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Sunday, July 29, 2012

तीस्ता जावेद सीतलवाड़ के विरुद्ध

कांग्रेसी राज में गुजरात दंगों का सच !!!

आखिर, पायनियर (20 अप्रैल) के दस दिन बाद टाइम्स आफ इंडिया (30 अप्रैल) ने तीस्ता जावेद सीतलवाड़ के विरुद्ध झूठी गवाही तैयार कराने का यास्मीन बानो शेख का आरोप छाप ही दिया। उसे और छिपाना संभव भी नहीं था, क्योंकि यास्मीन ने मुम्बई उच्च न्यायालय में उसे पेश कर दिया है। फिर भी हिन्दुस्तान टाइम्स, इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दू जैसे बड़े अंग्रेजी अखबार अभी तक चुप्पी साधे हुए हैं। हां, नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध उनका प्रचार जारी है। स्थिति यहां तक पहुंच गयी है कि इंडियन एक्सप्रेस ने 1 मई को गुजरात सरकार द्वारा स्वर्णिम गुजरात महोत्सव के अवसर पर दिए तीन पृष्ठ के विज्ञापन तो छापे, किन्तु उस अवसर पर अमदाबाद के सरदार पटेल स्टेडियम में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के उस महत्वपूर्ण भाषण को नहीं छापा, जिसमें उन्होंने अपने विरुद्ध चलाये जा रहे अपप्रचार का तथ्यपूर्ण एवं तर्कपूर्ण उत्तर दिया था। मोदी के विरुद्ध इतनी पक्षपातपूर्ण-द्वेषी पत्रकारिता भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी बन सकती है।
मोदी के विरुद्ध दुष्प्रचार
नरेन्द्र मोदी पर मुस्लिम विरोधी छवि लादने के पीछे सोनिया मंडली की रणनीति तो इन्हीं खबरों से स्पष्ट हो जाती है जिनमें एक ओर तो मोदी को भावी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवारों की सूची से काटने का प्रचार है तो दूसरी ओर 10, जनपथ के प्रवक्ता संजीव भट्ट का समाचार आते ही वे नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में गुजरात की सर्वतोमुखी प्रगति के प्रशंसकों को यह चेतावनी देने के लिए दौड़ पड़ते हैं कि संजीव भट्ट के इस रहस्योद्घाटन के बाद वे मोदी की प्रशंसा करना बंद करें। संजीव भट्ट के शपथपत्र का इससे अधिक क्या महत्व है कि उसमें नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध इस प्रचार को ही दोहराया गया है कि मोदी ने 2002 के साम्प्रदायिक दंगों में मुसलमानों का व्कत्लेआमव् कराया। 2002 से अब तक के समस्त चुनाव परिणामों और मौलाना वस्तानवी के व्टाइम्स आफ इंडियाव् को दिये गये साक्षात्कार से भी यह स्पष्ट है कि गुजरात के मुसलमानों पर इस दुष्प्रचार का कोई असर नहीं हो रहा है, क्योंकि वे मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल में गुजरात की विकास यात्रा में बराबर का हिस्सा पा रहे हैं और अपने साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव महसूस नहीं कर रहे हैं। गुजरात के बाहर के मुसलमानों को वे इस एकपक्षीय झूठे प्रचार से कब तक गुमराह करते रहेंगे, यह कहना कठिन है। बिहार में लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की मोदी-विरोधी नाव पहले ही डूब चुकी है। सोनिया पार्टी की भी मोदी-विरोधी प्रचार की पतंग न तो बिहार में उड़ पायी और न ही उत्तर प्रदेश में। यदि सोनिया पार्टी के रणनीतिकार यह आशा करते हैं कि गुजरात के विकास को 2002 के दंगों में मुस्लिम नरमेध के झूठे प्रचार की आंधी उड़ाकर जन दृष्टि से छिपाया जा सकता है, यह दुष्प्रचार दस वर्ष बाद भी मुस्लिम वोट बैंक को रिझाने में सहायक हो सकता है, तो भाजपा के प्रचार तंत्र को भी सन् 1969 में कांग्रेस के शासनकाल में हुए अमदाबाद के दंगे में मुसलमानों के नरमेध के काले पन्ने को देश के सामने अवश्य लाना चाहिए। इसी दृष्टि से हम यहां उस दंगे से जुड़े कुछ तथ्य प्रस्तुत कर रहे हैं।
अमदाबाद (1969) का साम्प्रदायिक दंगा
असगर अली इंजीनियर मुस्लिम बौद्धिकों में जाना-माना नाम है। उनके द्वारा संपादित एक पुस्तक का शीर्षक है कम्युनल राइट्स इन पोस्ट इंडिपेंडेंस इंडिया (स्वातंत्र्योत्तर भारत में साम्प्रदायिक दंगे)। इस पुस्तक का प्रथम संस्करण 1984 में और दूसरा संस्करण 1991 प्रकाशित हुआ था। अतरू इसे भारतीय जनसंघ, भाजपा और नरेन्द्र मोदी के प्रभाव से सर्वथा मुक्त कहा जा सकता है। वैसे भी असगर अली इंजीनियर भाजपा और हिन्दुत्व के कटु आलोचक रहे हैं, प्रशंसक नहीं। इस पुस्तक में अमदाबाद में 1969 के दंगे पर एक 34 पृष्ठ लम्बा लेख छपा है (पृ.175-208), जिसके लेखक हैं डा.घनश्याम शाह, जो जाने-माने वामपंथी बौद्धिक हैं, लम्बे समय तक सूरत (गुजरात) स्थित सामाजिक अध्ययन संस्थान के निदेशक रहे हैं और पिछले कई वर्षों से जेएनयू में प्रोफेसर हैं। इस लेख को पढ़ने पर भी उनका कम्युनिस्ट समर्थक आवेश स्पष्ट हो जाता है। हिन्दुत्ववादी और भाजपा समर्थक होने का आरोप तो उन पर लगाया ही नहीं जा सकता। इस लेख में उन्होंने 18 से 21 सितम्बर, 1969 को चार दिनों तक के अमदाबाद से प्रारंभ हुए साम्प्रदायिक दंगों के स्वरूप और कारणों की मीमांसा प्रस्तुत की है। उनका यह वर्णन व्यक्तिगत सर्वेक्षण, दंगों पर प्रकाशित न्यायमूर्ति जगमोहन रेड्डी आयोग की रपट एवं समकालीन दैनिक पत्रों में प्रकाशित समाचारों व अन्य साहित्य पर आधारित है। लेख के अंत में एक लम्बी संदर्भ सूची भी उन्होंने दी है।
जब यह दंगा हुआ उस समय गुजरात में कांग्रेस का शासन था। हितेन्द्र देसाई वहां के मुख्यमंत्री थे और केन्द्र में इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। इसलिए इस दंगे की पूरी जिम्मेदारी उस कांग्रेस की ही है जिसका उत्तराधिकारी होने का दावा आजकल सोनिया और राहुल कर रहे हैं। इन दंगों में कांग्रेस पार्टी और सरकार की भूमिका का वर्णन करने से पूर्व उसमें हुई जान-माल की हानि का लेखा-जोखा प्रस्तुत करना भी आवश्यक है। घनश्याम शाह लिखते हैं कि चार दिन तक चले इस दंगे में 1000 से अधिक लोग मारे गये और इससे कई गुना अधिक संख्या में घायल हुए। लगभग 4000 (ठीक संख्या 3,969) घरों व दुकानों को आग लगाकर भस्म कर दिया गया, 2,317 घरों-दुकानों को ढहा दिया गया। 6000 परिवार बेघर हो गये, 15000 से अधिक लोग शरणार्थी शिविरों में पहुंच गये। दंगों के कारण लगभग 34 करोड़ रुपए की दैनिक आमदनी की हानि हुई। जगमोहन रेड्डी रपट में कहा गया है कि व्मुसलमानों और मुस्लिम सम्पत्ति पर हमले पूर्णतया सुनियोजित थे। दंगाइयों और शस्त्रों को ले जाने के लिए वाहन उपलब्ध कराये गये थे। समाज का प्रत्येक वर्ग इन दंगों में सम्मिलित था, बड़ी संख्या में श्रमिक वर्ग भी हिस्सा ले रहा था। रपट कहती है कि इक्के-दुक्के कार्यकर्त्ता को छोड़ दें तो पार्टी के नाते जनसंघ का इन दंगों में कोई हाथ नहीं था।व् (पृष्ठ 192)
मुस्लिमों का नरमेध और कांग्रेस की भूमिका
घनश्याम शाह लिखते हैं कि 20 सितम्बर की शाम दंगे की लपटों ने पूरे अमदाबाद शहर को घेर लिया था। पूरा हिन्दू समाज इन दंगों में सम्मिलित था। शिक्षित मध्यम वर्ग से लेकर कपड़ा मिलों के मेहनतकश श्रमिक और सफाई कर्मचारी- सब एकजुट थे। फरसों, कुल्हाड़ी, चाकुओं और भालों का लोगों को मारने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था। औरतों के साथ बलात्कार हुआ, उनके कपड़े उतारकर उन्हें नग्न कर सड़क पर घुमाया गया। बच्चों को पत्थरों पर पटककर मार दिया गया या उनके पैरों से चीर दिया गया। शवों के अंग काट दिये गये। इस उन्माद से अमदाबाद के लोगों पर पशुभाव हावी हो गया था। (पृष्ठ 190) व्दंगे अमदाबाद से राज्य के विभिन्न हिस्सों में फैल गये। 20 सितम्बर की रात को जब हजारों मुसलमान अमदाबाद छोड़कर भाग रहे थे तब चार ट्रेनों को रोककर सत्रह यात्रियों को मार दिया गया। 23 सितम्बर को जब सरकार ने तीन घंटों के लिए कर्फ्यू हटाया तो 40 लोगों ने अपनी जान गंवाई। (पृष्ठ 191)
जब अमदाबाद शहर और गुजरात दंगे की आग में जल रहा था तब मुख्यमंत्री हितेन्द्र देसाई और उनकी कांग्रेस पार्टी क्या कर रही थी? घनश्याम शाह लिखते हैं, व्कोई कांग्रेसजन दंगों को रोकने के लिए सामने नहीं आया। कांग्रेस भवन ने अपने कार्यकर्ताओं को बड़ी संख्या में कफ्र्यू पास जारी कर दिये पर उन्हें कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं दिए। कुछ बूढ़े, पुराने गांधीवादी चिंतित अवश्य थे, किन्तु बुढ़ापे के कारण वे कुछ करने में अक्षम थे और केवल प्रार्थना कर रहे थे। प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष ने बताया कि अधिकांश कांग्रेसी साम्प्रदायिक दृष्टिकोण रखते हैं। वडोदरा की जिला कांग्रेस कमेटी ने दंगों की भर्त्सना करने से भी मना कर दिया। उसने प्रस्ताव पारित किया कि कुछ मुसलमानों के पाकिस्तान समर्थक रुख के कारण राज्य में तनाव की स्थिति पैदा हुई है। कांग्रेस कार्यकर्त्ताओं की लगभग सभी बैठकों में यही स्वर उठा। जिम्मेदार कांग्रेसजनों ने मुसलमानों के साम्प्रदायिक दृष्टिकोण की निंदा की और कहा कि उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए। गुजरात के एक उच्चपदस्थ कांग्रेसी नेता ने एक जनसभा में भाषण दिया, हमारे देश में पाकिस्तान के प्रति निष्ठा रखने वाले राष्ट्रविरोधी तत्व सक्रिय हैं। पुलिस अपनी सीमाओं के कारण उनका पता नहीं लगा पायी। इसलिए आप लोगों का फर्ज है कि आप उनका पता लगाएं। उनके घरों में घुसकर उन्हें पकड़ना चाहिए और तब आप उनके साथ जैसा चाहे वैसा व्यवहार करें। (पृष्ठ 198)
राज्य सरकार की नीयत
घनश्याम शाह लिखते हैं, कांग्रेसजनों ने दंगों में प्रत्यक्ष और परोक्ष- दोनों ढंग से भाग लिया। उन्होंने प्रशासन को गुमराह किया। वडोदरा में तैनात एस.आर.पी. दल को 20 सितम्बर को यह कहकर अमदाबाद भिजवा दिया कि यहां अशांति का कोई खतरा नहीं है। इस प्रकार दंगाइयों को लूटमार और मस्जिदों को ढहाने का मौका दे दिया। ऐसे समय में कांग्रेसी मुख्यमंत्री हितेन्द्र देसाई और उनकी सरकार क्या कर रही थी? घनश्याम शाह के अनुसार, व्मुख्यमंत्री हितेन्द्र देसाई दंगाग्रस्त क्षेत्रों में गये ही नहीं। वे पूरे समय अपने बंगले में अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों और सुरक्षाकर्मियों से घिरे बैठे रहे। राज्य सरकार ने राज्य में साम्प्रदायिक तनाव की स्थिति पैदा होने के बारे में केन्द्र सरकार की चेतावनी को अनसुना कर दिया। 18 सितम्बर को दंगा शुरू हो जाने पर भी कोई निर्णयात्मक कदम नहीं उठाया। 19 सितम्बर को कुछ ही क्षेत्रों में कर्फ्यू लगाया गया। एस.आर.पी. और सी.आर.पी. को 20 सितम्बर की प्रातः बुलाया गया, पर वे दंगों पर काबू पाने में असफल रहे। एक कैबिनेट मंत्री के त्यागपत्र देने की धमकी के बाद ही सेना को दो दिन बाद 21 सितम्बर की प्रातरू बुलाया गया। पूरे दिन मंत्रिमंडल में बहस होती रही कि सेना को पूरा नगर सौंप दें या कुछ मोहल्लों तक सीमित रखें। राज्य सरकार सेना का उपयोग करने में झिझक कर रही थी, क्योंकि इसकी हिन्दू मन पर प्रतिकूल प्रतिक्रिया से उसे 1972 के चुनाव में जनसंघ के सत्ता में आने का भय सता रहा था। अंततरू 21 की शाम को सेना को व्देखते ही गोली मारने का आदेश दिया गया।
घनश्याम शाह के अनुसार, पुलिस ने अपना कर्तव्य नहीं निभाया। उनकी आंखों के सामने लूटमार और हत्या होती रही, पर वे निष्क्रिय रहे। कई जगह वे दंगाइयों के लिए मैदान खुला छोड़कर वहां से भाग निकले। सी.आर.पी. और एस.आर.पी. के जवानों ने हिन्दुओं से कहा कि मुसलमानों को ऐसा ही सबक मिलना चाहिए। (पृष्ठ 204) एक कांग्रेसी नेता ने भी कहा कि हिन्दू पहली बार मुसलमानों को सबक सिखा पाये हैं। (पृष्ठ 205) पुलिस वाले मन ही मन खिन्न थे क्योंकि उनसे कई बार मुसलमानों से सार्वजनिक माफी मंगवायी गयी थी। ...कर्फ्यू को कड़ाई से लागू नहीं किया गया। अकेले कांग्रेस भवन ने 5,000 कर्फ्यू पास जारी कर दिये। इसके अलावा अन्य अनेक संस्थाओंध्व्यक्तियों को कर्फ्यू पास जारी करने का अधिकार दे दिया गया। इस कारण कर्फ्यू की घोषणा बेमानी हो गयी।व् घनश्याम शाह को ऐसे लोग भी मिले जिन्होंने जेब में कर्फ्यू पास रखकर दंगों में भाग लिया। घनश्याम शाह लिखते हैं, जब वडोदरा शहर दंगाइयों के कब्जे में था तब वहां सरकारी अधिकारी और राजनेता आपस में गाली-गलौज कर रहे थे। वडोदरा की कर्तव्यनिष्ठ प्रशासक (जिलाधिकारी) अमदाबाद में गृहसचिव से तीन दिन तक सम्पर्क नहीं कर पायीं, क्योंकि गृहसचिव मुख्यमंत्री के पास थे।
दंगे की पृष्ठभूमि
अब हम इन दंगों के तात्कालिक कारणों और हिन्दू-मुस्लिम संबंधों की पृष्ठभूमि पर आते हैं। घनश्याम शाह का माक्र्सवादी मस्तिष्क आर्थिक कारणों को खोजना चाहता है, पर वे मिल नहीं पाये। उन्हें मानना पड़ा है कि अमदाबाद ट्रेड यूनियन आंदोलन के पचास वर्ष बीत जाने पर भी वर्ग चेतना विकसित नहीं हो पायी और पूरा श्रमिक वर्ग हिन्दू-मुस्लिम आधार पर विभाजित हो गया। ट्रेड यूनियनें एवं राजनीतिक दल पूरी तरह निष्प्रभावी सिद्ध हुए। इन दंगों में हिन्दू समाज के प्रत्येक वर्ग ने भाग लिया, पूरा समाज एकजुट हो गया। उन्होंने यह भी माना कि हिन्दू-मुस्लिम तनाव शताब्दियों से चला आ रहा था। 1969 के दंगे से पहले 27-28 नवम्बर, 1968 को वेरावल में दंगा हुआ था, जिसमें 100 मुसलमान मारे गये थे। 2 करोड़ रुपये के माल की हानि हुई थी। 1969 के दंगों की पृष्ठभूमि 1965 के भारत- पाकिस्तान युद्ध से बननी शु डिग्री हो गयी थी। उस दौरान गुजरात के मुख्यमंत्री बलवंत राय मेहता के विमान को कच्छ सीमा पर पाकिस्तान की सेना ने निशाना बनाया, जिसमें उनकी मृत्यु हो गयी थी। इससे गुजरातवासियों की भावनाएं बुरी तरह आहत हुईं और उनके मन में मुस्लिमविरोध का भाव अंकुरित हुआ। जनवरी, 1960 में भावनगर में आयोजित अ.भा.कांग्रेस कमेटी के 66 वें अधिवेशन में मुसलमानों ने एक प्रतिवेदन प्रस्तुत किया जिसमें सुधार विरोधी और पृथकतावाद की गंध आती थी। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय सावधानी के तौर पर भारत सुरक्षा कानून के तहत कई मुसलमान नेताओं को नजरबंद किया गया था। इस कारण 1967 के आम चुनाव के समय मजलिसे मुशवरात ने कांग्रेस को हराने का फतवा जारी कर दिया। 2 जून, 1968 को अमदाबाद में जमीयत उल उलेमा ने एक सभा बुलायी जिसमें 16 प्रस्ताव पारित किये गए। ये सभी प्रस्ताव मुसलमानों की पृथकतावादी साम्प्रदायिक मांगों पर केन्द्रित थे। इसकी गुजरात के पंथनिरपेक्षतावादियों पर बहुत प्रतिकूल प्रतिक्रिया हुई। उन्हें लगा कि मुसलमान समाज राष्ट्रीय धारा में आने की बजाय अपने संगठित वोट बैंक का दबाव पृथकतावाद के पक्ष में बना रहा है। 18 सितम्बर, 1969 को अमदाबाद का दंगा शु डिग्री होने के केवल 15 दिन पहले अमदाबाद और अन्य सब शहरोंध्कस्बों में मुसलमानों के विशाल जुलूस अल अक्सा मस्जिद पर इस्रायली हमले के विरोध में निकले, जिनमें नारे लगे- जो इस्लाम से टकराएगा, दुनिया से मिट जाएगा, मुस्लिम एकता जिंदाबाद, पाकिस्तान जिंदाबाद् आदि। इसकी हिन्दू मन पर बहुत तीव्र प्रतिक्रिया हुई। कई दैनिक पत्रों ने लिखा कि व्हजारों मील दूर स्थित अल अक्सा मस्जिद की तुम्हें इतनी फिक्र है तो भारत में औरंगजेब द्वारा ध्वस्त ज्ञानवापी मंदिर, सिद्धपुर में रुद्रामल शिव मंदिर को क्यों नहीं हिन्दुओं को वापस करते।
मुस्लिम आक्रामकता ही जिम्मेदार
मार्च, 1969 में नगर पालिका चुनाव के समय एक पुलिस अधिकारी से धक्का-मुक्की के समय एक ठेले पर रखी कुरान शरीफ जमीन पर गिर गयी, जिससे क्रोधित होकर मुसलमानों ने थाने पर हमला बोलकर कई पुलिसकर्मियों को घायल कर दिया और नारे लगाये, इससे तो पाकिस्तान ही अच्छा है। कांग्रेस सरकार ने मुसलमानों के दबाव में आकर उस पुलिस अधिकारी को सार्वजनिक माफी मांगने को कहा। एक मुस्लिम पुलिस अधिकारी ने 12 बजे रात के बाद रामलीला को बंद कराने की कोशिश में रामायण को पैर से ठोकर मारी। एक के बाद एक हुईं इन सब घटनाओं ने हिन्दू मन को इतना अधिक आहत किया कि रामायण के अपमान के दो दिन बाद ही हिन्दू धर्म रक्षा समिति का गठन हो गया। साधु-संत उपवास पर बैठ गये। रामायण अपमान कांड की जांच की मांग की गई। अंततः उस मुस्लिम पुलिस अधिकारी को देर से ही क्यों न हो, निलंबित किया गया। 18 सितम्बर, 1969 को दंगा शु डिग्री होने का तात्कालिक कारण मुस्लिमबहुल जमालपुर मोहल्ले से सटे जगन्नाथ मंदिर के साधुओं का अपमान व मंदिर पर मुस्लिम भीड़ का आक्रमण बना। उर्स के लिए एकत्र मुस्लिमों की भीड़ ने मंदिर पर हमला बोल दिया, वहां रखी देव-प्रतिमाओं को क्षति पहुंचाई जिससे व्यथित होकर जगन्नाथ मंदिर के मुख्य साधु अनशन पर बैठ गये। उनके प्रति पूरे हिन्दू समाज में अगाध श्रद्धा थी। इस घटना के विरोध में हिन्दू धर्म रक्षा समिति ने जनसभा का आह्वान किया और फिर दंगे की चिंगारी सुलग उठी।
घनश्याम शाह का लेख ध्वनित करता है कि मुस्लिम आक्रामकता ही दंगे के लिए जिम्मेदार थी। उनके अनुसार बुद्धिजीवी पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता वर्ग भी मुस्लिम समाज की सुधार विरोधी एवं पृथकतावादी मानसिकता से क्षुब्ध था। उनकी यह धारणा बन गयी थी कि मुसलमानों का आधुनिकीकरण असंभव है। या तो उन्हें हिन्दू हो जाना चाहिए या पाकिस्तान अथवा किसी अन्य मुस्लिम देश में चले जाना चाहिए। कुछ सुधारवादी तो यह भी कहने लगे थे कि मुसलमानों को मताधिकार से वंचित कर द्वितीय श्रेणी का नागरिक बना देना चाहिए। (पृष्ठ 206) यदि प्रगतिशील बौद्धिक वर्ग इस भाषा में सोचने को विवश हो जाए तो गुजरात की पीड़ा कितनी गहरी है, इसका अनुमान लगाया जा सकता है।द
( साभार पांचजन्य)

Friday, July 27, 2012

25 मार्च 1971 को पूर्वी पाकिस्तान

शेख़ मुजीबुर्रहमान
सात मार्च 1971 को जब बांग्लादेश के राष्ट्रपिता शेख़ मुजीबुर्रहमान ढाका के मैदान में पाकिस्तानी शासन को ललकार रहे थे, तो उन्होंने क्या किसी ने भी यह कल्पना नहीं की थी कि ठीक नौ महीने और नौ दिन बाद बांग्लादेश एक वास्तविकता होगा.
पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह याहिया ख़ाँ ने जब 25 मार्च 1971 को पूर्वी पाकिस्तान की जन भावनाओं को सैनिक ताकत से कुचलने का आदेश दे दिया और शेख़ मुजीब गिरफ़्तार कर लिए गए, वहाँ से शरणार्थियों के भारत आने का सिलसिला शुरू हो गया.
जैसे-जैसे पाकिस्तानी सेना के दुर्व्यवहार की ख़बरें फैलने लगीं, भारत पर दबाव पड़ने लगा कि वह वहाँ पर सैनिक हस्तक्षेप करे.
इंदिरा चाहती थीं कि अप्रैल में हमला हो
इंदिरा गांधी ने इस बारे में थलसेनाअध्यक्ष जनरल मानेकशॉ की राय माँगी.
उस समय पूर्वी कमान के स्टाफ़ ऑफ़िसर लेफ़्टिनेंट जनरल जेएफ़आर जैकब याद करते हैं, "जनरल मानेकशॉ ने एक अप्रैल को मुझे फ़ोन कर कहा कि पूर्वी कमान को बांग्लादेश की आज़ादी के लिए तुरंत कार्रवाई करनी है. मैंने उनसे कहा कि ऐसा तुरंत संभव नहीं है क्योंकि हमारे पास सिर्फ़ एक पर्वतीय डिवीजन है जिसके पास पुल बनाने की क्षमता नहीं है. कुछ नदियाँ पाँच पाँच मील चौड़ी हैं. हमारे पास युद्ध के लिए साज़ोसामान भी नहीं है और तुर्रा यह कि मॉनसून शुरू होने वाला है. अगर हम इस समय पूर्वी पाकिस्तान में घुसते हैं तो वहीं फँस कर रह जाएंगे."
मानेकशॉ राजनीतिक दबाव में नहीं झुके और उन्होंने इंदिरा गांधी से साफ़ कहा कि वह पूरी तैयारी के साथ ही लड़ाई में उतरना चाहेंगे.
"जनरल मानेकशॉ ने एक अप्रैल को मुझे फ़ोन कर कहा कि पूर्वी कमान को बांग्लादेश की आज़ादी के लिए तुरंत कार्रवाई करनी है. मैंने उनसे कहा कि ऐसा तुरंत संभव नहीं है क्योंकि हमारे पास सिर्फ़ एक पर्वतीय डिवीजन है जिसके पास पुल बनाने की क्षमता नहीं है. कुछ नदियाँ पाँच पाँच मील चौड़ी हैं. हमारे पास युद्ध के लिए साज़ोसामान भी नहीं है और तुर्रा यह कि मॉनसून शुरू होने वाला है. अगर हम इस समय पूर्वी पाकिस्तान में घुसते हैं तो वहीं फँस कर रह जाएंगे"
जनरल जैकब
तीन दिसंबर 1971...इंदिरा गांधी कलकत्ता में एक जनसभा को संबोधित कर रही थीं. शाम के धुँधलके में ठीक पाँच बजकर चालीस मिनट पर पाकिस्तानी वायुसेना के सैबर जेट्स और स्टार फ़ाइटर्स विमानों ने भारतीय वायु सीमा पार कर पठानकोट, श्रीनगर, अमृतसर, जोधपुर और आगरा के सैनिक हवाई अड्डों पर बम गिराने शुरू कर दिए.
इंदिरा गांधी ने उसी समय दिल्ली लौटने का फ़ैसला किया. दिल्ली में ब्लैक आउट होने के कारण पहले उनके विमान को लखनऊ मोड़ा गया. ग्यारह बजे के आसपास वह दिल्ली पहुँचीं. मंत्रिमंडल की आपात बैठक के बाद लगभग काँपती हुई आवाज़ में अटक-अटक कर उन्होंने देश को संबोधित किया.
पूर्व में तेज़ी से आगे बढ़ते हुए भारतीय सेनाओं ने जेसोर और खुलना पर कब्ज़ा कर लिया. भारतीय सेना की रणनीति थी महत्वपूर्ण ठिकानों को बाई पास करते हुए आगे बढ़ते रहना.
ढाका पर कब्ज़ा भारतीय सेना का लक्ष्य नहीं
आश्चर्य की बात है कि पूरे युद्ध में मानेकशॉ खुलना और चटगाँव पर ही कब्ज़ा करने पर ज़ोर देते रहे और ढ़ाका पर कब्ज़ा करने का लक्ष्य भारतीय सेना के सामने रखा ही नहीं गया.
इसकी पुष्टि करते हुए जनरल जैकब कहते हैं, "वास्तव में 13 दिसंबर को जब हमारे सैनिक ढाका के बाहर थे, हमारे पास कमान मुख्यालय पर संदेश आया कि अमुक-अमुक समय तक पहले वह उन सभी नगरों पर कब्ज़ा करे जिन्हें वह बाईपास कर आए थे. अभी भी ढाका का कोई ज़िक्र नहीं था. यह आदेश हमें उस समय मिला जब हमें ढाका की इमारतें साफ़ नज़र आ रही थीं."
शेख़ हसीना के पिता शेख़ मुजीबुर्रहमान

पाकिस्तानी टैंक पर बैठे भारतीय सैनिक
पूरे युद्ध के दौरान इंदिरा गांधी को कभी विचलित नहीं देखा गया. वह पौ फटने तक काम करतीं और जब दूसरे दिन दफ़्तर पहुँचतीं, तो कह नहीं सकता था कि वह सिर्फ़ दो घंटे की नींद लेकर आ रही हैं.
जाने-माने पत्रकार इंदर मल्होत्रा याद करते हैं, "आधी रात के समय जब रेडियो पर उन्होंने देश को संबोधित किया था तो उस समय उनकी आवाज़ में तनाव था और ऐसा लगा कि वह थोड़ी सी परेशान सी हैं. लेकिन उसके अगले रोज़ जब मैं उनसे मिलने गया तो ऐसा लगा कि उन्हें दुनिया में कोई फ़िक्र है ही नहीं. जब मैंने जंग के बारे में पूछा तो बोलीं अच्छी चल रही है. लेकिन यह देखो मैं नार्थ ईस्ट से यह बेड कवर लाई हूँ जिसे मैंने अपने सिटिंग रूम की सेटी पर बिछाया है. कैसा लग रहा है? मैंने कहा बहुत ही ख़ूबसूरत है. ऐसा लगा कि उनके दिमाग़ में कोई चिंता है ही नहीं."
गवर्नमेंट हाउस पर बमबारी
14 दिसंबर को भारतीय सेना ने एक गुप्त संदेश को पकड़ा कि दोपहर ग्यारह बजे ढाका के गवर्नमेंट हाउस में एक महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है, जिसमें पाकिस्तानी प्रशासन के चोटी के अधिकारी भाग लेने वाले हैं.
भारतीय सेना ने तय किया कि इसी समय उस भवन पर बम गिराए जाएं. बैठक के दौरान ही मिग 21 विमानों ने भवन पर बम गिरा कर मुख्य हॉल की छत उड़ा दी. गवर्नर मलिक ने एयर रेड शेल्टर में शरण ली और नमाज़ पढ़ने लगे. वहीं पर काँपते हाथों से उन्होंने अपना इस्तीफ़ा लिखा.
"प्रिय अब्दुल्लाह, मैं यहीँ पर हूँ. खेल ख़त्म हो चुका है. मैं सलाह देता हूँ कि तुम मुझे अपने आप को सौंप दो और मैं तुम्हारा ख़्याल रखूँगा"
मेजर जनरल गंधर्व नागरा
दो दिन बाद ढाका के बाहर मीरपुर ब्रिज पर मेजर जनरल गंधर्व नागरा ने अपनी जोंगा के बोनेट पर अपने स्टाफ़ ऑफ़िसर के नोट पैड पर पूर्वी पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल नियाज़ी के लिए एक नोट लिखा- प्रिय अब्दुल्लाह, मैं यहीँ पर हूँ. खेल ख़त्म हो चुका है. मैं सलाह देता हूँ कि तुम मुझे अपने आप को सौंप दो और मैं तुम्हारा ख़्याल रखूँगा.
मेजर जनरल गंधर्व नागरा अब इस दुनिया में नहीं हैं. कुछ वर्ष पहले उन्होंने बीबीसी को बताया था, "जब यह संदेश लेकर मेरे एडीसी कैप्टेन हरतोश मेहता नियाज़ी के पास गए तो उन्होंने उनके साथ जनरल जमशेद को भेजा, जो ढाका गैरिसन के जीओसी थे. मैंने जनरल जमशेद की गाड़ी में बैठ कर उनका झंडा उतारा और 2-माउंटेन डिव का झंडा लगा दिया. जब मैं नियाज़ी के पास पहुँचा तो उन्होंने बहुत तपाक से मुझे रिसीव किया."
16 दिसंबर की सुबह सवा नौ बजे जनरल जैकब को मानेकशॉ का संदेश मिला कि आत्मसमर्पण की तैयारी के लिए तुरंत ढाका पहुँचें. नियाज़ी ने जैकब को रिसीव करने के लिए एक कार ढाका हवाई अड्डे पर भेजी हुई थी.
जैकब कार से छोड़ी दूर ही आगे बढ़े थे कि मुक्ति बाहिनी के लोगों ने उन पर फ़ायरिंग शुरू कर दी. जैकब दोनों हाथ ऊपर उठा कर कार से नीचे कूदे और उन्हें बताया कि वह भारतीय सेना से हैं. बाहिनी के लोगों ने उन्हें आगे जाने दिया.
आँसू और चुटकुले
जब जैकब पाकिस्तानी सेना के मुख्यालय पहुँचें. तो उन्होंने देखा जनरल नागरा नियाज़ी के गले में बाँहें डाले हुए एक सोफ़े पर बैठे हुए हैं और पंजाबी में उन्हें चुटकुले सुना रहे हैं.
जैकब ने नियाज़ी को आत्मसमर्पण की शर्तें पढ़ कर सुनाई. नियाज़ी की आँखों से आँसू बह निकले. उन्होंने कहा, "कौन कह रहा है कि मैं हथियार डाल रहा हूँ."
जनरल राव फ़रमान अली ने इस बात पर ऐतराज़ किया कि पाकिस्तानी सेनाएं भारत और बांग्लादेश की संयुक्त कमान के सामने आत्मसमर्पण करें.
समय बीतता जा रहा था. जैकब नियाज़ी को कोने में ले गए. उन्होंने उनसे कहा कि अगर उन्होंने हथियार नहीं डाले तो वह उनके परिवारों की सुरक्षा की गारंटी नहीं ले सकते. लेकिन अगर वह समर्पण कर देते हैं, तो उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उनकी होगी.
जैकब ने कहा- मैं आपको फ़ैसला लेने के लिए तीस मिनट का समय देता हूँ. अगर आप समर्पण नहीं करते तो मैं ढाका पर बमबारी दोबारा शुरू करने का आदेश दे दूँगा.

ढाका के बाहरी इलाक़े में खड़े मेजर जनरल नागरा और ब्रिगेडियर क्लेर
अंदर ही अंदर जैकब की हालत ख़राब हो रही थी. नियाज़ी के पास ढाका में 26400 सैनिक थे जबकि भारत के पास सिर्फ़ 3000 सैनिक और वह भी ढाका से तीस किलोमीटर दूर !
अरोड़ा अपने दलबदल समेत एक दो घंटे में ढाका लैंड करने वाले थे और युद्ध विराम भी जल्द ख़त्म होने वाला था. जैकब के हाथ में कुछ भी नहीं था.
30 मिनट बाद जैकब जब नियाज़ी के कमरे में घुसे तो वहाँ सन्नाटा छाया हुआ था. आत्म समर्पण का दस्तावेज़ मेज़ पर रखा हुआ था.
जैकब ने नियाज़ी से पूछा क्या वह समर्पण स्वीकार करते हैं? नियाज़ी ने कोई जवाब नहीं दिया. उन्होंने यह सवाल तीन बार दोहराया. नियाज़ी फिर भी चुप रहे. जैकब ने दस्तावेज़ को उठाया और हवा में हिला कर कहा, ‘आई टेक इट एज़ एक्सेप्टेड.’
नियाज़ी फिर रोने लगे. जैकब नियाज़ी को फिर कोने में ले गए और उन्हें बताया कि समर्पण रेस कोर्स मैदान में होगा. नियाज़ी ने इसका सख़्त विरोध किया. इस बात पर भी असमंजस था कि नियाज़ी समर्पण किस चीज़ का करेंगे.
मेजर जनरल गंधर्व नागरा ने बताया था, "जैकब मुझसे कहने लगे कि इसको मनाओ कि यह कुछ तो सरेंडर करें. तो फिर मैंने नियाज़ी को एक साइड में ले जा कर कहा कि अब्दुल्ला तुम एक तलवार सरेंडर करो, तो वह कहने लगे पाकिस्तानी सेना में तलवार रखने का रिवाज नहीं है. तो फिर मैंने कहा कि तुम सरेंडर क्या करोगे? तुम्हारे पास तो कुछ भी नहीं है. लगता है तुम्हारी पेटी उतारनी पड़ेगी... या टोपी उतारनी पड़ेगी, जो ठीक नहीं लगेगा. फिर मैंने ही सलाह दी कि तुम एक पिस्टल लगाओ ओर पिस्टल उतार कर सरेंडर कर देना."
सरेंडर लंच
"जब यह संदेश लेकर मेरे एडीसी कैप्टेन हरतोश मेहता नियाज़ी के पास गए तो उन्होंने उनके साथ जनरल जमशेद को भेजा, जो ढाका गैरिसन के जीओसी थे. मैंने जनरल जमशेद की गाड़ी में बैठ कर उनका झंडा उतारा और 2-माउंटेन डिव का झंडा लगा दिया. जब मैं नियाज़ी के पास पहुँचा तो उन्होंने बहुत तपाक से मुझे रिसीव किया"
मेजर जनरल गंधर्व नागरा
इसके बाद सब लोग खाने के लिए मेस की तरफ़ बढ़े. ऑब्ज़र्वर अख़बार के गाविन यंग बाहर खड़े हुए थे. उन्होंने जैकब से अनुरोध किया क्या वह भी खाना खा सकते हैं. जैकब ने उन्हें अंदर बुला लिया.
वहाँ पर करीने से टेबुल लगी हुई थी... काँटे और छुरी और पूरे ताम-झाम के साथ. जैकब का कुछ भी खाने का मन नहीं हुआ. वह मेज़ के एक कोने में अपने एडीसी के साथ खड़े हो गए. बाद में गाविन ने अपने अख़बार ऑब्ज़र्वर के लिए दो पन्ने का लेख लिखा ’सरेंडर लंच.’
चार बजे नियाज़ी और जैकब जनरल अरोड़ा को लेने ढाका हवाई अड्डे पहुँचे. रास्ते में जैकब को दो भारतीय पैराट्रूपर दिखाई दिए. उन्होंने कार रोक कर उन्हें अपने पीछे आने के लिए कहा.
जैतूनी हरे रंग की मेजर जनरल की वर्दी पहने हुए एक व्यक्ति उनका तरफ़ बढ़ा. जैकब समझ गए कि वह मुक्ति बाहिनी के टाइगर सिद्दीकी हैं. उन्हें कुछ ख़तरे की बू आई. उन्होंने वहाँ मौजूद पेराट्रूपर्स से कहा कि वह नियाज़ी को कवर करें और सिद्दीकी की तरफ़ अपनी राइफ़लें तान दें.
जैकब ने विनम्रता पूर्वक सिद्दीकी से कहा कि वह हवाई अड्डे से चले जाएं. टाइगर टस से मस नहीं हुए. जैकब ने अपना अनुरोध दोहराया. टाइगर ने तब भी कोई जवाब नहीं दिया. जैकब ने तब चिल्ला कर कहा कि वह फ़ौरन अपने समर्थकों के साथ हवाई अड्डा छोड़ कर चले जाएं. इस बार जैकब की डाँट का असर हुआ.
"मैं आपको फ़ैसला लेने के लिए तीस मिनट का समय देता हूँ. अगर आप समर्पण नहीं करते तो मैं ढाका पर बमबारी दोबारा शुरू करने का आदेश दे दूँगा"
जनरल जैकब
साढ़े चार बजे अरोड़ा अपने दल बल के साथ पाँच एम क्यू हेलिकॉप्टर्स से ढाका हवाई अड्डे पर उतरे. रेसकोर्स मैदान पर पहले अरोड़ा ने गार्ड ऑफ़ ऑनर का निरीक्षण किया.
अरोडा और नियाज़ी एक मेज़ के सामने बैठे और दोनों ने आत्म समर्पण के दस्तवेज़ पर हस्ताक्षर किए. नियाज़ी ने अपने बिल्ले उतारे और अपना रिवॉल्वर जनरल अरोड़ा के हवाले कर दिया. नियाज़ी की आँखें एक बार फिर नम हो आईं.
अँधेरा हो रहा था. वहाँ पर मौजूद भीड़ चिल्लाने लगी. वह लोग नियाज़ी के ख़ून के प्यासे हो रहे थे. भारतीय सेना के वरिष्ठ अफ़सरों ने नियाज़ी के चारों तरफ़ घेरा बना दिया और उनको एक जीप में बैठा कर एक सुरक्षित जगह ले गए.
ढाका स्वतंत्र देश की स्वतंत्र राजधानी है
ठीक उसी समय इंदिरा गांधी संसद भवन के अपने दफ़्तर में स्वीडिश टेलीविज़न को एक इंटरव्यू दे रही थीं. तभी उनकी मेज़ पर रखा लाल टेलीफ़ोन बजा. रिसीवर पर उन्होंने सिर्फ़ चार शब्द कहे....यस...यस और थैंक यू. दूसरे छोर पर जनरल मानेक शॉ थे जो उन्हें बांग्लादेश में जीत की ख़बर दे रहे थे.
श्रीमती गांधी ने टेलीविज़न प्रोड्यूसर से माफ़ी माँगी और तेज़ क़दमों से लोक सभा की तरफ़ बढ़ीं. अभूतपूर्व शोर शराबे के बीच उन्होंने ऐलान किया- ढाका अब एक स्वतंत्र देश की स्वतंत्र राजधानी है. बाक़ी का उनका वक्तव्य तालियों की गड़गड़ाहट और नारेबाज़ी में डूब कर रह गया.
http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2011/12/111216_bangladesh_liberation_rf.shtml,,,,,,,

बांग्लादेश के विद्रोह के दौरान पाकिस्तान 1971

संडे टाइम्स के इसी लेख ने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया
ब्रिटेन के संडे टाइम्स में 13 जून 1971 को छपे एक लेख ने बांग्लादेश के विद्रोह के दौरान पाकिस्तान की बर्बर कार्रवाई की तस्वीर बयाँ कर दी. उस लेख ने रिपोर्टर के परिवार को छिपने के लिए मजबूर किया और साथ ही उसने बदल दिया इतिहास भी.
''भाग्य ने अब्दुल बारी का साथ छोड़ दिया था. पूर्वी बंगाल के हज़ारों लोगो की तरह उसने भी एक ग़लती कर दी थी- एक बड़ी ग़लती- और वो ग़लती थी पाकिस्तानी ग़श्ती दल के सामने दौड़ने की. वह सिर्फ़ 24 साल का था, उसके इर्द-गिर्द सैनिक खड़े थे. वह बुरी तरह काँप रहा था क्योंकि उसे पता था कि उसे गोली मारी जाने वाली है."

पिछली शताब्दी में दक्षिण एशिया में पत्रकारिता के सर्वाधिक प्रभावशाली लेखों में से एक कुछ इसी वर्णन के साथ शुरू हुआ था.
एंथनी मैस्करैन्हास एक पाकिस्तानी रिपोर्टर थे और ब्रिटेन के संडे टाइम्स के लिए लिखते थे. उन्होंने ही पहली बार दुनिया को बताया कि किस तरह पाकिस्तानी सेना ने अपने पूर्वी प्रांत में 1971 में विद्रोह को दबाने की हिंसक और बर्बर कोशिश की.
इसमें कोई शक नहीं कि मैस्करैन्हास के उस रिपोर्ट के बाद ही इस संघर्ष को समाप्त करने की शुरुआत हुई. इसी ने दुनिया भर में पाकिस्तानी कार्रवाई की निंदा करवाई और इसी के बाद भारत ने निर्णायक भूमिका अदा करने का फ़ैसला किया.
इंदिरा गाँधी
तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने उस समय संडे टाइम्स के संपादक हैरल्ड इवांस को बताया था कि उस लेख ने उन्हें इतनी गहराई तक सदमा पहुँचाया था कि उन्होंने 'निजी कूटनीतिक अभियान के तहत यूरोपीय नेताओं से बात की, रूस से चर्चा की जिससे भारतीय हमले की भूमिका तैयार की जा सके.'
ऐसा नहीं है कि मैस्करैन्हास यही करना चाहते थे. इवांस ने अपने संस्मरणों में लिखा है, "वह एक अच्छे रिपोर्टर थे जो ईमानदारी से अपना काम कर रहा था."
इसमें भी कोई शक नहीं कि वह एक साहसी पत्रकार थे, उस समय पाकिस्तान पर सैनिक शासन था और उन्हें पता था कि लेख छपने से पहले उन्हें देश छोड़कर भागना पड़ेगा. ये काम भी उस समय आसान नहीं था.
मैस्करैन्हास की विधवा इवोन याद करते हुए बताती हैं, "उनकी माँ ने हमेशा उनसे कहा था कि उन्हें उठकर सच बोलना चाहिए. वह मुझे बताते थे कि मेरे सामने पहाड़ भी खड़ा कर दो तो मैं उस पर चढ़ जाऊँगा, वह कभी डरते नहीं थे."
पूर्वी पाकिस्तान में जब मार्च 1971 में युद्ध शुरू हुआ तो मैस्करैन्हास कराची के एक प्रतिष्ठित पत्रकार थे और देश के सत्तारूढ़ लोगों के बीच उनकी अच्छी पैठ भी थी.
उस समय संघर्ष पूर्वी पाकिस्तानी पार्टी (आज की अवामी लीग) की चुनाव में जीत के बाद शुरू हुआ था जो उस क्षेत्र के लिए ज़्यादा स्वायत्तता की माँग कर रही थी.
एक ओर राजनीतिक दल और सेना नई सरकार के गठन पर चर्चा कर रहे थे तो दूसरी ओर कई बंगाली इस बात से आश्वस्त थे कि पश्चिमी पाकिस्तान जानबूझकर उनकी आकांक्षाओं को दबाने की कोशिश कर रहा है.
पत्रकारों का दौरा
उस समय हुए कई युद्धापराधों में से एक के तहत सैनिकों ने ढाका विश्वविद्यालय पर हमला किया, वहाँ छात्रों और प्रोफ़ेसरों को लाइन से खड़ा करके उन्हें गोली मार दी गई.
इसके बाद उनका आतंक का अभियान गाँवों की ओर गया जहाँ विद्रोह कर चुके सैनिकों के साथ उनका संघर्ष हुआ.

एंथनी का जन्म गोवा में हुआ था और पढ़ाई लिखाई कराची में
शुरुआत में सेना ने सोचा कि कुछ पाकिस्तानी पत्रकारों को वहाँ बुलाया जाए और दिखाया जाए कि उन्होंने कैसे सफलतापूर्वक 'स्वतंत्रता सेनानियों' को निबटा दिया है.
विदेशी पत्रकार तो पहले ही देश से निकाले जा चुके थे और पाकिस्तान ये भी दिखाना चाहता था कि दूसरा पक्ष किस तरह के अत्याचार कर रहा है. अवामी लीग समर्थकों पर आरोप था कि उन्होंने ऐसे दसियों हज़ार आम लोगों को मार दिया था जिनकी वफ़ादारी पर उन्हें शक था. वैसे इस युद्धापराध से वे आज भी इनकार करते हैं.
उस समय मैस्करैन्हास सहित आठ पत्रकारों को 10 दिन की प्रांत की यात्रा कराई गई. उसके बाद जब वे घर लौटे तो उनमें से सात ने तो अनुशासित होकर वही लिखा जो उनसे लिखने के लिए कहा गया था.
मगर एक ने वो लिखने से इनकार कर दिया.
इवोन मैस्करैन्हास याद करती हैं कि वह वापसी में कितने सकते में थे, "मैंने अपने पति को उस हालत में पहले कभी नहीं देखा था. वह बिल्कुल आश्चर्यचकित थे, तनाव में थे और काफ़ी भावुक भी. उन्होंने मुझे बताया कि उन्होंने जो भी देखा, उसके बारे में वह लिख नहीं पाएँगे बल्कि इसके बाद वो कभी कुछ नहीं लिख पाएँगे."
निश्चय ही वो जो कुछ लिखना चाह रहे थे वो पाकिस्तान में संभव नहीं था. सारे अख़बारों के लेख पहले सेना के पास जाते थे इसलिए मैस्करैन्हास ने पत्नि को बताया कि अगर उन्होंने ऐसा कुछ लिखा तो उन्हें भी गोली मार दी जाएगी.
पाकिस्तान से बचकर निकले
उन्होंने बहाना बनाया कि वह अपनी बीमार बहन को देखने लंदन जा रहे हैं और वहाँ पहुँचकर वह सीधे संडे टाइम्स के संपादक के दफ़्तर पहुँचे.
लेख का अंश
सैनिक टुकड़ियाँ विद्रोहियों को खदेड़ने के बाद नगरों और गाँवों में जाकर सामूहिक हत्या कर रही हैं. इसके बाद ऑफ़िसर्स मेस में रात में मैंने सुना कि ऐसे अफ़सर भी जो वैसे तो बहादुर और सम्मानजनक हैं वे भी दिन भर हुई हत्याओं की चर्चा कर रह हैं. तुमने कितने मारे- इसके जवाब में भी मेरे ज़ेहन में खुदे हुए हैं
इवांस आज भी उस बैठक को याद करते हैं, "देखने में एक सैनिक की तरह, मूँछों वाला मगर भावुक आँखें."
इवांस ने संस्मरण में लिखा है, "वह मार्च में बंगाली अत्याचारों से सकते में थे मगर उन्होंने बताया कि उसके बाद जो पाकिस्तानी सेना ने किया वो और बुरा था और कहीं बड़े पैमाने पर था."
मैस्करैन्हास ने उन्हें बताया कि उन्होंने बड़े पैमाने पर और सुनियोजित ढंग से हो रही हत्याएँ देखी हैं साथ ही उन्होंने सेना के अधिकारियों को ये भी कहते हुए सुना कि हत्या ही 'अंतिम उपाय' है.
इवांस ने वादा किया कि वो लेख संडे टाइम्स में छपेगा मगर उससे पहले इवोन और उनके बच्चों को सकुशल कराची से निकालना था.
ये तय किया गया था कि जब मैस्करैन्हास ये टेलीग्राम भेजेंगे कि 'ऐन का ऑपरेशन सफल रहा' तब वे कराची से सामान बाँधना शुरू कर देंगे.
इवोन को याद है कि उन्हें संदेश सुबह तीन बजे मिला था, "टेलीग्राम वाले ने सुब- दरवाज़ा खटखटाया. मैंने अपने बच्चों को उठाया और जब मैंने संदेश पढ़ा तो पता चला कि ओह अब तो हमें लंदन जाना है. ये काफ़ी डरावना था. मुझे सब कुछ पीछे छोड़कर जाना था."
इवोन बताती हैं, ''हम सब एक-एक सूटकेस ही ले पाए, हम रो रहे थे और हम पर मुर्दनी छाई थी."
मगर किसी को किसी तरह का शक नहीं हो इसलिए पहले ये तय किया गया था कि मैस्करैन्हास पाकिस्तान लौटेंगे और तभी उनका परिवार वहाँ से निकलेगा.
मगर पाकिस्तानियों को उस समय एक ही विदेश यात्रा की अनुमति थी. इसलिए उन्हें देश से निकलने का उपाय ख़ुद करना पड़ा और वह ज़मीनी रास्ते से अफ़ग़ानिस्तान पहुँचे.
लेख से तहलका
"लोग लंदन में काफ़ी गंभीर थे और हमसे तो कोई बात ही नहीं करता था. हम कराची में हँसते-मुस्कुराते रहते थे मगर उससे यहाँ सब अलग था. वैसे हमें उसका कोई अफ़सोस नहीं रहा"
इवोन मैस्करैन्हास
जिस दिन पूरा परिवार एक साथ लंदन में मिला उसके अगले दिन संडे टाइम्स ने वो लेख छापा जिसका शीर्षक था, 'जीनोसाइड' यानी जनसंहार.

मैस्करैन्हास का वो लेख काफ़ी प्रभावशाली था क्योंकि पाकिस्तान के जिन अधिकारियों के साथ उन्होंने समय बिताया था वो उन पर काफ़ी विश्वास करते थे.
''मैंने हत्या और आगज़नी का बर्बर अभियान देखा है. सैनिक टुकड़ियाँ विद्रोहियों को खदेड़ने के बाद नगरों और गाँवों में जाकर सामूहिक हत्या कर रही हैं. मैंने देखा है कि पूरे के पूरे गाँव पर दंडात्मक कार्रवाई हो रही है. इसके बाद ऑफ़िसर्स मेस में रात में मैंने सुना कि ऐसे अफ़सर भी जो वैसे तो बहादुर और सम्मानजनक हैं वे भी दिन भर हुई हत्याओं की चर्चा कर रह हैं. तुमने कितने मारे- इसके जवाब में भी मेरे ज़ेहन में खुदे हुए हैं.''
मैस्करैन्हास का लेख पाकिस्तान के नज़रिए से एक बहुत बड़ा धोखा था और उन पर दुश्मन का एजेंट होने के आरोप लगे. पाकिस्तान अब भी इस बात से इनकार करता है कि मैस्करैन्हास ने जिन घटनाओं का ज़िक्र किया है उसके सैनिकों ने कभी ऐसा किया. बल्कि पाकिस्तान को इसे भारत का दुष्प्रचार कहता है.
वैसे देश छोड़ने के बावजूद मैस्करैन्हास का देश में संपर्क बना रहा और उन्होंने 1979 में सबसे पहले बताया था कि पाकिस्तान ने परमाणु हथियार विकसित कर लिए हैं.
वैसे बांग्लादेश में उन्हें काफ़ी प्यार से याद किया जाता है और उनका वो लेख अब भी देश के लिबरेशन वॉर म्यूज़ियम में लगा है.
अब उनका परिवार एक नए और ठंडे देश में बस गया था. इवोन उसे याद करते हुए बताती हैं, "लोग लंदन में काफ़ी गंभीर थे और हमसे तो कोई बात ही नहीं करता था. हम कराची में हँसते-मुस्कुराते रहते थे मगर उससे यहाँ सब अलग था. वैसे हमें उसका कोई अफ़सोस नहीं रहा."

http://www.bbc.co.uk/hindi/southasia/2011/12/111216_bangladesh_times_mascarenhas_ms.shtml