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Saturday, May 19, 2012

वेज-प्राइस स्पाइरल क्या है?


वेज-प्राइस स्पाइरल क्या है?

आरबीआई ने फाइनेंशल ईयर 2011-12 के मैक्रो इकनॉमिक एंड मॉनिटरी डेवलपमेंट्स रिपोर्ट में सोमवार को कहा कि ग्रामीण और शहरी इलाकों में वेतन और मजदूरी बढ़ना महंगाई दर में तेजी की बड़ी वजह है।

वेज-प्राइस स्पाइरल क्या है?

वेज (सैलरी) में बढ़ोतरी से इंडस्ट्री की इनपुट कॉस्ट बढ़ जाती है। खर्च योग्य इनकम बढ़ने से प्रोडक्ट्स और सर्विसेज की मांग बढ़ जाती है। इसके चलते कीमतें बढ़ती हैं। इससे सैलरी में और बढ़ोतरी की मांग शुरू हो जाती है। ज्यादा सैलरी, ज्यादा प्राइस के इस सायकल को वेज-प्राइस स्पाइरल कहा जाता है।
यह किस तरह होता है?
ऐसे इकनॉमी जिसमें लंबे समय से इनफ्लेशन का स्तर ऊंचा रहा हो, उसमें कीमत में और बढ़ोतरी के आसार ज्यादा होते हैं। अगर लोगों को कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका होती है तो उनके सैलरी में अनुमानित इनफ्लेशन रेट से कम बढ़ोतरी को स्वीकार करने की संभावना कम ही होती है। वे कम से कम सैलरी में इतनी बढ़ोतरी चाहते हैं, जो उनके रियल परचेजिंग पावर में कमी की भरपाई कर सके। इनपुट कॉस्ट बढ़ने के चलते भी ऐसा हो सकता है। हाई इनफ्लेशन और इनपुट कॉस्ट बढ़ने पर सरकार मिनिमम सपोर्ट प्राइस बढ़ाने पर मजबूर हो जाती है। इससे फूड प्राइसेज बढ़ने लगते हैं।
स्पाइरल्स रिस्क क्या हैं?
वेज प्राइस स्पाइरल के चलते बढ़ने वाले इनफ्लेशन को कंट्रोल करना मुश्किल हो जाता है। आम तौर पर यह बढ़ोतरी ऐसी इकनॉमी में होती है, जिसमें सप्लाई साइड की दिक्कतें (कम सप्लाई) होती हैं। भारत में इस तरह की स्थिति है। सरप्लस कैपेसिटी वाली इकनॉमी में काफी सप्लाई होने से बढ़ती मांग के चलते इनफ्लेशन नहीं बढ़ता। शॉर्ट टर्म में कैपेसिटी में तेज बढ़ोतरी नहीं की जा सकती, इसलिए स्पाइरल को मैनेज करने के लिए मांग घटाने की जरूरत पड़ती है। कैपेसिटी और डिमांड में संतुलन के लिए ऐसा किया जाता है।

क्या होता है थर्ड पार्टी इंश्योरेंस

क्या होता है थर्ड पार्टी इंश्योरेंस

कुछ समय पहले इंश्योरेंस रेग्युलेटर ने थर्ड पार्टी मोटर इंश्योरेंस प्रीमियम में बढ़ोतरी कर दी। आइए देखें थर्ड पार्टी इंश्योरेंस है क्या:

थर्ड पार्टी इंश्योरेंस कवर एक ऐसा कवर है जो फर्स्ट पार्टी यानी इंश्योर्ड शख्स के द्वारा थर्ड पार्टी को हुए नुकसान के लिए होता है। इसे समझने के लिए पहले फर्स्ट , सेकंड और थर्ड पार्टी को समझना होगा। फर्स्ट पार्टी वह शख्स है , जो अपनी गाड़ी का इंश्योरेंस करा रहा है। सेकंड पार्टी इंश्योरेंस कंपनी होती है , जिससे यह कवर लिया गया है। थर्ड पार्टी कोई तीसरा शख्स है जिसे फर्स्ट पार्टी की वजह से नुकसान पहुंचा। थर्ड पार्टी इंश्योरेंस में इस तीसरे शख्स को होने वाले नुकसान की भरपाई की जाती है यानी अगर आपकी गाड़ी से सड़क पर चल रही दूसरी गाड़ी या किसी शख्स को नुकसान होता है तो थर्ड पार्टी इंश्योरेंस कवर के तहत उस शख्स को हुए नुकसान की भरपाई आपकी इंश्योरेंस कंपनी करेगी। इसके लिए सालाना प्रीमियम की रकम निर्धारित है , जो कार या टूवीलर की क्षमता पर निर्भर करती है। नियम यह है कि बिना थर्ड पार्टी इंश्योरेंस कराए कोई भी गाड़ी सड़क पर नही आ सकती। इसे कराना अनिवार्य है। अपनी गाड़ी को होने वाले नुकसान के लिए (ओन डैमेज इंश्योरेंस) आप इंश्योरेंस करा भी सकते हैं और नहीं भी , लेकिन थर्ड पार्टी कराना अनिवार्य है। सड़क पर दौड़ती तमाम पुरानी गाड़ियों का आमतौर पर सिर्फ थर्ड पार्टी इंश्योरेंस कवर ही होता है।
2012-13 के लिए थर्ड पार्टी इंश्योरेंस का सालाना प्रीमियम
प्राइवेट कार
1000 सीसी तक
75 रुपए
1000 सीसी से 1500 सीसी तक
925 रुपए
1500 सीसी से ज्यादा
2853 रुपए
टूवीलर
75 सीसी तक
350 रुपए
75 सीसी से 150 सीसी तक
357 रुपए
150 सीसी से 350 सीसी तक
355 रुपए

रेडी रेकनर / पोस्ट ऑफिस स्कीम
स्कीम
ब्याज(फीसदी)
टैक्स बचत
मंथली इनकम स्कीम
8.5
कोई नहीं
आरडी
8.4
कोई नहीं
सेविंग अकाउंट
4
कोई नहीं
एनएससी(5 साल)
8.6
80सी
एनएससी(10 साल)
8.9
80सी
टाइम डिपॉजिट
8.2-8.5
80सी
सीनियर सिटिजंस स्कीम
9.3(तिमाही)
80सी
पीपीएफ
8.8
80सी

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Friday, May 18, 2012


क्या है करंसी वायदा का कारोबार

नई दिल्लीः नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) में शुक्रवार को मुद्रा (करंसी) का वायदा कारोबार शुरू हो गया। वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने इसकी शुरुआत की। 300 सदस्यों और 11 बैंकों ने कारोबार में भाग लिया।

कारोबार में हरेक अमेरिकी डॉलर की कीमत 44.15 रुपये रही। सूत्रों के अनुसार पहले ही दिन करीब 5000 सौदे हुए। यह कारोबार शुरू होने से बाजार विशेषज्ञ काफी खुश हैं। उनका कहना है कि इससे बाजार नियंत्रित होगा और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय उत्पादों का कारोबार बढ़ाने में आईटी कंपनियों को मदद मिलेगी।

क्या है वायदा कारोबार

मुद्रा का वायदा कारोबार का मतलब है कारोबारी आज की तारीख में अगले 15 से 90 दिनों तक का सौदा निपटा सकता है। उदाहरण के तौर पर अगर किसी कारोबारी को 90 दिन बाद डॉलर की जरूरत है तो अब उसको 90 दिन का इंतजार नहीं करना होगा। वह इसका पहले ही बंदोबस्त कर सकता है। वह एनएसई में जाकर इसके सदस्यों के जरिए डॉलर खरीद सकता है और उसकी डिलिवरी 90 दिन बाद ले सकता है।

सौदा करते वक्त उसे पूरी राशि देने की जरूरत नहीं है। वह तय मार्जिन मनी जो कुल राशि का 10 से 20 पर्सेन्ट के बीच रहता है, देकर सौदा कर सकता है। 90 दिन बाद बची राशि देकर वह डॉलर की डिलिवरी ले सकता है।

क्या है इससे फायदा

करंसी वायदा कारोबार शुरू होने से कारोबारियों को दो फायदे होंगे। पहला यह कि वे बाजार में डॉलर के मूल्य में उतार-चढ़ाव को देखते हुए उसे खरीद सकेंगे। जब डॉलर का दाम कम स्तर पर हो तो वायदा कारोबार के तहत उसे खरीदने का मौका उनके पास रहेगा, चाहे उनकी जेब में धन कम क्यों न हो।

इसके अलावा वायदा सौदा करने के बाद अगर डॉलर के दाम बढ़ते भी हैं तो उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि उन्हें पिछले दाम पर ही डॉलर की डिलिवरी मिलेगी। इससे सरकार को भी फायदा है। डॉलर की डिमांड का भार कम होगा। डॉलर को तर्कसंगत स्तर पर रखने में उसे मदद मिलेगी। ऐसे में आयात व निर्यात के अंतर को कम करने में खास परेशानी नहीं होगी।

आईटी कंपनियां खुश

करंसी वायदा कारोबार शुरू होने से आईटी कंपनियां काफी खुश हैं। इन्फोसिस के प्रेजिडेंट मोहन लाल पाई का कहना है कि डॉलर के मुकाबले रुपये में पिछले दिनों जो मजबूती आई थी, उससे कई आईटी कंपनियों को काफी घाटा हुआ था। आईटी कंपनियां अपना ज्यादातर काम आउटसोर्सिन्ग का करती हैं। इसके तहत वे अमेरिकी कंपनियों से काम लेती हैं जिसका भुगतान उन्हें डॉलर में होता है।

रुपये के मजबूत होने से भारतीय मुद्रा के लिहाज से उनकी आमदनी कम हुई। करंसी वायदा शुरू होने से अब उनके कारोबार पर खास असर नहीं पड़ेगा।

इकॉनमिक्स की भाषा के कुछ शब्द

मुद्रा का विनिमय मूल्य ( Exchange Value of Money ): जब देश की प्रचलित मुद्रा का मूल्य किसी विदेशी मुद्रा के साथ निर्धारित किया जाता है ताकि मुद्रा की अदला-बदली की जा सके तो इस मूल्य को मुद्रा का विनिमय मूल्य कहा जाता है। वह मूल्य दोनों देशों की मुद्राओं की आंतरिक क्रय शक्ति पर निर्भर करता है।

मुद्रास्फीति ( Money Inflation ): मुद्रास्फीति वह स्थिति है जिसमें मुद्रा का आंतरिक मूल्य गिरता है और वस्तुओं के मूल्य बढ़ते हैं। यानी मुद्रा तथा साख की पूर्ति और उसका प्रसार अधिक हो जाता है। इसे मुद्रा प्रसार या मुद्रा का फैलाव भी कहा जाता है।

मुदा अवमूल्यन ( Money Devaluation ): यह कार्य सरकार द्वारा किया जाता है। इस क्रिया से मुद्रा का केवल बाह्य मूल्य कम होता है। जब देशी मुद्रा की विनिमय दर विदेशी मुद्रा के अनुपात में अपेक्षाकृत कम कर दी जाती है, तो इस स्थिति को मुद्रा का अवमूल्यन कहा जाता है।

रेंगती हुई मुद्रास्फीति ( Creeping Inflation ): मुद्रास्फीति का यह नर्म रूप है। यदि अर्थव्यवस्था में मूल्यों में अत्यंत धीमी गति से वृद्धि होती है तो इसे रेंगती हुई स्फीति कहते हैं। अर्थशास्त्री इस श्रेणी में एक फीसदी से तीन फीसदी तक सालाना की वृद्धि को रखते हैं। यह स्फीति अर्थव्यवस्था को जड़ता से बचाती है।

रिकॉर्ड तारीख ( Record List ): बोनस शेयर, राइट शेयर या लाभांश आदि घोषित करने के लिए कंपनी एक ऐसी तारीख की घोषणा करती है जिस तारीख से रजिस्टर बंद हो जाएंगे। इस घोषित तारीख तक कंपनी के रजिस्टर में अंकित प्रतिभूति धारक ही वास्तव में धारक माने जाते हैं। इस तारीख को ही रेकॉर्ड तारीख माना जाता है।

रिफंड ऑर्डर ( Refun Order ): यदि किसी शेयर आवेदन पत्र पर शेयर आवंटन की कार्यवाही नहीं होती तो कंपनी को आवेदन पत्र के साथ संपूर्ण रकम वापस करनी होती है। रकम वापसी के लिए कंपनी जो प्रपत्र भेजती है उसे रिफंड ऑर्डर कहा जाता है। रिफंड ऑर्डर चेक, ड्राफ्ट या बैंकर चेक के रूप में होता है तथा जारीकर्ता बैंक की स्थानीय शाखा में सामान्यत: सममूल्य पर भुनाए जाते हैं।

लाभांश ( Dividend ): विभाजन योग्य लाभों का वह हिस्सा जो शेयरधारकों के बीच वितरित किया जाता है, लाभांश कहा जाता है। यह करयुक्त और करमुक्त दोनों हो सकता है। यह शेयरधारकों की आय है।

लाभांश दर ( Dividend Rate ): कंपनी के एक शेयर पर दी जाने वाली लाभांश की राशि को यदि शेयर के अंकित मूल्य के साथ व्यक्त किया जाए तो इसे लाभांश दर कहा जाता है। इसे अमूमन फीसदी में व्यक्त किया जाता है।

लाभांश प्रतिभूतियां ( Dividend Securities ): जिन प्रतिभूतियों पर प्रतिफल के रूप में निवेशक को लाभांश मिलता है, उन्हें लाभांश वाली प्रतिभूतियां कहा जाता है। जैसे समता शेयर, पूर्वाधिकारी शेयर।

शून्य ब्याज ऋणपत्र ( Zero Rated Deventure ): इस श्रेणी के डिबेंचरों या बॉन्डों पर सीधे ब्याज नहीं दिया जाता, बल्कि इन्हें जारी करते वक्त कटौती मूल्य पर बेचा जाता है और परिपक्व होने पर पूर्ण मूल्य पर शोधित किया जाता है। जारी करने के लिए निर्धारित कटौती मूल्य के अंतर को ही ब्याज मान लिया जाता है।

आइए जानते हैं बायबैक का फंडा

लीजा मैरी थॉमसन

किसी कंपनी के अपने शेयर दोबारा खरीदने के कदम को बायबैक कहा जाता है। ऐसा कर कंपनी खुले बाजार में उपलब्ध अपने शेयरों की संख्या घटाती है। इस कदम से आय प्रति शेयर (ईपीएस) में इजाफा होने के अलावा कंपनी की संपत्ति पर मिलने वाला रिटर्न भी बढ़ता है।

इनके असर से कंपनी की बैलेंस शीट भी बेहतर होती है। निवेशक के लिए बायबैक का मतलब है, कंपनी में उसकी हिस्सेदारी बढ़ना। शेयर बायबैक करने को कभी-कभार शेयर खरीदना कहा जाता है और आम तौर पर इसे शेयर की कीमत में उछाल का संकेत माना जाता है।

कैसा होता है बायबैक?

कंपनी टेंडर ऑफर या खुले बाजार में बायबैक से अपने शेयर वापस खरीद सकती है। पहले तरीके में कंपनी शेयरों की उन संख्या से जुड़े ब्योरे के साथ टेंडर ऑफर जारी करती है जिन्हें खरीदने की उसकी योजना है और प्राइस रेंज का संकेत देती है। ऑफर को स्वीकार करने में दिलचस्पी रखने वाले निवेशक को एक आवेदन भरकर जमा कराना होता है, जिसमें इसकी जानकारी होती है कि वह कितने शेयर टेंडर करना चाहता है और वांछित कीमत क्या है।

इस फॉर्म को कंपनी के पास वापस भेजना होता है। ज्यादातर मामलों में टेंडर ऑफर बायबैक की कीमत ओपन माकेर्ट में शेयर के दाम से ज्यादा होती है। सेबी के दिशा-निर्देशों के मुताबिक अगर कंपनी आपके शेयरों को स्वीकार करती है तो उसे आपको ऑफर क्लोज होने के 15 दिन के भीतर जानकारी देनी होगी। कंपनी के समक्ष दूसरा रूट यह होगा कि वह सीधे बाजार से धीरे-धीरे शेयरों को खरीदे।

कहां से मिली जानकारी?

बायबैक से जुड़ी तमाम जानकारी स्टॉक एक्सचेंज से मिल सकती है क्योंकि कंपनियों को ऐसे प्रस्तावों के बारे में सूचित करने की जरूरत होती है।

कंपनियां क्यों चुन रही है बायबैक का रास्ता?

इसकी कई वजह हो सकती हैं। कभी-कभी कंपनियां तब बायबैक में शामिल होती हैं जब उन्हें लगता है कि बाजार में शेयरों की कीमत काफी टूट रही है। दूसरे हालात में ज्यादा नकदी का इस्तेमाल कर ऐसा किया जा सकता है। हालांकि ऐसा कोई उदाहरण नहीं दिखता कि कंपनी के टेकओवर से बचने के लिए ऐसा किया गया हो।

क्या है बॉटम फिशिंग?

लीजा मैरी थॉमसन

क्या है बॉटम फिशिंग?

बॉटम फिशिंग स्टॉक मार्केट से जुड़ा हुआ टर्म है और इसकी चर्चा आमतौर पर मंदी के दौर में जोर पकड़ती है। इसमें निवेशक उन शेयरों में खरीदारी की कोशिश करते हैं, जिनका बाजार भाव उनकी नजर में कम होता है। बॉटम फिशिंग करने का यही तर्क है कि मंदी में कभी-कभार शेयरों का भाव उनके वास्तविक मूल्य से बहुत नीचे आ जाता है। इससे वह आम समय के मुकाबले शेयर निवेश के लिहाज से काफी आकर्षक हो जाता है।

निवेशक इस उम्मीद में कम भाव पर शेयर खरीदते हैं कि जब बाजार वापस तेजी की राह पर लौटेगा तब उनके भाव में उछाल आएगा। इस तरह कम भाव में खरीदा गया शेयर उन्हें अच्छा-खासा मुनाफा देगा। बॉटम फिशिंग में काफी जोखिम होता है क्योंकि जरूरी नहीं बाजार निवेशक की उम्मीद की चाल चले।

क्या भारतीय बाजार में बॉटम फिशिंग करने का यह सही वक्त है?

बॉटम फिशिंग की संभावना दो कारकों से तय होती है। एक शेयरों की कीमत और दूसरा निवेश का वक्त। जहां तक शेयरों की कीमत का सवाल है, माना जा रहा है कि बाजार सबसे निचले स्तर को छू चुका है। इस समय शेयर सबसे कम भाव पर मिल रहे हैं। फिर भी यह बात शर्तिया नहीं कही जा सकती कि कब बाजार चढ़ेगा या फिर वह दोबारा गिर जाएगा। अगर आप कम वक्त में चटपट मुनाफा कमाने की चाहत रखते हैं तो जरूरी नहीं कि इसमें बॉटम फिशिंग आपको फायदा दे ही।



मौजूदा गिरावट में कौन से सेक्टर निवेश के लिहाज से बेहतर हैं?

छोटे निवेशक बॉटम फिशिंग के लिए आमतौर पर कुछ खास सेक्टर के शेयरों में पैसा लगाना पसंद करते हैं। इनमें बैंकिंग, कैपिटल गुड्स, रियल्टी, मीडिया और लॉजिस्टिक्स कंपनियों के शेयर प्रमुख हैं। विश्लेषक निवेशकों को उन्हीं सेक्टर के शेयरों में निवेश की राय दे रहे हैं जिनका बाजार घरेलू है। इसके साथ ही निवेशक उन शेयरों में पैसा लगाने की सलाह दे रहे हैं जो शेयर बाजार में अपने 52 महीने के निचले स्तर पर चल रहे हैं।

दरअसल, सिर्फ छोटे निवेशक ही शेयरों के भाव में गिरावट का फायदा उठाकर बॉटम फिशिंग नहीं कर रहे हैं। छोटी और मझोली कंपनियों के प्रमोटर मौके का फायदा उठाकर फर्म में अपनी शेयरधारिता बढ़ाने में लगे हुए हैं।

क्या है प्रत्यक्ष विदेशी निवेश/ FDI?

लीमा मैरी थॉमसन

क्या है प्रत्यक्ष विदेशी निवेश / FDI?

सामान्य शब्दों में किसी एक देश की कंपनी का दूसरे देश में किया गया निवेश प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई कहलाता है। ऐसे निवेश से निवेशकों को दूसरे देश की उस कंपनी के प्रबंधन में कुछ हिस्सा हासिल हो जाता है जिसमें उसका पैसा लगता है। आमतौर पर माना यह जाता है कि किसी निवेश को एफडीआई का दर्जा दिलाने के लिए कम-से-कम कंपनी में विदेशी निवेशक को 10 फीसदी शेयर खरीदना पड़ता है। इसके साथ उसे निवेश वाली कंपनी में मताधिकार भी हासिल करना पड़ता है।

एफडीआई दो तरह के हो सकते हैं-इनवार्ड और आउटवार्ड। इनवार्ड एफडीआई में विदेशी निवेशक भारत में कंपनी शुरू कर यहां के बाजार में प्रवेश कर सकता है। इसके लिए वह किसी भारतीय कंपनी के साथ संयुक्त उद्यम बना सकता है या पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी यानी सब्सिडियरी शुरू कर सकता है। अगर वह ऐसा नहीं करना चाहता तो यहां इकाई का विदेशी कंपनी का दर्जा बरकरार रखते हुए भारत में संपर्क, परियोजना या शाखा कार्यालय खोल सकता है। आमतौर पर यह भी उम्मीद की जाती है कि एफडीआई निवेशक का दीर्घावधि निवेश होगा। इसमें उनका वित्त के अलावा दूसरी तरह का भी योगदान होगा।

एफडीआई के क्या फायदे हैं?

एफडीआई से विदेशी निवेशक और निवेश हासिल करने वाला देश, दोनों को फायदा होता है। निवेशक को यह नए बाजार में प्रवेश करने और मुनाफा कमाने का मौका देता है। विदेशी निवेशकों को टैक्स छूट, आसान नियमों, लोन पर कम ब्याज दरों और बहुत सी बातों से लुभाया जाता है। एफडीआई से घरेलू अर्थव्यवस्था में नई पूंजी, नई प्रौद्योगिकी आती है और रोजगार के मौके बढ़ते हैं और इस तरह के बहुत से फायदे होते हैं।

क्या देश में एफडीआई संबंधी खास नियम कानून हैं?

सरकार ने एफडीआई के लिए सेक्टर विशेष और कारोबारी गतिविधियों की प्रकृति के हिसाब से नियम बनाए हुए हैं। उदाहरण के लिए, हीरे और बहुमूल्य पत्थरों के उत्खनन (माइनिंग) में एफडीआई के लिए सरकार से पूर्व अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। इसमें रिजर्व बैंक को निवेश की रकम हासिल होने के 30 दिन के भीतर एक अधिसूचना भेजनी पड़ती है। इसके साथ ही संबंधित दस्तावेज विदेशी निवेशक को शेयर जारी किए जाने के 30 दिन के भीतर सौंपना पड़ता है। प्रसारण जैसे क्षेत्र में एफडीआई के लिए विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड (एफआईपीबी) से मंजूरी लेनी पड़ती है। कुछ खास क्षेत्रों में विदेशी निवेश की ऊपरी सीमा को लेकर भी कुछ नियम लागू हैं। निवेश के ये नियम एफडीआई और एफआईआई दोनों पर लागू होते हैं।

एफडीआई और एफआईआई निवेश में क्या अंतर है?

एफडीआई में किसी विदेशी कंपनी द्वारा देश में प्रत्यक्ष निवेश होता है जबकि एफआईआई यानी विदेशी संस्थागत निवेशक शेयरों, म्यूचुअल फंड में निवेश करते हैं। एफआईआई पार्टिसिपेटरी नोट, सरकारी प्रतिभूतियों, कमर्शियल पेपर वगैरह को निवेश माध्यम बनाते हैं। ज्यादातर एफडीआई की प्रकृति स्थायी होती है लेकिन बाजार में उथल-पुथल की स्थिति बनने पर एफआईआई जल्दी से बिकवाली कर निकल जाते हैं।

क्या है कारपोरेट गवर्नेंस?

लीजा मेरी थॉमसन

कारपोरेट गवर्नेंस क्या है?

किसी भी कंपनी को चलाने की प्रणालियों, सिद्धांतों और प्रक्रियाओं के मिले-जुले रूप को कॉरपोरेट गवर्नेंस कहते हैं। इनसे दिशानिर्देश मिलता है कि कंपनी का संचालन और उस पर नियंत्रण किस तरह किया जाए कि इससे कंपनी की गुणवत्ता बढ़े और इससे संबंधित लोगों को दीर्घकालिक तौर पर लाभ हो। यहां संबंधित लोगों के दायरे में कंपनी का निदेशक मंडल, कर्मचारी, ग्राहक और पूरा समाज शामिल है। इस तरह से कंपनी का प्रबंधन अन्य सभी लोगों के लिए ट्रस्टी की भूमिका में आ जाता है।



कॉरपोरेट गवर्नेंस के सिद्धांत क्या हैं?

पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ कंपनी के कारोबार को चलाना कॉरपोरेट गवर्नेंस का मूल सिद्धांत है। इसमें लेनदेन की गतिविधियों में ईमानदारी बरतना, कंपनी के परिणामों और फैसलों को सार्वजनिक करना, देश के कायदे-कानून का पालन करना और लोगों के भरोसे को बनाए रखना शामिल है। कॉरपोरेट गवर्नेंस पर बाजार नियामक संस्था सेबी ने खास तौर पर कहा है कि कंपनी का प्रबंधन करते हुए यह साफ किया जाना चाहिए कि व्यक्तिगत संपत्ति के दायरे में क्या है और कंपनी की संपत्ति के दायरे में क्या है।

कॉरपोरेट गवर्नेंस क्यों महत्वपूर्ण है?

जिन कंपनियों का कॉरपोरेट गवर्नेंस अच्छा होता है, उन पर लोगों का भरोसा कायम रहता है। किसी कंपनी में स्वतंत्र निदेशकों की उपस्थिति और उनकी सक्रियता से बाजार में उसकी स्थिति अच्छी होती है। आम तौर पर देखा जाता है कि विदेशी संस्थागत निवेशक जब किसी कंपनी में अपना निवेश करना चाहते हैं तो वे कंपनी के कॉरपोरेट गवर्नेंस पर खासा ध्यान रखते हैं।

साथ ही कॉरपोरेट गवर्नेंस उस कंपनी के शेयरों की कीमत पर भी असर डालता है। यदि किसी कंपनी का कॉरपोरेट गवर्नेंस बेहतर होता है तो बाजार से उसे रकम जुटाने में भी आसानी होती है। लेकिन इन सबके बीच दु:खद बात यह है कि कॉरपोरेट गवर्नेंस की चर्चा तभी होती है, जब बड़े पैमाने पर कोई घपलेबाजी होती है।

कॉरपोरेट गवर्नेंस का मसला इन दिनों क्यों चर्चा में है?

आईटी कंपनी सत्यम के संस्थापक रामलिंगा राजू की करोड़ों की घपलेबाजी से कॉरपोरेट गवर्नेंस का मसला सतह पर आ गया है। असल में बीते साल के 16 दिसंबर से ही सत्यम में गड़बड़ी की आहट आने लगी थी। उस वक्त कंपनी ने 1.3 अरब डॉलर खर्च कर मेटास प्रॉपर्टीज में हिस्सेदारी खरीदने की घोषणा की थी।

इस घोषणा के बाद कंपनी के शेयरधारकों में खलबली मच गई और इसके शेयर जमीन पर आ गए। परिणाम यह हुआ कि कंपनी को अपना फैसला वापस लेना पड़ा। बाद में राजू ने स्वीकार किया कि कंपनी के मुनाफे को गलत तरीके से पेश किया गया और कंपनी के पास फंड बहुत ही कम है। सत्यम की इस गड़बड़ी को भारत का सबसे बड़ा कॉरपोरेट घोटाला कहा जा रहा है। विडंबना है कि सत्यम ने बेहतरीन कॉरपोरेट गवर्नेंस के लिए सितंबर 2008 में गोल्डन पीकॉक ग्लोबल अवॉर्ड जीता था।

क्या होता है डेली मूविंग एवरेज?

बाजार में तेजी लौट आई या नहीं , इसके निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आप एक और पैमाने पर गौर कर सकते हैं और वह है डेली मूविंग एवरेज (डीएमए)। तेजी के बाजार में इंडेक्स अपनी 200 सिम्पल मूविंग एवरेज से ऊपर होगा और स्टॉक की वैल्यू (कम से कम निफ्टी के प्रमुख शेयर) 200 डीएमए से ऊपर होगी।

जियोजित फाइनेंशियल सर्विसेज में हेड ऑफ रिसर्च एलेक्स मैथ्यू ने कहा , ' जब तक सेंसेक्स / निफ्टी / शेयर उसकी 50 , 100 , 200 डीएमए से नीचे होते हैं तो बाजार को मंदडि़यों के कब्जे में बताया जाता है। अगर बाजार में सुस्ती की वजह से इंडेक्स 50 डीएमए से नीचे चला जाएगा तो वह वापसी करना शुरू करेगा जिसके चलते निफ्टी / सेंसेक्स / स्टॉक को उसकी 50 , 100 या 200 डीएमए तक ले जाएगा। '

इस स्थिति को तफ्सील से समझाने के लिए मैथ्यू ने एक उदाहरण दिया जिसमें हाजिर निफ्टी 2934 , निफ्टी 50 डीएमए 2864 , 100 डीएमए 3100 और 200 डीएमए 3822 पर है। उन्होंने कहा , ' मंदी के बाजार में क्योंकि निफ्टी अपने 50 डीएमए से ऊपर है इसलिए वह 3100 की 100 डीएमए या कई बार 3822 की 200 डीएमए को टेस्ट कर सकता है। सेंसेक्स में इस तरह के उछाल को मंदी के बाजार की रैलियां कहा जाता है। ' उनके मुताबिक ज्यादा कारोबार और कम इम्पैक्ट कॉस्ट बाजार में तेजी लौटने की मुख्य विशेषताएं हैं।


डिफ्लेशन किसे कहते हैं और आपको इससे कैसे फर्क पड़ता है?

शुभा गणेश

पिछले हफ्ते शेयर बाजारों को कुछ हैरत में डालने वाले घटनाक्रम सामने आए। मुद्रास्फीति दर ने गिरावट का रिकॉर्ड बनाया। सप्ताह दर सप्ताह आधार पर 7 मार्च को खत्म हफ्ते के लिए महंगाई दर 0.44 फीसदी रही जबकि इससे पिछले सप्ताह यह 2.43 फीसदी पर थी। कारोबारी गलियारों में अगले सप्ताह मुदास्फीति के शून्य का स्तर छूने या उससे भी नीचे नकारात्मक होने की आशंका जताई जा रही है।

कुछ महीने पहले तक निवेशक हर गुरुवार महंगाई दर में गिरावट की दुआ मांग रहे थे। लेकिन मुद्रास्फीति दर के आंकड़ों में लगातार गिरावट आने के बाद वे अब हैरान हैं। सप्ताह दर सप्ताह आधार पर मुद्रास्फीति दर जल्द ही नकारात्मक दायरे में जा सकती है। यह अपस्फीति (डिफ्लेशन) की स्थिति होगी।

क्या है अपस्फीति (डिफ्लेशन)?

नकारात्मक दायरे में अस्थायी गिरावट को तुरंत अपस्फीति के तौर पर नहीं लिया जाता। अपस्फीति को लेकर कीमतों में अस्थायी गिरावट के साथ भ्रम नहीं पालना चाहिए। दरअसल, यह कीमतों में लगातार गिरावट आने की स्थिति है। यह तब आती है जब मुद्रास्फीति दर शून्य फीसदी से भी नीचे चली जाती है। अपस्फीति के माहौल में उत्पादों और सेवाओं के दाम गिरने जारी रहते हैं। इसलिए, उपभोक्ताओं के पास कीमतों और गिरावट आने तक खरीदारी और उपभोग के फैसले टालने का मौका होता है। बदले में इससे समूची आर्थिक गतिविधियों पर ब्रेक लगती है। अर्थव्यवस्था जिस तादाद में उत्पाद और सेवाएं खरीदना चाहती हैं और जिस कीमत पर खरीदना चाहती हैं, उन दोनों में गिरावट आती है। सब कुछ थम सा जाता है। ऐसे में निवेश में भी गिरावट आती है जिससे औसत मांग पर और ज्यादा चोट पड़ती है। अपस्फीति का एक और साइड इफेक्ट बेरोजगारी बढ़ने के रूप में सामने आता है क्योंकि अर्थव्यवस्था में मांग का स्तर काफी घट जाता है। रोजगार की कमी मांग को और कम करती है जिससे अपस्फीति को और तेजी मिलती है।

वैश्विक स्तर पर अपस्फीति बड़ी समस्या है क्योंकि निकट भविष्य में इसके आर्थिक असर देखने को मिलेंगे ही, साथ ही हाल तक अर्थशास्त्री लगातार अपस्फीति के बने रहने को बुनियादी रूप से नामुमकिन मान रहे थे।

अपस्फीति बढ़ाती है क्रय शक्ति

अपस्फीति से पैसे का असल मूल्य बढ़ता है। इससे लिक्विड एसेट और मुद्रा बचाने वाले और उसे अपने पास रखने वालों को काफी फायदा होता है क्योंकि वक्त बीतने के साथ-साथ लिक्विड एसेट और करेंसी की वास्तविक वैल्यू बढ़ती रहती है। दूसरी ओर यह उन निवेशकों की रकम में कमी करने का काम करती है जिन लोगों ने कम तरलता रखने वाले उत्पादों में पैसा लगाया है। साथ ही कर्जदारों को भी नुकसान होता है क्योंकि कम तरलता वाली संपत्तियों में लगाया गया पैसा वक्त बीतने के साथ-साथ कम होने लगता है। अपस्फीति के दौर में कर्ज भी बढ़ता है। कर्ज की अदायगी, क्रय शक्ति का बड़ा हिस्सा चट कर जाती है। जब कर्ज लिया था, उस दिन के मुकाबले अपस्फीति के दौरान उसे चुकाना भारी बोझ बन जाता है। अपस्फीति को आम तौर पर नकारात्मक करार दिया जाता है क्योंकि इसमें कम तरलता वाली संपत्तियों में निवेश करने वाले और कर्जदारों की जेब से पैसा उनके पास पहुंचता है जो लिक्विड एसेट और करेंसी को बचाकर रखने वाले हैं। वक्त बीतने के साथ ही पैसे की क्रय शक्ति भी बढ़ती है। हालांकि, यह उस वक्त बड़ी मुसीबत बन सकती है जब व्यक्ति विशेष की नेट वर्थ का बड़ा हिस्सा कम तरलता रखने वाली संपत्तियों में फंसा हो।

अपस्फीति से बाहर का रास्ता

कम से कम सिद्धांत रूप में तो अपस्फीति से बचा ही जा सकता है। सरकार को ज्यादा रुपए छापने होते हैं। ज्यादा मुद्रा छापने से सिस्टम में पैसा बढ़ जाता है और लोगों के पास खर्च के लिए ज्यादा रकम होती है।अपस्फीति से निपटने के लिए दूसरा हथियार है रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति। सरकारी बॉन्ड खरीदकर आरबीआई पैसे की आपूर्ति बढ़ा सकता है इससे मुद्रास्फीति दर को हवा मिलेगी। कीमतों में इजाफा किसी भी ठोस वापसी के लिए फायदे का काम करता है क्योंकि इससे मुनाफा बढ़ता है और हर तरह का दबाव कम होने लगता है।

निवेशकों पर असर

इसलिए, रिजर्व बैंक की ओर से दरों में और कटौती हो सकती है और मौद्रिक नीति के मोर्चे पर राहत का इंतजाम किया जा सकता है। बाजारों पर 100 बेसिस अंकों की कमी का असर पहले ही देखा जा चुका है। मौद्रिक राहत पहुंचाने के लिए सरकार खुले बाजार से सरकारी बॉन्ड भी खरीद सकती है। निवेशकों के लिए इसका यह मतलब है कि 10-12 फीसदी की ऊंची डिपॉजिट दरों के दिन अब लद गए हैं और उन्हें डिपॉजिट तथा फिक्स्ड उत्पादों पर कम रिटर्न मिलेगा। फिक्स्ड डिपॉजिट और बॉन्ड में निवेश करने वाले निवेशक इन उत्पादों की वास्तविक कीमत अपस्फीति के दिनों में बढ़ती देखेंगे।

क्या है महंगाई दर और कैसे होती है इसकी गणना

कविता श्रीराम

मुद्रास्फीति दर शून्य के करीब खड़ी है। ज्यादा वक्त नहीं बीता है जब महंगाई दर का 0.44 फीसदी तक लुढ़कना नामुमकिन सा लग रहा था। लेकिन आज यह हकीकत है। मुद्रास्फीति दर ने गिरावट के मामले में 32 साल का रेकॉर्ड तोड़ दिया है। आप और क्या उम्मीद कर सकते हैं?

सबसे पहले हमें यह समझने की जरूरत है कि मुद्रास्फीति दर के आंकड़े कैसे आंके जाते हैं? देश की महंगाई दर थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) के आधार पर आंकी जाती है। इस सूचकांक का इस्तेमाल उन उत्पादों की औसत कीमत स्तर में बदलाव आंकने के लिए किया जाता है जिनका कारोबार थोक बाजार में होता है। डब्ल्यूपीआई के जरिए 400 से ज्यादा कमोडिटी पर निगाह रखी जाती है। कमोडिटी बास्केट में आने वाली चीजों की समीक्षा नियमित रूप से की जाती है ताकि कुछ सामान जरूरत से ज्यादा अहमियत न रखें। डब्ल्यूपीआई तक पहुंचने के लिए निर्मित उत्पादों, ईंधन और प्राथमिक वस्तुओं के दाम का इस्तेमाल किया जाता है।

कई लोगों की दलील है कि डब्ल्यूपीआई सटीक रूप से मुद्रास्फीति के दबाव का अंदाजा नहीं देता। इसलिए कई मुल्कों ने अब कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (सीपीआई) की राह पकड़ ली है। सीपीआई उपभोक्ताओं की ओर से खरीदे जाने वाले उत्पादों और सेवाओं के खास सेट की वेटेड औसत कीमत को आंकने से जुड़ा सांख्यिकीय माप है।

क्या चीजें वास्तव में सस्ती हो रही हैं? महंगाई दर शून्य तक पहुंच रही है लेकिन किराने का बिल कुछ और ही संकेत दे रहा है। खाद्य सामग्री के दाम अब भी ऊंचे हैं। खाद्यान्न एक साल पहले के मुकाबले नौ फीसदी महंगा है। प्राथमिक खाद्य वस्तुओं की कीमतें अब भी चढ़ रही हैं। डब्ल्यूपीआई में गिरावट मुख्य रूप से ईंधन और मैन्युफैक्चरिंग की वजह से है। इसलिए, कम महंगाई दर के बावजूद खाद्य वस्तुओं की कीमतें ज्यादा बनी हुई हैं।

अगर यह चलन जारी रहता है तो भारतीय रिजर्व बैंक आगे कदम बढ़ाकर दरों में और कटौती कर सकता है। बेरोजगारों की तादाद बढ़ने और नौकरियों में छंटनी की वजह से भी मांग घट रही है। मांग में गिरावट मुद्रास्फीति दर को शून्य के करीब ले जाने वाला अहम कारण है।

अनिश्चित हालात में निवेश

निवेशक अब मुद्रास्फीति और कीमतों में बढ़ोतरी के चलन के आदी हो गए हैं। अपस्फीति यानी डिफ्लेशन जैसा नाम यहां ज्यादा सुना नहीं गया है। इसी वजह से कई निवेशक अतिरिक्त रकम लगाने के लिए सर्वश्रेष्ठ माध्यम चुनने को लेकर भ्रम में हैं। डिफ्लेशन से हमारे मायने उत्पादों और सेवाओं के दामों में लगातार गिरावट आने से हैं। यह मांग घटने, उत्पादन में कमी और अर्थव्यवस्था में कमजोरी से जुड़ी है।

जो निवेशक ज्यादा जोखिम लेने की क्षमता रखते हैं उन्हें उन सेक्टरों में निवेश पर गौर करना चाहिए जो मांग में गिरावट से ज्यादा प्रभावित नहीं हुए हैं। स्वास्थ्य सेवा जैसे सेक्टर और ऊर्जा जैसे आवश्यक सेगमेंट में मांग घटने की संभावना नहीं रहती। हालांकि कई कंपनियों पर अर्थव्यवस्था में कमजोरी का सीधा असर पड़ता है। इस वक्त कर्ज के जाल में न फंसने की सलाह दी जाती है। अपनी नौकरी बरकरार रखिए क्योंकि बाहर हालात कुछ अच्छे नहीं हैं।

पास थ्रू सर्टिफिकेट (पीटीसी) क्या है?

लीजा मैरी थॉमसन

पास थ्रू सर्टिफिकेट (पीटीसी) क्या है?

पास थ्रू सर्टिफिकेट यानी पीटीसी वह प्रमाणपत्र है, जो गिरवी रखी गई संपत्ति के एवज में निवेशक को जारी किया जाता है। पीटीसी बैंक या अन्य वित्तीय संस्थानों द्वारा निवेशकों को जारी किए जाने वाले बॉन्ड या डिबेंचर के समान होते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पीटीसी को अंडरलाइंग सिक्योरिटीज के एवज में जारी किया जाता है। सिक्योरिटीज पर मिलने वाला ब्याज निवेशक को फिक्स्ड इनकम यानी निश्चित आय के रूप में होता है। प्राय: पीटीसी में वित्तीय संस्थाएं जैसे-बैंक, म्यूचुअल फंड् और बीमा कंपनियां निवेश करती हैं। हालांकि, इसे बेहतर ढंग से समझने के लिए हमें सिक्योराइटेजेशन के बारे में जानना होगा।

सिक्योराइटेजेशन क्या है?

बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थाएं ग्राहकों को जो लोन या सेवाएं देती हैं, उन पर उन्हें ब्याज मिलता है या मूलधन वापस मिलता है। सिक्योराइटेजेशन के तहत मिलने वाली रकम या आय को कर्ज योजनाओं (डेट इंस्ट्रूमेंट) में परिवर्तत कर निवेशकों को बेच दिया जाता है। इसके लिए मूल कंपनी या बैंक एक स्पेशल पर्पस व्हीकल (एसपीयू) बनाता है, जो डेट इंस्ट्रमेंट जारी करने का काम करती है। बाजार में इस डेट इंस्ट्रमेंट की बिक्री से मूल कंपनी को नकदी हासिल होती है। वह इस रकम या फंड का इस्तेमाल अपने कारोबार के लिए कर सकती है। जब कोई निवेशक इस डेट इंस्ट्रूमेंट को खरीदता है तो उसे पीटीसी जारी किया जाता है। इसका मतलब यह नहीं है कि पीटीसी के अंडरलाइंग एसेट पर निवेशक का अधिकार होता है। जब मूल कंपनी को दिए गए कर्ज की रकम या कर्ज पर ब्याज मिलता है तो वह उसे एसपीवी को स्थानांतरित कर देती है। एसपीवी इस रकम को फिक्स्ड इनकम के रूप में निवेशकों को दे देती हैं।

पास थ्रू सर्टिफिकेट और पे थ्रू सर्टिफिकेट में क्या अंतर है?

पास थ्रू सर्टिफिकेट में कंपनी को लोन पर मिलने वाला ब्याज या मूलधन सीधे निवेशक को दे दी जाती है, जबकि पे थ्रू सर्टिफिकेट में ब्याज या मूलधन की रकम निवेशक को नहीं दी जाती है। इसके बदले निवेशकों को एसपीवी द्वारा नई सिक्योरिटीज जारी की जाती है।

पीटीसी का क्या महत्व है? यह खबरों में क्यों है?

बाजार में मौजूद पीटीसी की रेटिंग क्रिसिल या फिच जैसी रेटिंग एजेंसियों द्वारा की जाती है। रेटिंग से निवेशकों को पीटीसी की अंडरलाइंग सिक्योरिटीज की गुणवत्ता के बारे में जानकारी मिलती है। वोकहार्ट द्वारा जारी पीटीसी की रेटिंग क्रिसिल ने घटा दी है। इसके चलते पीटीसी आजकल खबरों में है। वोकहार्ट अपने पीटीसी पर ब्याज का भुगतान करने में असमर्थ रही है, जिसके चलते उसके पीटीसी की रेटिंग घटा दी गई है।

क्या है क्यूआईपी?

क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट (क्यूआईपी) कंपनियों के लिए पूंजी जुटाने का एक जरिया है। शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनी क्यूआईपी के तहत क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर (क्यूआईबी) को वॉरंट के अलावा शेयर, आंशिक या पूर्णत: परिवर्तनीय डिबेंचर जैसी सिक्योरिटीज जारी कर पूंजी जुटाती है। ये सिक्योरिटी तय अवधि के बाद शेयरों में परिवर्तित कर दी जाती हैं। प्रिफरेंशियल आवंटन के अलावा जल्द पूंजी जुटाने का यह दूसरा जरिया है।

क्यूआईपी की शुरुआत कब और कैसे हुई थी?

सेबी ने घरेलू कंपनियों को कम अवधि में बाजार से पैसे जुटाने की सुविधा देने के लिए 2006 में इसकी शुरुआत की थी। इसका मकसद विदेशी पूंजी पर घरेलू कंपनियों की अत्यधिक निर्भरता में कमी लाना भी था। क्यूआईपी से पहले घरेलू बाजार से पूंजी जुटाने की जटिल औपचारिकताओं से बचने के लिए कई कंपनियां विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बॉन्ड (एफसीसीबी) या ग्लोबल डिपॉजिटरी रिसीट (जीडीआर) के जरिए पैसे जुटाना पसंद करती थीं।

क्यूआईपी में कौन हिस्सा ले सकता है?

क्यूआईपी के तहत सिर्फ वैसे क्यूआईबी को सिक्योरिटी जारी किए जा सकते हैं, जो खुद कंपनी के प्रमोटर नहीं हैं या प्रमोटर से संबंधित नहीं हैं। क्यूआईपी का प्रबंधन सेबी में पंजीकृत मर्चेंट बैंकर द्वारा किया जाता है। क्यूआईपी से पैसे जुटाने वाली कंपनी को इश्यू से पहले सेबी के यहां किसी तरह का दस्तावेज जमा नहीं करना पड़ता है। प्लेसमेंट से संबंधित दस्तावेज स्टॉक एक्सचेंज और कंपनी की वेबसाइट पर उपलब्ध कराया जाता है।

क्यूआईपी से पैसे जुटाने वाली कंपनियों की संख्या क्यों बढ़ गई है?

हाल में देखी गई मंदी में रियल एस्टेट सहित कई कंपनियों के सामने पैसे की भारी कमी की समस्या पैदा हो गई थी। उन्हें कारोबार के लिए कामकाजी पूंजी जुटाने में भी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। शेयर बाजार में हालात में आया सुधार कंपनियों के लिए वरदान के समान है। कंपनियां अपने महंगे कर्ज को चुकाने या अपनी बैलेंसशीट के पुनर्गठन के लिए क्यूआईपी का सहारा ले रही हैं। एक महीने से थोड़े अधिक समय में कंपनियों द्वारा क्यूआईपी के जरिए जुटाई गई रकम 3,500 करोड़ रुपए के स्तर को पार कर गई है। 2008 में कंपनियों ने करीब इतनी ही रकम क्यूआईपी से जुटाई थी। अगले कुछ हफ्ते में कई और कंपनियां क्यूआईपी के जरिए पैसे जुटाने जा रही हैं।

पहले जानिए क्या होती है 'हिडन कॉस्ट'

अमित कुश

अब डिवेलपर्स और एक्सर्पट्स भी मान रहे हैं कि रीयल एस्टेट में कीमतें तर्कसंगत स्थिति पर आ गई हैं, यानी इस भुलावे में रहना गलत होगा कि कीमतें कम हुई हैं। बस, दाम सही लेवल पर लाना मंदी की मजबूरी हो गया था। जानते हैं कि कीमतें अफोडेर्बल हुईं कैसे?

चाजेर्स

अफोडेर्बल प्रोजेक्ट के विज्ञापनों में आपने कीमत के साथ स्टार लगा देखा होगा। मतलब, शर्तें लागू। आप फ्लैट लेने जाएंगे, तो उसमें कुछ लाख और जुड़ जाएंगे। आमतौर पर बेसिक सेल प्राइज का ही प्रचार किया जाता है। इसके अलावा, कम से कम एक प्रिफर्ड लोकेशन चार्ज, ओपन या कवर्ड में से कोई एक पार्किंग चार्ज, इंटरेस्ट फ्री मेंटेनेंस चार्ज, कम से कम 1 केवी का पावर बैकअप चार्ज भी इसकी कीमत में जरूर जोड़े जाएंगे। क्लब मेंबरशिप कई जगह ऑप्शनल भी मिल सकती है। रजिस्ट्री की कीमत इन सबसे अलग होगी। कुल मिलाकर फ्लैट की कीमत पांच-छह लाख रुपये बढ़ सकती है, यानी बीस लाख रुपये वाला मकान 26 लाख रुपये में।

सुविधाएं

अफोडेर्बल फ्लैट्स ताम-झाम के बगैर होते हैं। फुली फनिर्श्ड की बजाय रॉ फ्लैट। रॉ-फ्लैट में महंगी चीजें लगाकर ही उसे लग्जरी बनाया जाता है। इसकी कीमत मंे विट्रीफाइड टाइल्स, महंगी बाथरूम फिटिंग्स, महंगे वॉशेबल पेंट, ब्रैंडेड मॉड्युलर किचन्स, बेसमेंट, कवर्ड पाकिर्ंग आदि की कीमतें भी शामिल होती है। अफोडेर्बलिटी की सबसे पहली गाज मॉड्युलर किचन पर गिरी है। ज्यादातर प्रोजेक्ट्स में रॉ-किचन दी जा रही है, यानी कीमत में 50 हजार से दो लाख रुपये तक की कमी। अगला नंबर है वुड वर्क का। कमरों में अलमारी की जगह तो होगी, लेकिन वुड वर्क नहीं। अच्छे वुक वर्क को बेस मानें, तो एक लाख रुपये की और कमी। इसके अलावा, तमाम मटीरियल की क्वॉलिटी से समझौता, जबकि लग्जरी प्रोजेक्ट्स के लिए बेहतरीन लोकेशन के साथ-साथ हाई क्वॉलिटी के कंस्ट्रक्शन की भी जरूरत होती है। इससे अफोडेर्बिलिटी की गुंजाइश कम होती है। इन दिनों पूरे घर में महंगी ग्रेनाइट फ्लोरिंग की बजाय कोटा स्टोन या अन्य फ्लोरिंग बिछवाई जा रही है। सभी कमरों में विट्रीफाइड टाइल्स की बजाय सिर्फ ड्राइंग रूम में इन्हें बिछाया जा रहा है। वॉशेबल ऑयल बॉन्ड डिस्टेंपर पेंट की बजाय ड्राई डिस्टेंपर, किचन में ग्रेनाइट स्लैब की बजाय कोटा स्टोन स्लैब, स्टेनलेस स्टील सिंक की बजाय विट्रस चाइना सिंक आदि का प्रयोग किया जा रहा है। इससे कंस्ट्रक्शन कॉस्ट 350 रुपये प्रति स्क्वेयर फीट तक कम की जा सकती है। इस तरह, महंगे इंटीरियर से हाथ खींचकर 1000 स्क्वेयर फीट के 2बीएचके फ्लैट की कीमत में साढ़े तीन से चार लाख रुपये कम किए जा सकते हैं।

साइज

अफोडेर्बल लेवल पर लाने के लिए फ्लैट्स के साइज भी कम किए जा रहे हैं। इससे फ्लैट की कीमत प्रति स्कवेयर फीट की दर से अपने आप कम हो जाती है। विज्ञापन में पहले की तरह 2 या 3 बीएचके प्रचारित किया जाएगा, लेकिन उस फ्लैट का साइज कम हो चुका होगा। अफोडेर्बलिटी के प्रचार में जिस 9 या 10 लाख रुपये के फ्लैट का जिक्र किया जाता है, वह दरअसल 550 से 750 स्क्वेयर फीट का 1 बीएचके होता है। इसकी जरूरत शायद सिर्फ बैचलर्स या नवदंपतियों को ही होती है।

लोकेशन

अफोडेर्बल प्रोजेक्ट्स अक्सर ऐसी जगह पर होते हैं, जहां जमीनों की कीमतें कम हैं। ये मुख्य शहर से दूर भी हो सकती हैं। हो सकता है कि वहां टाउनशिप तो हो, लेकिन उससे बाहर न तो बाजार हो और न अस्पताल। निजी वाहन रखना मजबूरी हो।

क्या हो MF आंकने का पैमाना?

कविता श्रीराम

निवेशक और फंड मैंनेजर , दोनों म्यूचुअल फंड के प्रदर्शन पर करीबी निगाह रखते हैं। निवेशक , निवेश से जुड़े फैसले करने की खातिर सूचना और जानकारी के इंतजार में रहते हैं , जबकि फंड मैनेजर का मेहनताना आम तौर पर इसी से जुड़ा होता है। फंड से मिलने वाला रिटर्न अकेला सारी कहानी में नाकाम रहता है , लेकिन वैकल्पिक निवेशों के बीच तुलना ज्यादा अर्थपूर्ण होती है। इसलिए बेंचमार्क का चुनाव खासी अहमियत रखता है। निवेश से कुल कितना रिटर्न मिलेगा , जोखिम से जुड़ा प्रदर्शन निवेशकों के लिए इससे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। कुछ निवेशक ऐसे होते हैं जो कम निवेश मिलने पर ज्यादा दिक्कत महसूस नहीं करते , लेकिन वे चाहते हैं कि निवेश का साथ कम जोखिम जुड़ा हो।

म्यूचुअल फंड के प्रदर्शन को आंकने के दो रास्ते हैं :

शार्प रेशियो

शार्प रेशियो जोखिम के समायोजन के बाद सामने आने वाले प्रदर्शन को मापने का रास्ता है। यह जोखिमपूर्ण एसेट की अतिरिक्त उथल - पुथल के लिए निवेश से मिलने वाले अतिरिक्त रिटर्न का आंकने का काम करता है। फर्ज कीजिए कि एक्स निवेश 12 फीसदी रिटर्न देता है। जबकि दूसरा वाई निवेश 10 फीसदी मुनाफे का इंतजाम करता है। इनमें से कौन सा बेहतर प्रदर्शन करने वाला खिलाड़ी है ? 12 फीसदी का एक्स से मिलने वाला निवेश पहली नजर में आकर्षक मालूम देता है , लेकिन आपको इन दोनों निवेश के साथ जुड़े लाभ की गणना करना जरूरी है। मान लीजिए कि एक्स के मामले निवेश जोखिमपूर्ण है , वाई निवेश मुक्त मुनाफा देता है। ऐसा होने पर वाई ने ज्यादा बेहतर रिस्क एडजेस्टेड रिटर्न देगा। एक्स से मिलने वाला रिटर्न उसके साथ जुड़े जोखिम के अनुपात में नहीं है। ( ##include msid= 4117863 ,type= 9 ##)

शार्प रेशियो म्यूचुअल फंड या पोर्टफोलियो से मिलने वाले रिटर्न में जोखिम मुक्त संपत्ति से मिलने वाले मुनाफे को घटाने और उसके बाद उसे स्कीम के स्टैंडर्ड डेविएशन से घटाने पर सामने आता है। म्यूचुअल फंड स्कीम से मिलने वाले रिटर्न में से जोखिम मुक्त एसेट का रिटर्न घटाने से हमें जोखिम मुक्त एसेट की तुलना में स्कीम की ओर से बटोरा गया अतिरिक्त रिटर्न पता चलता है।

इस अतिरिक्त रिटर्न को संपत्ति के स्टैंडर्ड डेविएशन से भाग कर शार्प रेशियो या उसके साथ जुड़ी अतिरिक्त उठापटक के लिए अतिरिक्त रिटर्न तय किया जा सकता है। स्टैंडर्ड डेविएशन शेयर की उठापटक को मापता है। शेयर का रिटर्न , शेयर के औसत रिटर्न से जितना अलग होगा , उसमें उतनी ज्यादा उथल - पुथल दर्ज की जाएगी। ज्यादा शार्प अनुपात रखने वाली एसेट उसी जोखिम के साथ तुलनात्मक रूप से ज्यादा रिटर्न देने का काम करती है।