Φ अपना विषय खोजे

Tuesday, August 14, 2012

राष्ट्र तभी फलते-फूलते हैं

 

When the failure Country

इन दिनों मैं एक दिलचस्प किताब पढ़ रहा हूं, जिसका नाम है-ह्वाई नेशन फेल। आप जैसे-जैसे इस किताब को पढ़ते जाएंगे, उतने ही इसके मुरीद होते जाएंगे कि अफगानिस्तान के मामले में हम कितने मूर्ख साबित हुए और हमें अपनी विदेशी सहायता रणनीति को बदलने की कितनी जरूरत है।

एमआईटी के अर्थशास्त्री डॉरेन एकमॉलू और हार्वर्ड के राजनीतिशास्त्री जेम्स ए रॉबिन्सन द्वारा लिखी गई यह किताब बताती है कि मुख्यतः संस्थाएं ही देशों के बीच फर्क पैदा करती हैं। राष्ट्र तभी फलते-फूलते हैं, जब वे समावेशी राजनीतिक और आर्थिक संस्थानों का विकास करते हैं, और वे तभी विफल होते हैं, जब वे संस्थाएं शोषक बन जाती हैं तथा सत्ता एवं अवसर चंद लोगों तक सिमटकर रह जाते हैं।

संपत्ति के अधिकार को लागू करने वाली समावेशी और राजनीतिक संस्थाएं सबके फल-फूल सकने का ढांचा तैयार करती हैं और नई तकनीकों और हुनर में निवेश को प्रोत्साहित करती हैं। ये उन शोषक आर्थिक संस्थानों की तुलना में आर्थिक वृद्धि में सहायक होती हैं, जिनकी संरचना चंद लोगों द्वारा कइयों से संसाधन छीनने के लिए होती है।

समावेशी आर्थिक और राजनीतिक संस्थाएं एक-दूसरे को सहयोग करती हैं, बहुलतावादी तरीके से राजनीतिक शक्तियों का व्यापक वितरण करती हैं और कानून-व्यवस्था बहाल कर, संपत्ति के अधिकार का ढांचा सुनिश्चित कर और समावेशी बाजार अर्थव्यवस्था स्थापित कर कुछ हद तक राजनीतिक केंद्रीकरण हासिल करने में सक्षम होती हैं। इसके विपरीत शोषक राजनीतिक संस्थाएं सत्ता पर पकड़ बनाए रखने के लिए कुछ सबल शोषक आर्थिक संस्थाओं के पास शक्तियां केंद्रित करती हैं।

एकमॉलू एक इंटरव्यू में बताते हैं कि राष्ट्र तभी फलते-फूलते हैं, जब वे हर नागरिक के नवोन्मेष, निवेश और विकास की पूरी शक्तियों को स्वतंत्र, सशक्त और संरक्षित करने वाली राजनीतिक एवं आर्थिक संस्थाओं का निर्माण करते हैं। जरा तुलना कीजिए कि साम्यवाद के पतन के बाद से सोवियत संघ का हिस्सा रहे जॉर्जिया या उजबेकिस्तान के साथ पूर्वी यूरोप के रिश्ते कैसे हुए या इस्राइल बनाम अरब देशों या कुर्दिस्तान बनाम बाकी इराक में क्या हुआ।

इन दोनों लेखकों के मुताबिक, इतिहास का सबक यह है कि अगर आपकी राजनीति सही नहीं होगी, तो आपकी अर्थव्यवस्था भी दुरुस्त नहीं होगी। इसीलिए वे इस धारणा का समर्थन नहीं करते कि चीन ने राजनीतिक नियंत्रण के जरिये आर्थिक विकास हासिल करने का कोई जादुई फॉरमूला ईजाद किया है। एकमॉलू कहते हैं, 'हमारा विश्लेषण यह है कि चीन ने कम्युनिस्ट पार्टी के तानाशाही नियंत्रण वाली शोषक संस्थाओं के जरिये विकास हासिल किया है। इसलिए यह विकास टिकाऊ नहीं है, क्योंकि यह उस 'रचनात्मक विघटन' को प्रोत्साहित नहीं करता, जो नवोन्मेष और उच्चतम आय के लिए बेहद अहम होता है।'

वे आगे लिखते हैं कि टिकाऊ आर्थिक विकास के लिए नवोन्मेष जरूरी है और नवोन्मेष को रचनात्मक विघटन से अलग नहीं किया जा सकता। नवोन्मेष आर्थिक क्षेत्र में पुराने की जगह नए को स्थापित करता है और राजनीतिक क्षेत्र में स्थापित सत्ता संबंधों को अस्थिर करता है। इसलिए जब तक चीन रचनात्मक विघटन पर आधारित अर्थव्यवस्था के लिए अपनी नीतियों में परिवर्तन नहीं करता, तब तक उसका विकास टिकाऊ नहीं होगा।

क्या आप इसकी कल्पना कर सकते हैं कि पढ़ाई छोड़ चुके एक 20 वर्षीय लड़के को एक कंपनी शुरू करने की इजाजत मिलती है, जो सरकारी बैंकों द्वारा वित्त पोषित चीनी कंपनियों के पूरे क्षेत्र के लिए चुनौती बनती है। एकमॉलू बताते हैं कि 9/11 के बाद उपजा विचार, कि अरब देशों और अफगानिस्तान में लोकतंत्र की कमी ही उसका रोग है, गलत नहीं था। लेकिन अमेरिका का यह सोचना गलत था कि हम वहां लोकतंत्र का निर्यात कर सकते हैं। टिकाऊ लोकतांत्रिक बदलाव कहीं बाहर से नहीं आ सकता, बल्कि वह स्थानीय तौर पर जमीनी आंदोलनों से ही उभरता है।

हालांकि इसका मतलब यह भी नहीं कि बाहरी लोग कुछ नहीं कर सकते। उदाहरण के लिए, हमें मिस्र जैसे देशों में सैन्य सहायता से हाथ खींचकर वहां के समाजों को व्यापक रूप से राजनीति से जोड़ना चाहिए। मिस्र, पाकिस्तान और अफगानिस्तान को दी जाने वाली अमेरिकी सहायता वास्तव में फिरौती है, जो वहां के शासक वर्ग को इसलिए दी जाती है, ताकि वे गलत काम न करें। हमें इसे प्रलोभन के रूप में बदलने की जरूरत है।

मसलन, काहिरा को और 1.3 अरब डॉलर की सैन्य सहायता देने के बजाय हमें इस बात पर जोर देना चाहिए कि मिस्र अपने समाज के सभी क्षेत्रों के प्रतिनिधियों की एक कमेटी बनाए, जो हमें बताएगा कि विदेशी सहायता से वे कौन-सी संस्थाएं, मसलन स्कूल, अस्पताल आदि बनाएंगे और उसके लिए उचित प्रस्ताव देगा। यदि हम उन्हें धन दे रहे हैं, तो उसका उपयोग संस्थाओं की मजबूती के लिए करना चाहिए।

हम केवल उनके लिए दबाव समूह ही हो सकते हैं। अगर आपके पास समावेशी संस्थानों के निर्माण के लिए जमीनी स्तर पर आंदोलन होगा, तो हम उसे केवल गति ही सकते हैं, लेकिन हम उसका निर्माण नहीं कर सकते या उसका विकल्प नहीं बन सकते। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि अफगानिस्तान और कई अरब देशों में हमारी नीतियां जमीनी स्तर के आंदोलनों को हतोत्साहित करती और हमारे लिए सुविधाजनक ताकतवरों की मदद करती हैं। इसलिए उन देशों में हमारे पास करने के लिए कुछ नहीं है।

भारत को आजाद हुए 65 साल

 

journey of freedom progress nuclear inflation corruption

भारत को आजाद हुए 65 साल बीत चुके हैं। इन 65 सालों में भारतीय लोकतंत्र का चेहरा इतना बदल चुका है कि पहचाना नहीं जा सकता। भारतीय लोकतंत्र कई क्षेत्रों में परिवर्तन की सीढ़ियां चढ़कर आधुनिक और विकसित हो चुका है।

आर्थिक और व्यावसायिक तौर पर भारत ने निश्चित तौर पर तरक्की की है। तीसरी दुनिया का देश कहा जाने वाले भारत आज विश्व की तीसरी महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है। दूसरी तरफ सामाजिक विषमताएं और राजनीतिक जटिलताएं अभी भी भारतीय लोकतंत्र की परेशानी का सबब बनी हुईं हैं। 65 सालों का ये सफर भारतीय लोकतंत्र के विकास की एक ऐसी कहानी कहता है, जिसमें कई उतार चढ़ाव हैं।

आजादी के सफर में कुछ विषमताएं ऐसी है जिन पर चर्चा बहुत जरूरी है। एक तरफ हम चांद और मंगल पर जा पहुंचे हैं तो दूसरी ओर घर में चांद सी बिटिया नहीं चाहते। एक तरफ हम बच्चों को हुनरमंद और अच्छी नौकरी में देखना चाहते हैं, लेकिन उच्च शिक्षा इतनी महंगी हो गई है कि पढ़ाई मुहाल हो गई है। एक तरफ प्रेम को आधार बनाकर बनी फिल्में सुपरहिट हो जाती हैं तो दूसरी तरफ प्रेम विवाह करने वालों को जान से मार दिया जाता है।

एक तरफ देश में करोड़पतियों की संख्या एक लाख हो गई है तो दूसरी तरफ करीब 43 फीसदी आबादी दिन में रोज बीस रुपए भी नहीं कमा पाती। एक तरफ शहरों में मॉल कल्चर पनपा है और भारतीय शहरियों की खर्च करने की कैपेसिटी बढ़ी है तो दूसरी तरफ गांवों में अभी तक बुनियादी सुविधाओं का अकाल है।

आर्थिक तौर पर मजबूत बना है भारत
1947 में जब भारत आजाद हुआ तब अंग्रेजी हुकूमत भारत को इतना निचोड़ चुकी थी कि 'सोने की चिड़िया' कहलाने वाला भारत कंगाली के दर्जे तक पहुंच गया था। ऐसे में भारत-पाक विभाजन ने रही सही कसर पूरी कर दी। आजाद भारत को आर्थिक तौर पर संभलने में करीब ढाई दशक लगा। 1975 तक भारतीय उद्योग ठीक ठाक अवस्था में पहुंच चुके थे।

पिछले 20 सालों में भारतीय अर्थव्यवस्था ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय योगदान दिया है। भारत को विश्व की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था के तौर पर प्रोजेक्ट किया जा रहा है। 65 सालों की एक बड़ी उपलब्धि इस क्षेत्र में तब मिली जब 2008 में भारत ने 9.4 फीसदी की विकास दर हासिल की। अर्थशास्त्री भी इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि आने वाले कुछ सालों में भारत विकासशील से विकसित देशों की कतार में शामिल हो
जाएगा।

आईटी-बीपीओ के क्षेत्र में उन्नति
भारत में कंप्यूटर युग आने के बाद उन्नति के रास्ते खुले। आईटी कंपनियों ने वैश्विक पटल पर अपनी पहचान बनाई। खासकर आईटी और बीपीओ के क्षेत्र में भारत ने दुनिया भर में अपनी अलग पहचान बनाई। आज इस क्षेत्र के भारतीय हुनरमंद युवाओँ की विदेशों में भारी मांग है। आज विदेशों में काम कर रहे अधिकतर हुनरमंद प्रोपेशनल्स में सबसे ज्यादा संख्या भारतीयों की है। भारत के आईटी और मेडिकल क्षेत्र के होनहार युवा कई देशों के विकास की रीढ़ बने हुए हैं।

बढ़ गई वैश्विक भागीदारी
आउटसोर्सिंग की बयार ने भारत को निश्चित तौर पर वो मौका दिया जिससे भारत अन्तरराष्ट्रीय पटल पर अपनी पहचान बना रहा है। हमारा देश सूचना प्रौद्योगिकी और आउटसोर्सिंग के क्षेत्र में द‌ुनिया भर में अपनी अलग पहचान बना चुका है। यही वजह है कि 2001 से 2006 तक आईटी सेवा में भारत की वैश्विक भागीदारी 62 प्रतिशत से बढ़कर 65 प्रतिशत हुई और बीपीओ क्षेत्र में 39 से बढ़कर 45 प्रतिशत तक हो गया। उम्मीद की जा रही है कि 2015 तक आईटी-बीपीओ क्षेत्र की वैश्विक भागीदारी 75 बिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगी।

परमाणु संपन्नता हासिल की
पहले जहां भारत को तीसरी दुनिया के एक गरीब मुल्क के तौर पर देखा जाता था, वही भारत आज विश्व के महत्वपूर्ण देशों की सूची में आ गया है। परमाणु संपन्नता की दौड़ में भी भारत ने अपना नाम दर्ज कराया है। आज भारत को परमाणु संपन्न देशों की श्रेणी में छठा स्थान हासिल है। जी-8 नामक संपन्न और ताकतवर देशों के सम्मेलन में भारत बाकायदा सलाहकार की भूमिका निभाता है। लड़ाकू विमान से लेकर लंबी दूरी की बैलेस्टिक मिसाइलें बनाने के मामले में हमारा कोई सानी नहीं।

हाल ही में भारत ने अग्नि-5 कांटिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल बनाई है जो 5000 हजार किलोमीटर तक मार कर सकती है। 2016 तक भारत की योजना 5,000 किलोमीटर मारक क्षमता वाली मिसाइल-रोधी रक्षा प्रणाली विकसित करने की है। अभी तक यह प्रणाली सिर्फ अमेरिका, रूस और इजरायल के पास है।

वैज्ञानिक उपलब्धि और अंतरिक्ष में छलांग
अंतरिक्ष में जाने वाले भारतीयों में कल्पना चावला और स‌ुनीता विलियम्स का नाम लेते ही हर भारतीय का सीना चौड़ा हो जाता है। नासा में ऐसे कई भारतीय वैज्ञानिक हैं जिनसे नासा के कार्यक्रम फलदायक साबित हुए है। दुनिया की उत्पत्ति का राज जानने को कराए गए 'बिगबैंग परीक्षण' में भी भारतीय र्वैज्ञानिकों का अहम योगदान रहा। 'गार्ड पार्टिकल' यानी 'हिग्स बोसोन' की खोज में भी भारतीय वैज्ञानिक सत्येंद्र नाथ बोस की अहम भूमिका की दुनिया भर में चर्चा हुई है।

जन जन की रग में घुसा भ्रष्टाचार
भ्रष्टाचार का मुद्दा आज भारत की दुखती रग बन चुका है। राजनीति से लेकर आम जनता की सामान्य दिनचर्या तक में भ्रष्टाचार इतना घुस गया है कि इससे छुटकारा पाने की कोशिशें दम तोड़ चुकी हैं। पिछले पैंतीस-चालीस सालों में भ्रष्टाचार भारतीय जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है। सरकारी स्तर पर पारदर्शिता सवालों के घेरे में आ चुकी है और राजनीति में समाहित नैतिकता धुंधली हो गई है।

ऐसा लगता है मानो राजनीति लोकतंत्र नहीं भ्रष्टतंत्र की दिशा में काम कर रही है। घोटालों की फेरहिस्त इतनी लंबी हो गई है कि पढ़ी तक नहीं जा सकती। सच कहें तो आज भ्रष्टाचार इस कदर आम जीवन में बस गया है कि एक व्यक्ति के लिए ईमानदार बने रहना नामुमकिन सा लगता है।

धन और बल पर टिका लोकतंत्र
जिसे विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है, वहां चुनाव बंदूकों के साए में होते हैं। लोकतंत्र पर बुलेटतंत्र और धनतंत्र हावी है। जाति और धर्म के नाम पर चुनाव लड़े जाते हैं।

अलगाववादी और नक्सली संगठनों से पूरा देश ग्रसित है। उतर पूर्व के कई राज्यों में अलग देश बनाने की मांग उठ रही है। देश के 14 राज्यों के 280 जिले आज नक्सलवाद की मार झेल रहे है। इनमें से 180 से ज्यादा जिलों में नक्सलियों से लोहा लेने के लिए बाकायदा सेना को लगाया गया है।

महंगी होती उच्च शिक्षा
आंकड़ों पर यकीन किया जाए तो दुनिया के सबसे ज्यादा युवा भारत में हैं। इस लिहाज से भारत में उच्च शिक्षा की स्थिति मजबूत और बेहतर होनी चाहिए। लेकिन स्थिति इसके उलट है। देश में उच्च शिक्षा बहुत महंगी है।

आम आदमी अपने होनहार बच्चों को मेडिकल, आईटी जैसे कोर्स कराने का सपना देखता है लेकिन महंगी पढ़ाई और भारी भरकम डोनेशन से उसके हौंसले पस्त हो जाते हैं। दूसरी ओर, यहां कदम कदम पर फर्जी इंस्टीट्यूट खुल गए हैं जो महज कुछ कमाई के लिए विद्यार्थियों के भविष्य के साथ खेल रहे हैं।

डंस रहे हैं सामाजिक विषमता के नाग
अपने आपको आधुनिक कहने वाले भारत में सामाजिक विषमता की गहरी खाई है। हालांकि सामाजिक और जातीय विषमता तो आजादी से पहले भी थी लेकिन आधुनिक भारत में इसकी मार भयंकर है। एक तरफ समलैंगिकों को अधिकार देकर अदालतें न्याय और बराबरी की मिसाल पैदा कर रही हैं तो दूसरी तरफ 'कन्या भ्रूण हत्या', 'दहेज हत्या', 'यौन शोषण', 'बाल श्रम' और 'ऑनर किलिंग' के मामले समाज को निचले दर्जे पर ला रहे हैं।

पिछले एक दशक में बलात्कार के मामलों ने रिकार्ड तोड़‌ दिया है। जिस भारत में औरत को 'देवी मां' का दर्जा दिया जाता है, उसी भारत में औरतों को 'डायन' बताकर नग्न घुमाने के मामले शर्मिंदा करते हैं। ऐसा लगता है जैसे की समाज में संवेदनशीलता खत्म हो गई है। एक तरफ 'लिव इन' का चलन बढ़ा है तो दूसरी तरफ वृद्धाश्रम में बुजुर्गो की तादाद भी बढ़ी है। संयुक्त परिवार एकल परिवारों में टूट गए हैं और एकल परिवार सिंगल पेरेंट में बदल रहे हैं।

बढ़ती महंगाई और बढ़ते गरीब
महंगाई 'सुरसा' की तरह मुंह फैला रही है और गरीबी 'फीनिक्स' पक्षी की तरह बार-बार अपनी ही राख से फिर पैदा हो जाती है। गरीबी की रेखा 22 रुपए और 32 रुपए के बीच झूल रही है। महंगाई इतनी तेजी से बढ़ी है कि सरकार का नारा 'गरीबी हटाओ' की बजाय 'गरीब हटाओ' में तब्दील होता दिख रहा है। विडंबना है कि कृषि आधारित भारत में खाद्य महंगाई सर्वाधिक तेजी से बढ़ी है।

सवाल - क्या आपको भी लगता है कि आजाद भारत कई मायनों में अब तक गुलाम है। क्या सामाजिक और राजनीतिक विषमताओँ को दूर करना ही असल आजादी है?

नए माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस में दिए गए 10 बेहतरीन फीचर

New Microsoft Office 10 amazing features। नए माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस में दिए गए 10 बेहतरीन फीचर

माइक्रोसॉफ्ट कॉरपोरेशन ने नए माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस 2013 का प्रिव्‍यू वर्जन की एक झलक दुनिया के सामने पेश की है जिसको देखकर आने वाले माइकोसॉफ्ट ऑफिस को एक बेहतर प्रोडेक्‍ट कहा जा सकता है। आने वाला नया वर्जन टैबलेट, कंप्‍यूटर दोनों को सपोर्ट करेगा। इसके अलावा विंडो8 में भी इसे प्रयोग किया जा सकता है। माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ स्‍टीव ब्‍लैमर ने सैन फ्रांसिस्‍को में एक प्रेस कांफ्रेंस के दैरान बताया नया ऑफिस पहले से कई ज्‍यादा फ्लेक्‍सिबल है साथ ही ये क्‍लाउड सर्विस को भी सपोर्ट करता हे। आइए जानते है माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस 2013 में दिए गए 10 नए फीचरों के बारे में,

  1. टच फीचर - नए ऑफिस में टच की सुविधा दी गई है यानी आप इसमें बिना माउस और कीबोर्ड के भी आसानी से काम कर सकते हैं। साथ डाक्‍यूमेंट को पढ़ने के साथ-साथ फिंगर से जूम भी कर सकते हैं।
  2. इंकिंग- नए ऑफिस में स्‍टायलस यानी स्‍क्रीन पेन के द्वारा आप डाक्‍यूमेंट में नोट्स, मेल लिख सकते हैं, ऑफिस ऑटोमेटिक उसे एनालाइज करके कॉलम में फिट कर देगा। यानी आपको कॉलम सलेक्‍ट करके टाइम करने की कोई जरूरत नहीं, अगर धाखे से कोई गलत कंटेट लिख दिया हो तो चिंता करने की कोई बात नहीं ईरेज़ टूल से उसे आसानी से मिटाया जा सकता है।
  3. एप्‍पलीकेशन- वन नोट और लाइंस जैसी एप्‍लीकेशन पहली बार नए ऑफिस में दी गईं हैं। इसके अलावा नया रेडियल मीनो यूजर को ऑफिस प्रयोग करने में और सहूलियत प्रदान करता है।
  4. स्‍कॉय ड्राइव- ऑफिस आपके डाक्‍यूमेंट को ऑटोमेटिक स्‍कॉय ड्राइव में सेव करता रहता है जिससे आप उस कंटेट को कभी भी चाहें तो अपने टैबलेट, लैपटॉप या फिर फोन में ओपेन कर सकते हैं।
  5. सबक्रिप्‍शन की सुविधा- नए ऑफिस में क्‍लाउड बेस सबक्रिप्‍शन की सुविधा की सुविधा दी गई है। मतलब यूजर भविष्‍य में इसे अपग्रेड भी कर सकता है। साथ में ऑफिस में आप स्‍काइपे का प्रयोग भी कर सकते हैं।
  6. स्‍टे कनेक्‍ट- ऑफिस 2013 में आप लोगों को फॉलो करने के अलावा डाक्‍यूमेंट और साइटें शेयर भी कर सकते हैं। आप चाहें तो इसमें वीडियो, पिक्‍चर और ऑफिस कंटेट के कोड इम्‍बेड कर अटैच कर सकते हैं।
  7. स्‍काइपे- नए ऑफिस में हर महिने 60 मिनट पूरी दुनिया में बात करने को मिलेंगे। इसके अलावा यूजर किसी को भी स्‍काइपें की मदद से मैसेज भी कर सकता है।
  8. रीडिंग और मार्कअप- ऑफिस में दिया गया रीडिंग मोड ऑप्‍शन के द्वारा यूजर आसानी से अपने कंटेंट को पढ़ सकता है। जबकि पूराने ऑफिस में कंटेट पढ़ने के लिए जूम के साथ साथ कई एडजस्‍टमेंट करने पड़ते थे।
  9. डिजिटल नोट टेकिंग- डिजिटल नोट टेकिंग की मदद से यूजर एक ही नोट को मल्‍टीपल यानी एक से ज्‍यादा डिवाइस में प्रयोग कर सकता है। इसके अलावा एक ही नोट को कई तरीको से प्रयोग भी कर सकते हैं।
  10. मीटिंग- नए ऑफिस में पॉवरप्‍वाइंट का न्‍यू प्रजेंटेशन व्‍यू फीचर दिया गया है जिसकी मदद से आप ही चीज पहले से शिड्यूल कर सकते हैं। साथ ही सिफ एक ही क्‍लिक से जूम, मार्कअप फीचरों का प्रयोग कर सकते हैं।