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Saturday, April 13, 2013

2014 में होने वाले में आम चुनाव में लोकसभा की लगभग 160 सीटों पर ट्विटर-फेसबुक का असर

चुनाव के नतीजों पर ट्विटर-फेसबुक का असर?

फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया के मंच का इस्तेमाल करने वाले लोग नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं?

एक नए अध्ययन में इसी सवाल का जवाब खोजा गया है.

आयरिश नॉलेज फाउंडेशन एंड इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने इस पर एक शोध किया है और कहा है कि 2014 में होने वाले में आम चुनाव में लोकसभा की लगभग 160 सीटों पर इसका असर दिखाई दे सकता है.

सर्वाधिक प्रभाव वाली सीटें

अध्ययन में सबसे सर्वाधिक प्रभाव वाली सीटों की पहचान की गई है.सबसे अधिक प्रभाव वाली सीटों का तात्पर्य उन सीटों से है, जहां पिछले लोकसभा चुनाव में विजयी उम्मीदवार के जीत का अंतर फेसबुक का प्रयोग करने वालों से कम है अथवा जिन सीटों पर फेसबुक का प्रयोग करने वालों की संख्या कुल मतदाताओं की संख्या का 10 प्रतिशत है.

अध्ययन में 67 सीटों की 'अत्यधिक प्रभाव वाली', जबकि शेष सीटों की 'कम प्रभाव वाली' सीटों के रूप में पहचान की गई है.

लोकसभा की कुल 543 में से 160 सीटों पर सोशल मीडिया का खासा असर देखने को मिल सकता है. महाराष्ट्र में इसका सबसे ज्यादा असर पडऩे की संभावना है. यहां की 21 सीटों पर सोशल मीडिया का असर पड़ सकता है."

महाराष्ट्र और गुजरात आगे

जबकि गुजरात में 17 सीटें सोशल मीडिया से प्रभावित हो सकती हैं. इसी तरह उत्तर प्रदेश में 14, कर्नाटक की 12, तमिलनाडु की 12, आंध्र प्रदेश की 11, केरल की 10 और मध्य प्रदेश की 9 सीटों पर इसका असर देखने को मिल सकता है.

ये वो लोकसभा सीटें हैं जहां लोग सोशल नेटवर्किंग साइट का इस्तेमाल सबसे ज्यादा करते हैं. इन निर्वाचन क्षेत्रों में कुल मतदाताओं के दस फीसदी से ज्यादा लोग फेसबुक से जुड़े हुए हैं.

सर्वेक्षण के मुताबिक फेसबुक से जुड़े लोग चुनाव से पहले अपने आसपास के वोटरों को प्रभावित कर सकते हैं.

अध्ययन का ये भी कहना हैं कि चुनाव से 48 घंटे पहले उम्मीदवारों के चुनाव प्रचार पर रोक लगने के बाद फेसबुक, ट्विटर जैसी सोशल मीडिया चुनाव प्रचार की कमान संभाल लेंगे.

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Friday, April 12, 2013

फेसबुक राजनीति में आहिस्ता आहिस्ता राजनीति में पैंठ बनाने में सक्षम बना रहा है

फेसबुक राजनीति में आहिस्ता आहिस्ता राजनीति में पैंठ बनाने में सक्षम बना रहा है - ताकत तकनीक की ...... या तो तैयार रहो .... या तो मीट जाओ !

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राजनीति में धीरे धीरे पैठ बना रहा है फेसबुक गूगल, फेसबुक और माइक्रोसॉफ्ट सहित अमेरिका की कुछ शीर्ष तकनीकी कंपनियों ने अमेरिकी आव्रजन नीति से जुड़े अहम मुद्दों के लिए आपस में हाथ मिलाया है। फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने इस समूह को एफडब्ल्यूडी का नाम दिया है जो उन्हें आहिस्ता आहिस्ता राजनीति में पैंठ बनाने में सक्षम बना रहा है और अमेरिका में आव्रजन सुधार को आगे बढाने के साथ ही वहां के उन प्रवासियों को मदद पहुंचा रहा है जो अभी तक पंजीकृत नहीं हैं।

वाशिंगटन पोस्ट में कल जुकरबर्ग ने लिखा, ‘‘ हमारी आव्रजन नीति विचित्र है ओैर आज की दुनिया के लिए उपयुक्त नहीं है। ’’ नये समूह का कहना है कि वह आव्रजन सुधार , बेहतर स्कूलों के मुद्दे के साथ साथ वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए और धन जुटाने को लेकर कांग्रेस और व्हाइट हाउस में लॉबिंग करने के साथ ही सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर जनसमर्थन जुटाएगा।

समूह में जुकरबर्ग का साथ नेटफ्लिक्स के सीईओ रीड हेस्टिंग्स , लिंकडिन के संस्थापक रेड हाफमैन ,येल्प के चेयरमैन मैक्स लेव्चिन , याहू के सीईओ मेरिसा मेयर ,ज्येंगा के सीईओ मार्क पिन्कस और गूगल के चेयरमैन एरिक श्मित दे रहे हैं।
जुकरबर्ग ने रेखांकित किया कि अमेरिका की मौजूदा अर्थव्यवस्था प्राकृतिक संसाधनों , औद्योगिक मशीनों और श्रम के बजाए मुख्य तौर पर ज्ञान और विचारों पर आधारित है। उन्होंने कहा कि अमेरिका को सबसे प्रतिभाशाली और मेहनती लोगों को आकषिर्त करने की जरूरत है। और उनमें से कई विदेश में जन्में हैं।

फेसबुक के सीईओ ने कहा, ‘‘ हम ऐसे 40 फीसदी गणित और विज्ञान स्नातकों को शिक्षा देने के बाद देश से बाहर क्यों कर देते हैं जो कि अमेरिका के नागरिक नहीं हैं। ’’ उन्होंने सवालिया लहजे में कहा, ‘‘ हम क्यों नहीं उद्यमियों को यहां आने देते हैं जबकि वे यहां आकर कंपनियां शुरू कर और नौकरियां पैदा कर सकते हैं। ’’ आव्रजन की बहस में शामिल होने वाले हाई प्रोफाइल चेहरों में अब फेसबुक के सह संस्थापक शामिल हो गए हैं। बुधवार को इस मुद्दे पर अमेरिकी राजधानी और देश भर में आयोजित रैली में हजारों लोगों ने हिस्सा लिया। ( https://www.facebook.com/jugal24x7 )

Thursday, April 4, 2013

चीन साइबर दुनिया के माध्यम से अपने दुश्मनको निशाना बना शक्ति प्रदर्शन कर रहा है.

♠ Jugal Eguru™ § आईटी जागृति और शिक्षा अभियान : ♠ Éगुरु द्वारा|  

युद्ध का नया सिद्धांत किसी राष्ट्र पर आर्थिक हमला करने, उसे आगामी कई वर्षों के लिए पंगु बना देना है. हो सकता है चीन शुरुआती तौर पर औद्योगिक क्रांति में पिछड़ गया हो लेकिन अतीत से सीखते हुए, आभासीय क्रांति का अगुवा बनने को वह पूर्णतया उद्यत है. सच यह है कि दूसरे देशों के साथ साइबर वार की सघन प्रतिस्पर्धी आभासी दुनिया में वह एक कदम आगे ही है. इस बार भी वह सुस्त पड़ने वाला नहीं!

 

चीन साइबर दुनिया के माध्यम से अपने दुश्मन अमेरिका को निशाना बना शक्ति प्रदर्शन कर रहा है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य और एक परमाणु शक्ति होने के बावजूद, चीन अच्छी तरह से जानता है कि वह अभी भी पश्चिमी आयुध प्रौद्योगिकी की बराबरी नहीं कर सकता. हताशा की इसी खाई को पाटने के लिए ही चीन साइबर वार के औचित्य को मूलाधार बना रहा है. इसके जरिए कई बार विभिन्न सैन्य और खुफिया वेबसाइटों पर हमला किया गया।

 

आखिर जासूसी किसे कहते हैं? आंकड़े, प्रौद्योगिकी, ब्लूप्रिंट, रणनीतियों और भूसामरिक निर्देशांकों तक की पहुंच को ही न! तो इस काम में वह काफी हद तक सफल भी है। इस वक्त चल रहे साइबर वार की जो भारी कीमत अमेरिकी और ब्रिटिश प्रतिष्ठान चुका रहे हैं उसे देखते हुए उनका चिंतित होना वाजिब है. हालांकि, साइबर संघर्ष सिर्फ सैन्य जासूसी तक ही सीमित नहीं है. इसमें खुफियागीरी, आर्थिक और सामाजिक जासूसी भी शामिल है. 2010 में, तकरीबन 103 देशों के राजनयिकों के कंप्यूटर में चीनी साइबर जासूसों ने सेंधमारी की, लाल ड्रेगन की कारगुजारियों पर भारत भी सचेत हुआ है. कारण स्पष्ट है. इस क्षेत्र में- चीन के बाद भारत तेजी से बढ़ता भावी सिलिकॉन हब की एशियाई शक्ति माना जाता है. ऐसा तो है नहीं कि चीन भारत के रक्षा प्रौद्योगिकी और सैन्य तैयारियों से बहुत कुछ सीख सकता है, पर निश्चित ही वह भारत की कुछ जानकारियां चोरी कर सकता है और उन्हीं के अनुरूप विभिन्न स्तरों पर रणनीतियां और प्रतिरणनीतियों बना सकता है.

 

 

निस्संदेह, आधुनिक युद्ध में हताहतों की संख्या या भौतिक संपत्ति का विनाश न्यूनतम होता है. इस साइबर वार में आर्थिक मायाजाल पर हमला किया जाता है और उसे ध्वस्त करने की कोशिश की जाती है. आर्थिक विपन्न देश दीर्घकालिक तौर पर न केवल मानव पूंजी से महरूम बल्कि राजनीतिक अस्थिरता का भी शिकार हो जाता है.

 

वियतनाम तट पर दक्षिण चीनी सागर में, जहां भारत और चीन की  तेल की खोज और नौसैनिक शक्ति से संबंधित मुद्दों पर कुछ समय से राजनीतिक कशमकश चल रही है. इस पर भी नजर डालें: 30 जून, 2010 को, विशाखापत्तन स्थित भारत के पूर्वी नौसेना कमान मुख्यालय के कंप्यूटर प्रणाली को अज्ञात एजेंटों द्वारा हैक कर लिया गया. साइबर फोरेंसिक विशेषज्ञों ने ट्रैक किया तो हैकिंग में बीजिंग की संलिप्तता जाहिर हो गई. अतीत में इसी तरह वित्त मंत्रालय के से ले कर पीएमओ की वेबसाइटों को चीनी हैकरों ने हैक किया. चीन के दुश्मनों की नजर में भविष्य में साइबर हमलों में वृद्धि की पूरी आशंका है, भारत के विरुद्ध भी जो इस साइबरवार में पूर्णत: शिथिल बैठा है.

अजीब बात है कि प्रतिभाशाली कंप्यूटर विशेषज्ञों समूह के बावजूद, भारत इस मोर्चे पर अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराने में लचर साबित हो रहा है. वास्तव में यह रक्षा, रक्षा उत्पादन और रक्षा अनुसंधान एवं विकास जैसे हमारे संस्थानों की बेहतर भर्ती और बौद्धिक पूंजी की राष्ट्र के रहस्यों की रक्षा के संदर्भ में उपयोग में विफलता है. सरकार हैकरों की सेना क्यों नहीं रखती है जो राष्ट्र के रहस्यों की रक्षा कर सकते हों? कम से कम इतना तो ईमानदारी से प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए.

इसके विपरीत, हैकिंग चीन में सरकार प्रायोजित पहल है. चीनी सरकार इसके लिए सालाना 55 मिलियन डॉलर की भारी भरकम राशि खर्च करती है. टोरंटो विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार, चीनी नौसेना की गुप्त शाखा कई तरह की साइबर जासूसी के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार है. यहां तक ​​कि पाकिस्तान में पलने और दूसरी जगहों पर चलने वाले आतंकवादी संगठनों को चीनी हैकर्स (राज्य प्रायोजित या अन्यथा) से निकलने वाली संवेदनशील जानकारी तक पहुंचने में खासी रुचि रहती है. ये जानकारियां भारत में आतंकी हमलों की साजिश में काम आ सकती हैं. भारत के लिए यह वक्त की मांग है कि वह साइबर सुरक्षा मोर्चे पर मजबूत बने.

 

साइबर सुरक्षा के लिए एक विशेष सेल का गठन अत्यंत महत्वपूर्ण है, प्रधानमंत्री और उनकी मंडली को इस स्थिति की गंभीरता का एहसास होना चाहिए. भारत तेजी से कंप्यूटरीकृत और उसकी अधिकतर संचार प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण होता जा रहा है, एक भरपूर साइबरवार के दुष्परिणाम का असर उस पूरी प्रणाली पर पड़ेगा जिससे देश संचालित होता है. यदि स्टक्सनेटॅ जैसे वायरस (जिसने नवंबर 2007 में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को गड़बड़ा दिया था) भारत के शेयर बाजार से लेकर भारतीय सशस्त्र बलों या यूटीलिटी सेंटरों तक के सर्वर पर हमला कर दे तो  देश जहां का तहां ठिठक कर ठहर जाएगा. (बेशक, इसके चलते लोगों के बीच भ्रम, भय, अविश्वास, क्रोध, लाचारी और हताशा अलग से उपजेगी !)

इस सूचना युग में, जब जानकारी की सुरक्षा सीमाओं की रक्षा जितनी ही जरूरी है, भारत क्यों न अपनी आवश्यकतानुसार आभासी और वास्तविक युद्ध को एकीकृत कर एक व्यापक रक्षा नीति का निर्माण करे. एक केंद्रीकृत रक्षा इकाई जो कि एक साथ साइबर और सीमा की रक्षा से निपटने के लिए सक्षम हों, ऐसी डिवीजनों का गठन जरूरी है. वर्तमान में, भारत में वेबसाइटों की हैकिंग कोई कठिन काम नहीं है. एक चीनी से ऐसा करने को कह कर तो देखें, यह वास्तव में यह बहुत आसान है!

Φ याद रखिए - सिक्यूरिटी का एक ही नियम है .... " हम कहीं भी सिक्यूर नहीं ...." फिर भी बचाव करना हमारे हाथ मे है !
आपका / देश का - जुगल ईगुरु ▐
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Monday, January 14, 2013

साइबर वॉर के लिए ▐ Cyber ​​War | Cyber ​​ARMY

साइबर वॉर के लिए ▐ Cyber ​​War | Cyber ​​ARMY

मुंबई।। आनेवाले समय में 'साइबर वॉर' की आशंका से निपटने के लिए 'साइबर सोलजर्स' (कंप्यूटर सैनिक) तैयार करने का महाराष्ट्र सरकार का इरादा है। नागपुर यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस चांसलर वी.एस. सकपाल के अधीन बनी समिति को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई है।

मूल तौर पर आईटी, साइबर लॉ और साइबर क्राइम पर यूनिवर्सियों में मास्टर्स डिग्री और डिप्लोमा कोर्स तैयार करने का जिम्मा सपकाल समिति को सौंपा गया था। समिति ने बुधवार को अपनी रिपोर्ट रखते हुए ईरान, नाइजीरिया, चीन और रशिया की तर्ज पर सायबर सैनिक तैयार करने की रूपरेखा रखी। उच्च शिक्षा मंत्री राजेश टोपे ने समिति को इसके लिए 15 दिनों का टाइम दिया है।

समिति ने यूनिवर्सिटी के सभी फर्स्ट ईयर के स्टूडेंट्स के लिए आईटी और साइबर क्राइम का छह महीने का डिप्लोमा अनिवार्य करने का सुझाव दिया है। इसके अलावा, साइबर लॉ और आईटी पर मास्टर्स कोर्स शुरू करने की भी सिफारिश की गई है।





अनजाने साइबर क्राइम Φ CYBER CRIME in INDIA

 

 

अनजाने साइबर क्राइम

 

 

 

 
 
  
 
  
 
  
  

इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले करीब-करीब हर शख्स ने कोई न कोई साइबर क्राइम जरूर किया है। कानूनी नहीं तो नैतिक अपराध तो किया ही है। इनमें से ज्यादातर को तो इसका अंदाजा तक नहीं होता। वे कहीं से भी कोई चित्र, लेख या विडियो कॉपी-पेस्ट करते समय जरा भी नहीं झिझकते। इंटरनेट पर ऐसे तमाम काम हैं, जो साइबर क्राइम के तहत आते हैं। 

कॉपी-पेस्ट या सामग्री की चोरी
- हर क्रिएटिव चीज बनाने वाले के पास एक खास हक होता है जो उसे अपनी सामग्री को गैरकानूनी ढंग से नकल किए जाने के खिलाफ सुरक्षा देता है। इसे कॉपीराइट कहते हैं।
- आपके लेख, कहानी, कविता, व्यंग्य, फोटो, संगीत की धुन, सॉफ्टवेयर, विडियो, कार्टून, एनिमेशन, किताब, ई-बुक, वेबसाइट वगैरह पर आपको यह खास हक हासिल है। कोई भी शख्स आपकी इजाजत के बिना आपकी रचना की कॉपी नहीं कर सकता और न ही उसे दूसरों को दे सकता है। ऐसा करना कॉपीराइट कानून का उल्लंघन है और आप उसके खिलाफ अदालत जा सकते हैं।
- कॉपीराइट लेने की एक कानूनी प्रक्रिया है, लेकिन अगर ऐसा नहीं भी करते, तो भी अपनी रचना पर आपका ही हक है।

- इसी तरह अगर आप किसी और का फोटो उसकी लिखित मंजूरी के बिना अपने फेसबुक प्रोफाइल पर पोस्ट करते हैं तो वह साइबर क्राइम है। गूगल इमेज या दूसरी इमेज होस्टिंग वेबसाइटों से अपनी पसंद का कोई फोटो लेकर उसे अपने ब्लॉग, सोशल नेटवर्किंग ठिकाने, वेबसाइट या पत्र-पत्रिका में इस्तेमाल करना भी उसी कैटिगरी में आता है।
- गूगल एक सर्च इंजन भर है, वह फ्री डाउनलोड साइट नहीं है। इसीलिए वह किसी भी पिक्चर के साथ उस वेब पेज को भी दिखाता है, जहां से उसे ढूंढा गया है। ऐसा करके वह पिक्चर चुराए जाने के मामले में किसी भी तरह की जिम्मेदारी से आजाद हो जाता है।

क्या करें

- अगर आपको गूगल इमेज सर्च पर मौजूद कोई फोटो इस्तेमाल करना है, तो कायदे से उस वेब पेज के संचालक से इजाजत लेनी चाहिए।
- अगर कोई शख्स अपनी रचना को लेकर ज्यादा ही गंभीर हो, तो यह छोटी सी चोरी आपको भारी पड़ सकती है। जिस गूगल के जरिये आपने वह लेख, फोटो या विडियो ढूंढा है, उसी के जरिये आपकी चोरी भी पकड़ी जा सकती है।

मजेदार साभार
- कुछ ब्लॉगों पर बड़ी दिलचस्प बातें नजर आती है। ब्लॉगरों ने गूगल इमेजेज से फोटो का इस्तेमाल किया और बतौर सावधानी नीचे साभार गूगल लिख दिया।
- गूगल पर दिखने वाले सर्च नतीजों, फोटो वगैरह पर गूगल का कोई मालिकाना हक नहीं है। वे तो महज रेफरेंस के तौर पर दिए गए हैं, जिससे आप सही ठिकाने तक पहुंच सकें।
- आभार ही जताना है तो उस वेबसाइट का जताइए, जहां से गूगल ने उसे ढूंढा है।

चाइल्ड पॉर्नोग्रफी देखना
- अगर आप जाने या अनजाने अपने इंटरनेट कनेक्शन के जरिये चाइल्ड पॉर्नोग्रफी (बच्चों के अश्लील चित्र, विडियो, लेख आदि) देखते हैं तो वह साइबर क्राइम है।
- आपने ऐसी किसी सामग्री को अपने किसी दोस्त को फॉरवर्ड कर दिया तो आप एक और साइबर क्राइम कर चुके हैं।
- 18 साल से कम उम्र वालों से संबंधित अश्लील सामग्री देखना, इंटरनेट से भेजना और सहेजना साइबर क्राइम है।
- इन्हें न खुद देखें, न किसी को फॉरवर्ड करें।

लोगो की चोरी
- इंटरनेट पर लोगो, आइकंस, प्रतीक चिह्नों, ट्रेडमार्क वगैरह की चोरी भी आम है।
- नया काम खोलना है या नई वेबसाइट बनानी है लोगो के लिए इंटरनेट सर्च से बेहतर जरिया क्या होगा?
- अच्छा सा लोगो दिखाई दिया और आपने उसे कॉपी कर इस्तेमाल कर लिया या किसी डिजाइनर की सेवा ली जिसने झटपट इंटरनेट से किसी कंपनी का अच्छा सा लोगो इस्तेमाल कर आपका विजिटिंग कार्ड, ब्रोशर और लेटरहेड तैयार कर दिया। ऐसा करके आपने न सिर्फ कॉपीराइट का उल्लंघन कर चुके हैं बल्कि ऑनलाइन ट्रेडमार्क के उल्लंघन मामले में भी आपको दोषी करार दिया जा सकता है।
- ऐसे किसी भी लोगो या आइकन का प्रयोग अपने बिजनेस आदि के लिए न करें।

वाई-फाई का दुरुपयोग
- जुलाई 2008 में अहमदाबाद बम विस्फोटों के बाद उनकी जिम्मेदारी लेते हुए आतंकवादियों ने जो ईमेल भेजा था, वह आपके-हमारे जैसे ही किसी आम इंटरनेट यूजर के वाई-फाई कनेक्शन का इस्तेमाल करके भेजा था। जांच एजेंसियों ने पता लगाया कि यह ईमेल नवी मुंबई के एक ?लैट में लगे वायरलेस इंटरनेट कनेक्शन के जरिये आया था। जाहिर है, उन्होंने यही निष्कर्ष निकाला कि जिस घर से मेल भेजा गया, वह किसी न किसी रूप में हमलावरों से जुड़ा हुआ होगा, लेकिन इस फ्लैट में रहता था मल्टिनैशनल कंपनी में काम करने वाला अमेरिकी नागरिक केनेथ हैवुड। अब उसे समझ आया कि इंटरनेट कनेक्शन लगाने वाले इंजिनियर ने क्यों कहा था कि उसे अपने वाई-फाई नेटवर्क का पासवर्ड जल्दी ही बदल लेना चाहिए। दरअसल, हैवुड के वाई-फाई कनेक्शन में कोई सिक्युरिटी सेटिंग नहीं की गई थी और आस-पास से गुजरता कोई भी शख्स हैवुड के कनेक्शन का इस्तेमाल कर सकता था। आतंकवादियों ने यही किया और हैवुड एक आतंकवादी मामले में गिरफ्तार होते-होते बचा।
- अगर कोई अपराधी आपके इंटरनेट कनेक्शन का इस्तेमाल करते हुए साइबर क्राइम करता है तो पुलिस उसे भले ही न ढूंढ पाए, आप तक जरूर पहुंच जाएगी और नतीजे भुगतने होंगे आपको।
- अगर वाई-फाई इंटरनेट कनेक्शन इस्तेमाल करते हैं तो उसे पासवर्ड प्रोटेक्ट करना और एनक्रिप्शन का इस्तेमाल करना न भूलें।

वायरस, स्पाईवेयर
- अगर आपके कंप्यूटर पर किसी वायरस या स्पाईवेयर ने कब्जा जमा लिया है और वह जोम्बी में तब्दील हो गया है तो समझिए, आप अपने कंप्यूटर और डेटा की असुरक्षा के साथ-साथ साइबर क्राइम में भी फंस सकते हैं। मुमकिन है, आप किसी परोक्ष साइबर क्राइम में हिस्सेदार बन रहे हों।
- कुछ वायरस और स्पाईवेयर न सिर्फ आपके कंप्यूटर के डेटा और निजी सूचनाएं चुराकर अपने संचालकों तक भेजते हैं बल्कि आपके संपर्क में मौजूद दूसरे लोगों तक अपनी प्रतियां पहुंचा देते हैं। कभी इंटरनेट के जरिये, कभी ईमेल के जरिये तो कभी लोकल नेटवर्क के जरिये। जिन लोगों के कंप्यूटर में आपके जरिये वायरस या स्पाईवेयर पहुंचा और कोई बड़ा नुकसान हो गया, उनकी नजर में दोषी कौन होगा? आप। ऐसे मामलों में आप अपनी कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।
- कंप्यूटर में अच्छा एंटिवायरस, एंटिस्पाईवेयर और फायरवॉल जरूर लगवाएं। ये सिर्फ आपकी साइबर सुरक्षा के लिहाज से ही जरूरी नहीं है बल्कि इसलिए भी है कि कहीं आप अनजाने में कोई साइबर अपराध न कर बैठें।

किसी का अकाउंट खोलना
- कुछ लोग अपने दोस्तों और साथियों के ईमेल अकाउंट, फेसबुक वगैरह का पासवर्ड ढूंढने की कोशिश करते हैं और कभी-कभी सफल भी हो जाते हैं। हो सकता है, आप महज मौज-मस्ती या मजाक के लिए ऐसा कर रहे हों लेकिन अगर आप किसी का पासवर्ड हासिल करने के बाद उसके खाते में लॉग-इन करते हैं तो आप साइबर क्राइम कर रहे हैं।
- ऐसा तब भी होता है, जब किसी ने आप पर भरोसा करके आपको अपना पासवर्ड बताया हो। यह खाता ईमेल, सोशल नेटवर्किंग, ब्लॉग, वेबसाइट, ऑनलाइन स्टोरेज सविर्स, ई-कॉमर्स साइट, इंटरनेट-बैंकिंग जैसा हो सकता है।
- किसी की प्राइवेसी में सेंध लगाने पर आप डेटा प्रोटेक्शन कानून के साथ-साथ सूचना प्रौद्योगिकी कानून 2000 की धारा 72 के तहत दोषी करार दिए जा सकते हैं।
- किसी का पासवर्ड चुराकर उसका अकाउंट खोलने की कोशिश न करें। साथ ही अगर कोई साथी कहे कि मेरा ईमेल खोलकर देख लेना, यह मेरा पासवर्ड यह है, तो उससे माफी मांग लेने में ही भलाई है।

सॉफ्टवेयर पायरेसी
- भारत के ज्यादातर कंप्यूटर यूजर किसी न किसी सॉफ्टवेयर का पाइरेटेड वर्जन इस्तेमाल कर रहे हैं। चाहे विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम हो, ऑफिस सॉफ्टवेयर सूइट हों या फिर ग्राफिक्स, पेजमेकिंग के सॉफ्टवेयर।
- अब सॉफ्टवेयरों के भीतर एडवांस किस्म के पाइरेसी प्रोटेक्शन और मॉनिटरिंग सिस्टम आने लगे हैं और हो सकता है आपके बारे में भी कंपनियों को जानकारी हो।
- ऐसे सॉफ्टवेयरों का इस्तेमाल करना साइबर क्राइम के तहत आता है। हमेशा ऑरिजनल सॉफ्टवेयर ही यूज करें।

गूगल क्लिक फ्रॉड
- इंटरनेट पर विज्ञापनों के बदले भुगतान की व्यवस्था थोड़ी अलग है। यह विज्ञापनों को क्लिक किए जाने की संख्या पर आधारित है। जैसे दस क्लिक यानी दो डॉलर या करीब 110 रुपये।
- ऐसे में कुछ लोग खुद ही अपने ब्लॉगों पर लगे विज्ञापनों को क्लिक करते रहते हैं या फिर कुछ दूसरे लोगों के साथ गठजोड़ कर लेते हैं। उन्हें पता नहीं कि इंटरनेट पर ऐसे फर्जी क्लिक की निगरानी रखी जा सकती है।
- इस तरह के क्लिक से बचें। यह बड़ा आर्थिक अपराध है और पता लगने पर आपके विज्ञापन तो बंद हो ही सकते हैं, भारी-भरकम जुर्माना या दूसरी सजा भी मिल सकती है।

बैंडविड्थ की चोरी
- कुछ लोग अपनी वेबसाइट पर दूसरी जगहों से ली गई भारी-भरकम ग्राफिक फाइलें (कुछ एमबी के फोटो या विडियो आदि) डालने के लिए शॉर्टकट अपनाते हैं।
- वे फाइलों को अपनी वेबसाइट पर सीधे नहीं डालते बल्कि ऑरिजनल वेबसाइट से ही उन्हें लिंक कर देते हैं। होता यह है कि विडियो या चित्र दिखता तो आपकी वेबसाइट पर है लेकिन असल में वह अपनी ऑरिजनल वेबसाइट पर ही लगा हुआ है, आपके वेब सर्वर पर नहीं है।
- यहां आप दो तरह के साइबर क्राइम कर रहे हैं। पहला कॉपीराइट संबंधी और दूसरा बैंडविड्थ की चोरी।
- बैंडविड्थ की चोरी को ऐसे समझ सकते हैं। हर वेबसाइट को डेटा डाउनलोड का एक खास कोटा मिला होता है और इस सीमा से बाहर जाने पर उसके संचालक को अलग से पैसे का भुगतान करना होता है। जब आप किसी और की साइट पर मौजूद भारी-भरकम विडियो को लिंक करके अपनी साइट पर लगाते हैं तो आपकी साइट पर आने वाले हर विजिटर के लिए वह विडियो ओरिजनल साइट से डाउनलोड होता है। डाउनलोड की इस प्रक्रिया में उसकी बैंडविड्थ खर्च होती है, जबकि आप अपनी बैंडविड्थ बचा लेते हैं।
- यह किसी अनजान व्यक्ति की जेब काटने जैसा है। हमेशा अपनी बैंडविड्थ ही खर्च करें, दूसरों की नहीं।

कुछ और साइबर क्राइम
- साइबर स्क्वैटिंग : किसी मशहूर ब्रैंड, कंपनी, संगठन, इंसान आदि के नाम से जुड़ा डोमेन नेम अनधिकृत रूप से अपने नाम से बुक करवा लेना।
- ऑनलाइन मानहानि : अपने ब्लॉग, वेबसाइट, सोशल नेटवकिर्ंग ठिकाने या दूसरे इंटरनेट ठिकाने पर किसी के बारे में अपमानजनक या अश्लील टिप्पणी करना।
- कारोबारी डेटा : किसी ग्राहक द्वारा मुहैया कराए जाने वाले गोपनीय कारोबारी डेटा की कॉपी बनाकर अपने पास रखना।
- वेबसाइट, डोमेन नेम पर कब्जा : भारत में कई वेब डिवेलपमेंट कंपनियां ऐसा करने की दोषी पाई गई हैं। अपने ग्राहकों के लिए डोमेन नेम बुक कराते, वेब होस्टिंग स्पेस लेते और इंटरनेट सेवा मुहैया कराते समय वे उनका सबसे खास यूजरनेम और पासवर्ड अपने कब्जे में रख लेते हैं और फिर उसी के दम पर ग्राहकों को तंग करते हैं।
- डिजाइन की चोरी : किसी वेबसाइट, ब्लॉग, ई-बुक आदि की बिना मंजूरी हू-ब-हू नकल कर लेना। किसी की टेंप्लेट को अनधिकृत रूप से इस्तेमाल कर लेना।

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Saturday, December 29, 2012

DRDO, other govt websites hacked by Algerian group

 

DRDO, other govt websites hacked by Algerian group

Hackers reveal how FBI used Apple UDID's to track 12 mn users

  • Biggest threat to India's cyber security: Pen drives, says army

It seems that hackers have once again showcased the weakness of India’s cyber-security system. According to IANS several important government websites were hacked late on Wednesday night.  The message posted on the websites read ‘SanFour25, Algerian Hackers’ minutes after the hacking took place.

Among the sites that came under the attack were those of the prime minister’s adviser on public information, infrastructure and innovations – http://iii.gov.in, and Recruitment and Assessment Centre (RAC) of the Defence Research and Development Organisation(DRDO) www.rac.gov.in.

Sam Pitroda is the prime minister’s adviser on public information, infrastructure and innovations, while RAC takes care of the process of scientists recruitment for the DRDO.

The cyber attackers group, said to be ‘SanFour25′, also targeted five more Indian websites and defaced them.

According to Rediff, the sites hacked include DRDO’s Recruitment and Assessment Centre, West Bengal’s police department, Directorate of Estates (Ministry of Urban Development), Biotechnology Industry Research Assistance Council, and Rehabilitation Council of India .

It seems that the DRDO Recruitment and Assessment Centre site was down for over nine hours. This is a particularly sensitive site as it deals with the recruitment of scientists to the several laboratories of the DRDO.

IANS quoting government sources as saying however that there were ”no secrets on these websites”.

The other important website that was hacked was Advisor to the Prime Minister on Public Information’s website. It seems that the authorities realised about the attack only after they stopped functioning.

The DRDO and Advisor to the Prime Minister on Public Information’s website site appear to be back now.