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Saturday, April 13, 2013

2014 में होने वाले में आम चुनाव में लोकसभा की लगभग 160 सीटों पर ट्विटर-फेसबुक का असर

चुनाव के नतीजों पर ट्विटर-फेसबुक का असर?

फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया के मंच का इस्तेमाल करने वाले लोग नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं?

एक नए अध्ययन में इसी सवाल का जवाब खोजा गया है.

आयरिश नॉलेज फाउंडेशन एंड इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने इस पर एक शोध किया है और कहा है कि 2014 में होने वाले में आम चुनाव में लोकसभा की लगभग 160 सीटों पर इसका असर दिखाई दे सकता है.

सर्वाधिक प्रभाव वाली सीटें

अध्ययन में सबसे सर्वाधिक प्रभाव वाली सीटों की पहचान की गई है.सबसे अधिक प्रभाव वाली सीटों का तात्पर्य उन सीटों से है, जहां पिछले लोकसभा चुनाव में विजयी उम्मीदवार के जीत का अंतर फेसबुक का प्रयोग करने वालों से कम है अथवा जिन सीटों पर फेसबुक का प्रयोग करने वालों की संख्या कुल मतदाताओं की संख्या का 10 प्रतिशत है.

अध्ययन में 67 सीटों की 'अत्यधिक प्रभाव वाली', जबकि शेष सीटों की 'कम प्रभाव वाली' सीटों के रूप में पहचान की गई है.

लोकसभा की कुल 543 में से 160 सीटों पर सोशल मीडिया का खासा असर देखने को मिल सकता है. महाराष्ट्र में इसका सबसे ज्यादा असर पडऩे की संभावना है. यहां की 21 सीटों पर सोशल मीडिया का असर पड़ सकता है."

महाराष्ट्र और गुजरात आगे

जबकि गुजरात में 17 सीटें सोशल मीडिया से प्रभावित हो सकती हैं. इसी तरह उत्तर प्रदेश में 14, कर्नाटक की 12, तमिलनाडु की 12, आंध्र प्रदेश की 11, केरल की 10 और मध्य प्रदेश की 9 सीटों पर इसका असर देखने को मिल सकता है.

ये वो लोकसभा सीटें हैं जहां लोग सोशल नेटवर्किंग साइट का इस्तेमाल सबसे ज्यादा करते हैं. इन निर्वाचन क्षेत्रों में कुल मतदाताओं के दस फीसदी से ज्यादा लोग फेसबुक से जुड़े हुए हैं.

सर्वेक्षण के मुताबिक फेसबुक से जुड़े लोग चुनाव से पहले अपने आसपास के वोटरों को प्रभावित कर सकते हैं.

अध्ययन का ये भी कहना हैं कि चुनाव से 48 घंटे पहले उम्मीदवारों के चुनाव प्रचार पर रोक लगने के बाद फेसबुक, ट्विटर जैसी सोशल मीडिया चुनाव प्रचार की कमान संभाल लेंगे.

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Thursday, January 10, 2013

FACEBOOK in DANGER : Indian Govt. Planning To GET RID OVER

♠ FACEBOOK in DANGER : Indian Govt. Planning To GET RID OVER
♠ फेसबुक खतरे मे : भारत सरकार दबाना चाहती है अभिव्यक्ति की आजादी

 

दिल्ली में घटित हुए कांड के विरोध में रायसीना हिल्स पर पहुंचे जनसैलाब ने सरकार और खुफिया तंत्र को हिलाकर रख दिया है। सरकारी मशनीरी हैरत में है कि बिना किसी नेतृत्व के इतनी बड़ी तादाद में जनता सिर्फ सोशल मीडिया के जरिये एकजुट हुए और राष्ट्रपति भवन के पास तक आक्रोश जाहिर करने पहुंच गये। सरकार और खुफिया तंत्र की ओर से सोशल मीडिया को खतरे के तौर पर देखा जा रहा है। इससे निपटने के लिए भी व्यापक विचार विमर्श इंटेलीजेंस और सरकार के बीच शुरू हो चुका है। माना जा रहा है कि देश के राजनीतिक और सांप्रदायिक माहौल को बिगाडऩे के लिए भविष्य में भी सोशल मीडिया अहम् भूमिका निभा सकता है।

सुरक्षा के लिहाज से सोशल साइटें एक नयी चुनौती बनकर सरकार के सामने खड़ी हैं। इस बात की आशंका सोशल मीडिया साइटों पर निगरानी रखने वाली सरकारी एजेंसी ने जाहिर की है। रिपोर्ट में कहा गया है उग्र प्रदर्शन के पीछे इन साइटों का इस्तेमाल किया गया। भावनाओं को छू जाने वाले अनगिनत संदेशों के जरिये दिल्ली के यूथ को टारगेट किया गया। एजेंसी की रिपोर्ट पर कारगर कदम उठाने का निर्णय लिया गया है। सरकार और तमाम खुफिया एजेंसियां उन कारणों पर गहन चिंतन मंथन कर रही है जिससे भविष्य में इस तरह की स्थितियों की पुनरावृत्ति न होने पाए।
   
आज की तारीख में युवा भारत के पास अपने जज्बात और गुस्से का इजहार करने के लिए वो हथियार है, जिसे कोई नहीं रोक सकता। वो हैं सोशल वेबसाइट्स। जो लोग दिल्ली के इंडिया गेट पर अपना आक्रोश दिखाने नहीं पहुंच सके, वो ट्विटर और फेसबुक सरीखी सोशल वेबसाइट्स पर अपने जज्बातों और गुस्से की इबारत लिख रहे हैं। लेकिन आम आदमी की सोशल मीडिया पर सक्रियता सरकार को रास नहीं आ रही है और येन-केन प्रकरेण वो सोशल मीडिया को दायरे में रखने और रखवाली के उपायों को खोज रही है। सोशल बेवसाइटस पर पोस्ट, कमेंटस और लाइक करना अपराध की श्रेणी मे शामिल है और इसकी वजह से कई लोग हवालात की सैर भी कर चुके हैं। गौरतलब है कि शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे की शवयात्रा के दौरान शिवसेना कार्यकर्ताओं द्वारा मुम्बई ठप किये जाने पर शाहीन धाडा नामक युवती ने फेसबुक पर टिप्पणी की थी और उनकी मित्र रेणु श्रीनिवासन ने उसे ‘लाइक’ किया था। इसके बाद दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया था लेकिन बाद में उन्हे रिहा कर दिया गया। कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को कार्टून बनाने पर राजद्रोह के मामले में जेल की हवा खानी पड़ी तो वहीं आम आदमी की आवाज दबाने के लिए सरकार और सरकारी मशीनरी आईटी एक्ट की विभिन्न धाराओं का दुरूपयोग जमकर कर रही है। आईटी एक्ट की धारा 66-ए  में संशोधन की मांग जोर-शोर से उठने लगी है।

असलियत यह है कि वर्तमान यूपीए सरकार लगभग हर मोर्चे पर फेल दिख रही है। सरकार के हठधर्मी, बेश्र्म और नकारा रवैये के कारण जनता में अंदर तक गुस्सा भरा हुआ है और जनता विशेषकर युवा वर्ग अपनी भड़ास को सोशल वेबसाइटस के माघ्यम से देश-दुनिया में सांझा करता है। इससे जनता के बीच सरकार की छवि को गहरा धक्का पहुंच रहा है। लेकिन समस्या यह है कि सरकार कमियों को दूर करने की बजाय जनता की आवाज दबाने में ऊजो खपा रही है। सरकार अपने अपराधों की मुखर आलोचना सुनने की सहनशीलता खो चुकी है और उसी का परिणाम है कि सरकार झुंझलाहट भरे आलोकतांत्रिक व्यवहार पर उतर आई है।

 

सोशल नेटवर्किंग की दुनिया में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर शिकंजा कसने के सरकार के षडयंत्र इसी झुंझलाहट और खीझ की असंतुलित प्रतिक्रिया है जिसे कि वह कई बहानों के चोले से ढंकने का प्रयास कर रही है। योग गुरू रामदेव का आंदोलन रहा हो अथवा अन्ना का अभियान, सरकार व कांग्रेस की तरफ से जिस तरह की प्रतिक्रिया व बयानबाजी की गई वह उसकी हताशा व अवसाद को बखूबी स्पष्ट करती है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की असफलता के साथ साथ राहुल गांधी का औंधे मुंह गिरना और उसके बाद एक और बड़े राज्य आन्ध्र प्रदेश में सूपड़ा साफ होना कांग्रेस और सोनिया गांधी की हताशा के ऊपर और कई मन का बोझ बढ़ा गया। रही सही कसर गुजरात में कांग्रेस की हार ने पूरी कर दी है। निश्चित रूप से इन असफलताओं में कांग्रेस नीत केंद्र सरकार के काले इतिहास का बहुत बड़ा योगदान है।

पिछले दो वर्षों में अन्ना हजारे द्वारा लोकपाल बिल पास करने के लिए चलाया जाने वाला अभियान हो या फिर बाबा रामदेव की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साईट्स की मदद से तेजी से आगे बढ़ी और फ़ैली। अगर ये कहा जाए कि सोशल नेटवर्किंग साइटस ने ही इन आंदोलनों की आग को फैलाया तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। समस्त विश्व में पिछले एक दशक में  इन्टरनेट विरोध या असहमति दर्ज कराने के एक नए प्लेटफॉर्म के रूप में उभरा है। इसे दुर्भाग्य कहा जाए या भ्रष्ट मानसिकता का दुराग्रह कि सत्तासीन अपने इन पापों को स्वीकारने व सुधारने के स्थान पर सतत सीनाजोरी का रास्ता अपनाए हुए हैं! इसी दुराग्रह के चलते सरकार अन्ना के विरुद्ध भद्दी बयानबाजी और रामदेव पर सस्ते आरोप लगाकर अपनी साख बचाने का बचकाना प्रयास करती रही है और अब उसी बचकानी सोच का परिणाम है कि सरकार सोशल नेटवर्किंग साइट्स को नियंत्रित करने का प्रयास कर रही है। गूगल सहित फेसबुक व ट्विटर जैसी वेबसाइट्स से सरकार लंबे समय से आमने-सामने की स्थिति में है।

 

लोकतन्त्र में यदि सरकार सच को स्वीकारने की अपनी अक्षमता के चलते अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के हनन की सीमा तक पहुंच जाए तो यह स्वयंसिद्ध हो जाता है कि सरकार लोकतान्त्रिक व्यवस्था में पूर्णत: असफल हो चुकी है। ऐसी सरकार को लोकतान्त्रिक व्यवस्था में बने रहने का नैतिक अधिकार ही नहीं रह जाता है। 1975 के आपातकाल के बाद आज पुन: एक बार सरकार यदि उस स्थिति में नहीं तो उस मनोदशा में अवश्य पहुंच गई है। फिनलैंड ने विश्व के सभी देशों के समक्ष एक उदहारण पेश करते हुए इन्टरनेट को मूलभूत कानूनी अधिकार में शामिल कर लिया। वहीं विश्व के सबसे बड़े और सफल लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले हमारे राष्ट्र में नकारा और निकम्मी सरकारें अपनी नाकामियां, असफलताओं, लचर कार्यप्रणाली, लालफीताशाही, भ्रष्टाचार और कमियों को ढकने के लिए आम आदमी की आवाज को दबाने का जो कुचक्र रच रही हैं वो किसी भी दृष्टि से स्वस्थ प्रजातंत्र का लक्षण नहीं है वहीं यह संविधानप्रदत्त मौलिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन भी है। अगर सरकार आम आदमी की आवाज दबाने की बजाय उसे सुनने और समझने का प्रयास करे तो देश की दशा और दिशा बदल सकती है। अदम गोंडवी का  शेर इस हालात के माकूल है-

 

ताला लगा के आप हमारी ज़बान को,
कैदी न रख सकेंगे ज़ेहन की उड़ान को।

Wednesday, January 9, 2013

ऐसी धमकी तो कभी लादेन ने भी नहीं दी

 - सुन, शैतान की औलाद!

 

ऐसी धमकी तो कभी लादेन ने भी नहीं दी
अकबरुद्दीन ओवैसी के बयान पर इन पालतू राष्ट्रवादी मुसलमानों तक की बकार भी नहीं फूटी। किसी अन्य शीर्ष नेता ने भी आज दिन तक ओवैसी पर कड़ी कार्रवाई की मांग नहीं की है। किसी बुद्धिजीवी, पत्रकार और सेकुलर नेता ने यह जानने की जहमत भी नहीं उठाई है कि ओवैसी के पास आखिर कौन सा ऐसा हथियार है जिससे वह १०० करोड़ हिंदुओं के खात्मे की वल्गना कर रहा है? कहीं ओवैसी को पाकिस्तानी इस्लामी परमाणु बम हाथ तो नहीं लग गया? ओवैसी जितनी बड़ी धमकी दे रहा है उतनी बड़ी धमकी तो कभी ओसामा बिन लादेन ने भी नहीं दी। जुल्फिकार अली भुट्टो दशकों तक हिंदुस्तान से लड़ने का दंभ भरा करते थे तो उनकी बेटी बेनजीर भुट्टो सदियों तक हिंदुस्तान से लड़ने का पाकिस्तानी हौसला बयान किया करती थी, पर उन दोनों ने भी कभी १०० करोड़ हिंदुओं के खात्मे का बड़बोलापन नहीं किया। फिर ओवैसी के इतने जबर्दस्त विध्वंसक बयान पर भी सेकुलरवाद के रखवाले गूंगे-बहरे क्यों बने रहे? ‘सहमत’ और शबाना आजमी का एक बयान जरूर आया पर उसमें भी औपचारिक विरोध के अलावा कुछ नजर नहीं आता।

 

ओवैसी को हल्के में लिया तो पछताओगे
आंध्रप्रदेश की पुलिस ने तो ओवैसी के इस बयान पर एक साधारण एफआईआर दर्ज करना भी जरूरी नहीं माना और उनकी कलम तब उठी जब अदालत ने निर्देश दिया। गुजरात दंगों में मुस्लिमों की मौत के लिए दुनिया की कोई भी अदालत न्याय के मान्य मापदंड पर नरेंद्र मोदी को दोषी नहीं ठहरा सकती, फिर भी सिर्फ यूरोप-अरब-अमेरिका प्रायोजित एनजीओ बिरादरी के बखेड़े पर मोदी को यूरोप और अमेरिका मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर विराजमान होने के बावजूद वीसा देने से इंकार करते हैं। ओवैसी को इतने घातक बयान के बाद भी ब्रिटेन का वीसा मिलने और लंदन यात्रा करने में कोई दिक्कत नहीं आती। इस राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय ढोंग का क्या औचित्य? क्या ओवैसी के बयान को हलके में लिया जा सकता है? ओवैसी जिस आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन का विधायक है उसकी पृष्ठभूमि जानने वाला कोई भी जानकार उसके बयान को हलके में लेने की सलाह नहीं देगा। मुस्लिम अलगाववाद का सऊदी अरेबिया और पाकिस्तान प्रायोजित जो ब्लू प्रिंट है उसका अंतिम चरण दक्षिणी हिंदुस्थान का इस्लामी अलगाववाद है। इस्लामी अलगाववाद का पहला चरण कश्मीर, दूसरा चरण असम समेत पूर्वोत्तर, तीसरा चरण हिंदुस्थान के प्रमुख शहरों को निशाना बनाना तथा अंतिम चरण हैदराबाद को केंद्र में रख दक्षिणी हिंदुस्थान में अलगाववादी ताकतों को बढ़ावा देना है।

 

हैदराबाद हो पाकिस्तान का हिस्सा...
इस्लामी आतंकवाद का कश्मीर को हिंदुस्थान से अलग करने का प्रयास १९४७ से जारी है। १९६० के दशक से लगातार पूर्वोत्तर हिंदुस्थान में मुस्लिम आबादी बढ़ाकर असम को लीलने का प्रयास चल रहा है। १९८० के बाद से दर्जनों बार असम में स्थानाrय असमी आबादी और बांग्लादेशी मुसलमानों के बीच टकराव हो चुका है। बीते वर्ष जब बोडो जनजाति और बांग्लादेशी मुसलमानों के बीच संघर्ष व्यापक हुआ था तब मुंबई, बैंगलोर समेत तमाम शहरों में मुसलमानों ने किस तरह पूर्वोत्तर वासियों को धमकाया यह पूरा देश हताश होकर देख रहा था। १९९० के दशक से ऑपरेशन के-२ के माध्यम से इस्लामी अलगाववादी देश के तमाम शहरों में निर्दोष हिंदुओं का खून बहाते रहे हैं। हुजी, लश्कर-ए-तोयबा, इंडियन मुजाहिदीन, हरकत-उल-अंसार जैसी दर्जनों तंजीमे हिंदुस्थान में ग्रीन कॉरिडोर (हरा गलियारा) बनाने में जुटी रही हैंै। शायद ही कोई प्रमुख शहर बचा हो जहां इस्लामी आतंकवाद का पंजा नजर न आया हो। अब मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एमआईएम) के विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी का बयान संकेत दे रहा है कि मुस्लिम अलगाववाद अपने चौथे यानी अंतिम चरण में पहुंचने को है। १९४७ के पहले जिन इलाकों से पाकिस्तान समर्थक बांग लगी थी उसमें हैदराबाद प्रमुख था। हैदराबाद को पाकिस्तान का हिस्सा बनाने की मांग के लिए ही एमआईएम गठित हुई थी। ज्ञात इतिहास के अनुसार १९२७ में निजाम का समर्थन करने के लिए नवाब मीर उस्मान अली खान की सलाह पर महमूद नवाज खान किलेदार गोलकुंडा ने एमआईएम का गठन किया था। इसकी पहली बैठक नवाब महमूद नवाज खान के घर ‘तौहीद मंजिल’ में हुई थी जिसमें पहला ही प्रस्ताव यही था कि एमआईएम को किसी भी सूरत में हैदराबाद को हिंदुस्थान का हिस्सा बनने से रोकना है।

 

...तब कासिम राजवी दुम दबाकर भागा
पाकिस्तान की मांग १९३० के दशक में हुई, एमआईएम उसके पहले से अलगाववाद की पैरोकार रही है। १९३८ में बहादुर यार जंग एमआईएम का सदर बना तो उसने मुस्लिम लीग के साथ सियासी समीकरण बैठा लिया। २६ दिसंबर १९४३ को लाहौर के मुस्लिम लीग सम्मेलन में इसी नवाब बहादुर यार जंग ने पाकिस्तान के समर्थन में सबसे आक्रामक भाषण दिया था। एमआईएम ने आजादी के पहले हैदराबाद से हिंदुओं के सफाए के लिए डेढ़ लाख रजाकारों की फौज तैयार की थी। हैदराबाद स्टेट में तब महाराष्ट्र का वर्तमान मराठवाड़ा भी हिस्सा था। हैदराबाद स्टेट के तत्कालीन प्रधानमंत्री मीर लाइक अली की सलाह पर तब कासिम राजवी नामक वकील को रजाकारों की सेना का मुखिया बनाया गया था। जब १९४८ में रजाकारों ने हिंदुओं का कत्लेआम शुरू किया तब भी पं. जवाहर लाल नेहरू मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति के चलते हिंदुओं का खूनखराबा रजाकारों के हाथ चुपचाप देखते रहे। उन दिनों सरदार वल्लभभाई पटेल देश के गृहमंत्री थे, उन्होंने नेहरू को फटकारा और सेना और पुलिस के संयुक्त अभियान के तहत ‘ऑपरेशन पोलो’ का आदेश दिया। हिंदू जनता पहले से ही रजाकारों की बर्बरता से लड़ने को तैयार थी। जब रजाकार चुन-चुन कर काटे जाने लगे तब मुस्लिम अलगाववादियों का दिमाग ठिकाने पर आया और निजाम भी आत्मसमर्पण को मजबूर हुआ। रजाकारों के मुखिया कासिम राजवी को जेल में ठूंस दिया गया। जब उसने अपने गुनाहों से तौबा कर लिया तब उसे १९५७ में पाकिस्तान जाने की शर्त पर जेल से रिहा किया गया। राजवी के दुम दबाकर भागने के बाद एमआईएम ठंडी पड़ गई। उसका नियंत्रण अब्दुल वाहिद ओवैसी के हाथ आ गया।

 

ये है ओवैसी का अतीत...
अब्दुल वाहिद ओवैसी स्वयंभू सालार-ए-मिल्लत (कौम का कमांडर) कहलाता था। १९६० में उसने हैदराबाद महापालिका का चुनाव जीता। १९६२ में अब्दुल वाहिद ओवैसी का बेटा सुलतान सलाहुद्दीन ओवैसी पथरघट्टी विधानसभा सीट जीतकर आंध्र प्रदेश विधानसभा पहुंचा। १९६७ में वह चारमीनार से और १९७२ में यकूतपुरा से विधानसभा पहुंचा। १९७४-७५ में सुलतान सलाहुद्दीन ओवैसी एमआईएम का सर्वेसर्वा बन गया। १९८४ में सुल्तान सलाहुद्दीन ओवैसी पहली बार हैदराबाद से लोकसभा चुनाव जीतने में कामयाब हुआ तब से २००४ तक वह लगातार सांसद रहा। २००४ में उसने अपनी जगह अपने बेटे असदुद्दीन ओवैसी को हैदराबाद से लोकसभा प्रत्याशी बनाया। २९ सितंबर २००८ को सुलतान सलाहुद्दीन के इंतकाल के बाद उसका बड़ा बेटा असदुद्दीन एमआईएम का प्रमुख बन गया। १९९० के दशक में एमआईएम में फूट पड़ी थी। ओवैसी परिवार के खिलाफ एमआईएम के चंद्रगुट्टा के विधायक अमानुल्ला खान ने बगावत कर दी तो १९९९ में अकबरुद्दीन ओवैसी को उसके खिलाफ उतार कर ओवैसी परिवार ने उसे परास्त किया था। हैदराबाद की महापालिका पर भी एमआईएम का कब्जा है और हैदराबाद का महापौर एमआईएम का मोहम्मद माजिद हुसैन है। एमआईएम की दहशत के चलते बीते कई वर्षों से हैदराबाद में रामनवमी के जुलूस को राज्य सरकार अनुमति नहीं दे रही। चारमीनार के निकट भाग्यलक्ष्मी मंदिर जो कि ३०० साल पुराना ऐतिहासिक मंदिर है और जिसके नाम पर हैदराबाद पहले भाग्यनगर के रूप में जाना जाता था, के गुबंद का निर्माण रोका गया।

 

औवेसी के सामने कांग्रेस भीगी बिल्ली!
आंध्रप्रदेश विधानसभा में एमआईएम के केवल ७ विधायक हैं पर उनकी दबंगई से कांग्रेस की सरकार कांपती है। अकबरुद्दीन ओवैसी माफिया गतिविधियों और हिंदूद्रोही वक्तव्यों के लिए कुख्यात है। २००७ में इसी अकबरुद्दीन ने ऐलान किया था कि यदि सलमान रश्दी या तस्लीमा नसरीन कभी हैदराबाद आए तो वह उनके सिर कलम कर लेगा। तस्लीमा नसरीन पर एमआईएम के कार्यकर्ताओं ने हमले की योजना भी बनाई थी, पर आज दिन तक आंध्र की कांग्रेस सरकार ने अकबरुद्दीन के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। २०११ में कुरनूल में एमआईएम की एक रैली में इसी अकबरुद्दीन ने आंध्र के विधायकों को काफिर तथा आंध्र की विधानसभा को कुप्रâस्तान कह कर अपमानित किया था, पर किसी आंध्र के विधायक ने अकबरुद्दीन पर विशेषाधिकार हनन का मामला चलाने की भी हिम्मत नहीं जुटाई। इसी रैली में उसने पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंहराव को कातिल, दरिंदा, बेईमान, धोखेबाज और चोर जैसी गालियां देकर कहा था -‘अगर राव मरा नहीं होता तो मैं उसे अपने हाथों से मार डालता।’ अप्रैल २०१२ में अकबरुद्दीन ने हरामीपने की हद पार करते हुए हिंदुओं के प्रभु राम और उनकी मां कौशल्या के लिए ऐसे अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया जिसे सुनकर उस सूअर के पिल्ले की खाल खींच लेना ही एकमेव दंड बचता है।

 

अगस्त २०१२ में इसी अकबरुद्दीन ओवैसी ने आंध्र पुलिस को ‘हिजड़ों की फौज’ करार दिया था, तब भी इस ‘लंडूरे’ के खिलाफ आंध्र पुलिस का आत्म सम्मान नहीं जागृत हुआ। उस समय भी ओवैसी ने चुनौती दी थी कि पुलिस और हिंदुओं में मुसलमानों से लड़ने की ताकत नहीं। बीते माह ८ दिसंबर २०१२ को इसी हरामपिल्ले ने फिर जहर उगला- ‘यह भाग्यलक्ष्मी कौन है और वहां बैठ कर क्या कर रही है? यह हिंदुओं का नया देवता कौन है, मैंने तो इसका नाम पहले कभी नहीं सुना। इतनी जोर से नारा लगाओ कि उनका भाग्य कांप जाए और लक्ष्मी गिर पड़े।’ अकबरुद्दीन ने जब यह हरामपंथी वाला बयान दिया तब मुस्लिमों की उन्मादी भीड़ ने ‘अल्लाह ओ अकबर’ का गगनभेदी नारा लगाया। उसके बाद उसने २४ दिसंबर को आदिलाबाद में हजारों मुसलमानों की मौजूदगी में १०० करोड़ हिंदुओं के १५ मिनट में खात्मे की कूवत का ऐलान किया। नरेंद्र मोदी को फांसी पर लटकाने की मांग की। सरकार मुस्लिम वोट बैंक के लिए चुप्पी साधे पड़ी है। सरकार हिंदुओं के सहनशीलता का इम्तहान ले रही है। यदि अकबरुद्दीन पर कार्रवाई नहीं हुई और हिंदुओं का माथा भड़का तो उसकी ऐसी दुर्दशा होगी कि उसके पूर्वज भी कब्र से निकल कर अपने गुनाहों के लिए तौबा करेंगे।

हिंदुस्तान की कसाबों की फेकटरी- (एइएमइएम) लगभग 80 वर्ष पुराना संगठन - ओवेशी का इतिहास

▐ हिंदुस्तान की कसाबों की फेकटरी डालनेवला ओवेशी का इतिहास ♠

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एइएमइएम) लगभग 80 वर्ष पुराना संगठन है जिसकी शुरुआत एक धार्मिक और सामाजिक संस्था के रूप में हुई थी लेकिन बाद में वो एक ऐसी राजनैतिक शक्ति बन गई जिस का नाम हैदराबाद के इतिहास का एक अटूट हिस्सा बन गया है.

ƪJugal Eguru

▐ हिंदुस्तान की कसाबों की फेकटरी डालनेवला ओवेशी का इतिहास ♠
भाग-1 ..... © Jugal Eguru™
[सोर्स बीबीसी- विकिपेडिया - डबल्यूएसजे - ब्रिटिश लाइब्रेरी आर्काइव्स]

▐ जिसकी शुरुआत एक धार्मिक और सामाजिक संस्था के रूप में हुई थी वो है ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एइएमइएम) लगभग 80 वर्ष पुराना संगठन है ! लेकिन बाद में वो एक ऐसी पोलिटिकल पावर बन गई जिस नाम का हैदराबाद के इतिहास गवाह है.

▐1928 म...ें नवाब महमूद नवाज़ खान के हाथों स्थापना से लेकर 1948 तक जबकि यह संगठन हैदराबाद को एक अलग मुस्लिम राज्य बनाए रखने की वकालत करता था. सरदार पटेल को सैनी बल इसी लिए इस्तेमाल करना पड़ा था ! और उस निझाम का बेकिंग बनके येही सब खड़े थे ! उस पर 1948 में हैदराबाद राज्य के भारत में विलय के बाद भारत सरकार ने प्रतिबन्ध लगा दिया था.

▐ 1957 में इस पार्टी बनके शुरू हुआ तब नाम में "ऑल इंडिया" जोड़ा और साथ ही अपने संविधान को बदला. कासिम राजवी ने, जो हैदराबाद राज्य के विरुद्ध भारत सरकार की कारवाई के समय मजलिस के अध्यक्ष थे और गिरफ्तार कर लिए गए थे, कासिम राजवी पाकिस्तान चले जाने से पहले इस पार्टी की बागडोर उस समय के एक मशहूर वकील अब्दुल वहाद ओवैसी के हवाले कर गए थे.

▐ 50 सालो मे धीरे धीरे कॉंग्रेस की तरह पारिवारिक परंपरा रूप .... इस संगठन पर ओवेशी परिवार हावी हो गया है !अब्दुल वाहेद के बाद सलाहुद्दीन ओवैसी उसके अध्यक्ष बने और अब उनके पुत्र असदुद्दीन ओवैसी उस के अध्यक्ष और सांसद हैं जब उनके छोटे भाई अकबरुद्दीन ओवैसी विधान सभा में पार्टी के नेता हैं. विधान सभा में उस के सदस्यों की संख्या बढ़ कर 7 हो गई है, विधान परिषद में उस के दो सदस्य हैं. हैदराबाद लोक सभा की सीट पर 1984 से उसी का कब्ज़ा है और इस समय हैदराबाद के मेयर भी इसी पार्टी के है.

▐ एइएमइएम को आम तौर पर मुस्लिम राजनैतिक संगठन या मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधि के रूप में देखा जाता है और हैदराबाद के मुसलमान बड़ी हद तक इसी पार्टी का समर्थन करते रहे हैं हालांकि खुद समुदाय के अन्दर से कई बार उस के विरुद्ध भी हुए है. जहाँ तक ओवैसी परिवार का सवाल है उस के हाथ में पार्टी की बाग़ डोर उस समय आई जब 1957 में इस संगठन पर से प्रतिबंध हटाया गया.

▐ पोलिटिकल पावर के साथ साथ ओवैसी परिवार के साधन और संपत्ति में भी ज़बरदस्त वृद्धि हुई है जिसमें एक मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज, कई दूसरे कालेज और दो अस्पताल भी शामिल हैं ! जो बिना कॉंग्रेस की रहमो नजर और मुस्लिम ब्रदरहुड नामक फंडिंग संस्था पोसिबल ही नहीं था !
▬ जिस तरह पाकिस्तान मे सोशियल मीडिया गरम है ....! इस की गिरफतारी को लेकर की " भाई को पुलिस हाथ तो नहीं लगाएगी ना ? भाई को गिरफ्तार कर के अब ये ******* क्या करेंगे आगे ? " तो इस हिसाब से वहा का पैसा और दाऊद की अमीरीयत के जलवे भी हो शकते है !

▐ पहला चुनाव जीते 1960 में - सलाहुद्दीन ओवैसी हैदराबाद नगर पालिका के लिए चुने गए और फिर दो वर्ष बाद वो विधान सभा के सदस्य बने तब से मजलिस की शक्ति लगातार बढती गई..... और आज यहाँ तक जा पहुंचे है की लगाने को कसाब पे लगाई देशद्रोह की कार्यवाही भी चल शक्ति है पर ....
कानून = कॉंग्रेस ...................

इस परिवार और मजलिस के नेताओं पर यह आरोप लगते रहे हैं की वो अपने भड़काओ भाषणों से हैदराबाद में साम्प्रदायिक तनाव को बढ़ावा देते रहे हैं. लेकिन दूसरी और मजलिस के समर्थक उसे भारतीय जनता पार्टी और दूसरे हिन्दू संगठनों का जवाब देने वाली शक्ति के रूप में देखते हैं.

राजनैतिक शक्ति के साथ साथ ओवैसी परिवार के साधन और संपत्ति में भी ज़बरदस्त वृद्धि हुई है जिसमें एक मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज, कई दूसरे कालेज और दो अस्पताल भी शामिल हैं.

एइएमइएम ने अपनी पहली चुनावी जीत 1960 में दर्ज की जब की सलाहुद्दीन ओवैसी हैदराबाद नगर पालिका के लिए चुने गए और फिर दो वर्ष बाद वो विधान सभा के सदस्य बने तब से मजलिस की शक्ति लगातार बढती गई.

सांप्रदायिकता का आरोप

बढ़ती हुई लोकप्रियता के साथ साथ सलाहुद्दीन ओवैसी "सलार-ए-मिल्लत" (मुसलमानों के नेता) के नाम से मशहूर हुए. वर्ष 1984 में वो पहली बार हैदराबाद से लोक सभा के लिए चुने गए साथ ही विधान सभा में भी उस के सदस्यों की संख्या बढती गई हालाँकि कई बार इस पार्टी पर एक सांप्रदायिक दल होने के आरोप लगे लेकिन आंध्र प्रदेश की बड़ी राजनैतिक पार्टिया कांग्रेस और तेलुगुदेसम दोनों ने अलग अलग समय पर उससे गठबंधन बनाए रखा.

दिलचस्प बात यह है की हैदराबाद नगरपालिका में यह गठबंधन अभी भी जारी है और कांग्रेस के समर्थन से ही मजलिस को मेयर का पद मिला है.

 मजलिस के नेता अकबरुद्दीन ओवैसी की गिरफ़्तारी के विरुद्ध हैदराबाद में बंद का एक दृश्य

मजलिस के नेता अकबरुद्दीन ओवैसी की गिरफ़्तारी के विरुद्ध हैदराबाद में बंद का एक दृश्य

2009 के चुनाव में एइएमइएम ने विधान सभा की सात सीटें जीतीं जो की उसे अपने इतिहास में मिलने वाली सब से ज्यादा सीटें थीं. कांग्रेस के साथ उस की लगभग 12 वर्ष से चली आ रही दोस्ती में दो महीने पहले उस समय अचानक दरार पड़ गई जब चारमीनार के निकट एक मंदिर के निर्माण के विषय ने एक विस्फोटक मोड़ ले लिया.

मजलिस ने कांग्रेस सरकार पर मुस्लिम-विरोधी नीतियां अपनाने का आरोप लगाया और उस से अपना समर्थन वापस ले लिया. अकबरुद्दीन ओवैसी के तथाकथित भाषण को लेकर जो हंगामा खड़ा हुआ है और जिस तरह उन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज गया है उसे कांग्रेस और मजलिस के टकराव के परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है.

अधिकतर हैदराबाद तक सीमित मजलिस अब अपना प्रभाव आंध्र प्रदेश के दूसरे जिलों और पडोसी राज्यों महाराष्ट्र और कर्नाटक तक फैलाने की कोशिश कर रही है.

हाल ही में उस ने महाराष्ट्र के नांदेड़ नगर पालिका में 11 सीटें जीत कर हलचल मचा दी है. आंध्र प्रदेश में कांग्रेस इस संभावना से परेशान है कि 2014 के चुनाव में एइएमइएम जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस के साथ हाथ मिला सकती है. अकबरुद्दीन ओवैसी की गिरफ्तारी के बाद तो मजलिस और कांग्रेस के बीच किसी समझौते की सम्भावना नहीं रह गई.

Thursday, December 20, 2012

केजरीवाल के प्रत्यक्ष लोकतंत्र के खतरे

केजरीवाल के प्रत्यक्ष लोकतंत्र के खतरे

 

केजरीवाल के प्रत्यक्ष लोकतंत्र के खतरे - India Real Time Hindi - WSJ

स्विटज़रलैंड अंतर्राष्ट्रीय रेड क्रॉस और घोर मानवाधिकार हनन के खिलाफ जिनेवा सम्मेलन का जन्मस्थान है। इस देश को धार्मिक सहिष्णुता का गढ़ माना जाता है। इसके बावजूद 2009 में, स्विटज़रलैंड ने नागरिकों के जनमत के आधार पर मस्जिदों की मीनारों पर राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध लगाया। क्योंकि स्विटज़रलैंड एक ऐसा देश है, जिसने प्रत्यक्ष लोकतंत्र को अपनाया है, लिहाज़ा जनमत का फैसला वहां का कानून बन गया।

इस कानून को धार्मिक स्वतंत्रता पर कुठाराघात कहकर व्यापक तौर पर निंदा की गई। यूरोप और मध्य एशिया में एमनेस्टी इंटरनेशनल के उप-कार्यक्रम निदेशक डेविड डियाज़-जॉगिक्स ने टिप्पणी की: “स्विटज़रलैंड एक ऐसा देश है, जहां धार्मिक सहिष्णुता की लंबी परंपरा रही है और जहां सताए हुए लोगों को शरण देने का प्रावधान है, ऐसा देश इस विकृत विभेदकारी प्रस्ताव का अनुमोदन करे, ये चौंकानेवाले है।”

फ्रेंच दैनिक ‘लिबरेशन’ के एक रिपोर्टर जीन क्वाट्रेमेर ने उपयुक्त ढंग से मीनारों पर प्रतिबंध और प्रत्यक्ष लोकतंत्र के खतरे के बीच संबंधों का खाका ये कहते हुए खींचा: “एक बार फिर, प्रत्यक्ष लोकतंत्र ने साबित किया है कि इसकी प्रकृति काफी खतरनाक है। लोगों को दूसरों से खतरों को ज़ाहिर करने की दी गई स्वीकृति, तर्कों को तिलांजलि देना और अल्पावधि-हितों पर फोकस करना, निश्चित तौर पर जनमत संग्रह सभी तरह के जनोत्तेजकों के हाथों में एक खतरनाक यंत्र है। ये समझना आसान है कि क्यों कई लोकंतात्रिक देशों ने इसे सीधे तौर पर गैरकानूनी बनाया है।”

भारत उन कई देशों में है, जिन्होंने प्रत्यक्ष लोकतंत्र को नहीं अपनाया। हम प्रतिनिधित्व पर आधारित एक लोकतंत्र हैं, जहां लोग अपने लिए कानून और नीतियां बनाने हेतु प्रतिनिधियों को चुनते हैं। हालांकि, पिछले दो-एक सालों से, अरविंद केजरीवाल और उनके समर्थक स्विस-सरीखे प्रत्यक्ष लोकतंत्र की ज़ोर-शोर से वकालत कर रहे हैं। श्री केजरीवाल दावा करते हैं कि प्रत्यक्ष कानून निर्माण विशेष हितों की हिफाज़त करने वाले कृतज्ञ भ्रष्ट राजनेताओं को दरकिनार करने की स्वीकृति प्रदान कर नागरिकों की सुरक्षा करते हैं।

श्री केजरीवाल ने जनमत संग्रहों और पहलकदमी को प्रस्तुत करने की मांग की है। जनमत संग्रह एक पद्धति है, जहां लोग, प्रत्यक्ष मतों से, नए कानून, नीति अथवा संसद द्वारा पारित मौजूदा कानून को नकारने का फैसला कर सकते हैं। दूसरी तरफ, एक पहलकदमी में नागरिकों का समूह राष्ट्रव्यापी प्रत्यक्ष मत हेतु नया मसौदा प्रस्तुत कर नए कानून अथवा संविधान संशोधन के लिए पहल करता है। हाल ही में, जिस तरीके से बहु-ब्रांड खुदरा में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को मंजूरी देने के लिए संसद में वोटिंग हुई, उसने गुस्से को भड़काया, श्री केजरीवाल ने एक बार फिर इस मुद्दे पर फैसले के लिए संसद में वोटिंग की बजाय राष्ट्रव्यापी जनमत संग्रह पर ज़ोर डाला।

मीनारों पर प्रतिबंध लगाने वाले स्विस जनमत संग्रह के भारत सरीखे देशों में प्रत्यक्ष लोकतंत्र की मांग हेतु गहरे निहितार्थ हैं, जहां कई अल्पसंख्यक गुट हैं। ये दलील दी जा सकती है कि व्यापक भागीदारी, अल्पसंख्यक समूहों को संभावित दमनकारी नीतिगत परिणामों को झेलने के लिए छोड़ती है (जैसे स्विस मीनार प्रतिबंध) जिनका समर्थन बहुसंख्यक आबादी के एक हिस्से (जैसे 50 फीसदी जमा एक वोट) ने किया।

वे अमेरिकन स्टेट्स जिन्होंने प्रत्यक्ष लोकतंत्र को अपनाया और चुनावों को लेकर पहलकदमी के दुर्भाग्यशाली उदाहरण बनाए, इस मुद्दे को स्पष्ट करते हैं। इनमें से कुछ पहलों में शामिल है, हिस्पैनिक्स के लिए बहुभाषी कार्यक्रमों को समाप्त करना, कानून में एक प्रावधान जो समलैंगिकों को बगैर भेदभाव के संरक्षण देता है और अवैध प्रवासियों को स्वास्थ्य, शिक्षा और मेडिकल फायदों जैसी आधारभूत सुविधाओं से वंचित रखना।

शायद, इसी वजह से भारतीय संविधान निर्माता चाहते थे कि कानून चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा बनाए जाएं, हालांकि संविधान सभा के अंतरिम अध्यक्ष, सचिदानंद सिन्हा ने मसौदा तैयार करने वालों के संज्ञान के लिए स्विस संविधान की ओर भी ध्यानाकर्षण दिलाया।

संविधान निर्माताओं ने इसकी बजाय यूएस संविधान, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया के राष्ट्रमंडल मॉडलों और ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था पर ज्यादा भरोसा किया। उन्होंने भारत के राष्ट्रपति के चुनाव और संविधान संशोधन के मामले में राष्ट्रव्यापी जनमत संग्रह के विचार को खारिज कर दिया।

संविधान ने जिस सरकार को ढांचागत किया वो सत्ता के प्रसार के ज़रिए प्रजा पीढ़क शासन को रोकने की कोशिश थी। इसलिए उदाहरणस्वरूप, इसकी तीन शाखाओं की प्रबंधकीय, संसदीय और न्यायिक शक्तियां पृथक हैं। संविधान ने संघवाद के ज़रिए शक्ति को छितरा दिया: ऐसा उसने केन्द्र और राज्यों के बीच सत्ता का विभाजन करके किया। ये संतुलन प्रत्यक्ष लोकतंत्र में गायब है। विभाजित-शक्ति व्यवस्था जो विचार-विमर्श और अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व, अल्पसंख्यक अधिकारों को बढ़ावा देती है, प्रतिनिधि की रोकटोक के बगैर जोखिमपूर्ण होती है।

हालांकि, ऐसा नहीं कहा जा सकता, भारत में प्रत्यक्ष लोकतंत्र की संपूर्ण मांगें औचित्यहीन हैं। मशहूर राजनीतिक विज्ञानी येहेज़केल ड्रॉर ने अन्वेषण किया कि प्रत्यक्ष लोकतंत्र छोटे समुदायों में अपेक्षाकृत अच्छा कर सकता है, जहां लोगों के ज्यादातर मुद्दों पर व्यक्तिगत अनुभव होते हैं, ये देखते हुए कि ये एक उपयुक्त विचारक प्रक्रिया और जटिल मुद्दों की पेशेवर व्याख्या के साथ संयोजित किया जाता है। जीन-जैक्स रूसो भी प्रत्यक्ष लोकतंत्र के हिमायती थे, लेकिन एक बार फिर छोटे प्रांतों के लिए।

प्रत्यक्ष लोकतंत्र सरकार का एक शक्तिशाली प्रकार है, जहां प्रत्येक नागरिक नामित छोटे इलाके में वार्तालाप में सहयोग देने की क्षमता (और इच्छाशक्ति) रखता हो। कुछ हद तक, अल्पसंख्यक दमन की चिंताएं प्रत्यक्ष लोकतंत्र में निहित होती हैं, जो प्रमुख तौर पर तब कम होती हैं, जब ये स्थानीय स्तर पर हर किसी मामले में लागू की जाती हैं, जैसे स्वास्थ्य, साफ-सफाई और आधारभूत सेवाओं का प्रावधान। छोटे क्षेत्रों में, पूरा समुदाय एकत्र हो सकता है और सक्रिय तौर पर अपने प्रतिदिन के क्रियाकलाप से जुड़े मुद्दों पर चर्चा कर सकता है।

इसे समझते हुए, संविधान निर्माताओं ने संविधान के अनुच्छेद 40 का मसौदा तैयार किया, जो राज्यों के लिए चुने गए प्रतिनिधियों वाली ग्राम पंचायतों की स्थापना ज़रूरी बनाता है और उन्हें आत्म-शासन की एक इकाई के तौर पर शक्ति भी प्रदान करता है। इससे आगे, संविधान के 73वें और 74वें संशोधनों के अंतर्गत ग्राम सभाओं और पंचायतों का गठन, प्रोफेसर ड्रॉर और रूसो द्वारा प्रतिपादित प्रत्यक्ष लोकतंत्र के सम्मोहक उदाहरण हैं।

2008 का मॉडल नगर राज बिल शहरों में ग्राम सभाओं के अनुरूप इकाईयां बनाने की बात करता है। ये बिल जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण मिशन के तहत जरूरी सुधार है, जिसका अर्थ हुआ, राज्यों को जेएनयूआरएम कार्यक्रम के तहत फंडिग की पात्रता के लिए बिल-आधारित समुदाय-सहभागी कानून बनाना अनिवार्य है।

श्री केजरीवाल और उनकी नई राजनीतिक पार्टी दुर्लभ और शायद विचित्र भी है, जो कई राजनीतिक दलों की विषमता दिखाती है, जिनकी मुख्य समस्या नए विचारों का अभाव, गहरी जातिगत-राजनीति और भ्रष्टाचार है। भारतीय राजनीति में खलबली के वक्त, श्री केजरीवाल खेल से दूर पर महत्वपूर्ण खिलाड़ी हैं। जैसा प्रताप भानु मेहता ने हाल ही में इंगित किया, विकेन्द्रीकरण को लेकर श्री केजरीवाल की तत्परता चाह जगाने वाली है। हालांकि, उन्हें असंवैधानिक राष्ट्रव्यापी जनमत संग्रह के शब्दाडंबरों को छोड़कर संवैधानिक तरीकों पर चलना चाहिए। शुरुआत में, वो सभी राज्यों से मॉडल नगर राज बिल के तुरंत कार्यान्वयन की जरूरत पर ज्यादा बात कर सकते हैं, जो शहरी परिषदों के गठन की बात करता है।

-करण सिंह त्यागी पेरिस की एक कानून फर्म में एक एसोसिएट एटॉर्नी हैं। वे हारवर्ड लॉ स्कूल से एलएलएम कार्यक्रम में स्नातक हैं।

-इंडिया रियल टाइम को ट्वीटर @indiarealtime पर फॉलो कीजिए।

Thursday, December 13, 2012

भारत के लिये क्‍यों महत्‍वपूर्ण है सर क्रीक ?

भारत के लिये क्‍यों महत्‍वपूर्ण है सर क्रीक ?

 

Sir Creek
गुजरात के कच्‍छ की समुद्री सीमा पर स्थित 650 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र सर क्रीक अचानक सुर्खियों में आ गया है। इस मुद्दे को उठाया है गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी ने और दबाने की कोशिश कर रही है केंद्र की सत्‍ताधारी पार्टी कांग्रेस। देश की सुरक्षा से जुड़े इस संवेदनशील मामले की गहराई में जाने से पहले हम आपको सैर कराना चाहेंगे सरक्रीक की।

 

आये दिन अखबारों में आप पाकिस्‍तानी रेंजरों द्वारा भारतीय मछुवारों को पकड़ने की और भारतीय रेंजरों द्वारा पाक मछुवारों के पकड़े जाने की खबरें पढ़ते रहते होंगे। असल में दोनों देशों के गरीब मछुवारे भी आज तक इस समुद्री सीमा को लेकर कंफ्यूज्‍ड हैं। सर क्रीक 650 वर्ग किलोमीटर का भारत का वो समुद्री इलाका है, जिस पर पाकिस्‍तान अपना दावा करता है।

इतिहास के पन्‍ने पलटें तो भारत में ईस्‍ट इंडिया कंपनी के शासन के दौरान चार्ल्‍स नैपियर ने 1842 में सिंध पर जीत हासिल की और उसे बंबई राज्‍य को सौंप दिया। उसके बाद सिंध में शासन कर रही सरकार ने सिंध और बंबई के बीच सीमारेखा खींचने का निर्णय लिया, जो कच्‍छ से गुजरती थी। उस निर्णय के अंतर्गत सरक्रीक खाड़ी को सिंध प्रांत में दर्शाया गया।

जबकि दिल्‍ली में शासन कर रही अंग्रेज सरकार के नक्‍शे में इसे भारत में दर्शाया गया। विवाद हुआ और फाइलों में दब गया। लेकिन स्‍वतंत्रता के बाद जब दोनों देशों के बीच बंटवारा हुआ तो पाकिस्‍तान ने सरक्रीक खाड़ी पर अपना मालिकाना हक जता दिया। इस पर भारत ने एक प्रस्‍ताव तैयार किया जिसमें समुद्र में कच्‍छ के एक सिरे से दूसरे सिरे तक सीधी रेखा खींची और कहा कि इसे ही सीमारेखा मान लेनी चाहिये। यह प्रस्‍ताव पाकिस्‍तान ने ठुकरा दिया, क्‍योंकि इसमें 90 फीसदी हिस्‍सा भारत को मिल रहा था। तब से लेकर आज तक दोनों देशों के बीच इस खाड़ी के मालिकाना हक को लेकर विवाद चल रहा है।

केंद्र में हाल ही में क्‍या हुआ

केंद्र सरकार ने हाल ही में सर क्रीक पर पाकिस्‍तान से समझौता करने पर सहमति बना ली है। ऐसी खबर आयी है कि हाल ही में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस पर डील फाइनल करने की चर्चा की। रक्षामंत्री एके एंटनी और तत्‍कालीन वित्‍त मंत्री प्रणब मुखर्जी भी इस पर राजी हो गये। माना जा रहा है कि यूपीए इस मामले को जल्‍द ही पाकिस्‍तान के सामने रख सकती है।

नरेंद्र मोदी क्‍यों कर रहे हैं विरोध

यूपीए की इस योजना के बारे में पता चलने पर नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा। पत्र में यह मांग की है कि सरक्रीक का 10 फीसदी हिस्‍सा पाकिस्‍तान को दे दिया जाये और बाकी भारत में रहने दिया जाये। यदि इससे कम पर समझौता हुआ तो देश की सुरक्षा में सेंध लग सकती है। उन्‍होंने कहा कि ऐसा होने पर पूरा देश भले ही खुद को सुरक्षित महसूस करे, लेकिन कच्‍छ सुरक्षित कभी नहीं रह पायेगा। मोदी ने कहा कि सरक्रीक में देश की प्राकृतिक संपदा का भंडार है उसे ऐसे पाकिस्‍तान को नहीं दे देनी चाहिये। आर्थिक दृष्टि से देखें तो इस क्षेत्र में भारी मात्रा में कच्‍चा तेल अथवा गैस होने की संभावना है, जो भारतीय अर्थ व्‍यवस्‍था के लिये सकारात्‍मक साबित हो सकता है।

सरक्रीक से जुड़े कुछ अन्‍य तथ्‍य

- सन 2000 में पाकिस्‍तान ने सरक्रीक पर भारी संख्‍या में सैनिकों को तैनात किया था। यानी वहां भी कारगिल जैसे युद्ध की तैयारी थी।
- 1965 के बाद ब्रिटिश पीएम हेरोल्‍ड विल्‍सन के हस्‍तक्षेप के बाद अदालत ने 1968 में फैसला सुनाया था, जिसके अनुसार पाकिस्‍तान को 9000 वर्ग किलोमीटर का मात्र 10 फीसदी हिस्‍सा मिला था।
- पाकिस्‍तान ने सिंध और कच्‍छ के बीच हुए एग्रीमेंट की कुछ तस्‍वीरों के आधार पर क्रीक को सिंध का भाग घोषित कर दिया और एक रेखा खींची जिसे ग्रीन लाइन बाउंड्री कहा।
- भारत ने इसे मानने से इंकार कर दिया। भारत ने कहा कि अंतर्राष्‍ट्रीय कानून के मुताबिक 1924 के आधार पर लगाये गये स्‍तंभों के आधार पर अपना दावा पेश किया। पाकिस्‍तान ने उसे यह कहकर मानने से इंकार कर दिया कि इस सीमा से नाव पार नहीं की जा सकती है, जबकि इस सीमा को आसानी से पार किया जा सकता है।
- 1999 में भारतीय वायुसेना ने सरहद के पार से आये एक पाकिस्‍तानी विमान को ध्‍वस्‍त कर दिया था। बताया जाता है कि यह विमान भारतीय सीमा में सर क्रीक की स्थिति को टोहने के लिये आया था। यह घटना कारगिल युद्ध के कुछ महीनों बाद ही हुई थी।

कुल मिलाकर देखा जाये तो केंद्र को इस मामले में जल्‍दबाजी नहीं करनी चाहिये। यदि नरेंद्र मोदी ने इस पर सवाल उठाये हैं, तो चुनाव के बाद इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए सुलझाने के ऐसे प्रयास करने चाहिये, जो भारत के हक में हों।

गांधी और कैलनबैक के बीच लिखे पत्र

लंदन में नीलम होंगे गांधी और कैलनबैक के बीच लिखे पत्र

 

लंदन में नीलम होंगे गांधी और कैलनबैक के बीच लिखे पत्र
गुरूवार, जून 14, 2012, 13:35 [IST]

mahatma gandhi
लंदन। दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी द्वारा गुजारे गए समय से जुड़े पत्र, तस्वीरें और दस्तावेज लंदन में 10 जुलाई को नीलाम होने जा रहे हैं। आपको बता दें कि इनमें बापू के आर्किटेक्ट हरमन कैलनबैक के विवादित संबंधों से जुड़े दस्तावेज भी शामिल हैं। नीलाम घर सॉथबी को गांधी से जुड़ी इस सामग्री से 5 लाख से 7 लाख पौंड मिलने की उम्मीद है।

पत्रों में से एक में गांधी ने 25 मार्च 1945 को कालबाख के बारे में लिखा है, ऐसे वक्त में जब सभी ने मेरा साथ छोड़ दिया था वह अक्सर मुझसे कहा करते थे कि मैं उन्हें हमेशा अपने साथ चलने वाले दोस्त की तरह पाएंगे, अगर जरूरत हुई तो, सच की तलाश में धरती के अंत तक जाएंगे।

सॉथबी ने कहा है कि इस सामग्री में दो पुरुषों के बीच दोस्ती के बारे में काफी जानकारियां हैं। यह गांधी जी की जीवनी के लिए अहम दस्तावेज हैं। कैलनबैक की दक्षिण अफ्रीका में 1904 में गांधी से मुलाकात हुई थी। इसके बाद वे दोनों हमेशा संपर्क में बने रहे।

ज्ञात हो कि गांधी जी के भारत लौटने के बाद भी उनकी दोस्ती कायम रही। 1910 में कैलनबैक ने जोहेनसबर्ग के पास 1100 एकड़ जमीन खरीदी और गांधी जी को दे दी। इस जमीन पर खेती का कामकाज गांधी जी और कैलनबैक मिलकर देखते थे।

सॉथबी ने इस विषय में जानकारी देते हुए बताया कि नीलामी के लिए रखी जाने वाली सामग्री में न केवल जमीन की खरीद से संबंधित दस्तावेज हैं, बल्कि वह दस्तावेज भी शामिल हैं, जो बताते हैं कि कैसे दोनों लोगों ने जमीन के लिए फलों के पेड़ खरीदे। वहां सिंचाई की व्यवस्था की। जमीन पर खेती को लेकर उनका पड़ोसियों से बहस होने का जिक्र भी इनमें है।

इन दस्तावेजों को ध्यान से देखने से पता चलता है कि इसमें गांधीजी के बड़े बेटे हरिलाल, दूसरे पुत्र मणिलाल और तीसरे पुत्र रामदास के बारे में भी जानकारी है। सॉथबी के मुताबिक गांधीजी के पारिवारिक सदस्यों और उनके करीबी सहयोगियों की ओर से लिखे गए इन पत्रों में गांधी की निजी जिंदगी के बारे में विस्तृत जानकारी है।

Friday, November 30, 2012

1960 के बाद का सबसे बडा दंगा अहमदाबाद

दंगों में मरता कौन है?

1960 के बाद का सबसे बडा दंगा अहमदाबाद में हुआ। राज्य सरकार ने न्यायमूर्ति जगमोहन रेड्डी वाले जाँच आयोग ने अहमदाबाद के दंगों के बारे में जो आंकडे दिये। उनके मुताबिक इस दंगे में 6742 मकान और दुकान जलाई गयीं। इनमें सिर्फ 671 हिन्दुओं की थीं बाकी 6071 मुसलमानों की नष्ट हुई। कुल सम्पत्ति का मूल्य 42324068 रुपये था। जिसमें हिन्दू सम्पत्ति 7585845 रु. की थी और मुस्लिम सम्पत्ति 34738224 रुपये की। 512 मृतकों में 24 हिन्दू थे और 413 मुसलमान । बाकी 75 की शिनाख्त नहीं हो सकी थी।


इसके बाद का सबसे बडा दंगा 1970 में भिवंडी में हुआ। इसमें 78 लोग मारे गये। इनमें 17 हिन्दू थे और 59 मुसलमान। बाकी दो की शिनाख्त नहीं हो सकी। भिवंडी दंगे की जांच के लिए नियुक्त न्यायमूर्ति डी. वी. मेडन जांच आयोग के सामने जो बयान दिये गये। उनसे यह प्रकट हुआ कि इस दंगे में 6 मुसलमान औरतों के साथ बलात्कार हुआ। जबकि एक भी हिन्दू औरत बलात्कार की शिकार नहीं हुई। भिवंडी के दंगों के परिणामस्वरूप हुये जलगांव के दंगे में 43 लोग मारे गये, जिनमें एक हिन्दू और बाकी के 42 मुसलमान। नष्ट हुयी कुल सम्पत्ति में 3390977 रुपये मूल्य की सम्पत्ति मुसलमानों की थी और सिर्फ 83725 रुपये मूल्य की हिन्दुओं की।


1967 में रांची-हटिया और नौशेरा में हुये दंगों में मृतकों की कुल संख्या 184 थी। जिनमें 164 मुसलमान और तो 19 हिन्दू, एक की शिनाख्त नहीं हो सकी। जिन दंगों का ऊपर जिक्र आया है, वे 1960 के बाद के भारत के भयंकरतम दंगों में हैं। इसके अलावा जमशेदपुर, अलीगढ, वाराणसी और बंबई जैसे शहरों में भी दंगे हुयें हैं। इन दंगों में भी कमोबेश उपर वाली स्थिति ही रही। शायद ही कोई ऐसा दंगा हुआ होगा, जिसमें मरने वालों में 70 प्रतिशत से ज्यादा मुसलमान न रहें हों। नष्ट हुई सम्पत्ति में भी लगभग यही अनुपात रहा।


सबसे ज्यादा अजीब बात यह है कि लगभग हर दंगे में पुलिस के हाथों गिरफ्तार होने वालों में भी मुसलमानों की ही संख्या अधिक रहती है. मुसलमानों के ही अधिक घरों की तलाशियां भी होतीं हैं। पुलिस भी बहुसंख्यक समुदाय की तरह यह सोचती है कि दंगों के लिये जिम्मेदार मुसलमान हैं। लिहाजा वह यह मानती प्रतीत होती है कि दंगों पर तभी नियंत्रण पाया जा सकता है जब मुसलमानों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाएगी। लेकिन इसके बावजूद बहुसंख्यक समुदाय की यह धारणा, कि दंगों में मरने वालों में अधिकतर हिन्दू होतें हैं।

यह धारणा इतनी गहरी है कि तमाम सरकारी आंकडों के बावजूद आम हिन्दू इस बात को नहीं मानता कि वास्तव में दंगों में हिन्दू ज्यादा आक्रामक होतें हैं। इसको न मानने की बात को अगर गहराई से देखा जाय तो पता चलेगा कि इसके पीछे बचपन की वो धारणाएं काम करतीं हैं। जो बचपन से हर हिन्दू घर में बच्चे को यह सिखाया जाता है कि मुसलमान क्रूर होतें हैं और वे किसी की भी जान लेने में नहीं हिचकते। इसके विपरीत हिन्दू तो बडे क़ोमल हृदय का होता है और उसके लिये चींटी की भी जान लेना मुश्किल होता है।

अक्सर आम हिन्दू आपको यह कहते हुए मिलेगा कि अरे साहब ! हिन्दू घर में तो आपको सब्जी काटने की छूरी के अलावा कोई हथियार नहीं मिलेगा। आम हिन्दू का मानना है। कि आमतौर पर मुसलमान अपने घरों में हथियारों का जखीरा रखतें हैं। यही वजह है कि आम हिन्दू को दंगों में मरने वालों के सरकारी आंकडे भी अविश्वसनीय लगतें हैं। दूसरी ओर कोई भी सरकार आंकडों को इस ढंग से पेश करना नही चाहेगी। जिससे आम लोगों के बीच मे यह धारणा बने कि देश में अल्पसंख्यक असुरक्षित है।

Thursday, November 8, 2012

पेट्रोल कंपनियो के घाटे का सच .....!! नुकषाण करने वाली कंपनिया --- अपने शेर होल्डर्स को दे रही है डिविडंड !! Φ

पेट्रोल कंपनियो के घाटे का सच .....!! नुकषाण करने वाली कंपनिया --- अपने शेर होल्डर्स को दे रही है डिविडंड !! Φ

घाटा होने पर भी दिया डिविडंड ??? ---!!

जनता को समजाओ - अपनी अकल लगाओ --- दिन मे तारे दिखानेवाली कॉंग्रेस के वादो पे मत जाओ ![जुगल Éगुरु]

Hindustan Petroleum CorporationDividend - Dividend history of the Hindustan Petroleum Corporation

Definition of 'Dividend Policy'

The policy a company uses to decide how much it will pay out to shareholders in dividends. 

You can view Announcement Date, Effective Date, Dividend Type (Interim, Final and Special), and Percentage of Dividend given information for Hindustan Petroleum Corporation Ltd.

Dividends Declared
Announcement DateEffective DateDividend TypeDividend (%)Remarks
29/05/201230/08/2012Final85%Rs.8.50 per share(85%)Dividend
26/05/201108/09/2011Final140% 
26/05/201003/09/2010Final120% 
02/06/200913/08/2009Final52.5% 
29/05/200802/09/2008Final30%AGM
29/05/200717/08/2007Final120% 
12/12/200627/12/2006Interim60% 
25/05/200618/08/2006Final30%AGM
26/05/200502/09/2005Final100%AGM
29/11/200414/12/2004Interim50% 
01/06/200423/08/2004Final160%AGM
11/12/200329/12/2003Interim60% 
27/06/200305/09/2003Final180%AGM
03/01/200303/02/2003Interim20% 
30/05/200202/08/2002Final100%AGM
25/05/2001 Final100%AGM
10/07/2000 Final30% 
04/04/2000 Interim80% 
11/06/1999 Final110% 
23/06/1998 Final0% 
23/06/1997 Final40%

Indian Oil CorporationDividend - Dividend history of the Indian Oil Corporation

You can view Announcement Date, Effective Date, Dividend Type (Interim, Final and Special), and Percentage of Dividend given information for Indian Oil Corporation Ltd.
Dividends Declared
Announcement DateEffective DateDividend TypeDividend (%)Remarks
28/05/201205/09/2012Final50%Rs.5.00 per share(50%)Dividend
30/05/201115/09/2011Final95% 
28/05/201008/09/2010Final130% 
29/05/200902/09/2009Final75% 
28/05/200809/09/2008Final55%AGM
28/05/200710/09/2007Final130% 
07/12/200626/12/2006Interim60% 
26/05/200607/09/2006Final125%AGM
30/05/200508/09/2005Final100%AGM
07/12/200429/12/2004Interim45% 
08/06/200423/08/2004Final160%AGM
11/12/200301/01/2004Interim50% 
23/06/200318/09/2003Final160%AGM
02/01/200303/02/2003Interim50% 
18/06/200212/09/2002Final110%AGM
15/06/2001 Final95%AGM
05/08/2000 FinalN.A.%Nil Final Dividend
15/05/2000 Interim40%2nd Interim Dividend
31/01/2000 Interim35% 
02/06/1999 Final130%AGM & Dividend

Friday, November 2, 2012

Jantaa ke Chaante !! SUPERHIT !!

Φ सुबह के 4 बजे है फिर भी मेरी आंखो मे हसते हस्ते पानी आ गया है और पेट बल खा रहा है ! इस वेब न्यूझ के कमेन्ट मे जिस तरह मोदी विरोधी या कॉंग्रेस के पेड़ न्यूझ होते है उसकी धड़ा धड़ तीप्पणिया पता नहीं इनकी सोई आत्मा जगाती है की नहीं ! इतने बेशर्म कैसे कोई धंधा कर शकता है !!? और आज की फाइव स्टार कमेन्ट ....!! हँसना आए तो हँसना पर जिस तरह जनता की आवाज को सच दिखाने के लिए भिखारी की तरह प्रदर्शित किया है जरा गौर करना ! सच मे हम सभी इस बिकाऊ मीडिया और पेड़ न्यूझ के कारण इतने ही लाचार है !!

क्या मोदी वाकई अविवाहित हैं: दिग्विजय - Digvijay slams Modi, Questions his marital status - Navbharat Times

kalyan, kalyan का कहना है :
02/11/2012 at 11:52 AM
ओ चैनल वाले भैया… एक दो मासूम सवालों के जवाब दोगे क्या?

1) भाई साहब… भाई साहब!!! कल ही डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी ने "भोंदू" के बारे में खुलासे करते हुए एक प्रेस कांफ़्रेंस की थी, उसे तुमने दस मिनट भी नहीं दिखाया? क्या डॉ स्वामी तुम्हें चाय-नाश्ता नहीं करवाते हैं???

2) नरेन्द्र मोदी की थरूर पर की गई टिप्पणी को लेकर ताबड़तोड़ पैनल डिस्कशन, नारी सम्मान, महिला आयोग वगैरा के ढोल पीट लिए… यहाँ तक कि सुनंदा पुष्कर का इंटरव्यू भी हमारे माथे पर दे मारा… जब अभिषेक मनु सिंघवी ने देश की न्याय-व्यवस्था को ही अपने चेम्बर में सुला लिया था, तब आपके मुँह में दही क्यों जम गया था भैया? बताओ ना प्लीईईईईईईज़!!!

=================
ए चैनल वाले बाबू…!! ओ भाई…!! अरे अंकल…!! सुनो तो, पतली गली से कहाँ कलटी मार रहे हो…

क्या मोदी वाकई अविवाहित हैं: दिग्विजय - Digvijay slams Modi, Questions his marital status - Navbharat Times

Ashok Gaur, Bansi Paharpur का कहना है :
02/11/2012 at 03:32 PM
दिग्गी टू देश का नेता है/ क्यो किसी के पेर्सनल मामले मे दखल देता है/ सादी नही हुए तो कोई तेरे कन बे के पिच्छे तो नही पड रहा / कई सालो से तेरे कॉमेंट देख रहा हु / सिर्फ पागलो बलि हरकत, जाई चन्द बलि नीति, चमचा गिरि / लगता पिछले जनम मे टू कुत्ता था / बे ही हरकत है / देश के बारे मे सोच / जन लोक पाल ला, भ्रस्तरचार मिटा आसाम मे दंगा क्यो हो रहे है . चीन सीमा पर क्यो घुसा आ रहा है / सोनिया लूट लूट कहा जमा कर रही है मेरा नाम फोर्ब्स मे क्यो नही/ पाकिस्तान को ढंका, अफजल गुरु ओर कसाब के बारे मे बोल जिससे लोग तेरे को कुत्ते से शेर काहे; ताक झहांक् मे कुछ नही रखा क्यो बच्चो की जिन्दि खराब कर रहा है लोग तेरे को प्रधान मंत्री के पड पर देखना चाहते है / इस तरह के बयान देकर भबिस्या खराब कर रहा है / मन मोहन सिंह के बाद दिग विजय सिंह का नंबर है/ क्योकि हो तो दोनो सिंहही / सर्वे से पता चला है सोनिया किपसंद पेहले सिंह दूसरी पसंद ख़ान है /

क्या मोदी वाकई अविवाहित हैं: दिग्विजय - Digvijay slams Modi, Questions his marital status - Navbharat Times

Shankar, Chennai का कहना है :
02/11/2012 at 10:40 AM
मोदी जी की शादी हूवी है या नही इससे जनता को कोई फर्क नही पड़ता नही उन्होने किसी आम जनता का पैसा किसी औरत के पीछे लगाया, लेकिन कोई अगर जनता का 50 करोड़ खर्चा करके अदरक चूसेगा तो जनता का घुस्सा जायज है.
 

 

क्या मोदी वाकई अविवाहित हैं: दिग्विजय - Digvijay slams Modi, Questions his marital status - Navbharat Times

Durga, Vikas Nagar का कहना है :
02/11/2012 at 10:06 AM
दिग्गी राजा बातो के धनी कुटिल राजनेतिक कांग्रेस के बफादार अपनी बे मतलब की बातो से लोगो को गुमराह करना जनता की ताली बटोरना उनकी खूबी है, जनता साबधान् खाली बातो से पेट नही भरता..............
 

 

(1) Sonali Arya

गाँधी के पोरबन्दर से कांग्रेस सांसद विठ्ल भाई भारत के दुसरे ऐसे सांसद है जिनके खिलाफ सबसे ज्यादा क्रिमिनल केस दर्ज है |

पहले नम्बर पर झारखंड मुक्ति मोर्चा के पलामू से सांसद कमलेश्वर बैठा है जिनके खिलाफ 46 क्रिमिनल केस है |

दुसरे नम्बर पर ...

गाँधी के गुजरात और गाँधी के जन्मभूमि पोरबन्दर से कांग्रेस के सांसद विठ्ठल राडडीया है जिनके खिलाफ 41 क्रिमिनल केस दर्ज है | और ६० दुसरे केस दर्ज है |

आज तो गाँधी जी आत्मा ख़ुशी मना रही होगी क्योकि गाँधी के नाम का मार्केटिंग का ठेका लेने वाले नीच कांग्रेस ने सबसे बड़े अपराधी को ही उनके जन्मस्थान से सांसद बनाया |

सुनने में ये भी आ रहा है की गुजरात के लेवुआ पटेल वोटो को अपने तरफ करने के लिए कांग्रेस इस क्रिमिनल सांसद को केन्द्रीय केबिनेट में लेने पर भी विचार कर रही है क्योकि गुजरात कांग्रेस ने इनका नाम केंद्र को मंत्री बनाने के लिए भेजा है |




Serious IPC Sections Number of Times they appear for Radadia :-
*****************************************************
395 2
324 1
304 1
Total 4

Details of Criminal Cases
********************
Cases where accused

Serial No. IPC Sections Applicable Other Details / Other Acts / Sections Applicable
1 322, 323, 501, 506(2) FIR NO: 22/91,Dated: 1-2-91 at the Jamkondarna PS Dist Rajkot, Case is pending in the Dhoraji Magistrate Court (Judicial Magistrate First Class since 26-4-91

2 114 Criminal intimidation,Death threats
3 323, 324 , 504, 506(2) FIR NO 123/91, Dated : 21-9-91 at the Jamkandorna PS District : Rajkot

4 189 Threating public servant on duty,criminal minilation death threats and Astrocities Act A-1(10),case is pending in the Dhoraji Magistrate’s Court First Class Since 1-4-94
5 504, 506(2) FIR NO : 111/92, Dated : 4-11-92 at the Jamkandorna PS District Rajkot, criminal minilation criminal assoult.Case is pending in the Dhoraji Magistrate’s Court,Judicial Magistrate First class since 20-11-92
6 188, FIR NO : 3030/2000 dated : 16-9-2000 at the Jamkandorna PS District : Rajkot, disturbing public servant on duty and Bombay Public Act section 33(1), (2), (33),case pending at Dhoraji Magistrate’s Court Judicial Magistrate First Class since 27-9-2002,
7 189, 504, 506(2) FIR NO : 3058/98, Dated: 15-6-98 at Dhoraji PS District : Rajkot, disturbing public servant injury,criminal minilation death threats case pending at Dhoraji Magistrate’s Court,Judicial Magistrate First class since 3-1-99
8 394, 332, 186, 143, 147, 395, 397, 144, 504, 506(2) FIR NO : 95/2000, Dated : 6-5-2000 at Dhoraji PS District Rajkot,stealing power worth rs 1,81,300 and threating to kill some one,robbery,dacoity,rioting, criminal assault of public servant on duty,death threats Case is pending in the Dhoraji Magistrate’s Court,Judicial Magistrate First class since 3-8-2000
9 394, 332, 186, 143, 147, 395, 397, 144, 504, 506(2) FIR NO : 97/2000,dated: 6-5-2000 at Dhoraji police station district: Rajkot,Looting electric meters worth rs 1,54,000/-, robbery, dacoity, rioting, criminal assult at public servant on duty,death threats,Case is pending in the Dhoraji Magistrate’s Court,Judicial Magistrate First class since 3-8-2000
10 188 FIR NO : 3018/98, Dated: 21-2-1998 under Bombay Police Act 135 , disoveying public servant on duty.Case is pending in the Dhoraji Magistrate’s Court,Judicial Magistrate First class since 23-4-98
11 188 FIR NO : 3019/98, dated : 21-2-1998 under Bombay Police Act 135,Disoveying public servant on duty ,Case is pending in the Dhoraji Magistrate’s Court,Judicial Magistrate First class since 23-4-98
12 332, 143, 149, 504, 341 FIR NO : 57/02,Date: 25-1-02 at Police Station ,Rajkot City,herrest public servant on duty wrongful statement,Case is pending in the Dhoraji Magistrate’s Court,Judicial Magistrate First class Rajkot City since 10-3-2002
13 186, 387, 504, 506(2) FIR NO : 742/02,Dated: 23-11-2000 at Police station,Rajkot City
14 188,114 To damage public property and death threats etc.Case is pending in the Dhoraji Magistrate’s Court,Judicial Magistrate First class Rajkot City since 10-3-2002
15 186, 304, 477, 114 FIR NO : 223/2000 dated : 17-4-2000 at police station Rajkot city , Threats assult of senior government officers destriction of evidence,Case is pending in the Dhoraji Magistrate’s Court,Judicial Magistrate First class Rajkot City since 4-7-2000
16 504, 506(2) FIR NO : 3194//05 dated : 26-05-2005 at Dhoraji Police Station District: Rajkot
17 188, Arms Act 30 Criminal intimidation,death tiea,case pending before Judicial Magistrate’s Court Dhoraji since 22-02-06
18 504, 506(2) FIR NO : 9704/05 Dated: 28-12-2004 at Dhoraji Police Station District Rajkot City
19 135 B.P.A (criminal intimidation,death threats case pending before Judicial Magistrate’s Court Dhoraji since-22-07-05
20 143, 147, 149, 186, 188 FIR NO : 1-555/08 at 04-12-08 at Rajkot City praduman nagar police station,Demage to public property etc,caase is pending before Chief Judicial Magistrate’s Rajkot, Court No 4, since 19-01-2009

Friday, October 26, 2012

केजरीवाल के अभियान - भारत की अर्थव्यवस्था बिगाड़ रहे है ![ जरूर पढे नग्न सत्य]केजरीवाल की चियरगर्ल्स किसके जनानखाने से बरामद होती है?


फोर्ड फाउंडेशन’ का इतिहास रहा है कि वह अमेरिकी हितों के लिए काम करने वाली संस्थाओं और व्यक्तिओं को प्रायोजित करती है।
‘टीम केजरीवाल’ का दावा है कि भारत के मौजूदा सभी राजनीतिक दल भ्रष्ट हैं इसलिए उनकी टीम अब स्वयं राजनीतिक विकल्प पेश कर भ्रष्टाचार को नेस्तानाबूद करेगी। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि भ्रष्टाचार पर नियंत्रण आवश्यक है, पर क्या भ्रष्टाचार का खात्मा करने में ‘टीम केजरीवाल’समर्थ है?
‘टीम केजरीवाल’ पर कालिख: पखवाड़े भर में केजरीवाल ने राजनीति से जुड़े तीन लोगों पर आरोप लगाए और इसी दौरान उन्हें खुद इस मुद्दे पर रक्षात्मक रवैया अपनाने को मजबूर होकर अपनी ही टीम के तीन प्रमुख सदस्यों प्रशांत भूषण, अंजली दमानिया और मयंक गांधी पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए.पी. शाह की अध्यक्षता में त्रिसदस्यीय अंतर्गत लोकपाल गठित करना पड़ा। अभी न्यायमूर्ति ए.पी. शाह ने जांच शुरू भी नहीं की थी कि तीन सदस्यीय लोकपाल गठित करने का फैसला करने वाले अरविंद केजरीवाल पर ही आरोप उछलने लगे। आरोप है कि केजरीवाल ‘कबीर’ नामक जिस एनजीओ से जुड़े हैं उसे अमेरिका के फोर्ड फाउंडेशन से सन् 2005 में 1,72ए000 अमेरिकी डॉलर तथा 2009 में 1,17,000 अमेरिकी डॉलर की रकम चंदे के तौर पर प्राप्त हुई है। तमाम राजनीतिक दल केजरीवाल के अभियान को अमेरिकी और यूरोपीय संस्थाओं द्वारा पोषित होने का आरोप लगाते रहे हैं। ब्रिक (ब्राजील, रूस, चीन और भारत) समूह द्वारा 2010 में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक से हटकर अपने समूह की नई बैंक गठित करने की घोषणा के बाद इन देशों में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन छिड़े। परिणामस्वरूप चारों देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर चोट लगी, चारों देशों की मुद्रा का अवमूल्यन हुआ और चारों देशों में राजनीतिक वर्ग के खिलाफ अविश्वास का माहौल बना। ‘फोर्ड फाउंडेशन’ का इतिहास रहा है कि वह अमेरिकी हितों के लिए काम करने वाली संस्थाओं और व्यक्तिओं को प्रायोजित करती है।
सब चंदे का खेल: ‘टीम अण्णा’ से मिलकर जब 2011 में डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने जनलोकपाल विधेयक प्रारूप समिति का गठन किया था तब केजरीवाल, किरण बेदी और अण्णा हजारे लोकपाल पद पर नियुक्ति के लिए पात्र व्यक्तियों के मापदंड में मैगासेस पुरस्कार प्राप्त व्यकित का आग्रह रख रहे थे। सनद रहे कि ये सब मैगासेस पुरस्कार से नवाजे चुके हैं। आम आदमी इस तथ्य से अपरिचित है कि मैगासेस पुरस्कार का एक प्रमुख प्रायोजक ‘फोर्ड फाउंडेशन’ है। जब अण्णा हजारे को अगस्त 2011 में सरकार नई दिल्ली में अनशन करने की अनुमति नहीं दे रही थी तब अमेरिकी दूतावास भी हजारे के समर्थन में बयानबाजी कर रहा था। केजरीवाल हर राजनीतिक दल और संस्था से पारदर्शिता की अपेक्षा करते हैं, पर उनकी संस्था को दान देने वाली संस्थाओं और व्यक्तियों की सूची आज दिन तक ‘कबीर’ संस्था की बेवसाइट पर क्यों उपलब्ध नहीं है? अमेरिका से संचालित एक एनजीओ है ‘आवाज’। इस एनजीओ ने लीबिया, ट्यूनीशिया, इजिप्त और सीरिया के सत्ताविरोधी आंदोलन की फंडिंग और सोशल मीडिया के माध्यम से नेटवर्किंग और प्रचार किया। ‘आवाज’ के रिकी पटेल और केजरीवाल ने संबंधों के बारे में बीते डेढ़ वर्षों में जब भी सवाल पूछा गया है ‘टीम अण्णा’ और ‘टीम केजरीवाल’ ने जवाब देने से कन्नी काटी है।
केजरीवाल का ‘भ्रष्टाचार’: केजरीवाल भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी के तौर पर अपना पूरा कार्यकाल दिल्ली में बिता चुके हैं और उनकी पत्नी आज भी दिल्ली में पोस्टिंग का लुत्फ ले रही हैं। दिल्ली या मुंबई में बिना रसूख के लंबी अवधि तक पोस्टिंग नहीं प्राप्त की जा सकती। आर्थिक न सही पर नैतिक तौर पर तो केजरीवाल पति-पत्नी साफ तौर पर भ्रष्ट नजर आते हैं। केजरीवाल सरकारी सेवा में रहते हुए अमेरिकी संस्था से अपने एनजीओ के लिए दान प्राप्त करते हैं, सो यह उनका आर्थिक भ्रष्टाचार ही माना जाएगा। अण्णा हजारे जब केजरीवाल के अभियान से भागने लगे तो उन्हें मनाने के लिए केजरीवाल 2 करोड़ रुपये का चेक लेकर गए थे। हजारे के साथी निजी वार्ता में आरोप लगाते हैं कि अनशन के दौरान केजरीवाल के चेलों ने लगभग 20 करोड़ रुपए चंदे के तौर पर जमा किए। जब इस राशि को लेकर टीम अण्णा हजारे के अंदरखाने में कहा-सुनी शुरू हुई तो केजरीवाल जमा राशि का 10 फीसदी हिस्सा लेकर अण्णा हजारे को लुभाने पहुंचे जिसे स्वीकारने से अण्णा ने साफ मना कर दिया। सो, स्पष्ट है कि केजरीवाल के हाथ कोयला दलाली से भले ही न काले हों पर उनका दामन कहीं से भी पाक-साफ नहीं है। रहा निवृत्त न्यायाधीशों से जांच कराने का ढोंग तो तमाम सरकारों बीते 65 वर्षों में ऐसी हजारों समितियां नियुक्त कर भ्रष्टाचारियों को ‘क्लीनचिट’ दिलाती रही हैं। ऐसे में केजरीवाल की भावी पार्टी भ्रष्टाचार से मुक्त होगी यह सोचना भी एक प्रकार का बौद्धिक भ्रष्टाचार होगा। ग्लोब व्यापी स्थिति यही है कि अमेरिका-यूरोप के विकसित देश हों या अफ्रीका-एशिया के विकासशील देश, हर नया शासक पिछले शासकों के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करता हुआ सत्ता संभालता है और कालांतर में पूर्ववर्ती शासक जितना ही अथवा उससे भी कहीं अधिक भ्रष्टाचार स्वयं कर दिखाता है।
भ्रष्टाचार विरोधी झंडाबरदार, अब भ्रष्ट: भारत के संदर्भ में देखें तो 1977 की जनता पार्टी सरकार इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी के भ्रष्टाचार की जांच से शुरू हुई थी और जनता के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के पुत्र कांति देसाई के भ्रष्टाचार के आरोपों के साथ विदा हुई। आज कौन मानेगा कि जेपी (जय प्रकाश नारायणद्ध और वीपी (विश्वनाथ प्रताप सिंह) के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों के झंडाबरदार आज के भ्रष्टाचार शिरोमणि मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव जैसे लोग रहे हैं। वीपी सिंह, चंद्रशेखर, देवेगौड़ा और गुजराल की समाजवादी सरकारें कहीं से भी कांग्रेस सरकारों से कम भ्रष्ट नहीं थी। ‘सबको देखा बार-बार, हमको देखें एक बार’ का नारा लगाती हुई अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार आई थी। उसे भी भ्रष्ट जयललिता के कंधे पर चढ़कर आना पड़ा और भ्रष्टाचार के आरोप झेलते हुए जाना पड़ा। कांग्रेस का इतिहास पं. जवाहरलाल नेहरू के सरकार में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन छेड़ने वाले दामाद फिरोज गांधी से शुरू होकर भ्रष्टाचारी दामाद रॉबर्ट वड्रा तक पहुंचा है। ऐसे में क्या भ्रष्टाचार हमारी व्यवस्था को लगा लाइलाज रोग मान लिया जाए? सत्ता में भ्रष्टाचार युग-युगांतर से चला आ रहा है तभी तो कौटिल्य ने ईसा पूर्व लिखे अपने ‘अर्थशास्त्र’ में राजा को सावधान किया है कि जिस भी अधिकारी के हाथ से होकर राजा की दौलत गुजरती है, वह उसमें से थोड़ी-सी खुद भोग लेने का लोभ संवरण नहीं कर पाता। इस तरह की चोरी अंततः राजा और राज्य दोनों को गरीब बनाती है इसलिए इसे रोकने का हरसंभव प्रयास किया जाना चाहिए। कौटिल्य के काल से चंद्रशेखर की सरकार तक हमारे देश में सत्ता संस्थानों में भ्रष्टाचार मौजूद जरूर था, पर उसका संस्थानीकरण नहीं हुआ था। संजय गांधी पर 1970 के दशक में भ्रष्टाचार के आरोप लगे। ‘किस्सा कुर्सी का’ जैसा मशहूर मुकद्मा चला, पर उन आरोपों को तमाम सरकारी प्रयास के बावजूद साबित नहीं किया जा सका।
भ्रष्टाचार को शिष्टाचार का स्वरूप: नब्बे के दशक के प्रारंभ तक भ्रष्टाचार के आरोप में पकड़े जाने पर समाज और बिरादरी में थू-थू होने की आशंका बरकरार रहती थी। 1991 में डॉ. मनमोहन सिंह ने आर्थिक उदारीकरण के साथ जो बेतहाशा बाजारवाद लाया उससे भ्रष्टाचार को शिष्टाचार का स्वरूप प्राप्त हो गया। मनमोहन सिंह ने अमेरिका से एक ऐसी प्रणाली आयात कर ली जिसमें भ्रष्टाचार और शोषण की रोकथाम के लिए कायदे-कानून तो मौजूद हैं लेकिन उसमें शोषण और रिश्वतखोरी को कभी सच्चे मन से अनैतिक करार नहीं दिया गया। अमेरिकी प्रणाली भ्रष्टाचार को कितना आत्मसात किए बैठी है उसे समझने के लिए ‘दि रॉबर बैरेन्स ऑफ अमेरिका’ पढ़ने से पर्याप्त दृष्टांत सामने आ जाते हैं कि कैसे बाजारवाद के चलते अच्छे से अच्छे नेताओं ने पूंजीपतियों के प्रभाव में आकर भ्रष्टाचार किए। अमेरिकी व्यवस्था में पूंजीपति प्रायोजित भ्रष्टाचार बीते दो शतकों से व्याप्त है। उन्नीसवीं सदी के दूसरे दशक में जनरल जैक्सन ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ही एक नया दल ‘डेमोक्रेट’ बनाया। उस समय भी अमेरिका में कितना भ्रष्टाचार था इसका अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि 1824 में राष्ट्रपति पद का चुनाव जीत जाने के बावजूद जनरल जैक्सन को प्रतिनिधि सभा ने हारा हुआ घोषित कर दिया। 1824 में जैक्सन दुबारा जब जीते तो उन्हें सत्ता मिली पर वे भ्रष्टाचार का खात्मा नहीं कर सके। 1970 के दशक में भारत की अधिकांश आबादी की ईमानदारी की गारंटी ली जा सकती थी, परंतु अमेरिका में तब तक ईमानदारी का लोप हो चुका था। 1970 के दशक में एक अमेरिकी पत्रिका ‘सायकोलॉजी टुडे’ ने पाठकों से पूछा कि अगर आपको 10 लाख डॉलर दिए जाएं तो बायबल के 10 निषेधों में से किस-किस को आप तोड़ेंगे? जवाब पाया गया कि तमाम अपराध करने के लिए अधिकांश लोग राजी थे। 1980 के दशक तक साम्यवादी और समाजवादी देशों ने बाजारवादी भोगवाद को अपने देशों में नहीं घुसने दिया था। 1980 के दशक में दूरसंचार क्रांति टेलीविजन और कंप्यूटर के माध्यम से इन देशों में घुसी जिसने बाजारवाद के वैभव को प्रचारित कर इन देशों में असंतोष की आग सुलगा दी। ब्रेजनेव के शासनकाल में सोवियत संघ के नागरिकों को विदेशी सैलानियों से घुलने-मिलने तक की इजाजत नहीं थी।
मनमोहन के रूसी संस्करण येल्तसिन: गोर्बाचेव ने ‘ग्लासनोस्त’ और ‘पेरेस्त्रोइका’ लाकर उदारवाद दिखाया तो सोवियत संघ में अवैध मुद्रा परिवर्तन और वेश्या व्यवसाय खुलकर शुरू हो गया। अमेरिकोन्मुखी प्रणाली ने गोर्बाचेव को नोबल शांति पुरस्कार दिला सत्ता से बाहर कर वहां मनमोहन सिंह के रूसी संस्करण येल्तसिन को सत्ता में स्थापित किया। अब रूसी कम्युनिस्ट सीधे क्रिमिनल बन गए और उनकी खुफिया एजेंसी केजीबी के अफसर माफिया। पुतिन के काल तक सोवियत संघ से बिखरा हर देश भ्रष्टाचार के निर्बाध संस्थानीकरण से बिलख रहा है। यह सारा प्रभाव अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां और उनके द्वारा प्रायोजित एनजीओ के चलते पड़ा है। भारत का मनमोहन काल भी सोवियत विघटन के समानांतर आया। चीन और ब्राजील पर भी अमेरिकी प्रभाव का यही परिणाम सप्रमाण पेश किया जा सकता है। अमेरिका और यूरोप के संदर्भ में खैरियत बस इतनी है कि वहां व्यक्तिगत स्तर के भ्रष्टाचार को रोकने का व्यापक प्रबंध है। वहां राजनीतिक दल पार्टी फंड के रूप में प्रतिष्ठित उद्योगों, व्यावसायों, व्यावसायिक समूहों और दलालों से तगड़ी रकम वसूल लेते हैं। उनका तर्क है कि आधुनिक चुनाव खर्च वहन करने के लिए ऐसा करना विधि सम्मत है। चूंकि वहां व्यक्तिगत भ्रष्टाचार के मामलों में दंड शीघ्र मिला सो उसे नियंत्रित किया जा सका। उन देशों को इस भ्रष्टाचार का भी सकारात्मक लाभ हुआ।
अमेरिका और यूरोप के लुटेरों ने दूसरे देशों की संपदा लूटी और अपने देश में विकास को गति दी, फिर भी उनका भ्रष्टाचार निंदित हुआ। भारत जैसे विकासशील देशों की स्थिति उलटी है यहां की शासक बिरादरी अपने ही गरीब भाइयों की संपदा लूट कर यूरोप में निवेश करती है। कांग्रेस और अन्य दलों के तमाम नेताओं पर इस तरह के आरोप लगे हैं। क्या टीम केजरीवाल इस लीक से हट पाएगी? कहावत है पूत के पांव पालने में दिखाई देते हैं। केजरीवाल जिस अंदाज में ‘आवाज’ और ‘फोर्ड फाउंडेशन’ से फंडिंग ले रहे हैं उससे कत्तई नहीं लगता कि सत्ता पाने पर वे राज दौलत भोगने के लोभ से बचेंगे। तब उनके अभियान को क्या कहा जाए? हमें तो उनकी टीम भ्रष्टाचार विरोधी ‘ट्वेंटी-ट्वेंटी’ के खेल में ‘चियरगर्ल्स’ से ज्यादा कुछ नजर नहीं आती। शाहरूख खान के आईपीएल टीम की एक चियरगर्ल पुणे में वेश्यावृत्ति में पकड़ी गई। देखना है केजरीवाल की चियरगर्ल्स किसके जनानखाने से बरामद होती है?

  •  आखरी आशा मोदी जी के गुजरात का नागरिक - जुगल पटेल [ईगुरु]║█║▌

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Thursday, October 18, 2012

▐ जरूर पढे= घोटालो का विज्ञान Φ क्या है ये 2जी ? Spectrum? GSM? GPRS? 3G? और लागू कानून

Jugal Ȩguru
▐ 2जी मामले मे - मन्मोहन ने सलाह ना मानी और हुआ 35000 करोड़ का नुकशान ! आज जेपीसी के 2जी घोटाले पर बैठक मे उपस्थित रहे चन्द्रशेखर ने कीया खुलासा ! उनके कहे अनुसार मनमोहन को 2008 के मुताबित 2जी - स्पेक्ट्रम की नीलामी करनी चाहिए थी ! वो नहीं हुई इस लिए 35000 करोड़ का नुकसान उठाना पड़ा - देश के खजाने को ! ▐╘ Read & Learn – Knowledge क्या है ये 2जी ? Spectrum? GSM? GPRS? 3G?╘
दोस्तो ! आज पूरा देश 2जी-...3जी-4जी- और जीजाजी को हर रोज सुनता पधता आया है ! वैसे भी मे एक स्केमोपेडीया [ घोटालो का सामान्य ज्ञान कोश ] बनाने की सोच ही रहा हूँ ! अब कॉंग्रेस ने किए ही ऐसे हाई टेक कांड की आम आदमी तो सिर्फ शब्द जानता है और कुछ नहीं ...! तो जानिए आज समय है और सबसे बड़ी बात मूड है तो जरा --▐ -विस्तार से पढ़िये क्या है ये 2जी घोटाला ?
Φ हमारे सारे वायरलेस संपर्क के साधन - जैसे की मोबाइल फोन - पूलिस/ मिलिटरी वायरलेस/ एएम और एफ़एम रेडीयो वो सब ध्वनि की तरंगो पे चलते है जिसको Hz हर्त्झ मे नापा जाता है ! जिसे फ्रीक्वंसी [आंदोलन] कहा जाता है !














Φ लो फ़्रिक्वंसी - मिडडियम फ़्रिक्वंसी - हाई Frequency जैसे 3 मुख्य विभागो मे उसे विभाजित किया जाता है जो एक वैश्विक मानक है ! इसके लिए पूरी दुनिया मे हर वायरलेस तकनीक के साधन की बनावट और कार्य के एक निश्चित स्टांडर्ड यानि के मानक होते है !
Band name Abbreviation ITU band Frequency
and
wavelength in air
Example uses
Tremendously low frequency TLF
< 3 Hz
> 100,000 km
Natural and man-made electromagnetic noise
Extremely low frequency ELF
3–30 Hz
100,000 km – 10,000 km
Communication with submarines
Super low frequency SLF
30–300 Hz
10,000 km – 1000 km
Communication with submarines
Ultra low frequency ULF
300–3000 Hz
1000 km – 100 km
Submarine communication, Communication within mines
Very low frequency VLF 4 3–30 kHz
100 km – 10 km
Navigation, time signals, submarine communication, wireless heart rate monitors, geophysics
Low frequency LF 5 30–300 kHz
10 km – 1 km
Navigation, time signals, AM longwave broadcasting (Europe and parts of Asia), RFID, amateur radio
Medium frequency MF 6 300–3000 kHz
1 km – 100 m
AM (medium-wave) broadcasts, amateur radio, avalanche beacons
High frequency HF 7 3–30 MHz
100 m – 10 m
Shortwave broadcasts, citizens' band radio, amateur radio and over-the-horizon aviation communications, RFID, Over-the-horizon radar, Automatic link establishment (ALE) / Near Vertical Incidence Skywave (NVIS) radio communications, Marine and mobile radio telephony
Very high frequency VHF 8 30–300 MHz
10 m – 1 m
FM, television broadcasts and line-of-sight ground-to-aircraft and aircraft-to-aircraft communications. Land Mobile and Maritime Mobile communications, amateur radio, weather radio
Ultra high frequency UHF 9 300–3000 MHz
1 m – 100 mm
Television broadcasts, microwave ovens, microwave devices/communications, radio astronomy, mobile phones, wireless LAN, Bluetooth, ZigBee, GPS and two-way radios such as Land Mobile, FRS and GMRS radios, amateur radio
Super high frequency SHF 10 3–30 GHz
100 mm – 10 mm
Radio astronomy, microwave devices/communications, wireless LAN, most modern radars, communications satellites, satellite television broadcasting, DBS, amateur radio
Extremely high frequency EHF 11 30–300 GHz
10 mm – 1 mm
Radio astronomy, high-frequency microwave radio relay, microwave remote sensing, amateur radio, directed-energy weapon, millimeter wave scanner
Terahertz or Tremendously high frequency THz or THF 12 300–3,000 GHz
1 mm – 100 μm
Terahertz imaging – a potential replacement for X-rays in some medical applications, ultrafast molecular dynamics, condensed-matter physics, terahertz time-domain spectroscopy, terahertz computing/communications, sub-mm remote sensing, amateur radio

Φ इसके लिए 'फ्रीक्वंसी को नापे जाने वाला अलग अलग विभाग, और कार्य के लिए स्टांडरडाइझ और हर देश की अपनी सरकार द्वारा नियमित और वितरीत किया जाता है ! तो उस 'फ्रीक्वंसी के पटल' यानि के बेन्ड को कहते है - स्पेक्ट्रम - !
  • ITU = International Telecommunication Union

Table of ITU Radio Bands
Band Number Symbols Frequency Range Wavelength Range
4 VLF 3 to 30 kHz 10 to 100 km
5 LF 30 to 300 kHz 1 to 10 km
6 MF 300 to 3000 kHz 100 to 1000 m
7 HF 3 to 30 MHz 10 to 100 m
8 VHF 30 to 300 MHz 1 to 10 m
9 UHF 300 to 3000 MHz 10 to 100 cm
10 SHF 3 to 30 GHz 1 to 10 cm
11 EHF 30 to 300 GHz 1 to 10 mm
12 THF 300 to 3000  GHz 0.1 to 1 mm


Φ और मोबाइल की सर्व प्रथम तकनीक जिसे फर्स्ट जनरेशन कहा जाता था उसे 1जी कहते थे जिसमे GSM [ Global Standard for Mobile communication ] कहा जाता था ! जिसमे सिर्फ कॉल और एसएमएस ही भेजे जा शकते थे ! इन्टरनेट सुविधा बहुत ही कम स्पीड पे चलती थी - 16 से 48 Kbps ! वह एक अलग Frequency पे कार्यरत थी !
Φ उसके बाद नई जनरेशन आई जो 2जी या ने की सेकंड जनरेशन नाम से जाना गया ! जो GPRS [General Packet Radio Service] को सपोर्ट करता था ! और अलग फ्रीकवनसि पे काम करता था ! क्यूंकी एक ही फ्रीकवनसि पे अलग - अलग साधन काम करे और उसकी पहुँच एक दूसरे को क्रॉस करती हो तो खलल पैदा होता है ! GPRS की स्पीड 96 से ले के 160 Kbps तक की होती है ! जिसमे आप कॉल और एसएमएस मे सीमित ना रहकर इन्टरनेट और एमएमएस आदि सेवाओ का उपयोग कर शकते है !
Φ अभी 2.5जी जिसे भी 2जी ही गीना जाता है ऐसा EDGE [ Enhance Datarate for GSM Enabled device ] Network भी कार्यरत है - जो 2.5 जी सपोर्ट से आपको 176 से लेके 320 Kbps तक की स्पीड देता है !

तो हो गया ! आपका स्पेक्ट्रम और 2जी - तो बन गया 2जी स्पेक्ट्रम !

Φ पूरे देश मे हर प्रकार की Frequency [कम अंतर संपर्क छोड़ कर -वोकीटोकी] सरकार के आधीन होती है ! और अपना रेडियो स्टेशन से लेके आप मोबाइल कंपनी के लिए सरकार के पास रजिस्ट्रेशन करवा के अपनी मन चाहिए Frequency बेन्ड ले शकते है !

Φ तो ए राजा तकनीक मे भी राजा थे , तो मंद मोहन को पता भी नहीं चला और इतना बड़ा घोटाला किया ! बाजार भाव से कम कीमत पर जैसे हर चीज के लाइसन्स और निविदा दी जाती है , इसी तरह इसके लाइसन्स भी मनमानी फर्जी कंपनिया बनाकर पहले तो उनको लाइसन्स दे दिये ! [ इसमे से 4 कंपनियो के दफ़तर मलेशिया की एक ही बिलडिंग और एक ही माले के एड्रेस वाले थे - सबूत सुबरमणियम जी की साइट पे है ]

Φ फिर उनही कंपनीयों ने उन सब Frequency के लाइसन्स और अधिकार अन्य जो वास्तव मे टेलीकोंम कंपनिया है उन कंपनियो को दे कर कई गुना रकम कमाई ! सुब्रमण्यम जी का यह कहना बिलकुल सच है की - चिंदंबरम के बेटे की भी कंपनी थी - जो रातो रात बना दी गई और उसको 2जी का लाइसन्स मीला और विदेशी कंपनी को बेच दीया उसके दस्तावेज़ आज भी सुब्रमण्यम जी की साइट पे देखे जा शकते है !

Φ इस घोटाले का सबसे बड़ा नुकशान उठा रहे है मूज जैसे आईटी से संबन्धित लोग और कंपनिया जिनहे आज पैसे दे कर भी हाई स्पीड इन्टरनेट नहीं मील रहा ! 2जी घोटाले के बाहर आने के बाद 3जी इन्टरनेट के दाम भी 3 गुना बढ़ गए ! क्यूँ की सुप्रीम ने जिन कंपनियो को दंड किया था उसके पैसे आखिर जनता से ही तो वसूल करने थे टेलिकॉम कंपनियो को ! आज दुनिया 4जी से आगे निकल चुकी है और हमारा देश अभी भी 10 साल पुरानी तकनीक और माध्यम के लिए उतने ही पैसे चुका रहा है जीतने खर्च मे वो आधुनिकतम तकनीक उपयोग मे ले शकते है ! अगर आज पूरे देश मे तकनीक और आईटी का अगर कोई सबसे ज्यादा ज्ञान और उसको विकास के हथियार बनाकर भारत को ऊपर लाने की क्षमता एक तो मोदी सर के पास है और दूसरी सुब्रमण्यम स्वामी जी के पास !

Φ पता नहीं भारत कब गंवारपन छोड़े और कूए के बहार की दुनिया भी देखे ! आज दुनिया हर सेकंड बदल रही है ! ज्ञान ही सर्वोपरि है ! गुजरात मे आईटी और ई-गवर्नन्स से ही मोदी जी ने अपना सारा कामकाज पारदर्शी करने का सपना देखा है ! अब तक 60% काम हो चुका है , क्यूँ की टेबल के नीचे की कमाई कोम्प्यूटर के आंकड़ो की वजह से बंद होती जा रही देखकर - गुजरात की पंचायत से ले कर पूलिस तक के कर्मचारियो ने क्या-क्या भाने निकाले थे वो मे अच्छी तरह जानता हूँ ! लेकिन मोदी सर ने एक भी बहाना नहीं चलाने दिया और

Φ आज गुजरात मे कई किसान और आम इंसान अपनी जमीन और जिंदगी से जुड़े सारे दस्तावेज़ कभी भी कहीं भी ....एक भी पैसा दिये बगैर या सलाम मारे बगैर घर बैठे पा शकते है ! यह प्रोजेक्ट अब भी पूर्ण विकसित नहीं है !
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▐ इस घोटाले का सबसे बड़ा नुकशान मेरे उस प्रोजेक्ट के सपने को हुआ की जिसमे हर कोई - माँ-बाप बेटा -दादा अपने घर पे, अपने वक्त पे, अपने मोबाइल और कंप्यूटर, को इन्टरनेट से जोड़ के गुजराती और हिन्दी भाषा मे तमाम आईटी की समाज, ज्ञान , उपयोग, जानकारी और रोजगारी के इन्टरनेशनल कोर्स - 20 प्रतिशत बाजार कीमत पर कर शकते है ! क्यूँ की अगर आज इन्टरनेट स्पीडी होता और 3जी अगर 2जी के भाव मे मिलता तो उन सबकी लाइव क्लास भी वो मोबाइल पे मेरे साथ कोन्फ़र्न्स कर के अटेण्ड कर शकते है ! और मेरे 12 साल से 3 बड़े नाम वाले आईटी इंस्टीट्यूट के अनुभव- विद्यार्थी हीतों की अवहेलना और नॉलेज के बदले सिर्फ कागजी सर्टिफिकेट देखे है..... उस आधार पर आसान शब्दो और उदाहरणो मे संमजाए गए  सारे कोर्स माइक्रोसॉफ्ट और सिस्को जैसी कंपनियो के इन्टरनेशनल सर्टीफिकेट कोर्ष  है ! जिसे पाने वाले के लिए दुनिया के हर देश के रास्ते खुल जाते है !

▐ पढ़िये गुजराती मे शॉर्ट एंड स्वीट - सीधा समजने मे हिट - [ कोम्प्यूटर का एडवांस बेजीक - जो शर्त है कोर्ष करने वाले भी नहीं जानते होंगे इतनी सारी जानकारी - क्लीक करे -https://docs.google.com/ open?id=0B3gQBJdOKri1dzZWeFdwcF JVSWs

▐ जो कोई मेरे प्रोजेक्ट के बारे मे जानना चाहता है ! और इन्वेस्ट कर के या जुड़ कर कमाई के साथ सेवा करना चाहता है गुजरात और देश की .....तो जाने क्या है ये ईगुरु का प्रोजेक्ट - हिन्दी मे - क्लिक करे - https://docs.google.com/ open?id=0B3gQBJdOKri1MnZKeVMzOV Awb3M


एक आखरी आशा मोदी जी के गुजरात का नागरिक - जुगल पटेल [ईगुरु]║█║▌

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[विस्फोट सत्य और सबूतो का ]

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