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Saturday, April 13, 2013

2014 में होने वाले में आम चुनाव में लोकसभा की लगभग 160 सीटों पर ट्विटर-फेसबुक का असर

चुनाव के नतीजों पर ट्विटर-फेसबुक का असर?

फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया के मंच का इस्तेमाल करने वाले लोग नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं?

एक नए अध्ययन में इसी सवाल का जवाब खोजा गया है.

आयरिश नॉलेज फाउंडेशन एंड इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने इस पर एक शोध किया है और कहा है कि 2014 में होने वाले में आम चुनाव में लोकसभा की लगभग 160 सीटों पर इसका असर दिखाई दे सकता है.

सर्वाधिक प्रभाव वाली सीटें

अध्ययन में सबसे सर्वाधिक प्रभाव वाली सीटों की पहचान की गई है.सबसे अधिक प्रभाव वाली सीटों का तात्पर्य उन सीटों से है, जहां पिछले लोकसभा चुनाव में विजयी उम्मीदवार के जीत का अंतर फेसबुक का प्रयोग करने वालों से कम है अथवा जिन सीटों पर फेसबुक का प्रयोग करने वालों की संख्या कुल मतदाताओं की संख्या का 10 प्रतिशत है.

अध्ययन में 67 सीटों की 'अत्यधिक प्रभाव वाली', जबकि शेष सीटों की 'कम प्रभाव वाली' सीटों के रूप में पहचान की गई है.

लोकसभा की कुल 543 में से 160 सीटों पर सोशल मीडिया का खासा असर देखने को मिल सकता है. महाराष्ट्र में इसका सबसे ज्यादा असर पडऩे की संभावना है. यहां की 21 सीटों पर सोशल मीडिया का असर पड़ सकता है."

महाराष्ट्र और गुजरात आगे

जबकि गुजरात में 17 सीटें सोशल मीडिया से प्रभावित हो सकती हैं. इसी तरह उत्तर प्रदेश में 14, कर्नाटक की 12, तमिलनाडु की 12, आंध्र प्रदेश की 11, केरल की 10 और मध्य प्रदेश की 9 सीटों पर इसका असर देखने को मिल सकता है.

ये वो लोकसभा सीटें हैं जहां लोग सोशल नेटवर्किंग साइट का इस्तेमाल सबसे ज्यादा करते हैं. इन निर्वाचन क्षेत्रों में कुल मतदाताओं के दस फीसदी से ज्यादा लोग फेसबुक से जुड़े हुए हैं.

सर्वेक्षण के मुताबिक फेसबुक से जुड़े लोग चुनाव से पहले अपने आसपास के वोटरों को प्रभावित कर सकते हैं.

अध्ययन का ये भी कहना हैं कि चुनाव से 48 घंटे पहले उम्मीदवारों के चुनाव प्रचार पर रोक लगने के बाद फेसबुक, ट्विटर जैसी सोशल मीडिया चुनाव प्रचार की कमान संभाल लेंगे.

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Thursday, January 10, 2013

FACEBOOK in DANGER : Indian Govt. Planning To GET RID OVER

♠ FACEBOOK in DANGER : Indian Govt. Planning To GET RID OVER
♠ फेसबुक खतरे मे : भारत सरकार दबाना चाहती है अभिव्यक्ति की आजादी

 

दिल्ली में घटित हुए कांड के विरोध में रायसीना हिल्स पर पहुंचे जनसैलाब ने सरकार और खुफिया तंत्र को हिलाकर रख दिया है। सरकारी मशनीरी हैरत में है कि बिना किसी नेतृत्व के इतनी बड़ी तादाद में जनता सिर्फ सोशल मीडिया के जरिये एकजुट हुए और राष्ट्रपति भवन के पास तक आक्रोश जाहिर करने पहुंच गये। सरकार और खुफिया तंत्र की ओर से सोशल मीडिया को खतरे के तौर पर देखा जा रहा है। इससे निपटने के लिए भी व्यापक विचार विमर्श इंटेलीजेंस और सरकार के बीच शुरू हो चुका है। माना जा रहा है कि देश के राजनीतिक और सांप्रदायिक माहौल को बिगाडऩे के लिए भविष्य में भी सोशल मीडिया अहम् भूमिका निभा सकता है।

सुरक्षा के लिहाज से सोशल साइटें एक नयी चुनौती बनकर सरकार के सामने खड़ी हैं। इस बात की आशंका सोशल मीडिया साइटों पर निगरानी रखने वाली सरकारी एजेंसी ने जाहिर की है। रिपोर्ट में कहा गया है उग्र प्रदर्शन के पीछे इन साइटों का इस्तेमाल किया गया। भावनाओं को छू जाने वाले अनगिनत संदेशों के जरिये दिल्ली के यूथ को टारगेट किया गया। एजेंसी की रिपोर्ट पर कारगर कदम उठाने का निर्णय लिया गया है। सरकार और तमाम खुफिया एजेंसियां उन कारणों पर गहन चिंतन मंथन कर रही है जिससे भविष्य में इस तरह की स्थितियों की पुनरावृत्ति न होने पाए।
   
आज की तारीख में युवा भारत के पास अपने जज्बात और गुस्से का इजहार करने के लिए वो हथियार है, जिसे कोई नहीं रोक सकता। वो हैं सोशल वेबसाइट्स। जो लोग दिल्ली के इंडिया गेट पर अपना आक्रोश दिखाने नहीं पहुंच सके, वो ट्विटर और फेसबुक सरीखी सोशल वेबसाइट्स पर अपने जज्बातों और गुस्से की इबारत लिख रहे हैं। लेकिन आम आदमी की सोशल मीडिया पर सक्रियता सरकार को रास नहीं आ रही है और येन-केन प्रकरेण वो सोशल मीडिया को दायरे में रखने और रखवाली के उपायों को खोज रही है। सोशल बेवसाइटस पर पोस्ट, कमेंटस और लाइक करना अपराध की श्रेणी मे शामिल है और इसकी वजह से कई लोग हवालात की सैर भी कर चुके हैं। गौरतलब है कि शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे की शवयात्रा के दौरान शिवसेना कार्यकर्ताओं द्वारा मुम्बई ठप किये जाने पर शाहीन धाडा नामक युवती ने फेसबुक पर टिप्पणी की थी और उनकी मित्र रेणु श्रीनिवासन ने उसे ‘लाइक’ किया था। इसके बाद दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया था लेकिन बाद में उन्हे रिहा कर दिया गया। कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को कार्टून बनाने पर राजद्रोह के मामले में जेल की हवा खानी पड़ी तो वहीं आम आदमी की आवाज दबाने के लिए सरकार और सरकारी मशीनरी आईटी एक्ट की विभिन्न धाराओं का दुरूपयोग जमकर कर रही है। आईटी एक्ट की धारा 66-ए  में संशोधन की मांग जोर-शोर से उठने लगी है।

असलियत यह है कि वर्तमान यूपीए सरकार लगभग हर मोर्चे पर फेल दिख रही है। सरकार के हठधर्मी, बेश्र्म और नकारा रवैये के कारण जनता में अंदर तक गुस्सा भरा हुआ है और जनता विशेषकर युवा वर्ग अपनी भड़ास को सोशल वेबसाइटस के माघ्यम से देश-दुनिया में सांझा करता है। इससे जनता के बीच सरकार की छवि को गहरा धक्का पहुंच रहा है। लेकिन समस्या यह है कि सरकार कमियों को दूर करने की बजाय जनता की आवाज दबाने में ऊजो खपा रही है। सरकार अपने अपराधों की मुखर आलोचना सुनने की सहनशीलता खो चुकी है और उसी का परिणाम है कि सरकार झुंझलाहट भरे आलोकतांत्रिक व्यवहार पर उतर आई है।

 

सोशल नेटवर्किंग की दुनिया में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर शिकंजा कसने के सरकार के षडयंत्र इसी झुंझलाहट और खीझ की असंतुलित प्रतिक्रिया है जिसे कि वह कई बहानों के चोले से ढंकने का प्रयास कर रही है। योग गुरू रामदेव का आंदोलन रहा हो अथवा अन्ना का अभियान, सरकार व कांग्रेस की तरफ से जिस तरह की प्रतिक्रिया व बयानबाजी की गई वह उसकी हताशा व अवसाद को बखूबी स्पष्ट करती है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की असफलता के साथ साथ राहुल गांधी का औंधे मुंह गिरना और उसके बाद एक और बड़े राज्य आन्ध्र प्रदेश में सूपड़ा साफ होना कांग्रेस और सोनिया गांधी की हताशा के ऊपर और कई मन का बोझ बढ़ा गया। रही सही कसर गुजरात में कांग्रेस की हार ने पूरी कर दी है। निश्चित रूप से इन असफलताओं में कांग्रेस नीत केंद्र सरकार के काले इतिहास का बहुत बड़ा योगदान है।

पिछले दो वर्षों में अन्ना हजारे द्वारा लोकपाल बिल पास करने के लिए चलाया जाने वाला अभियान हो या फिर बाबा रामदेव की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साईट्स की मदद से तेजी से आगे बढ़ी और फ़ैली। अगर ये कहा जाए कि सोशल नेटवर्किंग साइटस ने ही इन आंदोलनों की आग को फैलाया तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। समस्त विश्व में पिछले एक दशक में  इन्टरनेट विरोध या असहमति दर्ज कराने के एक नए प्लेटफॉर्म के रूप में उभरा है। इसे दुर्भाग्य कहा जाए या भ्रष्ट मानसिकता का दुराग्रह कि सत्तासीन अपने इन पापों को स्वीकारने व सुधारने के स्थान पर सतत सीनाजोरी का रास्ता अपनाए हुए हैं! इसी दुराग्रह के चलते सरकार अन्ना के विरुद्ध भद्दी बयानबाजी और रामदेव पर सस्ते आरोप लगाकर अपनी साख बचाने का बचकाना प्रयास करती रही है और अब उसी बचकानी सोच का परिणाम है कि सरकार सोशल नेटवर्किंग साइट्स को नियंत्रित करने का प्रयास कर रही है। गूगल सहित फेसबुक व ट्विटर जैसी वेबसाइट्स से सरकार लंबे समय से आमने-सामने की स्थिति में है।

 

लोकतन्त्र में यदि सरकार सच को स्वीकारने की अपनी अक्षमता के चलते अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के हनन की सीमा तक पहुंच जाए तो यह स्वयंसिद्ध हो जाता है कि सरकार लोकतान्त्रिक व्यवस्था में पूर्णत: असफल हो चुकी है। ऐसी सरकार को लोकतान्त्रिक व्यवस्था में बने रहने का नैतिक अधिकार ही नहीं रह जाता है। 1975 के आपातकाल के बाद आज पुन: एक बार सरकार यदि उस स्थिति में नहीं तो उस मनोदशा में अवश्य पहुंच गई है। फिनलैंड ने विश्व के सभी देशों के समक्ष एक उदहारण पेश करते हुए इन्टरनेट को मूलभूत कानूनी अधिकार में शामिल कर लिया। वहीं विश्व के सबसे बड़े और सफल लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले हमारे राष्ट्र में नकारा और निकम्मी सरकारें अपनी नाकामियां, असफलताओं, लचर कार्यप्रणाली, लालफीताशाही, भ्रष्टाचार और कमियों को ढकने के लिए आम आदमी की आवाज को दबाने का जो कुचक्र रच रही हैं वो किसी भी दृष्टि से स्वस्थ प्रजातंत्र का लक्षण नहीं है वहीं यह संविधानप्रदत्त मौलिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन भी है। अगर सरकार आम आदमी की आवाज दबाने की बजाय उसे सुनने और समझने का प्रयास करे तो देश की दशा और दिशा बदल सकती है। अदम गोंडवी का  शेर इस हालात के माकूल है-

 

ताला लगा के आप हमारी ज़बान को,
कैदी न रख सकेंगे ज़ेहन की उड़ान को।

Wednesday, January 9, 2013

ऐसी धमकी तो कभी लादेन ने भी नहीं दी

 - सुन, शैतान की औलाद!

 

ऐसी धमकी तो कभी लादेन ने भी नहीं दी
अकबरुद्दीन ओवैसी के बयान पर इन पालतू राष्ट्रवादी मुसलमानों तक की बकार भी नहीं फूटी। किसी अन्य शीर्ष नेता ने भी आज दिन तक ओवैसी पर कड़ी कार्रवाई की मांग नहीं की है। किसी बुद्धिजीवी, पत्रकार और सेकुलर नेता ने यह जानने की जहमत भी नहीं उठाई है कि ओवैसी के पास आखिर कौन सा ऐसा हथियार है जिससे वह १०० करोड़ हिंदुओं के खात्मे की वल्गना कर रहा है? कहीं ओवैसी को पाकिस्तानी इस्लामी परमाणु बम हाथ तो नहीं लग गया? ओवैसी जितनी बड़ी धमकी दे रहा है उतनी बड़ी धमकी तो कभी ओसामा बिन लादेन ने भी नहीं दी। जुल्फिकार अली भुट्टो दशकों तक हिंदुस्तान से लड़ने का दंभ भरा करते थे तो उनकी बेटी बेनजीर भुट्टो सदियों तक हिंदुस्तान से लड़ने का पाकिस्तानी हौसला बयान किया करती थी, पर उन दोनों ने भी कभी १०० करोड़ हिंदुओं के खात्मे का बड़बोलापन नहीं किया। फिर ओवैसी के इतने जबर्दस्त विध्वंसक बयान पर भी सेकुलरवाद के रखवाले गूंगे-बहरे क्यों बने रहे? ‘सहमत’ और शबाना आजमी का एक बयान जरूर आया पर उसमें भी औपचारिक विरोध के अलावा कुछ नजर नहीं आता।

 

ओवैसी को हल्के में लिया तो पछताओगे
आंध्रप्रदेश की पुलिस ने तो ओवैसी के इस बयान पर एक साधारण एफआईआर दर्ज करना भी जरूरी नहीं माना और उनकी कलम तब उठी जब अदालत ने निर्देश दिया। गुजरात दंगों में मुस्लिमों की मौत के लिए दुनिया की कोई भी अदालत न्याय के मान्य मापदंड पर नरेंद्र मोदी को दोषी नहीं ठहरा सकती, फिर भी सिर्फ यूरोप-अरब-अमेरिका प्रायोजित एनजीओ बिरादरी के बखेड़े पर मोदी को यूरोप और अमेरिका मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर विराजमान होने के बावजूद वीसा देने से इंकार करते हैं। ओवैसी को इतने घातक बयान के बाद भी ब्रिटेन का वीसा मिलने और लंदन यात्रा करने में कोई दिक्कत नहीं आती। इस राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय ढोंग का क्या औचित्य? क्या ओवैसी के बयान को हलके में लिया जा सकता है? ओवैसी जिस आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन का विधायक है उसकी पृष्ठभूमि जानने वाला कोई भी जानकार उसके बयान को हलके में लेने की सलाह नहीं देगा। मुस्लिम अलगाववाद का सऊदी अरेबिया और पाकिस्तान प्रायोजित जो ब्लू प्रिंट है उसका अंतिम चरण दक्षिणी हिंदुस्थान का इस्लामी अलगाववाद है। इस्लामी अलगाववाद का पहला चरण कश्मीर, दूसरा चरण असम समेत पूर्वोत्तर, तीसरा चरण हिंदुस्थान के प्रमुख शहरों को निशाना बनाना तथा अंतिम चरण हैदराबाद को केंद्र में रख दक्षिणी हिंदुस्थान में अलगाववादी ताकतों को बढ़ावा देना है।

 

हैदराबाद हो पाकिस्तान का हिस्सा...
इस्लामी आतंकवाद का कश्मीर को हिंदुस्थान से अलग करने का प्रयास १९४७ से जारी है। १९६० के दशक से लगातार पूर्वोत्तर हिंदुस्थान में मुस्लिम आबादी बढ़ाकर असम को लीलने का प्रयास चल रहा है। १९८० के बाद से दर्जनों बार असम में स्थानाrय असमी आबादी और बांग्लादेशी मुसलमानों के बीच टकराव हो चुका है। बीते वर्ष जब बोडो जनजाति और बांग्लादेशी मुसलमानों के बीच संघर्ष व्यापक हुआ था तब मुंबई, बैंगलोर समेत तमाम शहरों में मुसलमानों ने किस तरह पूर्वोत्तर वासियों को धमकाया यह पूरा देश हताश होकर देख रहा था। १९९० के दशक से ऑपरेशन के-२ के माध्यम से इस्लामी अलगाववादी देश के तमाम शहरों में निर्दोष हिंदुओं का खून बहाते रहे हैं। हुजी, लश्कर-ए-तोयबा, इंडियन मुजाहिदीन, हरकत-उल-अंसार जैसी दर्जनों तंजीमे हिंदुस्थान में ग्रीन कॉरिडोर (हरा गलियारा) बनाने में जुटी रही हैंै। शायद ही कोई प्रमुख शहर बचा हो जहां इस्लामी आतंकवाद का पंजा नजर न आया हो। अब मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एमआईएम) के विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी का बयान संकेत दे रहा है कि मुस्लिम अलगाववाद अपने चौथे यानी अंतिम चरण में पहुंचने को है। १९४७ के पहले जिन इलाकों से पाकिस्तान समर्थक बांग लगी थी उसमें हैदराबाद प्रमुख था। हैदराबाद को पाकिस्तान का हिस्सा बनाने की मांग के लिए ही एमआईएम गठित हुई थी। ज्ञात इतिहास के अनुसार १९२७ में निजाम का समर्थन करने के लिए नवाब मीर उस्मान अली खान की सलाह पर महमूद नवाज खान किलेदार गोलकुंडा ने एमआईएम का गठन किया था। इसकी पहली बैठक नवाब महमूद नवाज खान के घर ‘तौहीद मंजिल’ में हुई थी जिसमें पहला ही प्रस्ताव यही था कि एमआईएम को किसी भी सूरत में हैदराबाद को हिंदुस्थान का हिस्सा बनने से रोकना है।

 

...तब कासिम राजवी दुम दबाकर भागा
पाकिस्तान की मांग १९३० के दशक में हुई, एमआईएम उसके पहले से अलगाववाद की पैरोकार रही है। १९३८ में बहादुर यार जंग एमआईएम का सदर बना तो उसने मुस्लिम लीग के साथ सियासी समीकरण बैठा लिया। २६ दिसंबर १९४३ को लाहौर के मुस्लिम लीग सम्मेलन में इसी नवाब बहादुर यार जंग ने पाकिस्तान के समर्थन में सबसे आक्रामक भाषण दिया था। एमआईएम ने आजादी के पहले हैदराबाद से हिंदुओं के सफाए के लिए डेढ़ लाख रजाकारों की फौज तैयार की थी। हैदराबाद स्टेट में तब महाराष्ट्र का वर्तमान मराठवाड़ा भी हिस्सा था। हैदराबाद स्टेट के तत्कालीन प्रधानमंत्री मीर लाइक अली की सलाह पर तब कासिम राजवी नामक वकील को रजाकारों की सेना का मुखिया बनाया गया था। जब १९४८ में रजाकारों ने हिंदुओं का कत्लेआम शुरू किया तब भी पं. जवाहर लाल नेहरू मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति के चलते हिंदुओं का खूनखराबा रजाकारों के हाथ चुपचाप देखते रहे। उन दिनों सरदार वल्लभभाई पटेल देश के गृहमंत्री थे, उन्होंने नेहरू को फटकारा और सेना और पुलिस के संयुक्त अभियान के तहत ‘ऑपरेशन पोलो’ का आदेश दिया। हिंदू जनता पहले से ही रजाकारों की बर्बरता से लड़ने को तैयार थी। जब रजाकार चुन-चुन कर काटे जाने लगे तब मुस्लिम अलगाववादियों का दिमाग ठिकाने पर आया और निजाम भी आत्मसमर्पण को मजबूर हुआ। रजाकारों के मुखिया कासिम राजवी को जेल में ठूंस दिया गया। जब उसने अपने गुनाहों से तौबा कर लिया तब उसे १९५७ में पाकिस्तान जाने की शर्त पर जेल से रिहा किया गया। राजवी के दुम दबाकर भागने के बाद एमआईएम ठंडी पड़ गई। उसका नियंत्रण अब्दुल वाहिद ओवैसी के हाथ आ गया।

 

ये है ओवैसी का अतीत...
अब्दुल वाहिद ओवैसी स्वयंभू सालार-ए-मिल्लत (कौम का कमांडर) कहलाता था। १९६० में उसने हैदराबाद महापालिका का चुनाव जीता। १९६२ में अब्दुल वाहिद ओवैसी का बेटा सुलतान सलाहुद्दीन ओवैसी पथरघट्टी विधानसभा सीट जीतकर आंध्र प्रदेश विधानसभा पहुंचा। १९६७ में वह चारमीनार से और १९७२ में यकूतपुरा से विधानसभा पहुंचा। १९७४-७५ में सुलतान सलाहुद्दीन ओवैसी एमआईएम का सर्वेसर्वा बन गया। १९८४ में सुल्तान सलाहुद्दीन ओवैसी पहली बार हैदराबाद से लोकसभा चुनाव जीतने में कामयाब हुआ तब से २००४ तक वह लगातार सांसद रहा। २००४ में उसने अपनी जगह अपने बेटे असदुद्दीन ओवैसी को हैदराबाद से लोकसभा प्रत्याशी बनाया। २९ सितंबर २००८ को सुलतान सलाहुद्दीन के इंतकाल के बाद उसका बड़ा बेटा असदुद्दीन एमआईएम का प्रमुख बन गया। १९९० के दशक में एमआईएम में फूट पड़ी थी। ओवैसी परिवार के खिलाफ एमआईएम के चंद्रगुट्टा के विधायक अमानुल्ला खान ने बगावत कर दी तो १९९९ में अकबरुद्दीन ओवैसी को उसके खिलाफ उतार कर ओवैसी परिवार ने उसे परास्त किया था। हैदराबाद की महापालिका पर भी एमआईएम का कब्जा है और हैदराबाद का महापौर एमआईएम का मोहम्मद माजिद हुसैन है। एमआईएम की दहशत के चलते बीते कई वर्षों से हैदराबाद में रामनवमी के जुलूस को राज्य सरकार अनुमति नहीं दे रही। चारमीनार के निकट भाग्यलक्ष्मी मंदिर जो कि ३०० साल पुराना ऐतिहासिक मंदिर है और जिसके नाम पर हैदराबाद पहले भाग्यनगर के रूप में जाना जाता था, के गुबंद का निर्माण रोका गया।

 

औवेसी के सामने कांग्रेस भीगी बिल्ली!
आंध्रप्रदेश विधानसभा में एमआईएम के केवल ७ विधायक हैं पर उनकी दबंगई से कांग्रेस की सरकार कांपती है। अकबरुद्दीन ओवैसी माफिया गतिविधियों और हिंदूद्रोही वक्तव्यों के लिए कुख्यात है। २००७ में इसी अकबरुद्दीन ने ऐलान किया था कि यदि सलमान रश्दी या तस्लीमा नसरीन कभी हैदराबाद आए तो वह उनके सिर कलम कर लेगा। तस्लीमा नसरीन पर एमआईएम के कार्यकर्ताओं ने हमले की योजना भी बनाई थी, पर आज दिन तक आंध्र की कांग्रेस सरकार ने अकबरुद्दीन के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। २०११ में कुरनूल में एमआईएम की एक रैली में इसी अकबरुद्दीन ने आंध्र के विधायकों को काफिर तथा आंध्र की विधानसभा को कुप्रâस्तान कह कर अपमानित किया था, पर किसी आंध्र के विधायक ने अकबरुद्दीन पर विशेषाधिकार हनन का मामला चलाने की भी हिम्मत नहीं जुटाई। इसी रैली में उसने पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंहराव को कातिल, दरिंदा, बेईमान, धोखेबाज और चोर जैसी गालियां देकर कहा था -‘अगर राव मरा नहीं होता तो मैं उसे अपने हाथों से मार डालता।’ अप्रैल २०१२ में अकबरुद्दीन ने हरामीपने की हद पार करते हुए हिंदुओं के प्रभु राम और उनकी मां कौशल्या के लिए ऐसे अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया जिसे सुनकर उस सूअर के पिल्ले की खाल खींच लेना ही एकमेव दंड बचता है।

 

अगस्त २०१२ में इसी अकबरुद्दीन ओवैसी ने आंध्र पुलिस को ‘हिजड़ों की फौज’ करार दिया था, तब भी इस ‘लंडूरे’ के खिलाफ आंध्र पुलिस का आत्म सम्मान नहीं जागृत हुआ। उस समय भी ओवैसी ने चुनौती दी थी कि पुलिस और हिंदुओं में मुसलमानों से लड़ने की ताकत नहीं। बीते माह ८ दिसंबर २०१२ को इसी हरामपिल्ले ने फिर जहर उगला- ‘यह भाग्यलक्ष्मी कौन है और वहां बैठ कर क्या कर रही है? यह हिंदुओं का नया देवता कौन है, मैंने तो इसका नाम पहले कभी नहीं सुना। इतनी जोर से नारा लगाओ कि उनका भाग्य कांप जाए और लक्ष्मी गिर पड़े।’ अकबरुद्दीन ने जब यह हरामपंथी वाला बयान दिया तब मुस्लिमों की उन्मादी भीड़ ने ‘अल्लाह ओ अकबर’ का गगनभेदी नारा लगाया। उसके बाद उसने २४ दिसंबर को आदिलाबाद में हजारों मुसलमानों की मौजूदगी में १०० करोड़ हिंदुओं के १५ मिनट में खात्मे की कूवत का ऐलान किया। नरेंद्र मोदी को फांसी पर लटकाने की मांग की। सरकार मुस्लिम वोट बैंक के लिए चुप्पी साधे पड़ी है। सरकार हिंदुओं के सहनशीलता का इम्तहान ले रही है। यदि अकबरुद्दीन पर कार्रवाई नहीं हुई और हिंदुओं का माथा भड़का तो उसकी ऐसी दुर्दशा होगी कि उसके पूर्वज भी कब्र से निकल कर अपने गुनाहों के लिए तौबा करेंगे।

हिंदुस्तान की कसाबों की फेकटरी- (एइएमइएम) लगभग 80 वर्ष पुराना संगठन - ओवेशी का इतिहास

▐ हिंदुस्तान की कसाबों की फेकटरी डालनेवला ओवेशी का इतिहास ♠

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एइएमइएम) लगभग 80 वर्ष पुराना संगठन है जिसकी शुरुआत एक धार्मिक और सामाजिक संस्था के रूप में हुई थी लेकिन बाद में वो एक ऐसी राजनैतिक शक्ति बन गई जिस का नाम हैदराबाद के इतिहास का एक अटूट हिस्सा बन गया है.

ƪJugal Eguru

▐ हिंदुस्तान की कसाबों की फेकटरी डालनेवला ओवेशी का इतिहास ♠
भाग-1 ..... © Jugal Eguru™
[सोर्स बीबीसी- विकिपेडिया - डबल्यूएसजे - ब्रिटिश लाइब्रेरी आर्काइव्स]

▐ जिसकी शुरुआत एक धार्मिक और सामाजिक संस्था के रूप में हुई थी वो है ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एइएमइएम) लगभग 80 वर्ष पुराना संगठन है ! लेकिन बाद में वो एक ऐसी पोलिटिकल पावर बन गई जिस नाम का हैदराबाद के इतिहास गवाह है.

▐1928 म...ें नवाब महमूद नवाज़ खान के हाथों स्थापना से लेकर 1948 तक जबकि यह संगठन हैदराबाद को एक अलग मुस्लिम राज्य बनाए रखने की वकालत करता था. सरदार पटेल को सैनी बल इसी लिए इस्तेमाल करना पड़ा था ! और उस निझाम का बेकिंग बनके येही सब खड़े थे ! उस पर 1948 में हैदराबाद राज्य के भारत में विलय के बाद भारत सरकार ने प्रतिबन्ध लगा दिया था.

▐ 1957 में इस पार्टी बनके शुरू हुआ तब नाम में "ऑल इंडिया" जोड़ा और साथ ही अपने संविधान को बदला. कासिम राजवी ने, जो हैदराबाद राज्य के विरुद्ध भारत सरकार की कारवाई के समय मजलिस के अध्यक्ष थे और गिरफ्तार कर लिए गए थे, कासिम राजवी पाकिस्तान चले जाने से पहले इस पार्टी की बागडोर उस समय के एक मशहूर वकील अब्दुल वहाद ओवैसी के हवाले कर गए थे.

▐ 50 सालो मे धीरे धीरे कॉंग्रेस की तरह पारिवारिक परंपरा रूप .... इस संगठन पर ओवेशी परिवार हावी हो गया है !अब्दुल वाहेद के बाद सलाहुद्दीन ओवैसी उसके अध्यक्ष बने और अब उनके पुत्र असदुद्दीन ओवैसी उस के अध्यक्ष और सांसद हैं जब उनके छोटे भाई अकबरुद्दीन ओवैसी विधान सभा में पार्टी के नेता हैं. विधान सभा में उस के सदस्यों की संख्या बढ़ कर 7 हो गई है, विधान परिषद में उस के दो सदस्य हैं. हैदराबाद लोक सभा की सीट पर 1984 से उसी का कब्ज़ा है और इस समय हैदराबाद के मेयर भी इसी पार्टी के है.

▐ एइएमइएम को आम तौर पर मुस्लिम राजनैतिक संगठन या मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधि के रूप में देखा जाता है और हैदराबाद के मुसलमान बड़ी हद तक इसी पार्टी का समर्थन करते रहे हैं हालांकि खुद समुदाय के अन्दर से कई बार उस के विरुद्ध भी हुए है. जहाँ तक ओवैसी परिवार का सवाल है उस के हाथ में पार्टी की बाग़ डोर उस समय आई जब 1957 में इस संगठन पर से प्रतिबंध हटाया गया.

▐ पोलिटिकल पावर के साथ साथ ओवैसी परिवार के साधन और संपत्ति में भी ज़बरदस्त वृद्धि हुई है जिसमें एक मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज, कई दूसरे कालेज और दो अस्पताल भी शामिल हैं ! जो बिना कॉंग्रेस की रहमो नजर और मुस्लिम ब्रदरहुड नामक फंडिंग संस्था पोसिबल ही नहीं था !
▬ जिस तरह पाकिस्तान मे सोशियल मीडिया गरम है ....! इस की गिरफतारी को लेकर की " भाई को पुलिस हाथ तो नहीं लगाएगी ना ? भाई को गिरफ्तार कर के अब ये ******* क्या करेंगे आगे ? " तो इस हिसाब से वहा का पैसा और दाऊद की अमीरीयत के जलवे भी हो शकते है !

▐ पहला चुनाव जीते 1960 में - सलाहुद्दीन ओवैसी हैदराबाद नगर पालिका के लिए चुने गए और फिर दो वर्ष बाद वो विधान सभा के सदस्य बने तब से मजलिस की शक्ति लगातार बढती गई..... और आज यहाँ तक जा पहुंचे है की लगाने को कसाब पे लगाई देशद्रोह की कार्यवाही भी चल शक्ति है पर ....
कानून = कॉंग्रेस ...................

इस परिवार और मजलिस के नेताओं पर यह आरोप लगते रहे हैं की वो अपने भड़काओ भाषणों से हैदराबाद में साम्प्रदायिक तनाव को बढ़ावा देते रहे हैं. लेकिन दूसरी और मजलिस के समर्थक उसे भारतीय जनता पार्टी और दूसरे हिन्दू संगठनों का जवाब देने वाली शक्ति के रूप में देखते हैं.

राजनैतिक शक्ति के साथ साथ ओवैसी परिवार के साधन और संपत्ति में भी ज़बरदस्त वृद्धि हुई है जिसमें एक मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज, कई दूसरे कालेज और दो अस्पताल भी शामिल हैं.

एइएमइएम ने अपनी पहली चुनावी जीत 1960 में दर्ज की जब की सलाहुद्दीन ओवैसी हैदराबाद नगर पालिका के लिए चुने गए और फिर दो वर्ष बाद वो विधान सभा के सदस्य बने तब से मजलिस की शक्ति लगातार बढती गई.

सांप्रदायिकता का आरोप

बढ़ती हुई लोकप्रियता के साथ साथ सलाहुद्दीन ओवैसी "सलार-ए-मिल्लत" (मुसलमानों के नेता) के नाम से मशहूर हुए. वर्ष 1984 में वो पहली बार हैदराबाद से लोक सभा के लिए चुने गए साथ ही विधान सभा में भी उस के सदस्यों की संख्या बढती गई हालाँकि कई बार इस पार्टी पर एक सांप्रदायिक दल होने के आरोप लगे लेकिन आंध्र प्रदेश की बड़ी राजनैतिक पार्टिया कांग्रेस और तेलुगुदेसम दोनों ने अलग अलग समय पर उससे गठबंधन बनाए रखा.

दिलचस्प बात यह है की हैदराबाद नगरपालिका में यह गठबंधन अभी भी जारी है और कांग्रेस के समर्थन से ही मजलिस को मेयर का पद मिला है.

 मजलिस के नेता अकबरुद्दीन ओवैसी की गिरफ़्तारी के विरुद्ध हैदराबाद में बंद का एक दृश्य

मजलिस के नेता अकबरुद्दीन ओवैसी की गिरफ़्तारी के विरुद्ध हैदराबाद में बंद का एक दृश्य

2009 के चुनाव में एइएमइएम ने विधान सभा की सात सीटें जीतीं जो की उसे अपने इतिहास में मिलने वाली सब से ज्यादा सीटें थीं. कांग्रेस के साथ उस की लगभग 12 वर्ष से चली आ रही दोस्ती में दो महीने पहले उस समय अचानक दरार पड़ गई जब चारमीनार के निकट एक मंदिर के निर्माण के विषय ने एक विस्फोटक मोड़ ले लिया.

मजलिस ने कांग्रेस सरकार पर मुस्लिम-विरोधी नीतियां अपनाने का आरोप लगाया और उस से अपना समर्थन वापस ले लिया. अकबरुद्दीन ओवैसी के तथाकथित भाषण को लेकर जो हंगामा खड़ा हुआ है और जिस तरह उन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज गया है उसे कांग्रेस और मजलिस के टकराव के परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है.

अधिकतर हैदराबाद तक सीमित मजलिस अब अपना प्रभाव आंध्र प्रदेश के दूसरे जिलों और पडोसी राज्यों महाराष्ट्र और कर्नाटक तक फैलाने की कोशिश कर रही है.

हाल ही में उस ने महाराष्ट्र के नांदेड़ नगर पालिका में 11 सीटें जीत कर हलचल मचा दी है. आंध्र प्रदेश में कांग्रेस इस संभावना से परेशान है कि 2014 के चुनाव में एइएमइएम जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस के साथ हाथ मिला सकती है. अकबरुद्दीन ओवैसी की गिरफ्तारी के बाद तो मजलिस और कांग्रेस के बीच किसी समझौते की सम्भावना नहीं रह गई.

Thursday, December 13, 2012

भारत के लिये क्‍यों महत्‍वपूर्ण है सर क्रीक ?

भारत के लिये क्‍यों महत्‍वपूर्ण है सर क्रीक ?

 

Sir Creek
गुजरात के कच्‍छ की समुद्री सीमा पर स्थित 650 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र सर क्रीक अचानक सुर्खियों में आ गया है। इस मुद्दे को उठाया है गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी ने और दबाने की कोशिश कर रही है केंद्र की सत्‍ताधारी पार्टी कांग्रेस। देश की सुरक्षा से जुड़े इस संवेदनशील मामले की गहराई में जाने से पहले हम आपको सैर कराना चाहेंगे सरक्रीक की।

 

आये दिन अखबारों में आप पाकिस्‍तानी रेंजरों द्वारा भारतीय मछुवारों को पकड़ने की और भारतीय रेंजरों द्वारा पाक मछुवारों के पकड़े जाने की खबरें पढ़ते रहते होंगे। असल में दोनों देशों के गरीब मछुवारे भी आज तक इस समुद्री सीमा को लेकर कंफ्यूज्‍ड हैं। सर क्रीक 650 वर्ग किलोमीटर का भारत का वो समुद्री इलाका है, जिस पर पाकिस्‍तान अपना दावा करता है।

इतिहास के पन्‍ने पलटें तो भारत में ईस्‍ट इंडिया कंपनी के शासन के दौरान चार्ल्‍स नैपियर ने 1842 में सिंध पर जीत हासिल की और उसे बंबई राज्‍य को सौंप दिया। उसके बाद सिंध में शासन कर रही सरकार ने सिंध और बंबई के बीच सीमारेखा खींचने का निर्णय लिया, जो कच्‍छ से गुजरती थी। उस निर्णय के अंतर्गत सरक्रीक खाड़ी को सिंध प्रांत में दर्शाया गया।

जबकि दिल्‍ली में शासन कर रही अंग्रेज सरकार के नक्‍शे में इसे भारत में दर्शाया गया। विवाद हुआ और फाइलों में दब गया। लेकिन स्‍वतंत्रता के बाद जब दोनों देशों के बीच बंटवारा हुआ तो पाकिस्‍तान ने सरक्रीक खाड़ी पर अपना मालिकाना हक जता दिया। इस पर भारत ने एक प्रस्‍ताव तैयार किया जिसमें समुद्र में कच्‍छ के एक सिरे से दूसरे सिरे तक सीधी रेखा खींची और कहा कि इसे ही सीमारेखा मान लेनी चाहिये। यह प्रस्‍ताव पाकिस्‍तान ने ठुकरा दिया, क्‍योंकि इसमें 90 फीसदी हिस्‍सा भारत को मिल रहा था। तब से लेकर आज तक दोनों देशों के बीच इस खाड़ी के मालिकाना हक को लेकर विवाद चल रहा है।

केंद्र में हाल ही में क्‍या हुआ

केंद्र सरकार ने हाल ही में सर क्रीक पर पाकिस्‍तान से समझौता करने पर सहमति बना ली है। ऐसी खबर आयी है कि हाल ही में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस पर डील फाइनल करने की चर्चा की। रक्षामंत्री एके एंटनी और तत्‍कालीन वित्‍त मंत्री प्रणब मुखर्जी भी इस पर राजी हो गये। माना जा रहा है कि यूपीए इस मामले को जल्‍द ही पाकिस्‍तान के सामने रख सकती है।

नरेंद्र मोदी क्‍यों कर रहे हैं विरोध

यूपीए की इस योजना के बारे में पता चलने पर नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा। पत्र में यह मांग की है कि सरक्रीक का 10 फीसदी हिस्‍सा पाकिस्‍तान को दे दिया जाये और बाकी भारत में रहने दिया जाये। यदि इससे कम पर समझौता हुआ तो देश की सुरक्षा में सेंध लग सकती है। उन्‍होंने कहा कि ऐसा होने पर पूरा देश भले ही खुद को सुरक्षित महसूस करे, लेकिन कच्‍छ सुरक्षित कभी नहीं रह पायेगा। मोदी ने कहा कि सरक्रीक में देश की प्राकृतिक संपदा का भंडार है उसे ऐसे पाकिस्‍तान को नहीं दे देनी चाहिये। आर्थिक दृष्टि से देखें तो इस क्षेत्र में भारी मात्रा में कच्‍चा तेल अथवा गैस होने की संभावना है, जो भारतीय अर्थ व्‍यवस्‍था के लिये सकारात्‍मक साबित हो सकता है।

सरक्रीक से जुड़े कुछ अन्‍य तथ्‍य

- सन 2000 में पाकिस्‍तान ने सरक्रीक पर भारी संख्‍या में सैनिकों को तैनात किया था। यानी वहां भी कारगिल जैसे युद्ध की तैयारी थी।
- 1965 के बाद ब्रिटिश पीएम हेरोल्‍ड विल्‍सन के हस्‍तक्षेप के बाद अदालत ने 1968 में फैसला सुनाया था, जिसके अनुसार पाकिस्‍तान को 9000 वर्ग किलोमीटर का मात्र 10 फीसदी हिस्‍सा मिला था।
- पाकिस्‍तान ने सिंध और कच्‍छ के बीच हुए एग्रीमेंट की कुछ तस्‍वीरों के आधार पर क्रीक को सिंध का भाग घोषित कर दिया और एक रेखा खींची जिसे ग्रीन लाइन बाउंड्री कहा।
- भारत ने इसे मानने से इंकार कर दिया। भारत ने कहा कि अंतर्राष्‍ट्रीय कानून के मुताबिक 1924 के आधार पर लगाये गये स्‍तंभों के आधार पर अपना दावा पेश किया। पाकिस्‍तान ने उसे यह कहकर मानने से इंकार कर दिया कि इस सीमा से नाव पार नहीं की जा सकती है, जबकि इस सीमा को आसानी से पार किया जा सकता है।
- 1999 में भारतीय वायुसेना ने सरहद के पार से आये एक पाकिस्‍तानी विमान को ध्‍वस्‍त कर दिया था। बताया जाता है कि यह विमान भारतीय सीमा में सर क्रीक की स्थिति को टोहने के लिये आया था। यह घटना कारगिल युद्ध के कुछ महीनों बाद ही हुई थी।

कुल मिलाकर देखा जाये तो केंद्र को इस मामले में जल्‍दबाजी नहीं करनी चाहिये। यदि नरेंद्र मोदी ने इस पर सवाल उठाये हैं, तो चुनाव के बाद इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए सुलझाने के ऐसे प्रयास करने चाहिये, जो भारत के हक में हों।

Saturday, December 8, 2012

बेकार - बदहाल --- बेअसर भारत की खुफिया एजंसियां

 बेकार - बदहाल --- बेअसर भारत की  खुफिया एजंसियां

कानून-व्यवस्था बनाए रखने और सुचारु शासन व्यवस्था के लिए खुफिया तंत्र का मजबूत होना बहुत जरूरी है। राजतंत्र के दौरान खुफिया ही शासकों के आंख-कान हुआ करते थे। आजादी मिलने के बाद भी खुफिया तंत्र अधिक सक्रिय था। इसके पीछे एक कारण यह भी हो सकता है कि देश के सामने कई चुनौतियां थीं। विभाजन के घाव हरे थे। देश विरोधी शक्तियां कभी भी सिर उठा सकती हैं, इसलिए ज्यादा सतर्कता रखी गई। कालांतर में सतर्कता में कमी आई है। हालांकि सांप्रदायिक दंगों, आतंकवाद और नक्सलवादी गतिविधियां इन दिनों बढ़ी हैं एवं हमारा खुफिया तंत्र ज्यादा सक्रिय व सतर्क होना चाहिए था। इसके विपरीत कुछ वर्षों से खुफिया तंत्र में कमजोरी साफ नजर आ रही है।


इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के साथ हुई घटनाओं के बारे में खुफिया तंत्र अनभिज्ञ रहा। इसके बाद मुंबई दंगे, 26/11 और देश के विभिन्न स्थानों पर हुए विस्फोटों के मामले में हमें पहले से कोई जानकारी नहीं मिल पाई। देश का खुफिया विभाग समय-समय पर सतर्क रहने की सूचना जब भी देता है तब कोई घटना ही नहीं होती। दरअसल खुफिया विभाग की हालत हमारे मौसम विभाग जैसी हो गई है। मौसम विभाग की अधिकतर घोषणाएं सच नहीं होतीं। उसी तरह खुफिया सूचनाएं भी अक्सर गलत निकल जाती हैं। खुफिया एजेंसियों में तालमेल का अभाव, कर्मियों और विशेषज्ञ स्टाफ की कमी और लचर प्रशासनिक व्यवस्था भी एक बड़ा मुद्दा है।

हर कुछ समय बाद बेखौफ आतंकी हमें लहूलुहान कर रहे हैं। कभी मुंबई, वाराणसी, अहमदाबाद तो कभी जयपुर। हम क्यों नहीं रोक पा रहे इन हमलों को? कहां छूट रही है कमी? क्या हैं हमारी कमी और कमजोरी? खुफिया सूचनाओं की कमी। पिछली आतंकी घटनाओं की बेतरतीब जांच। जिम्मेदार अपराधियों के अनछुए सुराग। सुस्त जांच एजेंसियों को प्रति सरकारी उदासीनता। प्रशिक्षण, आधुनिक हथियारों और उपकरणों की कमी। यही चंद वजहें हैं कि देश में हर छह महीने बाद कहीं न कहीं आतंकी अपनी ताकत दिखा रहे हैं। पिछली घटनाओं से हम कोई सबक नहीं ले रहे। असम और म्यांमार में हुई हिंसा के विरोध में मुंबई में रैली के दौरान दंगा फैल सकता है, खुफिया विभाग इस बारे में सूंघ नहीं सका। असम में हुई हिंसा की भी पहले से जानकारी नहीं मिली। उत्तर प्रदेश में पिछले नौ महीने में हुए एक दर्जन सांप्रदायिक दंगों की हवा भी खुफिया तंत्र को नहीं लगी। इसका मतलब कहीं न कहीं सतर्कता में कमी है। बैंगलोर में मुंबई जैसी हिंसा की अफवाह के चलते एक ही रात में 6 हजार लोग पलायन कर गए मगर हमारे सूचना तंत्र को कानोंकान खबर नहीं लगी, जबकि ये अफवाहें फेसबुक और इंटरनेट के जरिए फैलाई जा रही थीं। यात्रियों की भीड़ के कारण रेल विभाग को स्पेशल ट्रेनें चलाना पड़ती हैं तब जाकर सरकार को खबर लगती है। सूचना तंत्र की कमजोरी के चलते जो हालात बैंगलोर या मुंबई में बने थे, ऐसे हालात आगे चलकर भारत के हर बड़े शहर में पैदा हो सकते हैं।

2008 में मुंबई पर हुए हमले के बाद इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस (आईडीएसए) टास्क फोर्स की रिपोर्ट में खुफिया तंत्र में सुधार की बात कही गयी थी। मुंबई पर हुए आतंकी हमले के बाद गहरी नींद में सो रही सरकार ने राष्ट्र विरोधी व आंतकवादी घटनाओं से जुड़े मामलों की जांच पड़ताल करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर नेश्नल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी [एनआईए] का मजबूत किया है और देश के विभिन्न राज्यों में इसकी क्षेत्रीय इकाइया गठित की जा रही है। मुंबई पर हुए बड़े आतंकी हमले के बाद 2002 में गठित गठित गुप्तचर ब्योरों की एजेंसी ‘मेक’ (बहुएजेंसी केंद्र) की पहली बैठक 1 जनवरी 2009 को तत्तकालीन गृहमंत्री पी. चिदबरम की अध्यक्षता में हुई थी, जिसमें गुप्तचर ब्यूरो, केन्द्रीय अर्द्ध सुरक्षाबलों तथा गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे। तब चिदंबरम ने घोषणा की थी कि मेक तथा अन्य सभी सरकारी एजेंसियों के बीच खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान कानूनन करना होगा। पिछले लगभग चार वर्षों में मेक के तत्त्वावधान में खुफिया एजेंसियों की एक हजार से अधिक बैठकें हो चुकी हैं और नतीजा ढाक के तीन पात ही है।
भारतीय खुफिया एजेंसियों के खराब प्रदर्शन का कारण उनकी आपसी खींचतान और रणनीतिक दृष्टि की कमी है। एक एजेंसी दूसरी एजेंसी को अपने अधिकार क्षेत्र में घुसने नहीं देती इसीलिए दोहरी मेहनत होती है। काडर राज्य से दूर रहने के लिए अधिकारी नागरिक खुफिया एजेंसियों में पड़े रहते हैं। वहीं खुफिया पर लगातार ध्यान देने की जरूरत को नकारा नहीं जा सकता है। ऐसा नहीं हो सकता कि जब कोई बड़ी घटना घटे तब इस तरफ ध्यान दिया जाए और फिर अगले ही पल आप इसे भूल जाएं। प्रतिस्पर्धा और नंबर बढ़ाने के खेल से समस्या पैदा होती है। संस्थाओं को समझना होगा कि समय अहम है न कि यह कि जानकारी कौन दे रहा है।

एक सच यह भी है कि सुधार अचानक नहीं हो सकते। इसमें समय लगेगा। विभागीय बंटवारे, द्वेष और दूरदृष्टि की कमी भी अड़चन का काम करेगी. इसीलिए विशेषज्ञों का मानना है कि विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय ही समस्या का हल है। हमारे यहां आईबी गृह मंत्री को रिपोर्ट करती है, रिसर्च एंड अनालिसिस विंग(रॉ) प्रधानमंत्री को, ज्वाइंट इंटेलीजेंस कमेटी (जेआईसी), एविएशन रिसर्च ब्यूरो (एआरसी) और नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (एनटीआरओ) जैसी एजेंसियां भी हैं जो राष्ट्रीय  सुरक्षा परिषद को रिपोर्ट करती हैं। सेना के पास अपनी खुफिया एजेंसियां हैं जो थल सेना, जल सेना और वायु सेना के लिए काम करती हैं, सभी के ऊपर नेशनल इंटेलीजेंस एजेंसी नाम की संस्था है। वित्तीय खुफिया जांच के लिए अन्य एजेंसियां हैं। इनमें आयकर, सीमा शुल्क और उत्पाद शुल्क के निदेशालय शामिल हैं। इसके अलावा राज्य स्तरीय खुफिया एजेंसियां और विशेष प्रकोष्ठ भी हैं जो खुफिया का ही काम करते हैं। पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने 2009 में इंटेलीजेंस ब्यूरो के समारोह में भाषण देते हुए स्वीकार किया था कि महत्वपूर्ण खुफिया जानकारी के सभी डेटाबेस को एक साथ जोडऩे की जरूरत है। नागरिक और सैन्य खुफिया के बीच की दूरी भी बड़ा मसला है। परंपरागत रूप से रॉ का सचिव मौके और वक्त के हिसाब से प्रधानमंत्री को रिपोर्ट देता रहता है और आईबी का निदेशक गृह मंत्री को। इसमें सैन्य खुफिया यानी मिलिट्री इंटेलीजेंस (एमआई) के पास ऐसा कोई फोरम ही नहीं बचता जहां वह अपनी बात कह सके।

हर बड़े हादसे के बाद सूचना तंत्र की कमजोरी सामने आती है और कुछ दिनों हाय-तौबा करने के बाद इस गंभीर सवाल पर मिट्टी डाल दी जाती है। इससे सरकार की नीयत पर भी संदेह उठता है। क्या खुफिया तंत्र ठीक है। वह सही समय पर सूचनाएं सरकार तक पहुंचा रहा है और सरकार कानों में तेल डालकर बैठी है? क्या सरकार महंगाई या अन्य गंभीर मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने के लिए हिंसक घटनाएं होने देना चाहती है। अगर नहीं तो ऐसे कदम उठाए जाना जरूरी हैं, जिनसे खुफिया तंत्र को मजबूत किया जा सके, ताकि सरकार को समय पर सूचनाएं मिलें और देश हिंसा की लपटों में घिरने से बच सके। महाराष्ट्र सरकार 50 हजार लोगों की रैली निकालने को मंजूरी दे देती है और इसमें शामिल लोगों के मंसूबों से कोई सरोकार नहीं रखती, यह बात हैरान करने वाली है।

स्टाफ की कमी बड़ी समस्या है। चिदंबरम ने इसी साल अप्रैल में लोकसभा को बताया कि प्रति 100,000 लोगों पर (पुलिस-जनसंख्या अनुपात) अनुमोदित और वास्तविक पुलिस बल क्रमश: 145.25 और 117.09 है। भारत में प्रति 100,000 लोगों पर 130 पुलिसकर्मी हैं जबकि संयुक्त राष्ट्र के मानकों में यह संख्या न्यूनतम 220 होनी चाहिए. इस मानक को माना जाए तो भारत में 600,000 पुलिसकर्मियों की कमी है यानी अनुमोदित संख्या बल से करीब 25 फीसदी कम। खुफिया एजेंसियों और राज्य स्तर पर खुफिया विभाग में कार्मिकों का बड़ा टोटा है। जिला स्तर पर इंटेलीजेंस ब्यूरो में चार-पांच लोग होते हैं। सिपाही से उम्मीद रखी जाती है कि वह अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और बिना किसी प्रतिक्रिया के जरूरी जानकारी जुटाता रहे। मगर, बंदोबस्त, चुनाव, राजनीतिक रैलियों और वीआईपी ड्यूटी के चक्कर में उसके काम पर बुरा असर पड़ता है। राज्य सरकारों के पास खुफिया जानकारी जुटाने के लिए विशेष शाखाएं हैं मगर क्या किसी ने कभी इस बात की परवाह की है कि वहां किस तरह के लोग रखे जाते हैं?

विशेषज्ञ और विश्लेषक मानते हैं कि अब खुफिया तंत्र में पूरी तरह बदलाव लाने का समय आ गया है और साथ ही इसकी मुनासिब निगरानी भी होनी चाहिए, चाहे विभिन्न संसदीय समितियों की तर्ज पर निगरानी समिति बनाई जाए या फिर रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री, गृह मंत्री और वित्त मंत्री को शामिल करके प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति बनाई जाए। जरूरी है कि विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को शामिल किया जाए। सुरक्षा के लिए खुफिया तंत्र के  आधुनिकीकरण को जरूरी बताते हुए आईडीएसए ने प्रस्ताव रखा है कि भर्ती से लेकर प्रशिक्षण, वेतन और करियर में आगे बढऩे की प्रक्रिया में सुधार होना चाहिए ताकि प्रतिभावान लोग खुफिया तंत्र से जुडऩा पसंद करें।

अफसोस इस बात का है कि सुधारों को तब एजेंडा में रखा जाता है जब नुकसान हो चुका होता है। इसीलिए हम हमेशा पीछे भागते रहते हैं। यही वजह है कि हम आज तक ऐसा सिस्टम नहीं बना सके जो किसी उभरती हुई शक्ति के पास होना चाहिए। सुब्रामण्यम समिति की रिपोर्ट काफी समझ-बूझ के साथ तैयार की गई थी मगर लागू करने के मामले में हम कभी सफल नहीं हो सकते। बड़ी समस्या यह है कि जो एजेंसियां स्थापित हो चुकी हैं वही विरोध करती हैं ताकि उनकी जगह खतरे में न पड़े। ऊपर से हमारे यहां राजनीतिक दृढ़ता भी नहीं है। बदलते वैश्विक परिदृश्य, आंतकवाद की बढ़ती चुनौतियों और दिन ब दिन मजबूत होते नक्सलवाद, ड्रग माफियाओं और तस्करों पर प्रभावी रोक के लिए खुफिया तंत्र के पेंच कसने की जरूरत है। खुफिया तंत्र की नाकामी देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा के लिए विस्फोटक स्थिति ओर हालात पैदा कर सकती है।

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Friday, November 30, 2012

1960 के बाद का सबसे बडा दंगा अहमदाबाद

दंगों में मरता कौन है?

1960 के बाद का सबसे बडा दंगा अहमदाबाद में हुआ। राज्य सरकार ने न्यायमूर्ति जगमोहन रेड्डी वाले जाँच आयोग ने अहमदाबाद के दंगों के बारे में जो आंकडे दिये। उनके मुताबिक इस दंगे में 6742 मकान और दुकान जलाई गयीं। इनमें सिर्फ 671 हिन्दुओं की थीं बाकी 6071 मुसलमानों की नष्ट हुई। कुल सम्पत्ति का मूल्य 42324068 रुपये था। जिसमें हिन्दू सम्पत्ति 7585845 रु. की थी और मुस्लिम सम्पत्ति 34738224 रुपये की। 512 मृतकों में 24 हिन्दू थे और 413 मुसलमान । बाकी 75 की शिनाख्त नहीं हो सकी थी।


इसके बाद का सबसे बडा दंगा 1970 में भिवंडी में हुआ। इसमें 78 लोग मारे गये। इनमें 17 हिन्दू थे और 59 मुसलमान। बाकी दो की शिनाख्त नहीं हो सकी। भिवंडी दंगे की जांच के लिए नियुक्त न्यायमूर्ति डी. वी. मेडन जांच आयोग के सामने जो बयान दिये गये। उनसे यह प्रकट हुआ कि इस दंगे में 6 मुसलमान औरतों के साथ बलात्कार हुआ। जबकि एक भी हिन्दू औरत बलात्कार की शिकार नहीं हुई। भिवंडी के दंगों के परिणामस्वरूप हुये जलगांव के दंगे में 43 लोग मारे गये, जिनमें एक हिन्दू और बाकी के 42 मुसलमान। नष्ट हुयी कुल सम्पत्ति में 3390977 रुपये मूल्य की सम्पत्ति मुसलमानों की थी और सिर्फ 83725 रुपये मूल्य की हिन्दुओं की।


1967 में रांची-हटिया और नौशेरा में हुये दंगों में मृतकों की कुल संख्या 184 थी। जिनमें 164 मुसलमान और तो 19 हिन्दू, एक की शिनाख्त नहीं हो सकी। जिन दंगों का ऊपर जिक्र आया है, वे 1960 के बाद के भारत के भयंकरतम दंगों में हैं। इसके अलावा जमशेदपुर, अलीगढ, वाराणसी और बंबई जैसे शहरों में भी दंगे हुयें हैं। इन दंगों में भी कमोबेश उपर वाली स्थिति ही रही। शायद ही कोई ऐसा दंगा हुआ होगा, जिसमें मरने वालों में 70 प्रतिशत से ज्यादा मुसलमान न रहें हों। नष्ट हुई सम्पत्ति में भी लगभग यही अनुपात रहा।


सबसे ज्यादा अजीब बात यह है कि लगभग हर दंगे में पुलिस के हाथों गिरफ्तार होने वालों में भी मुसलमानों की ही संख्या अधिक रहती है. मुसलमानों के ही अधिक घरों की तलाशियां भी होतीं हैं। पुलिस भी बहुसंख्यक समुदाय की तरह यह सोचती है कि दंगों के लिये जिम्मेदार मुसलमान हैं। लिहाजा वह यह मानती प्रतीत होती है कि दंगों पर तभी नियंत्रण पाया जा सकता है जब मुसलमानों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाएगी। लेकिन इसके बावजूद बहुसंख्यक समुदाय की यह धारणा, कि दंगों में मरने वालों में अधिकतर हिन्दू होतें हैं।

यह धारणा इतनी गहरी है कि तमाम सरकारी आंकडों के बावजूद आम हिन्दू इस बात को नहीं मानता कि वास्तव में दंगों में हिन्दू ज्यादा आक्रामक होतें हैं। इसको न मानने की बात को अगर गहराई से देखा जाय तो पता चलेगा कि इसके पीछे बचपन की वो धारणाएं काम करतीं हैं। जो बचपन से हर हिन्दू घर में बच्चे को यह सिखाया जाता है कि मुसलमान क्रूर होतें हैं और वे किसी की भी जान लेने में नहीं हिचकते। इसके विपरीत हिन्दू तो बडे क़ोमल हृदय का होता है और उसके लिये चींटी की भी जान लेना मुश्किल होता है।

अक्सर आम हिन्दू आपको यह कहते हुए मिलेगा कि अरे साहब ! हिन्दू घर में तो आपको सब्जी काटने की छूरी के अलावा कोई हथियार नहीं मिलेगा। आम हिन्दू का मानना है। कि आमतौर पर मुसलमान अपने घरों में हथियारों का जखीरा रखतें हैं। यही वजह है कि आम हिन्दू को दंगों में मरने वालों के सरकारी आंकडे भी अविश्वसनीय लगतें हैं। दूसरी ओर कोई भी सरकार आंकडों को इस ढंग से पेश करना नही चाहेगी। जिससे आम लोगों के बीच मे यह धारणा बने कि देश में अल्पसंख्यक असुरक्षित है।

Thursday, November 8, 2012

पेट्रोल कंपनियो के घाटे का सच .....!! नुकषाण करने वाली कंपनिया --- अपने शेर होल्डर्स को दे रही है डिविडंड !! Φ

पेट्रोल कंपनियो के घाटे का सच .....!! नुकषाण करने वाली कंपनिया --- अपने शेर होल्डर्स को दे रही है डिविडंड !! Φ

घाटा होने पर भी दिया डिविडंड ??? ---!!

जनता को समजाओ - अपनी अकल लगाओ --- दिन मे तारे दिखानेवाली कॉंग्रेस के वादो पे मत जाओ ![जुगल Éगुरु]

Hindustan Petroleum CorporationDividend - Dividend history of the Hindustan Petroleum Corporation

Definition of 'Dividend Policy'

The policy a company uses to decide how much it will pay out to shareholders in dividends. 

You can view Announcement Date, Effective Date, Dividend Type (Interim, Final and Special), and Percentage of Dividend given information for Hindustan Petroleum Corporation Ltd.

Dividends Declared
Announcement DateEffective DateDividend TypeDividend (%)Remarks
29/05/201230/08/2012Final85%Rs.8.50 per share(85%)Dividend
26/05/201108/09/2011Final140% 
26/05/201003/09/2010Final120% 
02/06/200913/08/2009Final52.5% 
29/05/200802/09/2008Final30%AGM
29/05/200717/08/2007Final120% 
12/12/200627/12/2006Interim60% 
25/05/200618/08/2006Final30%AGM
26/05/200502/09/2005Final100%AGM
29/11/200414/12/2004Interim50% 
01/06/200423/08/2004Final160%AGM
11/12/200329/12/2003Interim60% 
27/06/200305/09/2003Final180%AGM
03/01/200303/02/2003Interim20% 
30/05/200202/08/2002Final100%AGM
25/05/2001 Final100%AGM
10/07/2000 Final30% 
04/04/2000 Interim80% 
11/06/1999 Final110% 
23/06/1998 Final0% 
23/06/1997 Final40%

Indian Oil CorporationDividend - Dividend history of the Indian Oil Corporation

You can view Announcement Date, Effective Date, Dividend Type (Interim, Final and Special), and Percentage of Dividend given information for Indian Oil Corporation Ltd.
Dividends Declared
Announcement DateEffective DateDividend TypeDividend (%)Remarks
28/05/201205/09/2012Final50%Rs.5.00 per share(50%)Dividend
30/05/201115/09/2011Final95% 
28/05/201008/09/2010Final130% 
29/05/200902/09/2009Final75% 
28/05/200809/09/2008Final55%AGM
28/05/200710/09/2007Final130% 
07/12/200626/12/2006Interim60% 
26/05/200607/09/2006Final125%AGM
30/05/200508/09/2005Final100%AGM
07/12/200429/12/2004Interim45% 
08/06/200423/08/2004Final160%AGM
11/12/200301/01/2004Interim50% 
23/06/200318/09/2003Final160%AGM
02/01/200303/02/2003Interim50% 
18/06/200212/09/2002Final110%AGM
15/06/2001 Final95%AGM
05/08/2000 FinalN.A.%Nil Final Dividend
15/05/2000 Interim40%2nd Interim Dividend
31/01/2000 Interim35% 
02/06/1999 Final130%AGM & Dividend

Friday, November 2, 2012

नरेंद्रभाई आज जीस स्थान पर खडे हैं उन के पिछे वो पतिपत्नि का त्याग बहुत बडी भुमिका निभा चुका है ।

हम सब का भरोषा और विश्वास सच साबित हुआ - और मेरी बात का समर्थन सबूतो के साथ मीला - ▐ साभार: श्री भरोडिया(नरेंद्र भाई के बचपन के मित्र) !
नरेंद्रभाई आज जीस स्थान पर खडे हैं उन के पिछे वो पतिपत्नि का त्याग बहुत बडी भुमिका निभा चुका है । उन के निजी जीवन में हमारा कोइ अधिकार नही बनता दखल देने का । मिडिया में ये बात को गलत अंदाज में उछाला गया तो ये लिखना पडा ।
! ▐ जानिए मोदी जी की अनदेखि अन सुनी कहानी बचपन से आज तक की !!! - जुगल ईगुरु !

  • मेरा २४ घंटा सिर्फ देश के लिये ही है । ५ मिनिट भी मै किसी सगे को नही दे सकता । - Narendra Modi

  • उन्होंने मुझे देखा है की नही मालुम नही । अपने भाई को भी घुसने नही देते तो मै क्यों जाउ ।?? - Cousin of Narendra Modi
  • अपने घर संसार की बली, भाभी जी के अरमानों की बली, अपने ही संबंधियो से बेरुखी । ये सब नरेंद्र मोदीने किया है । उनका केरेक्टर ढिला है या मजबूत तय जनता करगी, कोंग्रेस या दिग्गी राजा नही ।
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ये बच्चा मुश्किल से १५-१६ सालका रहा होगा तब भारत-पाक की लडाई छीड गई । प्रधानमंत्री लाल बाहादुर शास्त्रीने मोरचा संभाला । देश का हौसला बढाने के लिए नारा दिया  ” जय जवान, जय किसान ” ईस नारे पर देश भर के सेवाभावी लोग, सेवाभावी संस्थाएं, खडे हो गये । आर.एस.एस भी उनमें से एक संस्था थी । लडाई के समय गुजरात के हर रोड पर, हर स्टेशन पर युवा लडके तैनात हो गये थे जरूरी साधन सामग्री ले कर । अगर सैनिकों का जथ्था, उन की गाडियां गुजरती है तो उन्हें जो मदद चाहिए मिल सके ।  ये बच्चा भी उन युवाओं के साथ स्टेशन के प्लेटफोर्म पर भागता फिरता था ।
 वो जमाना आज के मुकाबले अलग था । उस जमाने में माबाप के आगे बच्चों का कुछ नही चलता था । अगर बच्चा विद्रोह भी करता तो माबाप तो बाजुमें रहते सारे गांव के चाचे ताउ कान खिंचने लग जाते । बच्चे सब की ईज्जत करते थे तो मजबूर हो जाते थे, बडों की बात मानने के लिए । इसी आधार पर मा बापने जशोदाभाभी से उनका ब्याह करवा दिया,१९६८ में । लेकिन देश सेवा की ईतनी लगन लगी थी की ईसने जशोदाभाभी का स्विकार (गौना नही करवाया , असली शादी गौना होता था, इससे पहले लडके लडकी एक दुसरे का मुह भी नही देखते ) नही किया, चल पडे घर छोड कर । पिता भारत और मां भारती की सेवा के लिए अपने खूद के माबाप की भावना को ठेस पहुंचाया । ये किशोरावस्था थी, जहां आदमी दोराहे पे खडा होता है । उसने बडी राह, देशसेवा की राह पकडली ।
दौरान पोलिटिकल सायन्स की डिग्री हासिल कर ली । आर.एस.एस के प्रचारक भी बन गया । आज भारत के कितने नेता के पास पोलिटिकल सायन्स की सामान्य डिग्री भी है ?
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जब ईस बच्चे का नरेन्द्रभाई मोदी के नाम से जनता को परिचय हुआ तो एक गुजराती मेगेजीन (१९८४) में जशोदाभाभी का ईन्टर्व्यु छपा था । उसमें तस्विर थी, भाभी अपने पिताजी की किराने की दुकानमें हाथमें तराजु लिए बैठी थी, काफी खूश दिखती थी । बताती थी वो मुझे बुलायेंगे तब जाउंगी तबतक पिता की दुकानमें मदद करुंगी, मेरा भाई अशोक अभी छोटा है । लेकिन अब पता चला है भाभीने टिचरकी नौकरी कर ली थी, अब रिटायर्ड भी हो गई है और १०००० का पेन्शन भी मिलता है । एक सच्ची भारतिय नारी की तरह पति के बुलावे का ईन्तजार करती रही, पति के खिलाफ खभी नही बोली । मोदी के कारण ही उस के आसपास के लोग, अपनी स्कूल, पूरा रसोसणा गांव उस का मान सम्मान करता रहा हैं । लोगोने हर तरह की मदद की है, तकलिफ नही पडने दी है ।
२००७ में नरेन्द्रभाई के साले साबह अशोकभाईने कोशीश की दीदी और जीजा को मिलाने की लेकिन सफलता नही मिली । मोदी का कहना है के मेरा २४ घंटा सिर्फ देश के लिये ही है । ५ मिनिट भी मै किसी सगे को नही दे सकता । बात भी सही है । अपनी मां के अलावा उसे कोइ सगा मिल नही सकता, अपने सगे भाई भी नही । उन के सगे चचेरे भाई को मैंने कहा था तू अब नरेंद्रभाई के पास चला जा कहीं अच्छी जगह सेट कर देंगे मैं ईस मंदी मे कितना पगार दे देता हुं । उसने मुझे बताया छोडो सब । वो चले गए उस के बाद मेरा जनम हुआ है । मैंने भी उन्हें एक ही बार देखा है । उन्होंने मुझे देखा है की नही मालुम नही । अपने भाई को भी घुसने नही देते तो मै क्यों जाउ ।
उस की बात सही थी । मोदी गांव छोडकर गये तो किसी को पता नही था वो कहां है । कहा जाता है वो सिर्फ दो बार गांव आये हैं । एक बार पिता के अवसान के समय और दुसरी बार स्कूल की निव रखने के कार्यक्रम के लिए । उस समय भीड में उनकी छोटी बेहन भी उन्हें देखने आई थी, पास जानेकी हिम्मत नही कर पाई थी । मोदीने देख लिया या किसीने ध्यान दिलाया तो वो खूद उसके पास गये और हालचाल पूछ लिया ।
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जब मोदी पहलीबार मुख्यमंत्री बने तो उनका ही बचपन का दोस्त उन पर उबल पडा था । ” ये घांची अब तक लुक्खे की तरह भटकता था तो घर नही चला सकता था, अब नेता हो गया है, अब क्या कमी है, अब बहु को बुला लेना चाहिए ” । ये एक आम आदमी की आवाज थी । आम आदमी सोचता है की नेता बनते ही पैसे का पेड लग जाता है । बस अब उसे खा-पिकर राज करना है । आम नेता के लिए ये सही बात होगी मोदी के लिए नही ।
उन के तलाक के लिए भी सवाल उठे हैं । तलाक ईस लिए लिया जाता है की आदमी दूसरी शादी कर के जीवन में सेट हो सके । ईन की उमर थी तलाक ले के दूसरी शादी की तब शादी और तलाक का सारा मामला सामाजिक तरिके से होता था । तलाक में कभी कानून का दखल नही होता था । दोनों पक्ष के १०-१२ आदमी मिलकर तलाक दे देते थे । ये जिम्मेदारी माबाप की होती थी, तलाक लेनेवालों की नही । लेकिन समाज वकिल का बाप होता है राह देखता है बच्चों का मन बदलने का । उसे समजाने में टाईम पास कर देता है ।
लेकिन इस दौरान ये पतिपत्नी समाज से आगे बढ गए । भाभीने ठान लिया की मैं तलाक नही लुंगी । मरते दमतक नरेन्द्र ही मेरा पति रहेगा । और नरेन्द्रभाई भी मजबूर है । देश सेवा का ईतना बडा भार उठा लिया है की २४ घंटे में से ५ मिनट भी वो भाभी या अन्य सगे को नही दे सकते । भाभी भी ये समज चुकी है । देश के लिये आदमी मर जाता है तो ये तो सिर्फ पति का वियोग ही है ।
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अपने घर संसार की बली, भाभी जी के अरमानों की बली, अपने ही संबंधियो से बेरुखी । ये सब नरेंद्र मोदीने किया है । उनका केरेक्टर ढिला है या मजबूत तय जनता करगी, कोंग्रेस या दिग्गी राजा नही ।
नरेंद्रभाई आज जीस स्थान पर खडे हैं उन के पिछे वो पतिपत्नि का त्याग बहुत बडी भुमिका निभा चुका है । उन के निजी जीवन में हमारा कोइ अधिकार नही बनता दखल देने का ।  मिडिया में ये बात को गलत अंदाज में उछाला गया तो ये लिखना पडा ।

मेरी पोस्ट ये थी - जिसके जवाब मे मेरी बात और विषवास को समर्थन और ज्यादा सबूत मीले ! मे : श्री भरोडिया(नरेंद्र भाई के बचपन के मित्र) का दिल से धन्यवाद करता हूँ !
▐ क्यू है खामोश मोदी जी - यशोदाबेंन वाले आरोप पर ? ▐ Φ यशोदाबेन ने कहा था,‘मोदी मेरे पति और मैं उनके खिलाफ कुछ नहीं बोलूंगी। मुझे खुशी है हम दोनों समाज सेवा कर रहे हैं।’ [Φ वो नेशनल लीडर हैं, बहुत सुंदर और पढ़-लिखे हैं, मैं तो उनके सामने कुछ भी नहीं।....]
▐ अगर ये बात सच है तो शर्म आनी चाहिए उन गंदे खून वालi - चरित्रहीनता जिनके डीएनए मे है और नहेरु के वंश से है ......! ऐसी देवी जैसी स्त्री का नाम सारे बाजार उछाल के अपने संस्कार और पैदाइश मे पूरे गाँव की सहकारी महनत योजना दर्शाती है ! ▐
मोदी और यशोदाबेन की शादी बचपन में हुई थी, लेकिन उनका ‘गौना’नहीं हुआ। उस जमाने में बाल विवाह की प्रथा थी और मोदी की भी इसी प्रथा के तहत शादी कर दी गई थी। इसके बाद उनका झुकाव संघ की ओर हो गया और उन्होंने अविवाहित रहने का फैसला किया। यशोदाबेन ने भी मोदी के फैसले का सम्मान किया, लेकिल उन्होंने भी शादी नहीं की।
यशोदाबेन स्कूल टीचर थीं और वो भी समाजसेवा में जुटी हैं। हाँ उनका और गाँव का इंटरव्यू मैंने भी देखा है ! यशोदाबेन के करीबी कहते हैं कि वो इस बात से खुश हैं कि मोदी और वो दोनों समाज की सेवा कर रहे हैं। इंटरनेट पर यशोदाबेन और उनके नाते रिश्तेदारों के बयान वाले कुछ वीडियो भी हैं, जिनमें यशोदाबेन के मोदी की पत्नी होने की बात कही गई है।
2009 में एक मैगजीन ने अपनी रिपोर्ट में यशोदाबेन नाम की महिला से बातचीत की थी और ये दावा किया था वो मोदी की पत्नी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक यशोदाबेन गुजरात के राजोसाना गांव में रहती हैं और जिस समय ये रिपोर्ट आई थी तब वो उसी गांव के स्कूल में पढ़ाती थीं। मैगजीन के मुताबिक यशोदाबेन ने कहा, ‘हां मोदी से मेरी शादी हुई थी, लेकिन हम अलग रहते हैं। वो नेशनल लीडर हैं, बहुत सुंदर और पढ़-लिखे हैं, मैं तो उनके सामने कुछ भी नहीं। ’मैगजीन ने यशोदाबेन के हवाले से लिखा था कि मोदी और उनकी शादी वाडनगर गांव में हुई थी। शादी के कुछ दिन बाद वो पढ़ाई पूरी करने के लिए अपने घर वापस लौट आईं और फिर कभी वापस नहीं गईं।
▐ रिपोर्ट में राजोसाना गांव के लोगों के भी बयान दिए गए थे। उस गांव के सभी लोग यशोदाबेन को मोदी की पत्नी के तौर पर ही जानते हैं। वो कहते हैं कि यशोदाबेन अहमदाबाद कभी कभी जाती हैं, लेकिन मोदी ने उन्हें कभी बुलाया नहीं। वो मुस्लिमों के बच्चों को पढ़ाती हैं और उनकी सेवा करती हैं। इस मैगजीन से बातचीत में यशोदाबेन ने कहा था,‘मोदी मेरे पति और मैं उनके खिलाफ कुछ नहीं बोलूंगी। मुझे खुशी है हम दोनों समाज सेवा कर रहे हैं।’
▐ Φ अगर ये बात सच है तो शर्म आनी चाहिए उन गंदे खून वालi - चरित्रहीनता जिनके डीएनए मे है और नहेरु के वंश से है ......! ऐसी देवी जैसी स्त्री का नाम सारे बाजार उछाल के अपने संस्कार और पैदाइश मे पूरे गाँव की सहाकरी योजना दर्शाती है ! एक तरफ तीन तीन बार शादी करनेवाला वो थरूर ..... और अपने 19 साल के बेटे को और 2 -2 पति को गरीब होने पर छोड देनेवाली सुनंदा, [ नयी सूचना और सबूतो के आधार पर उसके दूसरे पति को आत्म हत्या करनी पड़ी थी- क्यूँ की दुबई मे उसके द्वारा खर्च किए गए करोड़ो का बोज उसके दूसरे पति मैनन पर ला दिया था , इस लिए मेनन का कंस्ट्रक्षण बिजनेस बर्बाद हुआ और जैसा की मीने पहले कहा था की आर्थिक बदहाली की वजह से मेनन को दुबई से भारत वापिस आना पड़ा था , लेकिन उसके बाद भी उसने सुनन्दा को बहुत ही रिक्वेस्ट की थी लेकिन थरूर के साथ लगी हुई वो दुबई छोड कर नहीं आई , और उसके दूसरे पति मेनन ने आत्महत्या कर ली जिसको सुनन्दा और उसके फौजी पिता अकस्मात मौत बता रहे थे !]
Φ अपने जिस्म को सीढी बनाकर तीसरी शादी के लिए थरूर तक पहुंची ! और आगे की कोई गेरंटी नहीं है ! भारतीय संस्कृति पर कलंक जैसा ये ये सुनंदा - शशि का युगल और
▐ भारतीयता और हिन्दू संस्कृति को अपनी नस नस मे खून की तरह दौड़ रहा है ऐसा नरेंद्र मोदी और यशोदा बहन का युगल ! ▐ जिनहोने अपनी बचपन की शादी को ना निभाते हुए भी एक भारतीय नारी और एक संसार त्यागी पुरुष बनकर निभा रहे है ! और मोदी जी की देश सेवा के यज्ञ मे अपनी ख्वाहिशों का हवन करने वाली और , दूसरी शादी ना कर के भी पवित्रता से पतिव्रत निभानेवाली उस यशोदा बहन --- यशोदा माँ जैसी है ! उनको मे साष्टांग प्रणाम मोदी जी से भी पहले करूंगा ! ▐
▐ क्यूँ की पुरुष और प्रदेश दोनों के उत्थान और पतन के केंद्र मे नारी होती है ! आज अगर उनको कोई भी शिकायत होती ......... तो मोदी जी की नकली सेक्स सीडी बनाने के लिए साउथ की अभिनेत्री ओ को और तहलका को हाई टेक फर्जी वीडियो बनवाने का कोंटरेक्ट देने वाली ये कॉंग्रेस इस मुद्दे को छोड़ती क्या ? ▐ चलो वो तो छोड भी दे क्यूँ की उनके खुद के ही हर गली हर नुक्कड़ पर नारी शोषण के कांड होते रहते है , ▐ लेकिन मीडिया .... मोदी जी को छिंक भी आए तो देश भर मे सनसनी की तरह पेश करने वाली मीडिया ..... जो कॉंग्रेस के फेंके टुकड़ो पर पलनेवाली,▬ और हर दुखद कांड या घटना मे देश वासियो की लाशों की बोटियों को आपस मे बाँट कर अपनी रोटी का निवाला बनाने वाली,▬ ये मीडिया क्या इस मुद्दे को छोड़ती क्या !
▐ मोदी के नाम के 2 अक्षर जिनकी टीआरपी और अखबार मेगेजीन की बिक्री कई गुना कर देती है तो ये मुद्दा तो उनके लिए बहुत बड़ा चांस था ! और ये बात सच इस लिए मानने योग्य है क्यूँ की यशोदा बहन ने जब खुद ही कहा की वह खुश है और उनको मोदी जी से कोई शिकायत बाजू पर रही ऊपर से गर्व है ....तो जमीन ही ताकनी पड़ी होगी शर्म से उन बेशर्मो को !
▐ तो ऐसी बात हमे क्यूँ बताए ! ? क्यूँ की इसको रहस्य ही रहने दे कर अपने न्यूझ के हेडलाइन के टाइटल बनाने का मौका भी चला जाता जो आज उनको मीला है !
▐ अगर आप ऐसे हालत मे हो तो आप अपने पारिवारिक जीवन के बारे मे क्या सार्वजनिक करेंगे? अगर खुद को शादी शुदा बताए - तो उन्होने एक भी दिन क्या सांसरिक जीवन का बिताया है ? और उन्होने खुद कभी बाल ब्रह्मचारी नहीं कहा और इस बात पे मौन है ....क्यूँ की वे भी मन ही मन यशोदा बहन के निस्वार्थ त्याग के रूण के नीचे है ...... और सिर्फ वे हि क्यूँ पूरा गुजरात उनका ऋणी है , और कल पूरा देश होगा ...जिसने इक योगी पुरुष का रास्ता न भटका कर खुद को भी उनही की तरह अलग राह पर जन सेवा मे समर्पित कर दिया !▐
▬ आप मूजे चाहे चमचा कह लो मोदी जी का , चाहे नाजायज औलाद {जो मूज जैसे अकेले अनाथ के लिए गर्व की बात होती }, पर अंध भक्त बिलकुल नहीं हूँ ! एक वक्त मे खुद कॉंग्रेस के करीब शक्ति सिंह गोहेल वर्ष 1996- 1999 भावनगर रह चुका हूँ - कॉलेज के दिनो मे मेरे बिन नेता पद के भी नेतृत्व को केश करवाते थे ..और रेलियों मे भीड़ जुटाते थे.... क्यूँ की लड़किया सिर्फ मूज पे भरोसा करती थी .....! एक को छोड़ कर सभी को बहन ही बान लिया था ...इस लिए !! . हनुमंत सिंह चूड़ासमा नाम क एक भावनगरी कोंग्रेसी और बदले मे मे सिर्फ विद्यार्थी हीतो के काम और भावनगर शहर की बापूगीरी मे , मेरे बीपीटीआई कॉलेज सर्कल की सहपाठी और लड़कियो को निर्भीकता का वचन ! ▐
▐ मे ही हूँ जो बीजेपी और कॉंग्रेस के निजी युद्ध के कारण अपना करीयर और डिग्री गंवाई - एक शानदार भविष्य गंवाया - जब बीजेपी की सरकार थी - केशु भाई सीएम थे - और भरत बारोट - टेकनिकल शिक्षा मंत्री - जिनकी केबिन के अंदर जा कर मैंने आसमान सर पे उठा लिया था , खुद को निर्दोष साबित करने के लिए ... तब मूजे जवाब मिला था की कभी कभी सूखे घास के साथ हरी घास भी जल जाती है ! और मूज जैसे एक के लिए उनके पास कोई वक्त नहीं है ! तब से ही मे धूर विरोधी था - बीजेपी और केशुभाई का ! और हर राजनीतिज्ञ का ....... लेकिन जीवन मे हादसो की कतार लिए हमेशा जलता ही रहा हूँ बदनसीबी की आग मे - जब मेरा प्रेम और पारिवारिक जीवन भी बर्बाद हो गया - क्यूँ की मूजे चुनना था - केनेडा मे ग्रीन कार्ड और जॉब - या फिर देश मे ही रहकर मेरे जेसो के साथ हुए अन्याय के लिए लड़ना ...... तो मैंने भी .... केनेडा छोड़ दिया था .....! और देश को चुना था !
▐ जब सब कुछ लूट गया तो मरने की धुन सवार हो गई , लेकिन जीवन व्यर्थ गया था इस लिए मौत किसी के काम आ जाये इस लिए --- मरते मरते भी किसी एक की जिंदगी बचाता जाऊन - न्याय दिलाता जाऊन - इस लिए एक एनजीओ मे जूड़ा --- NEST India - Fights Against Crime and Corruption ! और ऐसे ऐसे पंगे लिए फिर भी सिर्फ धमकिया और एक ही बार खूनी हमला ---- उसमे भी मूजसे ज्यादा हमला करने वाला घायल हुआ बेचारे को अस्पताल भी मेरी टिम ले कर गई थी ....! कोई मार डाले इस इंतजार मे बहुत वक्त ना गंवा कर अपने कोम्प्यूटर पे ही ध्यान केन्द्रीत रखकर मुफ्त मे शिक्षा देना शुरू किया जिस कोर्स के 50,000 से 1 लाख तक फीस थे उसको मुफ्त मे करवाया पहले अपने गाँव मे और फिर बरोड़ा , अहमदाबाद और अब भरूच अंकलेश्वर - जहां जॉब मिली वहाँ फूल टाइम जॉब भी की पार्ट टाइम लोगो की मदद - [ जिसमे मेरा खुद का स्वार्थ था क्यूँ की मेरा अहम संतुस्ट होता था, की मे भी काम का हूँ , किसी को तो काम लगा ] करता रहा ! और एक दुर्घटना ने मौजे मेरे ही परीवार और समाज के कुछ लोगो के जूठे आरोपो और उनकी हलकी मानसिकता और नियत को सबूत के साथ पोल-खोल के लिए ही फेसबुक पे आया था !! फिर जिस तरह से फेसबुक मे देश प्रेम जग रहा था उस को देख कर अपना खुद का बदला लेना भूल गया और देश के लिए बदला लेने लगा !↨ क्यूँ की देश के असली इतिहास - किताबी और स्कूली नहीं - जानता था और बरबादी के मूल मे कौन है वो भी ! और बचपन से - आप कहेंगे मूजे किसने शिखाया तो वो है ---- नगेंद्र विजय और हर्षल पुष्कर्णा भारत का सबसे पहला एक मात्र सायन्स मेगेझिन - जो गुजराती और अब अङ्ग्रेज़ी मे प्रकाशित होता है और -सफारी - जिसने मेरे संस्कारो और देश भक्ति का माँ-बाप बनके सींचा है - जिसने मूजे हर विषय मे जानकार बनाया है ! उस ज्ञान के भंडार जैसे ... हर घर मे गीता रामायण के साथ ये मेगेजीन होना जरूरी है ! www.safari-india.com ▐ तो ये राम कहानी से आपका दिमाग खराब करना उद्देश्य नही था ...उद्देश्य वही की जब कोई खुद को और अपनी निजी जीवन को त्याग कर लोगो की और देश की सेवा मे समर्पित किया हो , ऐसे लोगो की भावनाओ का आदर करे ...क्यूँ की मे खुद उस श्रेणी मे आता हूँ ! और मोदी जी के मौन को समज शकता हूँ ! जिनके सीएम पद पर आने के बाद - बस चंद फेक्स - ईमेल और फोन कॉल से मैंने न्याय दिलाया है ---- जिनकी सीएमओ से मूजे पूर्ण सुरक्षा का वादा मीला था और निभाया भी था ..... जिसमे मूजे कहा गया था की अगर आप ने किसी के मांगने पर घूस दी तो आप पर भी कार्यवाही होगी ! और फ़ीर जा के माना मोदित्व मे व जयते !!
और सिस्टम और गवर्नमेंट के नंगेपन को एक के बाद एक कपड़े पहनते हुए देखा है ---! खुद को सर्वोपरि समाजने वाले --- अधिकारियों को पहली बार वे सरकार और जनता के नौकर है इस बात का एहसास होते हुए देखा है और एक एप्लीकेशन पे दौड़ते हुए देखा है ! एक अंकलेश्वर के एएसआई के नाम पर की गई मेरी फरियाद के दिन के तीसरे दिन के बाद ही विधान सभा चुनाव थे .....! मैंने सोचा था 1-2 महीने मे उसकी लग जाएगी ....! लेकिन तीसरे ही दीन उसको सस्पेंड होते हुए देखा है ----! जिस दिन से चुनाव शुरू हो रहे थे ....! उसी दिन आम आदमी की अर्जी का रिसपोन्स ????? आश्चर्य है ना !! आपसे पूछता हु...अपने कभी अपने या अपने आसपास हो रहे अन्याय- भ्राष्टाचार और गुनाह के सामने आवाज उठाई है ? है तो कहाँ तक ? सीएमओ फोन या लेटर से फेक्स से संपर्क किया है .... और अगर आप समजते है की आप को तब भी न्याय नहीं मीला .....तो आपका वो तथा कथित न्याय क्या किसी अन्य के लिए अन्यायपूर्ण था ? अगर आप खुद ही अपने आसपास की गण्डकी साफ नहीं करना चाहते तो उस गंदगी के सड़ने पर बीमार हो कर सरकार पे उंगली उठाने का आपको कोई हक नहीं ...! जय हिन्द - जय गुजरात ! मोदी सिर्फ एक ही बात ! █▌║││█║▌│║█║▌© Official Jugal Eguru™ page ✔ Help us for Grow . Like ✔ Tag ✔ Share ♥

Sunday, October 28, 2012

इलेक्शन कमीशन या फिर कॉंग्रेस का ही मीशन !

इलेक्शन कमीशन या फिर कॉंग्रेस का ही मीशन !

पेड न्यूज के दोषी अमर उजाला और जी-न्यूज को को सम्मानित किया है इलेक्शन कमीशन ने ! जैसा तरह कॉंग्रेस का मीशन रहा है की हर घोटाले बाज की पदोन्नति कर देते है ! तब अब ये चुनाव आयोग भी ऐसे महाभियोग से बच नहीं पाया !

लोकसभा चुनाव के दौरान पेड न्यूज का कोराबार करने के दोषी करार दिये गये अमर उजाला को अब देश का इलेक्शन कमीशन लोकतंत्र को मजबूत करनेवाली पत्रकारिता के पुरस्कार से पुरस्कृत करेगा. वह भी ऐसे वक्त में जब एक तरफ पेड न्यूज पर नजर रखने के लिए नयी गाइडलाइन तैयार की जा रही हैं वहीं प्रेस परिषद द्वारा दोषी करार दिये गये अखबार को जनता को जागरुक के लिए पुरस्कृत किया  है.

इलेक्शन कमीशन ने इसी साल 23 जनवरी को घोषणा किया था कि हर साल मतदाता दिवस पर वह ऐसे समाचार माध्यमों या संस्थाओं को पुरस्कृत करेगा जो मतदाताओं को जागरूक करने का काम करते हैं. यह पुरस्कार मतदाता जागरूकता दिवस 23 जनवरी को दिया जाएगा.  इस साल चुनाव आयोग ने जिन दो मीडिया घरानों को यह पुरस्कार देने के लिए चुना उसमें एक जी न्यूज है तो दूसरा अमर उजाला है. इन दोनों को यह पुरस्कार उत्तराखण्ड और उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान की गई रिपोर्टिंग के लिए पुरस्कृत किया जाएगा.

चुनाव आयोग ने अपना ही साल दो साल पुराना रिकार्ड चेक नहीं किया जब इसी अमर उजाला के खिलाफ चुनाव आयोग में भी शिकायत की गई थी कि उसने लोकसभा चुनाव के दौरान 2009 में एक उम्मीदवार से खबर छापने के लिए पैसे की मांग की थी. उस वक्त योगेन्द्र कुमार नामक एक प्रत्याशी ने चुनाव आयोग और प्रेस परिषद से दो अखबारों की शिकायत थी. इसमें एक दैनिक जागरण था और दूसरा अमर उजाला. उस उम्मीदवार की शिकायत पर प्रेस परिषद ने जांच की और फैसला भी सुनाया था. प्रेस परिषद ने अमर उजाला को पेड न्यूज का दोषी पाया था. अब उसी अमर उजाला को चुनाव आयोग इस बात के लिए पुरस्कृत कर रहा है, कि चुनाव के दौरान मतदाताओं को जागरुक करने के लिए इस अखबार ने बेहतरीन काम किया है.

और जी-न्यूज भी आज खुद नवीन जीदाल के रीवर्स स्टींग से आरोपो के घेरे मे है ! अब तक लगता था की सिर्फ टीवी चेनल ही बीके न्यूझ देते है ! लेकिन मेरा एक साल पहले का एक गुजराती लेख , सार्थक होता दिख रहा है की यह चेनल का दूषण अब प्रिंट मीडिया मे भी घुस गया है ! अब बात ये सोचनेवाली है की गुजरात मे जिस तरह आर्थिक हेर फेर को आचार संहिता के दायरे मे ला कर जिस तरह सामान्य व्यापारी गण और आम इंसान को परेशान कर रहा है तो उसकी निष्पक्षता पर सवाल लाजमी है ! अभी पीछले हफ्ते ही एक सोनी व्यापारी की एक किलो चांदी आचार समहीता के नाम पर जप्त कर ली थी ! गुजरात मे इतनी समृद्धता है की ज़्यादातर व्यापारी के जेब से ही 2-3 लाख यूही निकल जाएँगे ! तो 2 लाख की रकम की हेरफेर को आचार संहिता के दायरे मे ला कर आखिर चुनाव आयोग गुजरात और गेर कोंग्रेसी राज्यो मे ही क्यूँ इतनी सख्ती से पेश आ रहा है ! क्या इसमे भी कोई पैड आयोग का मामला है ?

सवाल यह है कि ऐसे वक्त में जब चुनाव आयोग खुद पेड न्यूज को रोकने के लिए सख्त गाइडलाइन बना रहा है तब दागदार छवि वाले अखबारों को पुरस्कार करके वह कौन सी परंपरा कायम करना चाह रहा है?

Friday, October 26, 2012

केजरीवाल के अभियान - भारत की अर्थव्यवस्था बिगाड़ रहे है ![ जरूर पढे नग्न सत्य]केजरीवाल की चियरगर्ल्स किसके जनानखाने से बरामद होती है?


फोर्ड फाउंडेशन’ का इतिहास रहा है कि वह अमेरिकी हितों के लिए काम करने वाली संस्थाओं और व्यक्तिओं को प्रायोजित करती है।
‘टीम केजरीवाल’ का दावा है कि भारत के मौजूदा सभी राजनीतिक दल भ्रष्ट हैं इसलिए उनकी टीम अब स्वयं राजनीतिक विकल्प पेश कर भ्रष्टाचार को नेस्तानाबूद करेगी। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि भ्रष्टाचार पर नियंत्रण आवश्यक है, पर क्या भ्रष्टाचार का खात्मा करने में ‘टीम केजरीवाल’समर्थ है?
‘टीम केजरीवाल’ पर कालिख: पखवाड़े भर में केजरीवाल ने राजनीति से जुड़े तीन लोगों पर आरोप लगाए और इसी दौरान उन्हें खुद इस मुद्दे पर रक्षात्मक रवैया अपनाने को मजबूर होकर अपनी ही टीम के तीन प्रमुख सदस्यों प्रशांत भूषण, अंजली दमानिया और मयंक गांधी पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए.पी. शाह की अध्यक्षता में त्रिसदस्यीय अंतर्गत लोकपाल गठित करना पड़ा। अभी न्यायमूर्ति ए.पी. शाह ने जांच शुरू भी नहीं की थी कि तीन सदस्यीय लोकपाल गठित करने का फैसला करने वाले अरविंद केजरीवाल पर ही आरोप उछलने लगे। आरोप है कि केजरीवाल ‘कबीर’ नामक जिस एनजीओ से जुड़े हैं उसे अमेरिका के फोर्ड फाउंडेशन से सन् 2005 में 1,72ए000 अमेरिकी डॉलर तथा 2009 में 1,17,000 अमेरिकी डॉलर की रकम चंदे के तौर पर प्राप्त हुई है। तमाम राजनीतिक दल केजरीवाल के अभियान को अमेरिकी और यूरोपीय संस्थाओं द्वारा पोषित होने का आरोप लगाते रहे हैं। ब्रिक (ब्राजील, रूस, चीन और भारत) समूह द्वारा 2010 में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक से हटकर अपने समूह की नई बैंक गठित करने की घोषणा के बाद इन देशों में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन छिड़े। परिणामस्वरूप चारों देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर चोट लगी, चारों देशों की मुद्रा का अवमूल्यन हुआ और चारों देशों में राजनीतिक वर्ग के खिलाफ अविश्वास का माहौल बना। ‘फोर्ड फाउंडेशन’ का इतिहास रहा है कि वह अमेरिकी हितों के लिए काम करने वाली संस्थाओं और व्यक्तिओं को प्रायोजित करती है।
सब चंदे का खेल: ‘टीम अण्णा’ से मिलकर जब 2011 में डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने जनलोकपाल विधेयक प्रारूप समिति का गठन किया था तब केजरीवाल, किरण बेदी और अण्णा हजारे लोकपाल पद पर नियुक्ति के लिए पात्र व्यक्तियों के मापदंड में मैगासेस पुरस्कार प्राप्त व्यकित का आग्रह रख रहे थे। सनद रहे कि ये सब मैगासेस पुरस्कार से नवाजे चुके हैं। आम आदमी इस तथ्य से अपरिचित है कि मैगासेस पुरस्कार का एक प्रमुख प्रायोजक ‘फोर्ड फाउंडेशन’ है। जब अण्णा हजारे को अगस्त 2011 में सरकार नई दिल्ली में अनशन करने की अनुमति नहीं दे रही थी तब अमेरिकी दूतावास भी हजारे के समर्थन में बयानबाजी कर रहा था। केजरीवाल हर राजनीतिक दल और संस्था से पारदर्शिता की अपेक्षा करते हैं, पर उनकी संस्था को दान देने वाली संस्थाओं और व्यक्तियों की सूची आज दिन तक ‘कबीर’ संस्था की बेवसाइट पर क्यों उपलब्ध नहीं है? अमेरिका से संचालित एक एनजीओ है ‘आवाज’। इस एनजीओ ने लीबिया, ट्यूनीशिया, इजिप्त और सीरिया के सत्ताविरोधी आंदोलन की फंडिंग और सोशल मीडिया के माध्यम से नेटवर्किंग और प्रचार किया। ‘आवाज’ के रिकी पटेल और केजरीवाल ने संबंधों के बारे में बीते डेढ़ वर्षों में जब भी सवाल पूछा गया है ‘टीम अण्णा’ और ‘टीम केजरीवाल’ ने जवाब देने से कन्नी काटी है।
केजरीवाल का ‘भ्रष्टाचार’: केजरीवाल भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी के तौर पर अपना पूरा कार्यकाल दिल्ली में बिता चुके हैं और उनकी पत्नी आज भी दिल्ली में पोस्टिंग का लुत्फ ले रही हैं। दिल्ली या मुंबई में बिना रसूख के लंबी अवधि तक पोस्टिंग नहीं प्राप्त की जा सकती। आर्थिक न सही पर नैतिक तौर पर तो केजरीवाल पति-पत्नी साफ तौर पर भ्रष्ट नजर आते हैं। केजरीवाल सरकारी सेवा में रहते हुए अमेरिकी संस्था से अपने एनजीओ के लिए दान प्राप्त करते हैं, सो यह उनका आर्थिक भ्रष्टाचार ही माना जाएगा। अण्णा हजारे जब केजरीवाल के अभियान से भागने लगे तो उन्हें मनाने के लिए केजरीवाल 2 करोड़ रुपये का चेक लेकर गए थे। हजारे के साथी निजी वार्ता में आरोप लगाते हैं कि अनशन के दौरान केजरीवाल के चेलों ने लगभग 20 करोड़ रुपए चंदे के तौर पर जमा किए। जब इस राशि को लेकर टीम अण्णा हजारे के अंदरखाने में कहा-सुनी शुरू हुई तो केजरीवाल जमा राशि का 10 फीसदी हिस्सा लेकर अण्णा हजारे को लुभाने पहुंचे जिसे स्वीकारने से अण्णा ने साफ मना कर दिया। सो, स्पष्ट है कि केजरीवाल के हाथ कोयला दलाली से भले ही न काले हों पर उनका दामन कहीं से भी पाक-साफ नहीं है। रहा निवृत्त न्यायाधीशों से जांच कराने का ढोंग तो तमाम सरकारों बीते 65 वर्षों में ऐसी हजारों समितियां नियुक्त कर भ्रष्टाचारियों को ‘क्लीनचिट’ दिलाती रही हैं। ऐसे में केजरीवाल की भावी पार्टी भ्रष्टाचार से मुक्त होगी यह सोचना भी एक प्रकार का बौद्धिक भ्रष्टाचार होगा। ग्लोब व्यापी स्थिति यही है कि अमेरिका-यूरोप के विकसित देश हों या अफ्रीका-एशिया के विकासशील देश, हर नया शासक पिछले शासकों के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करता हुआ सत्ता संभालता है और कालांतर में पूर्ववर्ती शासक जितना ही अथवा उससे भी कहीं अधिक भ्रष्टाचार स्वयं कर दिखाता है।
भ्रष्टाचार विरोधी झंडाबरदार, अब भ्रष्ट: भारत के संदर्भ में देखें तो 1977 की जनता पार्टी सरकार इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी के भ्रष्टाचार की जांच से शुरू हुई थी और जनता के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के पुत्र कांति देसाई के भ्रष्टाचार के आरोपों के साथ विदा हुई। आज कौन मानेगा कि जेपी (जय प्रकाश नारायणद्ध और वीपी (विश्वनाथ प्रताप सिंह) के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों के झंडाबरदार आज के भ्रष्टाचार शिरोमणि मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव जैसे लोग रहे हैं। वीपी सिंह, चंद्रशेखर, देवेगौड़ा और गुजराल की समाजवादी सरकारें कहीं से भी कांग्रेस सरकारों से कम भ्रष्ट नहीं थी। ‘सबको देखा बार-बार, हमको देखें एक बार’ का नारा लगाती हुई अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार आई थी। उसे भी भ्रष्ट जयललिता के कंधे पर चढ़कर आना पड़ा और भ्रष्टाचार के आरोप झेलते हुए जाना पड़ा। कांग्रेस का इतिहास पं. जवाहरलाल नेहरू के सरकार में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन छेड़ने वाले दामाद फिरोज गांधी से शुरू होकर भ्रष्टाचारी दामाद रॉबर्ट वड्रा तक पहुंचा है। ऐसे में क्या भ्रष्टाचार हमारी व्यवस्था को लगा लाइलाज रोग मान लिया जाए? सत्ता में भ्रष्टाचार युग-युगांतर से चला आ रहा है तभी तो कौटिल्य ने ईसा पूर्व लिखे अपने ‘अर्थशास्त्र’ में राजा को सावधान किया है कि जिस भी अधिकारी के हाथ से होकर राजा की दौलत गुजरती है, वह उसमें से थोड़ी-सी खुद भोग लेने का लोभ संवरण नहीं कर पाता। इस तरह की चोरी अंततः राजा और राज्य दोनों को गरीब बनाती है इसलिए इसे रोकने का हरसंभव प्रयास किया जाना चाहिए। कौटिल्य के काल से चंद्रशेखर की सरकार तक हमारे देश में सत्ता संस्थानों में भ्रष्टाचार मौजूद जरूर था, पर उसका संस्थानीकरण नहीं हुआ था। संजय गांधी पर 1970 के दशक में भ्रष्टाचार के आरोप लगे। ‘किस्सा कुर्सी का’ जैसा मशहूर मुकद्मा चला, पर उन आरोपों को तमाम सरकारी प्रयास के बावजूद साबित नहीं किया जा सका।
भ्रष्टाचार को शिष्टाचार का स्वरूप: नब्बे के दशक के प्रारंभ तक भ्रष्टाचार के आरोप में पकड़े जाने पर समाज और बिरादरी में थू-थू होने की आशंका बरकरार रहती थी। 1991 में डॉ. मनमोहन सिंह ने आर्थिक उदारीकरण के साथ जो बेतहाशा बाजारवाद लाया उससे भ्रष्टाचार को शिष्टाचार का स्वरूप प्राप्त हो गया। मनमोहन सिंह ने अमेरिका से एक ऐसी प्रणाली आयात कर ली जिसमें भ्रष्टाचार और शोषण की रोकथाम के लिए कायदे-कानून तो मौजूद हैं लेकिन उसमें शोषण और रिश्वतखोरी को कभी सच्चे मन से अनैतिक करार नहीं दिया गया। अमेरिकी प्रणाली भ्रष्टाचार को कितना आत्मसात किए बैठी है उसे समझने के लिए ‘दि रॉबर बैरेन्स ऑफ अमेरिका’ पढ़ने से पर्याप्त दृष्टांत सामने आ जाते हैं कि कैसे बाजारवाद के चलते अच्छे से अच्छे नेताओं ने पूंजीपतियों के प्रभाव में आकर भ्रष्टाचार किए। अमेरिकी व्यवस्था में पूंजीपति प्रायोजित भ्रष्टाचार बीते दो शतकों से व्याप्त है। उन्नीसवीं सदी के दूसरे दशक में जनरल जैक्सन ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ही एक नया दल ‘डेमोक्रेट’ बनाया। उस समय भी अमेरिका में कितना भ्रष्टाचार था इसका अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि 1824 में राष्ट्रपति पद का चुनाव जीत जाने के बावजूद जनरल जैक्सन को प्रतिनिधि सभा ने हारा हुआ घोषित कर दिया। 1824 में जैक्सन दुबारा जब जीते तो उन्हें सत्ता मिली पर वे भ्रष्टाचार का खात्मा नहीं कर सके। 1970 के दशक में भारत की अधिकांश आबादी की ईमानदारी की गारंटी ली जा सकती थी, परंतु अमेरिका में तब तक ईमानदारी का लोप हो चुका था। 1970 के दशक में एक अमेरिकी पत्रिका ‘सायकोलॉजी टुडे’ ने पाठकों से पूछा कि अगर आपको 10 लाख डॉलर दिए जाएं तो बायबल के 10 निषेधों में से किस-किस को आप तोड़ेंगे? जवाब पाया गया कि तमाम अपराध करने के लिए अधिकांश लोग राजी थे। 1980 के दशक तक साम्यवादी और समाजवादी देशों ने बाजारवादी भोगवाद को अपने देशों में नहीं घुसने दिया था। 1980 के दशक में दूरसंचार क्रांति टेलीविजन और कंप्यूटर के माध्यम से इन देशों में घुसी जिसने बाजारवाद के वैभव को प्रचारित कर इन देशों में असंतोष की आग सुलगा दी। ब्रेजनेव के शासनकाल में सोवियत संघ के नागरिकों को विदेशी सैलानियों से घुलने-मिलने तक की इजाजत नहीं थी।
मनमोहन के रूसी संस्करण येल्तसिन: गोर्बाचेव ने ‘ग्लासनोस्त’ और ‘पेरेस्त्रोइका’ लाकर उदारवाद दिखाया तो सोवियत संघ में अवैध मुद्रा परिवर्तन और वेश्या व्यवसाय खुलकर शुरू हो गया। अमेरिकोन्मुखी प्रणाली ने गोर्बाचेव को नोबल शांति पुरस्कार दिला सत्ता से बाहर कर वहां मनमोहन सिंह के रूसी संस्करण येल्तसिन को सत्ता में स्थापित किया। अब रूसी कम्युनिस्ट सीधे क्रिमिनल बन गए और उनकी खुफिया एजेंसी केजीबी के अफसर माफिया। पुतिन के काल तक सोवियत संघ से बिखरा हर देश भ्रष्टाचार के निर्बाध संस्थानीकरण से बिलख रहा है। यह सारा प्रभाव अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां और उनके द्वारा प्रायोजित एनजीओ के चलते पड़ा है। भारत का मनमोहन काल भी सोवियत विघटन के समानांतर आया। चीन और ब्राजील पर भी अमेरिकी प्रभाव का यही परिणाम सप्रमाण पेश किया जा सकता है। अमेरिका और यूरोप के संदर्भ में खैरियत बस इतनी है कि वहां व्यक्तिगत स्तर के भ्रष्टाचार को रोकने का व्यापक प्रबंध है। वहां राजनीतिक दल पार्टी फंड के रूप में प्रतिष्ठित उद्योगों, व्यावसायों, व्यावसायिक समूहों और दलालों से तगड़ी रकम वसूल लेते हैं। उनका तर्क है कि आधुनिक चुनाव खर्च वहन करने के लिए ऐसा करना विधि सम्मत है। चूंकि वहां व्यक्तिगत भ्रष्टाचार के मामलों में दंड शीघ्र मिला सो उसे नियंत्रित किया जा सका। उन देशों को इस भ्रष्टाचार का भी सकारात्मक लाभ हुआ।
अमेरिका और यूरोप के लुटेरों ने दूसरे देशों की संपदा लूटी और अपने देश में विकास को गति दी, फिर भी उनका भ्रष्टाचार निंदित हुआ। भारत जैसे विकासशील देशों की स्थिति उलटी है यहां की शासक बिरादरी अपने ही गरीब भाइयों की संपदा लूट कर यूरोप में निवेश करती है। कांग्रेस और अन्य दलों के तमाम नेताओं पर इस तरह के आरोप लगे हैं। क्या टीम केजरीवाल इस लीक से हट पाएगी? कहावत है पूत के पांव पालने में दिखाई देते हैं। केजरीवाल जिस अंदाज में ‘आवाज’ और ‘फोर्ड फाउंडेशन’ से फंडिंग ले रहे हैं उससे कत्तई नहीं लगता कि सत्ता पाने पर वे राज दौलत भोगने के लोभ से बचेंगे। तब उनके अभियान को क्या कहा जाए? हमें तो उनकी टीम भ्रष्टाचार विरोधी ‘ट्वेंटी-ट्वेंटी’ के खेल में ‘चियरगर्ल्स’ से ज्यादा कुछ नजर नहीं आती। शाहरूख खान के आईपीएल टीम की एक चियरगर्ल पुणे में वेश्यावृत्ति में पकड़ी गई। देखना है केजरीवाल की चियरगर्ल्स किसके जनानखाने से बरामद होती है?

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Thursday, October 25, 2012

मिडीया की भड़वागीरी आखिर सबूत के साथ सामने Φ !जिंदल के स्टिंग ऑपरेशन के मुख्‍य अंश

नवीन जिंदल के स्टिंग ऑपरेशन के मुख्‍य अंश

नई दिल्‍ली: कांग्रेस सांसद और देश के बड़े उद्योगपति नवीन जिंदल ने जी न्यूज चैनल पर कोयला घोटाले की खबर न चलाने के एवज में 100 करोड़ की रंगदारी मांगने का आरोप लगाया है. दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस में नवीन जिंदल ने जी न्यूज के संपादकों के साथ बातचीत का टेप जारी किया.

इस वीडियो में जी न्‍यूज़ के मैनेजिंग एडिटर सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के संपादक समीर आहलूवालिया को जिंदल के अधिकारियों के साथ बातचीत करते हुए दिखाया गया है, जिसमें वे पैसों और कोयला घोटाले पर चर्चा कर रहे हैं.

हम यहां पर जी न्‍यूज़ और जिंदल के अधिकारियों के बीच बातचीत के कुछ अंश पेश कर रहे हैं:

समीर (जी टीवी): हर साल... 25 चार साल के लिए... हो सकता है कि हमारे कहने-सुनने में कुछ इधर-उधर हो गया हो.

समीर (जी टीवी): ये तो पहले से ही आराम से दिखाई जा रही है... अब दूसरा फेज़ यह है कि इसकी जो रिवर्स साइड है उसे भी हल्‍के तरीके से करेंगे. हमारे रिश्‍ते दोनों तरफ से दोनों के लिए फायदेमंद होने चाहिए.

सुधीर (जी टीवी): देखिए, एक तो ये है कि सबसे बड़ी सुरक्षा ये होती है कि इसके बाद कोई ऐसी चीज़ नहीं आएगी... अब इसके बाद कोई निगेटिव नहीं आएगा... इसके बाद कुछ नहीं आएगा... दूसरा ये है कि फिर सोचेंगे कि क्‍या, कैसे वो कराना है, कौन-सी चीज ऊपर डाली है, कौन सी नीचे डालनी है... क्‍योंकि हमारी कवरेज तो वैसे तो जारी रहेगे, क्‍योंकि कोयले पर तो हमारे पास कितनी सारी चीजें हैं... मतलब वो चलती रहेंगी.

सुधीर (जी टीवी): इसको हम जलदी से जल्‍दी कर लेते हैं, ताकि इससे हम खत्‍म हों और फिर जो आप बोल रहे हैं...

सुधीर (जी टीवी): फिर हम क्‍या करेंगे, फिर उस पर आप जो बोल रहे हो न... आगे का रोड मैप... फिर उस पर काम करना शुरू करेंगे.

सुधीर (जी टीवी): सबसे बड़ा फायदा जो है वो ये है कि इसके बाद कोई नुकसान नहीं होगा... मैं बता रहा हूं आपके वाले में जो सबसे नाजुक है उसमें आगे नुकसान हो सकता है... वो जो नुकसान है न वो रुक जाएगा.. मतलब आप मुसीबत में फंसने से बच जाएंगे...

समीर (जी टीवी): मैं आपसे कुछ अलग या अनोखा नहीं मांग रहा हूं. आप इस पर गौर करें, यह दरअसल दोनों के लिए फायदेमंद है. आप जितना मांग सकते हैं मैं उससे भी ज्‍यादा दूंगा. यह हमेशा ऐसे ही चलेगा. यह भी एकतरफा नहीं होगा. मैं आपसे यही कहना चाहता हूं.

खबरें दबाने के लिए जी न्यूज मांग रहा था पैसा: जिंदल -

 खबरें दबाने के लिए जी न्यूज मांग रहा था पैसा: जिंदल

 

 

 

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विडियोः नवीन जिंदल ने जारी किए जी ब्लैकमेल के 'सबूत'

 

 

 

 

 

 

 

नई दिल्ली।। जिंदल स्टील के अध्यक्ष नवीन जिंदल ने गुरुवार को जी न्यूज तथा जी पर खबरें दबाने के लिए 100 करोड़ रुपये का विज्ञापन मांगने का आरोप लगाया है। कांग्रेस सांसद जिंदल ने जी न्यूज तथा जी बिजनेस के खिलाफ पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है। इसके लिए उन्होंने एक स्टिंग ऑपरेशन का भी सहारा लिया। हालांकि, जी ग्रुप ने जिंदल के सारे दावों के बकवास करार दिया है।

जिंदल ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि जी ग्रुप के सम्पादक सुधीर चौधरी ने हमारी टीम से कहा कि वह तब तक हमारे खिलाफ निगेटिव खबरें दिखाते रहेंगे, जब तक कि हम उन्हें सालाना 20 करोड़ रुपये का विज्ञापन देने पर सहमति नहीं जताते। जिंदल ने कहा कि पहले उन्होंने 20 करोड़ रुपये मांगे और फिर 100 करोड़ रुपये की मांग की।

जिंदल ने कहा कि मीडिया ग्रुप ने उनकी कम्पनी के खिलाफ कुछ समाचार दिखाए थे, जिसके बाद जिंदल स्टील की टीम ने चैनलों से बातचीत शुरू की थी।

कांग्रेस सांसद ने एक सीडी भी जारी की, जिसमें चौधरी को रुपये मांगते हुए दिखाया गया है। उन्होंने कहा कि उनकी कम्पनी पिछले 40 साल से कारोबार कर रही है, लेकिन उन्हें इस तरह पहले कभी ब्लैकमेल नहीं किया गया।

जिंदल के दावे पर जी न्यूज ने कहा है कि नवीन जिंदल ने सीडी मीडिया के सामने पेश कर हकीकत को बरगलाने की कोशिश की। उन्होंने झूठी सीडी पेश की है। उन्होंने पूरी सीडी नहीं दिखाई। दरअसल कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले में फंसे जिंदल जी न्यूज पर चल रही खबरों को रुकवाना चाहते थे और इसके लिए वह किसी भी हद तक जाने को तैयार थे। वह लगातार जी न्यूज की टीम को फॉलो कर रहे थे और चाहते थे कि उनकी खबर रोक दी जाए। लेकिन, जी न्यूज ने उनके तमाम हथकंडों के बावजूद कोल ब्लॉक आंवटन से जुड़ी खबर का प्रसारण नहीं रोका।

 

नवीन जिंदल के जी न्यूज पर गंभीर आरोप


Jindal Steel

जिंदल स्टील एंड पावर के मालिक और कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल ने न्यूज चैनल जी न्यूज पर खबर रोकने के बदले पैसे मांगने के आरोप लगाए हैं।

नवीन जिंदल ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एक सीडी रिलीज की जिसमें जी बिजनेस के संपादक समीर अहलूवालिया और जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी को जिंदल ग्रुप के साथ पैसों की बात करते हुए दिखाया गया है।

नवीन जिंदल ने ये भी आरोप लगाया है कि जी न्यूज ने उन्हें पैसे नहीं देने पर कंपनी को बदनाम करने की धमकी भी दी थी। नवीन जिंदल का कहना है कि जी न्यूज ने खबर रोकने के लिए 100 करोड़ रुपये मांगे थे। इसके पहले नवीन जिंदल जी न्यूज और जी बिजनेस के खिलाफ एफआईआर भी कर चुके हैं।

जी न्यूज और जी बिजनेस ने इस खबर का खंडन किया है और कहा है कि नवीन जिंदल के लगाए गए सभी आरोप गलत हैं। बल्कि, जी न्यूज का कहना है कि जिंदल स्टील ने खबर रोकने के लिए उन्हें पैसे देने की पेशकश की थी लेकिन चैनल ने उनकी इस पेशकश को ठुकरा दिया।

जिंदल ने किया जी न्यूज का स्टिंग, ब्लैक मेलिंग का आरोप-देश - IBN Khabar

नई दिल्ली। कांग्रेस सांसद और उद्योगपति नवीन जिंदल ने कहा कि सितंबर से कोयले के आवंटन के मामले में जीटीवी हमारी कंपनी के खिलाफ गलत खबर दिखा रहा था। जब हमने न्यूज चैनल से बात करनी चाही तो हमसे 20 करोड़ रुपये मांगे गए। बाद में ये रकम बढ़ाकर सौ करोड़ कर दी गई।

नवीन जिंदल ने जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के संपादक समीर आहलूवालिया पर आरोप लगाया कि उनसे 13, 17 और 19 सितंबर को कंपनी के लोगों की मीटिंग हुई जिसमें उनसे करोड़ों की ये रकम मांगी गई। चैनल ने इस बातचीत को बाकायदा रिकॉर्ड कर लिया और आज वो टेप प्रेस कांफ्रेंस में दिखाया।

जिंदल ने किया जी न्यूज का स्टिंग, ब्लैक मेलिंग का आरोप

 

वहीं इस बारे में जी न्यूज का कहना है कि ये सब चैनल को बदनाम करने की साजिश है। नवीन जिंदल ने उन्हें खरीदने की कोशिश की और नाकाम रहने पर ये साजिश रची। जबकि जिंदल के मुताबिक स्टिंग रोकने के लिए जी न्यूज ने उनसे 100 करोड़ रुपए मांगे गए और पैसे नहीं देन पर बदनाम करने की धमकी दी। इस बाबत दिल्ली पुलिस में उन्होंने एक केस दर्ज कराया है।

 

 

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