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Saturday, August 18, 2012

कैसे करें अपना फेसबुक एकाउंट डिलीट

कैसे करें अपना फेसबुक एकाउंट डिलीट

कैसे करें अपना फेसबुक एकाउंट डिलीटसोशल नेटवर्किंग के दौर में यूं तो फेसबुक से एक दिन के लिए भी दूर होना मुश्‍किल है, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इससे पूरी तरह से ऊब चुके हैं। या फिर वे पूराना एकाउंट डिलीट करके नया एकाउंट बनाना चाहते हैं।  कुछ यूजर्स ऐसे भी हैं जिन्‍होंने शुरुआत में आनन फानन में सैकड़ों की तादाद में ‘फ्रेंड्स’ को एड कर लिया है और अब उनसे जल्‍द से जल्‍द छुटकारा पा कर नया अकाउंट बनाना चाहते हैं। 

जब बारी फेसबुक अकाउंट को डिलीट करने की आती है, तो ज्‍यादातर लोग खुद को इस मामले में असहाय पाते हैं। फेसबुक ने अपने फीचर में अकाउंट को डिलीट करने का आप्‍शन नहीं दिया है। कुछ मशक्‍कत कर भी ली जाए, तो आप केवल ‘डिएक्टिवेट योर अकाउंट’ तक ही पहुंच पाएगें।
इससे दूसरे यूजर आपका अकाउंट नहीं देख पाएगें, लेकिन आपकी पिक्‍चर और दूसरी सभी सामग्री सर्वर पर ही सेव रहतीं हैं। इसलिए अगर आप अगर आप अपना एकाउंट आगे नहीं चलाना चाहते हैं तो उसे पूरी तरह से डिलीट कर दीजिए-
इस लिंक पर जाइए-
अपना एकाउंट डिलीट करने के लिए सबसे पहले अपने एकाउंट में लॉग इन करके दसरे टैब में इस यूआरएल को इंटर करें।
अगर आप फेसबुक पर लॉग-इन नहीं हैं, तो सबसे पहले आपको लॉग इन होना पडेगा। इसके बाद यहां आपको सबमिट बटन पर क्‍लिक करना पडेगा। यूआरएल डालते ही आपके सामने एकाउंट डिलीट का ऑप्‍शन खुलकर सामने आ जाएगा। ध्‍यान रखे की सबमिट करने के बाद दो सप्‍ताह तक अपने एकाउंट को लॉग-इन ना करें। इस तरह आपका अकाउंट डिलीट हो जाएगा।

Thursday, August 16, 2012

पाकिस्तान ने खोली भारत के इस्लामी जेहादियों की पोल

पाकिस्तान ने खोली भारत के इस्लामी जेहादियों की पोल
  • बर्मा में मुस्लिम उत्पीडन की हकीकत का पर्दाफाश....!!!
  • पाकिस्तान ने खोली भारत के इस्लामी जेहादियों की पोल
  • बर्मा में मुस्लिमो के विरुद्ध हिंसा की झूंठी खबरे हुई बेनकाब
  • पाकिस्तान ने हिन्दुस्तान के इस्लामी जेहादियों को दिखाया सच का आईना
  • उल्टा चोर कोतबाल को डांटे बाली कहाबत साबित हुए बर्मा के हालात पर
  • हिन्दुस्तान के जेहादियों के मुहँ पर पाकिस्तानी तमाचा
  • भारत में मुस्लिम हितों की लड़ाई लड़ने बाली तीस्ता शीतलबाड़ ने भी खोली
  • भारत के पाकिस्तान परस्त जेहादियों की पोल
  • पाकिस्तान के एक नागरिक ने किया हिन्दुस्तान के दंगाईयो का पर्दाफाश
  • बर्मा में मुस्लिम उत्पीडन की झूंठी खबरों और फर्जी फोटो से भारत में दंगा
  • करने बालो को किया एक पाकिस्तानी ने बेनकाब
  • भारत में रह कर ‘’पाकिस्तान जिंदाबाद’’ के नारे लगाने बालो और ‘’पाकिस्तान
  • का झंडा फहराने बालो’’ के मुहँ पर पाकिस्तानी तमाचा ..
  • मुम्बई पुलिस कमिश्नर को सौपे तीस्ता शीतलबाड़ ने सबूत
  • फर्जी फोटो के आधार पर भारत में फैलाया गया था तनाव
Note ,,,,,, पूरी जानकारी के लिये नीचे दिए लिंक को जरुर देखे
(इस फोटो में दिख रहे बर्मा के बौद्ध अपने देश में बंगलादेशी घुसपैठियों द्वारा फैलाई जा रही हिंसा के खिलाफ शांतिपूर्वक ढंग से एक मंदिर में प्रार्थना करते हुए ..क्या आपको इनके चेहरों पर जेहादियों जैसी आक्रामकता या हिंसा के कोई भाव दिख रहे है.. इन्ही लोगो पर झूंठा इल्जाम लगाया गया है की इन लोगो ने हिंसा की थी )

पिछले काफी समय से सोशल नेटवर्क पर बर्मा में मारे जा रहे मुस्लिमो की तस्वीरे चर्चा का विषय थी ... इन फोटो के आधार पर भारत की मुस्लिम आवादी के वीच झूठी खबरे फैलाई गयी की बर्मा में बड़े पैमाने पर मुस्लिमो को मारा जा रहा है इन फोटो के आधार पर भारत के अंदर बहुत शातिराना तरीके से एक आन्दोलन को अंजाम दिया जा रहा था .. फर्जी फोटो को पूरे देश में फैला कर मुस्लिम समाज के कुछ लोगो ने एक गुस्से का निर्माण किया .. जिसमे मुस्लिम समाज के कुछ जिम्मेदार लोग भी शामिल थे ...इसमें कुछ पुलिस बाले भी शामिल थे जो मुम्बई पुलिस के कर्मचारी रहे है ....इन सब ने बहुत शातिराना तरीके से पूरे घटनाक्रम को अंजाम दिया.. जिसकी परिणति थी पिछले दिनों रांची और मुम्बई में हुए हिंसक प्रदर्शन और दंगा ब आगजनी ... |


इसी वीच पाकिस्तान के एक जिम्मेदार नागरिक ने बर्मा की घटनाओं की सच्चाई को बेनकाब कर भारत के उन इस्लामी जेहादियों और कुछ पढ़े लिखे उन मुस्लिमो को आईना दिखाया जो भारत में रह कर देश विरोधी हरकतों के समर्थन में सोशल नेटबर्क पर तकरीरे पढ़ रहे थे ...| सबसे पहले पाकिस्तान के नागरिक फराज अहमद ने बर्मा की घटनाओं और उन तस्वीरों की हकीकत को बेनकाव किया जिसके आधार पर भारत में तनाव को भडकाया जा रहा था .. फिर फराज से मिली जानकारी के बाद भारत में मुस्लिम हितों की लड़ाई लड़ने बाली तीस्ता शीतलबाड़ ने उन सबूतों को इक्कट्ठा कर मुम्बई के पुलिस आयुक्त को सौप दिया है ... जिन सज्जन को इन सबूतों के बारे में कोई शक हो बो मुम्बई पुलिस के कमिश्नर से संपर्क करने के साथ तीस्ता शीतलबाड़ से भी संपर्क कर सकते है ...क्यों की अगर ये सबूत किसी हिंदू संगठन ने दिए होते तो उन पर देश का सेकुलर और इस्लामी तबका अपनी आदत के अनुसार सबाल जरुर उठाता |
. लेकिन इस बार सबूत दिए है उस पाकिस्तान के एक जिम्मेदार और जागरूक तथा पढ़े लिखे नागरिक ने जिस पाकिस्तान के समर्थन में भारत में कुछ लोग जिंदाबाद के नारे लगाने के साथ पकिस्तान का झंडा फहराना अपनी शान समझते है ..नीचे दिए गए लिंक पाकिस्तानी नागरिक फराज अहमद और उनके द्वारा बर्मा की घटनाओं की असलियत से सम्बंधित है साथ ही इस समाचार पर दिल्ली से प्रकाशित दैनिक जागरण ने भी एक खबर छापी है .जिसको 16-08-2012 के दिल्ली से प्रकाशित अंक के पहले पन्ने पर देखा जा सक्ता है .!!!.
असम की साजिश का पर्दाफाश  विदेशी यूनाइटेड मुस्लिम नेशनलिस्ट आर्मी (उमना) का हाथमुम्बई की घटना में तो पाकिस्तान का झंडा फहराए जाने के साथ पुलिस ब मीडिया पर हमला भी किया गया .. इस घटना में पचास से जादा पुलिसकर्मी और पत्रकार घायल हुए थे ,,, पुलिस के हथियारों को लूटा गया साथ ही देश के शहीदों की याद में बने स्मारक ‘’ अमर जवान ज्योति को मुस्लिम दंगाईयो ने सरेआम तहस नहस किया जिसकी फोटो मीडिया में भी सार्वजानिक हो चुकी है .... इतना सब होने के बाद भी मुस्लिम समाज के जिम्मेदार लोगो ने इस घटना पर कोई शर्मिंदगी और अफ़सोस नहीं जाहिर किया ..

!मुंबई में हुई हिंसा सुनियोजित थी। इसके पीछे असम से आए किसी मुस्लिम नेता का हाथ ▌▌▌▌▌[CLICK Pic 4Full]






Wednesday, August 15, 2012

ई रीडर्स की मांग और लोकप्रियता

 

लोकप्रियता के दबाव और ई रीडर्स की मांग

पिछले करीब तीन महीनों से ई एल जेम्स की फिफ्टी शेड्स ट्रायोलॉजी यानि तीन किताबें –फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे, फिफ्टी शेड्स डार्कर, फिफ्टी शेड्स फ्रीड अमेरिका में प्रिंट और ई एडीशन दोनों श्रेणी में बेस्ट सेलर बनी हुई हैं । जेम्स की इन किताबों ने पूरे अमेरिका और यूरोप में इतनी धूम मचा दी है कि कोई इसपर फिल्म बना रहा है तो कोई उसके टेलीवीजन अधिकार खरीद रहा है । फिफ्टी शेड्स ट्रायोलॉजी लिखे जाने की कहानी भी बेहद दिलचस्प है । टीवी की नौतरी छोड़कर पारिवारिक जीवन और बच्चों की परवरिश के बीच एरिका ने शौकिया तौर पर फैनफिक्शन नाम के बेवसाइट पर मास्टर ऑफ यूनिवर्स के नाम से एक सीरीज लिखना शुरू किया । एरिका ने पहले तो स्टीफन मेयर की कहानियों की तर्ज पर प्रेम कहानियां लिखना शुरू किया जो काफी लोकप्रिय हुआ ।  लोकप्रियता के दबाव और ई रीडर्स की मांग पर उसे बार बार लिखने को मजबूर होना पड़ा । शौकिया लेखन पेशेवर लेखन में तब्दील हो गया । पाठकों के दबाव में एरिका ने अपनी कहानियों का पुर्नलेखन किया और उसे फिर से ई रीडर्स के लिए पेश कर दिया । पात्रों के नाम और कहानी के प्लॉट में बदलाव करके उसकी पहली किश्त बेवसाइट पर प्रकाशित हुई तो वह पूरे अमेरिका में वायरल की तरह फैल गई । चंद हफ्तों में एरिका लियोनॉर्ड का भी नाम बदल गया और वो बन गई ई एल जेम्स । उसकी इस लोकप्रियता को भुनाते हुए उसने ये ट्रायोलॉजी प्रकाशित करवा ली । इसके प्रकाशन के पहले ही प्री लांच बुकिंग से प्रकाशकों ने लाखों डॉलर कमाए । यह सब हुआ सिर्फ साल भर के अंदर ।
इस पूरे प्रसंग को लिखने का उद्देश्य यह बताना था कि ई बुक्स की बढती लोकप्रियता और उसके फायदों के मद्देनजर यूरोप और अमेरिका में लेखकों ने ज्यादा लिखना शुरू कर दिया है । उनकी पहली कोशिश ये होने लगी है कि वो अधीर पाठकों की झुधा को शांत करे जो कि अपने प्रिय लेखक की कृतियां एक टच से या एक क्लिक से डाउनलोड कर पढ़ना चाहता है । ई रीडिंग और ई राइटिंग के पहले के दौर में लेखक साल में एक कृति की रचना कर लेते थे तो उसे बेहद सक्रिय लेखक माना जाता था । जॉन ग्रीशम जैसा लोकप्रिय लेखक भी साल में एक ही किताब लिखता था । पाठकों को भी साल भर अपने प्रिय लेखकों की कृति का इंतजार रहता था । पुस्तक छपने की प्रक्रिया भी वक्त लगता था । पहले लेखकों के लिखे को टाइप किया जाता था । फिर उसकी दो तीन बार प्रूफरीडिंग होती थी । कवर डिजायन होता था । ले देकर हम कह सकते हैं कि लेखन से लेकर पाठकों तक पहुंचने की प्रक्रिया में काफी वक्त लग जाता था । यह वह दौर था जब पाठकों और किताबों के बीच एक भावनात्नक रिश्ता होता था । पाठक जब एकांत में हाथ में लेकर किताब पढ़ता था तो किताब के स्पर्श से वह उस किताब के लेखक और उसके पात्रों से एक तादात्मय बना लेता था । कई बार तो लेखक पाठक के बीच का भावनात्मक रिश्ता इतना मजबूत होता था कि पाठक वर्षों तक अपने प्रिय लेखक की कृति के इंतजार में बैठा रहता था और जब उसकी कोई किताब बाजार में आती थी तो उसे वो हाथों हाथ ले ले लेता था । लेकिन वक्त बदला, स्टाइल बदला, लेखन और प्रकाशन की प्रक्रिया बदली । अब तो ई लेखन का दौर आ गया है । ई लेखन और ई पाठक के इस दौर में पाठकों की रुचि में आधारभूत बदलाव देखने को मिल रहा है । पश्चिम के देशों में पाठकों की रुचि में इस बदलाव को रेखांकित किया जा सकता है । अब तो इंटरनेट के दौर में पाठकों का लेखकों से भावनात्मक संबंध की बजाए सीधा संवाद संभव हो गया है । लेखक ऑनलाइन रहते हैं तो पाठकों के साथ बातें भी करते हैं । ट्विटर पर सवालों के जवाब देते हैं । पेसबुक पर अपना स्टेटस अपडेट करते हैं । ई एल जेम्स की सुपरहिट ट्राय़ोलॉजी तो पाठकों के संवाद और सलाह का ही नतीजा है ।
 
दरअसल हमारे या विश्व के अन्य देशों के समाज में जो इंटरनेट पीढ़ी सामने आ रही है उनके पास धैर्य की कमी है । कह सकते हैं कि वो सबकुछ इंस्टैंट चाहती हैं । उनको लगता है कि इंतजार का विकल्प समय की बर्बादी है । अमेजोन या किंडल पर किताबें पढ़नेवाला ये पाठक समुदाय बस एक क्लिक या एक टच पर अपने पसंदीदा लेखक की नई कृति चाहता है । इससे लेखकों पर जो दबाव बना है उसका नतीजा यह है कि बड़े से बड़ा लेखक अब साल में कई कृतियों की रचना करने लगा । कई बड़े लेखक तो साल में दर्जनभर से ज्यादा किताबें लिखने लगे । जो कि ई रीडिंग और ई राइटिंग के दौर के पहले असंभव हुआ करता था । जैम्स पैटरसन जैसे बड़े लेखकों की रचनाओं में बढ़ोतरी साफ लक्षित की जा सकती है । पिछले साल पैटरसन ने बारह किताबें लिखी और एक सहलेखक के साथ यानि कुल तेरह । एक अनुमान के मुताबिक अगर पैटरसन के लेखन की रफ्तार कायम रही तो इस साल वो तेरह किताबें अकेले लिख ले जाएंगें । पैटरसन की सालभर में इतनी किताबें बाजार में आने के बावजूद ई पाठकों और सामान्य पाठकों के बीच उनका आकर्षण कम नहीं हुआ, लोकप्रियता में इजाफा हुआ है । लेकिन जेम्स पैटरसन की इस रफ्तार से कई साथी लेखक सदमे में हैं ।
ई रीडर्स की बढ़ती तादाद का फायदा प्रकाशक भी उठाना चाहते हैं, लिहाजा वो भी लेखकों पर ज्यादा से ज्यादा लिखने का दबाव बनाते हैं । प्रकाशकों को लगता है कि जो भी लेखक इंटरनेट की दुनिया में जितना ज्यादा चर्चित होगा वो उतना ही बड़ा स्टार होगा । जिसके नाम को किताबों की दुनिया में भुनाकर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है । इसके मद्देनजर प्रकाशकों ने एक रणनीति भी बनाई हुई है । अगर किसी बड़े लेखक की कोई अहम कृति प्रकाशित होनेवाली होती है तो प्रकाशक लेखकों से आग्रह कर पुस्तक प्रकाशन के पहले ई रीडर्स के लिए छोटी छोटी कहानियां लिखवाते हैं । जो कि सिर्फ डिजिटल फॉर्मेट में बी उपलब्ध होता है । इसका फायदा यह होता है कि छोटी कहानियों की लोकप्रियता से लेखक के पक्ष में एक माहौल बनता है और उसकी आगामी कृति के लिए पाठकवर्ग में एक उत्सुकता पैदा होती है । जब वह उत्सुकता अपने चरम पर होती है तो प्रकाशक बाजार में उक्त लेखक की किताब पेश कर देता है । उत्सुकता के उस माहौल का फायदा परोक्ष रूप से प्रकाशकों को होता है और वो मालामाल हो जाता है । इसमें कुछ गलत भी नहीं है क्योंकि कारोबार करनेवाले अपने फायदे की रणनीति बनाते ही हैं ।
मशहूर और बेहद लोकप्रिय ब्रिटिश थ्रिलर लेखक ली चाइल्ड ने भी अपने उपन्यास के पहले कई छोटी छोटी कहानियां सिर्फ डिजीटल फॉर्मेट में लिखी । उन्होंने साफ तौर पर माना कि ये कहानियां वो अपने आगामी उपन्यास के लिए पाठकों के बीच एक उत्सुकता का माहौल बनाने के लिए लिख रहे हैं । तो प्रकाशक के साथ-साथ लेखक भी अब ज्यादा से ज्यादा लिखकर उस कारोबारी रणनीति का हिस्सा बन रहे हैं । चाइल्ड ने माना है कि पश्चिम की दुनिया में सभी लेखक कमोबेश ऐसा कर रहे हैं और उनके मुताबिक दौड़ में बने रहने के लिए ऐसा करना बेहद जरूरी भी है । इन स्थितियों की तुलना में अगर हम हिंदी लेखकों की बात करें तो उनमें से कई वरिष्ठ लेखकों को अब भी सोशल नेटवर्किंग साइट्स सरे परहेज है । उनकी अपनी कोई बेवसाइट नहीं है । दो-चार प्रकाशकों को छोड़ दें तो हिंदी के प्रकाशकों की भी बेवसाइट नहीं है । हिंदी के वरिष्ठ लेखक अब भी फेसबुक और ट्विटर से परहेज करते नजर आते हैं । नतीजा यह कि हिंदी में लेखकों पर अब भी पाठकों का कोई दबाव नहीं, वो अपनी रफ्तार से लेखन करते हैं । फिर रोना रोते हैं कि पाछक नहीं । वक्त के साथ अगर नहीं चलेगें तो वक्त भी आपका इंतजार नहीं करेगा और आगे निकल जाएगा । हिंदी के लेखकों के लिए चेतने का वक्त है ।