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Tuesday, July 10, 2012

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजु-ए-कातिल में है ।
एक से करता नहीं क्यों दूसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफिल में है ।
यूँ खड़ा मकतल में कातिल कह रहा है बार-बार
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है?
ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार
अब तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफिल में है ।
वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमाँ,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है ।
खींच कर लाई है सबको कत्ल होने की उम्मींद,
आशिकों का आज जमघट कूंच-ए-कातिल में है ।
है लिये हथियार दुश्मन ताक में बैठा उधर
और हम तैय्यार हैं सीना लिये अपना इधर
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
हाथ जिनमें हो जुनून कटते नहीं तलवार से
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से
और भडकेगा जो शोला-सा हमारे दिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
हम तो निकले ही थे घर से बांधकर सर पे कफ़न
जाँ हथेली पर लिये लो बढ चले हैं ये कदम
जिंदगी तो अपनी मेहमाँ मौत की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
दिल मे तूफानों की टोली और नसों में इन्कलाब
होश दुश्मन के उडा देंगे हमें रोको न आज
दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंजिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

ભણતર અને કેળવણી જુદાં છે


ભણતર અને કેળવણી જુદાં છે

આપણે એ ન ભૂલીએ કે બાળકને ભણાવવામાં અને કેળવવામાં તફાવત છે. શાળાઓ બાળકને ભણાવવામાં અમુક હદ સુધીની જ ભૂમિકા ભજવી શકે, પણ આધુનિક શિક્ષણ પદ્ધતિની પોતાની ઘણી મર્યાદાઓ છે. એ જોતાં આપણે આપણાં બાળકોને ભણાવવામાં શાળાઓ પર વધારે પડતો મદાર ન રાખીએ. જીવનનું સાચું શિક્ષણ અને વ્યવહારલક્ષી કેળવણી તો વર્ગખંડની બહાર જ થઈ શકે. આપણે જો એમ માનતા હોઈએ કે ડિગ્રી મળી જાય એટલે આપણું ભણતર પૂરું થયું ગણાય, તો એ આપણી સૌથી મોટી ભૂલ છે. ખરું ભણતર અને સાચી કેળવણી તો વાસ્તવમાં શાળા-મહાશાળામાંથી બહાર નીકળ્યા પછી જ શરૂ થતું હોય છે. સૌથી ઉત્તમ શિક્ષક જીવન છે અને સૌથી શ્રેષ્ઠ શાળા પણ એ જ છે. ભાર વગર ભણવાની અને વ્યવહારુ ડહાપણ શિખવાડવાની સંભવિતતા જેટલી, એનામાં સમાયેલી છે એટલી શાળા-મહાશાળાઓમાં ક્યાંથી હોય ?! સાથે આપણે એ પણ ન ભૂલીએ કે બાળકના સૌથી ઉત્તમ શિક્ષક તો એના માબાપ જ નીવડી શકે છે !

तेरे खुशबु मे बसे ख़त

तेरे खुशबु मे बसे ख़त मैं जलाता कैसे,
जिनको दुनिया की निगाहों से छुपाये रखा,
जिनको इक उम्र कलेजे से लगाए रखा,

जिनका हर लफ्ज़ मुझे याद था पानी की तरह,

याद थे मुझको जो पैगाम-ऐ-जुबानी की तरह,
मुझ को प्यारे थे जो अनमोल निशानी की तरह,

तूने दुनिया की निगाहों से जो बचाकर लिखे,
सालाहा-साल मेरे नाम बराबर लिखे,
कभी दिन में तो कभी रात में उठकर लिखे,

तेरे खुशबु मे बसे ख़त मैं जलाता कैसे,
प्यार मे डूबे हुए ख़त मैं जलाता कैसे,
तेरे हाथों के लिखे ख़त मैं जलाता कैसे,

तेरे ख़त आज मैं गंगा में बहा आया हूँ,
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ,