो आप अपने पारिवारिक जीवन के बारे मे क्या सार्वजनिक करेंगे? अगर खुद को शादी शुदा बताए - तो उन्होने एक भी दिन क्या सांसरिक जीवन का बिताया है ? और उन्होने खुद कभी बाल ब्रह्मचारी नहीं कहा और इस बात पे मौन है ....क्यूँ की वे भी मन ही मन यशोदा बहन के निस्वार्थ त्याग के रूण के नीचे है ...... और सिर्फ वे हि क्यूँ पूरा गुजरात उनका ऋणी है , और कल पूरा देश होगा ...जिसने इक योगी पुरुष का रास्ता न भटका कर खुद को भी उनही की तरह अलग राह पर जन सेवा मे समर्पित कर दिया !▐
▬ आप मूजे चाहे चमचा कह लो मोदी जी का , चाहे नाजायज औलाद {जो मूज जैसे अकेले अनाथ के लिए गर्व की बात होती }, पर अंध भक्त बिलकुल नहीं हूँ ! एक वक्त मे खुद कॉंग्रेस के करीब शक्ति सिंह गोहेल वर्ष 1996- 1999 भावनगर रह चुका हूँ - कॉलेज के दिनो मे मेरे बिन नेता पद के भी नेतृत्व को केश करवाते थे ..और रेलियों मे भीड़ जुटाते थे.... क्यूँ की लड़किया सिर्फ मूज पे भरोसा करती थी .....! एक को छोड़ कर सभी को बहन ही बान लिया था ...इस लिए !! . हनुमंत सिंह चूड़ासमा नाम क एक भावनगरी कोंग्रेसी और बदले मे मे सिर्फ विद्यार्थी हीतो के काम और भावनगर शहर की बापूगीरी मे , मेरे बीपीटीआई कॉलेज सर्कल की सहपाठी और लड़कियो को निर्भीकता का वचन ! ▐
▐ मे ही हूँ जो बीजेपी और कॉंग्रेस के निजी युद्ध के कारण अपना करीयर और डिग्री गंवाई - एक शानदार भविष्य गंवाया - जब बीजेपी की सरकार थी - केशु भाई सीएम थे - और भरत बारोट - टेकनिकल शिक्षा मंत्री - जिनकी केबिन के अंदर जा कर मैंने आसमान सर पे उठा लिया था , खुद को निर्दोष साबित करने के लिए ... तब मूजे जवाब मिला था की कभी कभी सूखे घास के साथ हरी घास भी जल जाती है ! और मूज जैसे एक के लिए उनके पास कोई वक्त नहीं है ! तब से ही मे धूर विरोधी था - बीजेपी और केशुभाई का ! और हर राजनीतिज्ञ का ....... लेकिन जीवन मे हादसो की कतार लिए हमेशा जलता ही रहा हूँ बदनसीबी की आग मे - जब मेरा प्रेम और पारिवारिक जीवन भी बर्बाद हो गया - क्यूँ की मूजे चुनना था - केनेडा मे ग्रीन कार्ड और जॉब - या फिर देश मे ही रहकर मेरे जेसो के साथ हुए अन्याय के लिए लड़ना ...... तो मैंने भी .... केनेडा छोड़ दिया था .....! और देश को चुना था !
▐ जब सब कुछ लूट गया तो मरने की धुन सवार हो गई , लेकिन जीवन व्यर्थ गया था इस लिए मौत किसी के काम आ जाये इस लिए --- मरते मरते भी किसी एक की जिंदगी बचाता जाऊन - न्याय दिलाता जाऊन - इस लिए एक एनजीओ मे जूड़ा --- NEST India - Fights Against Crime and Corruption ! और ऐसे ऐसे पंगे लिए फिर भी सिर्फ धमकिया और एक ही बार खूनी हमला ---- उसमे भी मूजसे ज्यादा हमला करने वाला घायल हुआ बेचारे को अस्पताल भी मेरी टिम ले कर गई थी ....! कोई मार डाले इस इंतजार मे बहुत वक्त ना गंवा कर अपने कोम्प्यूटर पे ही ध्यान केन्द्रीत रखकर मुफ्त मे शिक्षा देना शुरू किया जिस कोर्स के 50,000 से 1 लाख तक फीस थे उसको मुफ्त मे करवाया पहले अपने गाँव मे और फिर बरोड़ा , अहमदाबाद और अब भरूच अंकलेश्वर - जहां जॉब मिली वहाँ फूल टाइम जॉब भी की पार्ट टाइम लोगो की मदद - [ जिसमे मेरा खुद का स्वार्थ था क्यूँ की मेरा अहम संतुस्ट होता था, की मे भी काम का हूँ , किसी को तो काम लगा ] करता रहा ! और एक दुर्घटना ने मौजे मेरे ही परीवार और समाज के कुछ लोगो के जूठे आरोपो और उनकी हलकी मानसिकता और नियत को सबूत के साथ पोल-खोल के लिए ही फेसबुक पे आया था !! फिर जिस तरह से फेसबुक मे देश प्रेम जग रहा था उस को देख कर अपना खुद का बदला लेना भूल गया और देश के लिए बदला लेने लगा !↨ क्यूँ की देश के असली इतिहास - किताबी और स्कूली नहीं - जानता था और बरबादी के मूल मे कौन है वो भी ! और बचपन से - आप कहेंगे मूजे किसने शिखाया तो वो है ---- नगेंद्र विजय और हर्षल पुष्कर्णा भारत का सबसे पहला एक मात्र सायन्स मेगेझिन - जो गुजराती और अब अङ्ग्रेज़ी मे प्रकाशित होता है और -सफारी - जिसने मेरे संस्कारो और देश भक्ति का माँ-बाप बनके सींचा है - जिसने मूजे हर विषय मे जानकार बनाया है ! उस ज्ञान के भंडार जैसे ... हर घर मे गीता रामायण के साथ ये मेगेजीन होना जरूरी है ! www.safari-india.com ▐ तो ये राम कहानी से आपका दिमाग खराब करना उद्देश्य नही था ...उद्देश्य वही की जब कोई खुद को और अपनी निजी जीवन को त्याग कर लोगो की और देश की सेवा मे समर्पित किया हो , ऐसे लोगो की भावनाओ का आदर करे ...क्यूँ की मे खुद उस श्रेणी मे आता हूँ ! और मोदी जी के मौन को समज शकता हूँ ! जिनके सीएम पद पर आने के बाद - बस चंद फेक्स - ईमेल और फोन कॉल से मैंने न्याय दिलाया है ---- जिनकी सीएमओ से मूजे पूर्ण सुरक्षा का वादा मीला था और निभाया भी था ..... जिसमे मूजे कहा गया था की अगर आप ने किसी के मांगने पर घूस दी तो आप पर भी कार्यवाही होगी ! और फ़ीर जा के माना मोदित्व मे व जयते !!
और सिस्टम और गवर्नमेंट के नंगेपन को एक के बाद एक कपड़े पहनते हुए देखा है ---! खुद को सर्वोपरि समाजने वाले --- अधिकारियों को पहली बार वे सरकार और जनता के नौकर है इस बात का एहसास होते हुए देखा है और एक एप्लीकेशन पे दौड़ते हुए देखा है ! एक अंकलेश्वर के एएसआई के नाम पर की गई मेरी फरियाद के दिन के तीसरे दिन के बाद ही विधान सभा चुनाव थे .....! मैंने सोचा था 1-2 महीने मे उसकी लग जाएगी ....! लेकिन तीसरे ही दीन उसको सस्पेंड होते हुए देखा है ----! जिस दिन से चुनाव शुरू हो रहे थे ....! उसी दिन आम आदमी की अर्जी का रिसपोन्स ????? आश्चर्य है ना !! आपसे पूछता हु...अपने कभी अपने या अपने आसपास हो रहे अन्याय- भ्राष्टाचार और गुनाह के सामने आवाज उठाई है ? है तो कहाँ तक ? सीएमओ फोन या लेटर से फेक्स से संपर्क किया है .... और अगर आप समजते है की आप को तब भी न्याय नहीं मीला .....तो आपका वो तथा कथित न्याय क्या किसी अन्य के लिए अन्यायपूर्ण था ? अगर आप खुद ही अपने आसपास की गण्डकी साफ नहीं करना चाहते तो उस गंदगी के सड़ने पर बीमार हो कर सरकार पे उंगली उठाने का आपको कोई हक नहीं ...! जय हिन्द - जय गुजरात ! मोदी सिर्फ एक ही बात ! █▌║││█║▌│║█║▌© Official Jugal Eguru™ page ✔ Help us for Grow . Like ✔ Tag ✔ Share ♥

Jantaa ke Chaante !! SUPERHIT !!

Φ सुबह के 4 बजे है फिर भी मेरी आंखो मे हसते हस्ते पानी आ गया है और पेट बल खा रहा है ! इस वेब न्यूझ के कमेन्ट मे जिस तरह मोदी विरोधी या कॉंग्रेस के पेड़ न्यूझ होते है उसकी धड़ा धड़ तीप्पणिया पता नहीं इनकी सोई आत्मा जगाती है की नहीं ! इतने बेशर्म कैसे कोई धंधा कर शकता है !!? और आज की फाइव स्टार कमेन्ट ....!! हँसना आए तो हँसना पर जिस तरह जनता की आवाज को सच दिखाने के लिए भिखारी की तरह प्रदर्शित किया है जरा गौर करना ! सच मे हम सभी इस बिकाऊ मीडिया और पेड़ न्यूझ के कारण इतने ही लाचार है !!

क्या मोदी वाकई अविवाहित हैं: दिग्विजय - Digvijay slams Modi, Questions his marital status - Navbharat Times

kalyan, kalyan का कहना है :
02/11/2012 at 11:52 AM
ओ चैनल वाले भैया… एक दो मासूम सवालों के जवाब दोगे क्या?

1) भाई साहब… भाई साहब!!! कल ही डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी ने "भोंदू" के बारे में खुलासे करते हुए एक प्रेस कांफ़्रेंस की थी, उसे तुमने दस मिनट भी नहीं दिखाया? क्या डॉ स्वामी तुम्हें चाय-नाश्ता नहीं करवाते हैं???

2) नरेन्द्र मोदी की थरूर पर की गई टिप्पणी को लेकर ताबड़तोड़ पैनल डिस्कशन, नारी सम्मान, महिला आयोग वगैरा के ढोल पीट लिए… यहाँ तक कि सुनंदा पुष्कर का इंटरव्यू भी हमारे माथे पर दे मारा… जब अभिषेक मनु सिंघवी ने देश की न्याय-व्यवस्था को ही अपने चेम्बर में सुला लिया था, तब आपके मुँह में दही क्यों जम गया था भैया? बताओ ना प्लीईईईईईईज़!!!

=================
ए चैनल वाले बाबू…!! ओ भाई…!! अरे अंकल…!! सुनो तो, पतली गली से कहाँ कलटी मार रहे हो…

क्या मोदी वाकई अविवाहित हैं: दिग्विजय - Digvijay slams Modi, Questions his marital status - Navbharat Times

Ashok Gaur, Bansi Paharpur का कहना है :
02/11/2012 at 03:32 PM
दिग्गी टू देश का नेता है/ क्यो किसी के पेर्सनल मामले मे दखल देता है/ सादी नही हुए तो कोई तेरे कन बे के पिच्छे तो नही पड रहा / कई सालो से तेरे कॉमेंट देख रहा हु / सिर्फ पागलो बलि हरकत, जाई चन्द बलि नीति, चमचा गिरि / लगता पिछले जनम मे टू कुत्ता था / बे ही हरकत है / देश के बारे मे सोच / जन लोक पाल ला, भ्रस्तरचार मिटा आसाम मे दंगा क्यो हो रहे है . चीन सीमा पर क्यो घुसा आ रहा है / सोनिया लूट लूट कहा जमा कर रही है मेरा नाम फोर्ब्स मे क्यो नही/ पाकिस्तान को ढंका, अफजल गुरु ओर कसाब के बारे मे बोल जिससे लोग तेरे को कुत्ते से शेर काहे; ताक झहांक् मे कुछ नही रखा क्यो बच्चो की जिन्दि खराब कर रहा है लोग तेरे को प्रधान मंत्री के पड पर देखना चाहते है / इस तरह के बयान देकर भबिस्या खराब कर रहा है / मन मोहन सिंह के बाद दिग विजय सिंह का नंबर है/ क्योकि हो तो दोनो सिंहही / सर्वे से पता चला है सोनिया किपसंद पेहले सिंह दूसरी पसंद ख़ान है /

क्या मोदी वाकई अविवाहित हैं: दिग्विजय - Digvijay slams Modi, Questions his marital status - Navbharat Times

Shankar, Chennai का कहना है :
02/11/2012 at 10:40 AM
मोदी जी की शादी हूवी है या नही इससे जनता को कोई फर्क नही पड़ता नही उन्होने किसी आम जनता का पैसा किसी औरत के पीछे लगाया, लेकिन कोई अगर जनता का 50 करोड़ खर्चा करके अदरक चूसेगा तो जनता का घुस्सा जायज है.
 

 

क्या मोदी वाकई अविवाहित हैं: दिग्विजय - Digvijay slams Modi, Questions his marital status - Navbharat Times

Durga, Vikas Nagar का कहना है :
02/11/2012 at 10:06 AM
दिग्गी राजा बातो के धनी कुटिल राजनेतिक कांग्रेस के बफादार अपनी बे मतलब की बातो से लोगो को गुमराह करना जनता की ताली बटोरना उनकी खूबी है, जनता साबधान् खाली बातो से पेट नही भरता..............
 

 

(1) Sonali Arya

गाँधी के पोरबन्दर से कांग्रेस सांसद विठ्ल भाई भारत के दुसरे ऐसे सांसद है जिनके खिलाफ सबसे ज्यादा क्रिमिनल केस दर्ज है |

पहले नम्बर पर झारखंड मुक्ति मोर्चा के पलामू से सांसद कमलेश्वर बैठा है जिनके खिलाफ 46 क्रिमिनल केस है |

दुसरे नम्बर पर ...

गाँधी के गुजरात और गाँधी के जन्मभूमि पोरबन्दर से कांग्रेस के सांसद विठ्ठल राडडीया है जिनके खिलाफ 41 क्रिमिनल केस दर्ज है | और ६० दुसरे केस दर्ज है |

आज तो गाँधी जी आत्मा ख़ुशी मना रही होगी क्योकि गाँधी के नाम का मार्केटिंग का ठेका लेने वाले नीच कांग्रेस ने सबसे बड़े अपराधी को ही उनके जन्मस्थान से सांसद बनाया |

सुनने में ये भी आ रहा है की गुजरात के लेवुआ पटेल वोटो को अपने तरफ करने के लिए कांग्रेस इस क्रिमिनल सांसद को केन्द्रीय केबिनेट में लेने पर भी विचार कर रही है क्योकि गुजरात कांग्रेस ने इनका नाम केंद्र को मंत्री बनाने के लिए भेजा है |




Serious IPC Sections Number of Times they appear for Radadia :-
*****************************************************
395 2
324 1
304 1
Total 4

Details of Criminal Cases
********************
Cases where accused

Serial No. IPC Sections Applicable Other Details / Other Acts / Sections Applicable
1 322, 323, 501, 506(2) FIR NO: 22/91,Dated: 1-2-91 at the Jamkondarna PS Dist Rajkot, Case is pending in the Dhoraji Magistrate Court (Judicial Magistrate First Class since 26-4-91

2 114 Criminal intimidation,Death threats
3 323, 324 , 504, 506(2) FIR NO 123/91, Dated : 21-9-91 at the Jamkandorna PS District : Rajkot

4 189 Threating public servant on duty,criminal minilation death threats and Astrocities Act A-1(10),case is pending in the Dhoraji Magistrate’s Court First Class Since 1-4-94
5 504, 506(2) FIR NO : 111/92, Dated : 4-11-92 at the Jamkandorna PS District Rajkot, criminal minilation criminal assoult.Case is pending in the Dhoraji Magistrate’s Court,Judicial Magistrate First class since 20-11-92
6 188, FIR NO : 3030/2000 dated : 16-9-2000 at the Jamkandorna PS District : Rajkot, disturbing public servant on duty and Bombay Public Act section 33(1), (2), (33),case pending at Dhoraji Magistrate’s Court Judicial Magistrate First Class since 27-9-2002,
7 189, 504, 506(2) FIR NO : 3058/98, Dated: 15-6-98 at Dhoraji PS District : Rajkot, disturbing public servant injury,criminal minilation death threats case pending at Dhoraji Magistrate’s Court,Judicial Magistrate First class since 3-1-99
8 394, 332, 186, 143, 147, 395, 397, 144, 504, 506(2) FIR NO : 95/2000, Dated : 6-5-2000 at Dhoraji PS District Rajkot,stealing power worth rs 1,81,300 and threating to kill some one,robbery,dacoity,rioting, criminal assault of public servant on duty,death threats Case is pending in the Dhoraji Magistrate’s Court,Judicial Magistrate First class since 3-8-2000
9 394, 332, 186, 143, 147, 395, 397, 144, 504, 506(2) FIR NO : 97/2000,dated: 6-5-2000 at Dhoraji police station district: Rajkot,Looting electric meters worth rs 1,54,000/-, robbery, dacoity, rioting, criminal assult at public servant on duty,death threats,Case is pending in the Dhoraji Magistrate’s Court,Judicial Magistrate First class since 3-8-2000
10 188 FIR NO : 3018/98, Dated: 21-2-1998 under Bombay Police Act 135 , disoveying public servant on duty.Case is pending in the Dhoraji Magistrate’s Court,Judicial Magistrate First class since 23-4-98
11 188 FIR NO : 3019/98, dated : 21-2-1998 under Bombay Police Act 135,Disoveying public servant on duty ,Case is pending in the Dhoraji Magistrate’s Court,Judicial Magistrate First class since 23-4-98
12 332, 143, 149, 504, 341 FIR NO : 57/02,Date: 25-1-02 at Police Station ,Rajkot City,herrest public servant on duty wrongful statement,Case is pending in the Dhoraji Magistrate’s Court,Judicial Magistrate First class Rajkot City since 10-3-2002
13 186, 387, 504, 506(2) FIR NO : 742/02,Dated: 23-11-2000 at Police station,Rajkot City
14 188,114 To damage public property and death threats etc.Case is pending in the Dhoraji Magistrate’s Court,Judicial Magistrate First class Rajkot City since 10-3-2002
15 186, 304, 477, 114 FIR NO : 223/2000 dated : 17-4-2000 at police station Rajkot city , Threats assult of senior government officers destriction of evidence,Case is pending in the Dhoraji Magistrate’s Court,Judicial Magistrate First class Rajkot City since 4-7-2000
16 504, 506(2) FIR NO : 3194//05 dated : 26-05-2005 at Dhoraji Police Station District: Rajkot
17 188, Arms Act 30 Criminal intimidation,death tiea,case pending before Judicial Magistrate’s Court Dhoraji since 22-02-06
18 504, 506(2) FIR NO : 9704/05 Dated: 28-12-2004 at Dhoraji Police Station District Rajkot City
19 135 B.P.A (criminal intimidation,death threats case pending before Judicial Magistrate’s Court Dhoraji since-22-07-05
20 143, 147, 149, 186, 188 FIR NO : 1-555/08 at 04-12-08 at Rajkot City praduman nagar police station,Demage to public property etc,caase is pending before Chief Judicial Magistrate’s Rajkot, Court No 4, since 19-01-2009